🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~42

पढ़ने का समय : 8 मिनट

भाग~42 क्या वो लौट आई? 

 

रूहानी कैब की खिड़की से बाहर देख रही थी, शहर की भीड़ में खोए चेहरों को, तेज़ भागती गाड़ियों को और उन धूप की किरणों को जो शाम होते-होते सुनहरी उदासी में बदल जाती थीं। 

मन में हल्की-सी थकावट थी, पर साथ ही एक जिद भी थी, टूटे दिन की टहनियों से उम्मीद के फूल उगाने की कोशिश।

स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी की तारीख तय हो चुकी थी, और उसने सोचा कि अगर उसी दिन मीना की बेटी गुनगुन का बर्थडे भी मना लिया जाए, तो बच्ची की आँखों में अपनापन महसूस करने की चमक भी आ जाएगी।

“वैसे भी… मैं गुनगुन के लिए ड्रेस डिज़ाइन तो कर ही रही हूँ,” रूहानी ने खुद से बुदबुदाते हुए सोचा, एक मुलायम मुस्कान के साथ।

कैब रुकी, वो उतरी, हाथ में कुछ सैंपल्स और पर्स थामे, और धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ाए। दरवाज़ा खोलते ही सबसे पहले हॉल की खामोशी ने उसका स्वागत किया, वो खामोशी जो किसी की कमी से ज्यादा, किसी सोच में डूबे होने का संकेत लग रही थी। 

अद्वैत वहां नहीं था, जबकि आमतौर पर इस वक़्त वो वही होता था, कॉफी मग के साथ या किसी किताब में उलझा हुआ।

रूहानी ने मोबाइल निकाला, कॉल लगाया। पहली ही बेल में उठा लिया अद्वैत ने।

“कहाँ हो?” उसने सीधा पूछा।

“स्टडी रूम में,” अद्वैत की आवाज़ आई, थोड़ी थकी हुई, पर हमेशा की तरह स्थिर।

“नीचे हॉल में आओगे? कुछ बात करनी है,” रूहानी ने कहा, आवाज़ में ना कोई झिझक थी, ना कोई बनावट, सिर्फ़ एक सादगी थी, जिसमें रिश्तों के सारे स्पेस टंगे हुए थे।

फोन कटते ही उसने काँच की मेज पर सैंपल्स फैला दिए, हर रंग, हर डिज़ाइन जैसे गुनगुन के चेहरे की मुस्कान की कल्पना बनकर उसके आगे बिछ गए थे। 

मन में अब भी हल्की हिचकिचाहट थी, न जाने अद्वैत को उसका सुझाव कैसा लगेगा। पर फिर भी, वो जानती थी कि जिन रिश्तों में maturity हो, वहाँ छोटी-छोटी बातें भी बन सकती हैं।

“काश लोग ऐसे ही छोटी खुशियों को बाँटने में उतना ही उत्साहित हों, जितना कि बड़े इवेंट्स की प्लानिंग में होते हैं,” रूहानी ने बेजान टेबल की ओर देखते हुए कहा, जैसे कोई पेंटिंग अधूरी छोड़कर रंग सोच रहा हो।

अद्वैत जब स्टडी रूम से नीचे आया, तो उसकी चाल में हमेशा वाली थकान नहीं थी, लेकिन एक अजीब-सी उदासी उसके चेहरे पर छाई हुई थी। 

रूहानी सोफ़े पर बैठी हुई थी, सामने मेज़ पर इनविटेशन कार्ड और कुछ सैंपल्स फैले थे। कमरा हल्के पीले लैंप की रोशनी में डूबा हुआ था, जो दोनों की मौजूदगी को और भी गहरा बनाता जा रहा था।

अद्वैत ने सीधे रूहानी के चेहरे को देखकर पूछा, “क्या बात करनी थी अभी? डिनर का टाइम तो वैसे भी होने वाला है।”

रूहानी ने नज़रें उठाईं, फिर शांत लहजे में कहा, “इसीलिए तो अब बात करनी सोची… क्योंकि तुम तो डिनर के टाइम कभी बात नहीं करते हो?”

उसकी आवाज़ में शिकवा नहीं था, बस एक स्मृति थी, उन नियमों की, जो दोनों ने बिना ज़्यादा कहे बना लिए थे।

अद्वैत थोड़ा मुस्कराया, “तो आज तुमने मुझे नियम तोड़ने से पहले बुला लिया?”

रूहानी ने नजर झुकाकर कहा, “शायद… या शायद ये भी एक रूल है जो मैंने खुद के लिए बना लिया।”

वो उठी और मेज़ से एक इनविटेशन कार्ड उठाकर अद्वैत की ओर बढ़ाया।

“ये लो… तुम्हारे लिए,” उसने कहा।

अद्वैत ने कार्ड लिया, उस पर उंगलियाँ फिराईं, जैसे हर अक्षर को महसूस करना चाहता हो।

“Well… thank you, इतनी बड़ी रकम देने के लिए,” रूहानी बोली, “और तुमने actual reason भी नहीं पूछा, पता नहीं क्यों… लेकिन मैं ही बता देती हूँ। मैंने विमान नगर के पास धनौरी में अपना नया स्टूडियो खरीदा है stich & soul।”

अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी तरफ़ नज़रें उठाईं, बिलकुल खाली, जैसे उसका मन कुछ पलों के लिए वहीं अटका हो गया हो।

“दो दिन बाद मेरे studio की opening ceremony है,” रूहानी ने धीमे से जोड़ा।

वो बोल रही थी, लेकिन आँखें बार-बार अद्वैत के चेहरे पर टिक जा रही थीं, जैसे कुछ खोज रही हो वहाँ।

“तो… तुम्हें इनवाइट करना बनता है,” उसने मुस्कराते हुए कहा, “आख़िर कुछ तो रिश्ता है हमारा… नाम का ही सही।”

फिर हल्का सा रुककर, जैसे खुद से कह रही हो, “मतलब… कुछ मर्यादाएँ तो निभानी पड़ती हैं, है न?”

अद्वैत कुछ नहीं बोला। उसके होंठ थोड़े खुले थे, लेकिन शब्द कहीं अटक से गए थे।

“Chief guest के तौर पर आ सकते हो,” रूहानी ने हिम्मत से कहा, “I mean… अगर तुम्हारे schedule में fit हो।”

वो पल थोड़े अजीब थे, एक formal आमंत्रण, जो उस रिश्ते के भीतर से निकला था जिसमें कभी personal होने की इजाज़त नहीं थी।

अद्वैत की चुप्पी देख रूहानी खुद ही हँस पड़ी, एक हल्की, almost sarcastic हँसी।

“Oh sorry, I forget…” उसने कहा, “तुम अपनी fee भी तो लोगे, right?”

अद्वैत की भौंहें थोड़ी उठीं, लेकिन अब भी उसने कुछ नहीं कहा।

“So… Mr. Bestselling Writer, Mr. Adwait Awasthi… आप कितना charge करेंगे?” उसकी आवाज़ में अब एक playful taunt था, जो वो अक्सर खुद को ढाल देने के लिए इस्तेमाल करती थी।

फिर कुछ याद आया उसे, और उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।

“Ouch,” उसने कहा, “मैं तो सही में भूल गई… तुम तो यही बोलोगे ना कि ‘मेरे ही पैसे मुझे वापस कर रही हो?’”

अद्वैत की आँखें अब उसकी तरफ़ सीधी टिक चुकी थीं, पर होंठ अब भी बंद थे।

“Don’t worry,” रूहानी ने कंधे उचकाते हुए कहा, “मेरी little savings हैं… उसमें से दे दूँगी।”

उसके चेहरे पर एक pride थी, लेकिन उस pride में एक अकेलापन भी छुपा था, जैसे वो दुनिया को साबित करना चाहती हो कि वो खुद के लिए काफी है, पर उसके भीतर कहीं एक कोना अब भी चाहता था कि कोई बिना कहे उसे थाम ले, बिना शर्तों के।

अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी ओर बढ़ा, एक पल को कुछ कहने के लिए होंठ खुले, लेकिन वो फिर रुक गया।

कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई थी, जैसे शब्दों के बजाय अब खामोशियाँ ही संवाद कर रही हों।

और रूहानी?

वो वही खड़ी थी, अपनी बनाई हुई सीमाओं के भीतर, फिर भी उम्मीद से थोड़ा आगे… जैसे चाहती हो कि इस बार कोई रेखा पार कर जाए… सिर्फ़ एक बार… बस एक बार।

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

एकांश ने जैसे ही वो आवाज़ सुनी, उसकी पलकों की सिलवटें थरथरा उठीं, जैसे बरसों से सूखे पड़े किसी पुराने खत के अक्षर अचानक ज़िंदा हो उठे हों।

गर्दन धीमी-सी हरकत में उठी, मानो उसे डर हो कि अगर ज़रा भी जल्दी की, तो वह मंज़र बिखर जाएगा। और फिर… उसने देखा।

वो वही थी …. रूहानी।

उसके सामने खड़ी, बिल्कुल वैसी ही जैसे उसकी यादों में थी, वही मासूम आँखें, जिनमें एक वक़्त उसकी पूरी कायनात सांस लेती थी। 

वही धीमी साँसें, जो कभी उसके दिल की धड़कनों से ताल मिलाया करती थीं और वही हल्के मुस्कुराते होंठ, जिनमें उसकी ज़िन्दगी की सबसे गहरी तसल्ली लिपटी थी।

“एकांश…” वो बोली, बेहद नर्मी से, जैसे किसी टूटते हुए सपने की आवाज़ हो, धीमी, लेकिन सीधी दिल में उतर जाने वाली।

एकांश के भीतर कुछ दरक गया। उसका पूरा वजूद जैसे किसी पुराने मंदिर की मूर्ति की तरह थरथरा उठा, जिसमें सालों से किसी ने आस्था नहीं जगाई थी। 

वो उठ खड़ा हुआ और धीमे-धीमे उसके पास गया। कांपते हाथों से उसके चेहरे को छूने लगा…. उसके गाल, उसकी ठोड़ी। हर स्पर्श में वो अपने टूटे हिस्सों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था।

वो रो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें… जैसे किसी अंधे कुएँ में उतरी हुई थीं….. गहरी, नम, और खोई हुईं। वो अब शब्दों में नहीं, सिर्फ स्पर्श में जी रहा था। जैसे ज़िन्दगी ने भाषा छोड़ दी हो।

रूहानी चुप रही। ना कोई विरोध, ना कोई सवाल। जैसे वो कोई हक़ीक़त नहीं, एकांश की टूटी हुई कल्पना की सजीव मूर्ति हो…. जो सिर्फ उसके लिए वहाँ खड़ी थी।

एकांश ने उसे बाँहों में खींच लिया। उसकी साँसें अब तेज़ थीं, अधूरी थीं। उसके होठों ने उसकी त्वचा को छुआ…. माथे से होते हुए उसकी गर्दन तक। 

हर चुम्बन में एक अधूरा वादा था, हर साँस में एक बुझता हुआ इश्क़। एक वो इश्क़ जिसे वक़्त ने अधूरा छोड़ दिया था, और आज ये लम्हा जैसे उसे पूरा करने आया था।

“तुम मेरी हो… हमेशा से,” वो बुदबुदाया, उसकी गर्दन में मुंह छुपाए हुए, “अब कोई फ़ासला नहीं… कोई वादा नहीं… बस तुम और मैं…”

लेकिन…

जैसे ही उसके होठ नीचे फिसले, जैसे ही उसका स्पर्श उस सरहद की ओर बढ़ा जहाँ इज़्ज़त और इच्छा की लकीरें धुंधली पड़ने लगती हैं…

चटाक!!

एक ज़ोरदार तमाचा उसकी दुनिया को झकझोर गया। जैसे कोई शीशा हो, जिसमें वो रूहानी को देख रहा था और अचानक किसी ने उसे पत्थर मार दिया हो। सब कुछ चकनाचूर।

वो पीछे हटा। चेहरा सुलग उठा, और उसकी आँखों ने काँपते हुए सामने देखा …. 

वो रूहानी नहीं थी।

उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ, आँखों में जलता हुआ तूफ़ान। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे हर साँस एक ज्वालामुखी को थामे हुए हो। उसने कसकर एकांश की बाहें झटक दीं…. जैसे किसी ज़हर को अपनी त्वचा से दूर फेंक रही हो।

“होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था… जलन, गुस्सा, और टूटता हुआ भरोसा।

एकांश वहीं खड़ा रह गया। जैसे किसी सपने से गिर पड़ा हो… हकीकत की सख़्त ज़मीन पर, नंगे पाँव, बेआवाज़।

उसके हाथ अब भी हवा में थे… किसी को छूने की मुद्रा में, लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था। 

——————

क्या अद्वैत उस इन्विटेशन कार्ड के साथ रूहानी के जज़्बात पढ़ पाएगा, या फिर वो भी उस रिश्ते की तरह अनकहे रह जाएंगे? 

क्या एकांश वाक़ई रूहानी को देख रहा था… या बस अपनी ही अधूरी चाहत को छूने की नाकाम कोशिश कर रहा था? 

कौन थी वो… जो एकांश की बाँहों में थी? 

 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *