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अधूरी इबादत भाग~43

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~43 फासलों के बीच हम 

 

काम्या रैना… एक ऐसा नाम जो किसी पहचान की मोहताज नहीं था। मशहूर फैशन डिज़ाइनर, कई national और international fashion weeks की consistent शो-स्टॉपर, luxury lifestyle magazine के कवर पर चमकता चेहरा और Pune के सबसे रईस इलाके में बने उस glass-walled penthouse की रानी… जहाँ से शहर की चकाचौंध रातों में उसकी ही तरह तन्हा चमकती दिखती थी।

सिल्क की emerald green slit gown, six-inch high heels, diamond-studded smartwatch, curated nail art और एक flawless attitude….. ऐसा लग रह था जैसे काम्या किसी magazine shoot से निकल कर सीधी अपने रूम में आ गई हो। 

उसके माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे, पर दौलत और रुतबे में वो किसी राजा-रानी से कम नहीं थे। 

और उसका पति? एकांश राठौड़….. 

फेमस फोटो और वीडियो ग्राफर, जो कभी दुनियाभर की शादियाँ, शूट्स और फिल्म फेस्ट कवर करता था, अब शादी के बाद सिर्फ काम्या के लिए काम करता था। 

उनकी शादी उतनी ही ग्रैंड थी, जितनी उनकी दुनिया…. लेकिन उस दुनिया के पर्दे के पीछे, कुछ अधूरा सा पल रहा था।

जब एकांश के चीखने की आवाज़ें घर की साज़-सज्जा में दरार की तरह गूंजने लगीं, तो काम्या का धैर्य टूटा। वो अपने रूम से निकली, बालों में लगा महँगा क्लिप अब भी चमक रहा था, लेकिन चेहरे पर एक भी शिकन की जगह अब लावा बह रहा था।

उसने देखा एकांश की उथल-पुथल में डूबा हुआ था। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में जैसे कोई भटका हुआ तूफ़ान हो जो दिशा भूल गया हो। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था, पर वो कंपन भीतर के दर्द का नहीं, किसी खोए हुए पल को दोबारा छू लेने की बेतुकी कोशिश का था। 

“ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?” उसने पूछा—आवाज़ सख्त, आँखें सवालों से भरी।

मगर एकांश… वो जैसे किसी और ही दुनिया में था। उसकी आँखों में एक पागलपन था, चेहरा पसीने से तर, होठ बुदबुदा रहे थे। 

वो जैसे हवा में किसी के होने का भ्रम जी रहा था। और उस भ्रम में, वो नाम निकल गया… “रूहानी।”

बस… इतना ही सुनना था, काम्या का चेहरा गुस्से से जल उठा, उसने एक झटके में एकांश की बाँह पकड़ी और पूरे ज़ोर से झटकते हुए तमाचा जड़ दिया।

“होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।

एकांश ठिठक गया। पलकें फड़कने लगीं। चेहरा जैसे गर्म रेत पर गिरा हो… वो एक पल को देखता रहा, फिर बुदबुदाया, “I’m sorry…” और बिना एक और शब्द बोले अपने कमरे की ओर चला गया। 

कुछ देर बाद, कपड़े बदलकर, चेहरा धोकर, बाल सँवारकर… वो ड्रॉइंग रूम में लौटा तो देखा, काम्या वही थी, पर अब उसका चेहरा शांत था। पहली बार उसके हाथ में कोई luxury purse नहीं, बल्कि first aid box था। 

वो professionally composed expression, जो वो runway पर रखती थी, अब भी था… बस उस calmness के नीचे कुछ टूटा हुआ तैर रहा था।

एकांश चुपचाप उसके बगल बैठ गया। उसके चेहरे पर अब कोई ग़ुस्सा नहीं था… कोई प्यार भी नहीं। सिर्फ एक खालीपन था, जो ointment की ठंडक से भी नहीं भर पा रहा था। 

काम्या उसके और पास खिसक आई, जैसे कई मुद्दों को hold पर रख दिया हो। उसने उसका हाथ उठाया और बहुत नर्मी से, उस जख्मी जगह पर ointment लगाने लगी। उसकी उंगलियाँ expert थीं…. न सख्त, न बहुत कोमल… बस उतनी ही कि घाव भर सके, बिना कुछ कहे।

कमरे की हवा गाढ़ी हो चुकी थी, जैसे हर साँस किसी अधूरे वादे की राख समेटे चल रही हो। एकांश की उंगलियाँ अभी भी उस पट्टी की गर्माहट महसूस कर रही थीं, जो काम्या ने उसके जख्मी हाथ पर बांधी थी। 

उसकी नज़रें फर्श पर जमी थीं, लेकिन ज़हन में अब भी रूहानी की छाया गूंज रही थी…. जैसे वो अभी भी वहाँ खड़ी हो, और कोई उसे ज़बरदस्ती वापस खींच रहा हो।

काम्या के होंठों पर एक फीकी मुस्कान तैर रही थी…. वो मुस्कान जिसमें नमी नहीं, नफ़रत की नोंक छुपी थी।

“तुम्हारे ज़ख्म की मरहम तो लगा दी, अब दिल के लिए भी कुछ चाहिए?” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन हर शब्द किसी surgical blade की तरह काटता चला गया। 

“या वो कोई और लगाए?”

एकांश ने आंखें उठाईं, धीमे से कहा, “काम्या… प्लीज़… अभी नहीं।”

लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही काम्या का गुस्सा दहाड़ बनकर फूट पड़ा, “कब? जब तुम पूरी तरह उस Illusion के साथ जीने लगो?”

उसका चेहरा अब केवल गुस्से से नहीं, अपमान की पीड़ा से भी तप रहा था। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे दिल की आग सांसों के रास्ते बाहर निकलने को मचल रही हो।

“क्या तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुम्हारी ये हालत देखकर कैसा लगता है?” उसकी आँखों में आँसू की नहीं, जवाब की मांग थी।

एकांश ने हल्की साँस ली, जैसे भीतर कुछ जकड़ रहा हो, “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं परफेक्ट हूं।”

“नहीं,” काम्या ने दाँत भींचते हुए कहा, “तुमने सिर्फ ये साबित किया है कि मैं irrelevant हूं। तुम्हारे लिए, मैं बस एक नाम हूं… एक well-dressed distraction… nothing more.”

एकांश की निगाहें अब उसके चेहरे से हटकर सामने की दीवार पर टिक गईं। दीवार पर टँगा वो बड़ा सा मिरर अब उसके अंदर झाँक रहा था। 

ठंडेपन से उसने कहा, “तुम्हें जो चाहिए था….. status, success, lifestyle…… सब कुछ तो है न। और मैं… एकांश राठौड़… वो भी तो मिल गया न तुम्हें। फिर शिकायत किस बात की?”

काम्या की आँखों में कुछ काँपा, दर्द की परत में दबा हुआ सच। वो फुसफुसाई, “मैंने तुमसे सौदे नहीं किए थे, एकांश… मैंने तुमसे सच में प्यार किया….. पर तुमने मुझे कभी उस क़ीमत पर चाहा ही नहीं।”

कुछ पल के लिए कमरे में फिर वही सन्नाटा। 

एकांश ने नज़रें झुकाईं, जैसे अपने शब्दों की ही सच्चाई उसे कचोट रही हो। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं…. जैसे सोच और शर्म एक-दूसरे से टकरा रही हों।

उसकी आवाज़ आई, धीमी और डूबती हुई, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई खिड़की खुली छोड़ दी गई हो और अब हवा की सिसकियाँ भीतर घुस रही हों।

“काम्या… हर किसी का दर्द से जूझने का अपना तरीका होता है,” उसने कहा, मानो ये शब्द नहीं, कोई टूटी हुई ढाल हो जिसे वो अपने खिलाफ उठाने की कोशिश कर रहा हो।

“मेरा तरीका… शायद थोड़ा उलझा हुआ है, लेकिन… मैं कोशिश कर रहा हूँ, सच में।”

काम्या का चेहरा अब सख़्त था, लेकिन उसकी आँखों में कोई तूफ़ान हिलोरें मार रहा था। “तुम्हारा ‘तरीका’… एक दूसरी औरत के नाम को बड़बड़ाना है, उसे अपने hallucinations में छूना… और फिर sorry बोलकर बाथरूम में छुप जाना?”

एकांश का सिर झटका, “रूहानी कोई ‘दूसरी औरत’ नहीं है।”

उस एक वाक्य ने जैसे काम्या के भीतर किसी मृत volcano को जगा दिया। उसने एकदम शांत लहजे में कहा, “हां… और मैं कभी पहली नहीं थी।”

वो उठी। हाई हील्स की खनक ने जैसे कमरे की चुप्पी को चीर दिया—हर कदम ऐसा, मानो फर्श पर नहीं, किसी गहरे राज़ पर रखा जा रहा हो। 

एकांश वहीं बैठा रह गया….. उस खाली first-aid box के पास, जो अब पट्टी से ज़्यादा, उसके अंदर की टूट-फूट की गवाही दे रहा था।

फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला। उंगलियाँ काँप रही थीं, जैसे दिल और दिमाग आपस में लड़ रहे हों। उसने फोन अनलॉक किया। Contacts खोले।

स्क्रॉल किया…

“Ruhani 💔” 

नाम अब भी सेव था, delete कभी कर नहीं पाया था।

उसने स्क्रीन को कुछ सेकंड देखा, जैसे उसमें रूहानी की आँखें झाँक रही हों… पूछ रही हों,”अब क्यों?”

थोड़ी देर वो यूँ ही बैठा रहा। कमरे में सिर्फ मोबाइल की नीली रौशनी थी और अचानक, उसने call button दबा दिया।

Tring… tring… tring…

हर रिंग एक heartbeat जैसी थी, धीमी, भारी, और किसी अनकही उम्मीद से भरी।

फिर… क्लिक। call connect हो गया। पर दूसरी तरफ… सन्नाटा।

न कोई “Hello” न कोई सांस न कोई हलचल….. बस… एक breathing silence जैसे किसी बंद कमरे में कोई अपनी साँसें रोककर सुन रहा हो।

एकांश की उँगलियाँ काँप गईं। उसने धीमे से फुसफुसाया, “रूहानी…?”

कोई जवाब नहीं।

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क्या उस breathing silence के पीछे वाकई कोई था… या ये भी एकांश की उसी उलझी हुई दुनिया का हिस्सा था?

अगर रूहानी सच में सुन रही थी… तो अब वो क्या सोच रही होगी?

काम्या के हर कदम की खनक अब किसी गहरे राज़ को जगा रही है… क्या वो राज़ कभी उजाला देखेगा?

 

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