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अधूरी इबादत भाग~34

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~34 नज़रें जब मिलें 

 

धनौरी की उस धूलभरी सड़क पर, जहाँ हर मोड़ जैसे किसी अधूरे किस्से की तरह चुप खड़ा था, रूहानी की सांसें एक अनकहे डर और उम्मीद के दो सिरों के बीच झूल रही थीं। 

उस पुरानी दुकान के सामने खड़े होकर उसने पल भर को आँखें बंद कीं…. मन ही मन अपनी माँ की वो बात याद आई, “हर सपना एक कीमत मांगता है, बेटा… सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत की भी।” लेकिन उस वृद्ध दुकानदार की जिद और चालाकी ने जैसे उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।

पर तभी मीना, जो अब तक शांत खड़ी थी, एकदम से बोल पड़ी, “बाबूजी, आप तो कह रहे थे कि आपको शाम की फ्लाइट है विदेश जाने की, और बेटा कह रहा था कि सारी प्रॉपर्टी बेचकर ही आना। अब अगर आप यही दुकान नहीं बेचेंगे, तो क्या बाकी टाइम बचा है जाने का?”

उसके शब्दों में कुछ ऐसा था जो दुकानदार को भीतर तक छू गया। वह चुप हुआ, फिर गहरी साँस लेकर बोला, “ठीक है… तुम लोग बार-बार पूछ रहे हो, और मुझे भी अब देर नहीं करनी। लो, बीस लाख में तय रहा, पर आज ही कागज़ात पूरे होंगे।”

रूहानी की साँस जैसे एक झटके में लौट आई। एक पल के लिए उसे सब कुछ थमता सा महसूस हुआ, जैसे आसमान पर छाए बादल अचानक हट गए हों। उसने अपने बैग से दस्तावेज़ और पैसे निकाले, और कांपते हाथों से कागज़ात उसके सामने रख दिए। 

दुकानदार ने भी एक पुराना फाइल खोला और दोनों ने कागज़ों पर दस्तखत किए। रूहानी ने ध्यान से पढ़ा, हर लाइन को जाँचा, और जब आखिरी हस्ताक्षर किए, तो ऐसा लगा मानो उसने सिर्फ एक दुकान नहीं खरीदी, बल्कि अपने सपनों को एक ठिकाना दे दिया हो।

कागज़ साइन करने के बाद, वो कुर्सी से उठी, जैसे किसी जीत का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो।

उस पल रूहानी को कोई परवाह नहीं थी कि किसने उस दुकान को खरीदने की कोशिश की थी। अब वो जगह उसकी थी….. उसकी पहचान, उसकी मेहनत, उसका सपना। 

“अब कोई भी मुझे इस राह से पीछे नहीं कर सकता,” उसने मन ही मन कहा।

जैसे ही रूहानी को दुकान की चाबी मिली, उसकी मुट्ठी कस गई… वो सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसकी मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों की चाबी थी। उसने उसे हथेली में भरकर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, मानो उस धड़कते हुए पल को आत्मा में समेट लेना चाहती हो। 

फिर वह हल्के क़दमों से मीना की ओर मुड़ी और धीमे स्वर में बोली, “मीना, अब तुम विमान नगर वापस चली जाओ। मुझे हडपसर जाना है… वहाँ पुराने स्टूडियो का जो किराया बकाया है, वो चुकता करना है।”

मीना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “मैडम, चलिए मैं भी साथ चलती हूँ…”

रूहानी ने उसकी तरफ देख मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं मीना, आज अकेले जाने का मन है… ये सफर मेरा है। और तुम्हारे बच्चे भी घर पर अकेले होंगे, उनके बारे में भी तो सोचो। कल वापस आ जाना, बहुत सारा काम भी रहेगा।”

मीना थोड़ी मायूस होकर चुप हो गई, लेकिन रूहानी के चेहरे पर जो विश्वास की चमक थी, उसने उसे और कुछ कहने नहीं दिया। वो चुपचाप विदा लेकर चली गई।

हडपसर पहुँचते-पहुँचते दिन हल्का सा ढलने लगा था। स्टूडियो के बाहर खड़ी रूहानी ने एक बार फिर उस पुरानी इमारत को देखा…. धूल में लिपटा वो सपना, जिसे आज वो साफ करने आई थी। 

पुराने मकान मालिक से मिलकर उसने बाकी का किराया अदा किया, और पक्की रसीद ली। बुजुर्ग ने उसे दुआ देते हुए कहा, “बिटिया, इस बार अपना सपना अधूरा मत छोड़ना।”

लौटते वक़्त, रूहानी खुद से बुदबुदाई, “अब भी मेरे पास चार लाख हैं… उसी से मैं रिनोवेशन करवा लूंगी। और जो भी ज़रूरत का सामान होगा, मशीन, कपड़ा, डिजाइनिंग टेबल — सब कुछ ले आऊंगी।”

उसके चेहरे पर अब थकावट नहीं थी… थी तो सिर्फ़ उम्मीद की चमक और एक नर्म-सी मुस्कान — जैसे ज़िंदगी पहली बार उसकी ओर बढ़ी हो, बिना किसी शर्त के।

रूहानी जैसे ही सड़क किनारे कैब रोकने लगी, उसकी नज़र सामने से आ रहे एक दुबले-पतले, स्कूल यूनिफॉर्म में सजे लड़के पर पड़ी।

सड़क पार करता वह लड़का पलभर में उसे पहचान गया। उसकी आँखों में चमक उभरी, “दीदी!” 

वह दौड़कर रूहानी की ओर लपका। रूहानी की साँस जैसे रुक गई हो, वर्षों से भुलाया कोई एहसास दिल में दस्तक देने लगा।

दोनों बहन-भाई गले लगे, कसकर, जैसे वक्त के हर बीते पल को समेट लेना चाहते हों। रूहानी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “कैसा है मेरा छोटा यश? और मम्मी-पापा कैसे हैं?”

यश ने चुपचाप खुद को अलग किया और थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “आपकी वजह से ही अब मैं आपको फोन नहीं करता, दीदी। आप ही ने तो कहा था ना, मुझसे कोई संपर्क मत करना… वरना मम्मी-पापा मेरा फ़ोन भी छीन लेंगे।”

रूहानी की आँखें भीग आईं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की। कुछ पल चुप रहकर वो बोली, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था यश… क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें डाँट पड़े। तू उनके लाडले बेटे है, वो तुझे बहुत चाहते हैं।”

यश ने गर्दन झुकाई और धीमे से कहा, “हाँ… लेकिन फिर भी, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ दीदी। दोस्तों के बीच तो रहता हूँ… पर वो जो बात जीजाजी में है… वो किसी में नहीं। आप जानती हो, मैं रोज़ उनके बारे में सबको बताता हूँ… जीजू ऐसे, जीजू वैसे…”

रूहानी बस उसकी हाँ में हाँ मिलाती रही, हल्की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाते हुए। 

फिर उसने उसकी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मुझे अब निकलना होगा यश… नहीं तो विमान नगर पहुँचते-पहुँचते रात बहुत हो जाएगी।”

यश ने चुपचाप सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में जो कसक थी, वो दूर तक रूहानी का पीछा करती रही।

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जब रूहानी विमान नगर अद्वैत के घर पहुँची, तो उसकी रूहानी की सारी थकान जैसे एक पल में झलकने लगी। सीधे अपने कमरे में जाकर नहाने चली गई, बिना यह सोचे कि अद्वैत घर में है या नहीं।

सुबह से बाहर भाग-दौड़, मानसिक उलझनों और सपनों की जद्दोजहद ने उसे थका दिया था। बाथरूम से निकली तो उसने ढीले पायजामा सेट को पहना था, जो हल्का रंग का था और भीगते बालों से गीला हो चुका था। 

वह तौलिये से अपने गीले बालों को धीरे-धीरे थपकाते हुए सूखाने की कोशिश में लगी थी, जैसे हर बूंद उसके भीतर की सारी बेचैनी को बहा ले जा रही हो।

उसने बिल्कुल भी महसूस नहीं किया कि अद्वैत उसके कमरे के बाहर खड़ा है, डिनर के लिए पूछने आया था, लेकिन अद्वैत का दिल जैसे रुक-रुक कर धड़क रहा था। 

उसकी आँखें रूहानी के हर छोटे-छोटे हाव-भाव को बड़े ही बारीकी से देख रही थीं…. उसके भीगे बाल, जो उसकी नाजुक गर्दन पर गिर रहे थे, तौलिये की कोमल छुअन, और वो हल्का सा कंपकपाना जो उसके चेहरे पर था। 

अंदर एक अजीब सी गर्माहट उठ रही थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। 

उसकी सांसें धीरे-धीरे तेज हो रही थीं, और दिल की गहराइयों में कोई अनकहा सवाल उठ रहा था। 

क्या ये सही है, क्या उसने अपने मन को इस तरह खो दिया? 

रूहानी ने जैसे ही आइने में अपनी परछाई देखी, उसे महसूस हुआ कि कोई दरवाजे के पास खड़ा है। वह तुरन्त तौलिये को अपने गर्दन और साइन के उस हिस्से पर ले आई, जहाँ पानी की बूंदें गिरी थीं।

अद्वैत को खड़ा पाकर उसने सकपकाते हुए कहा, “ऐसे क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ में नश्तर की तरह कड़कपन और एक छुपी हुई शर्मिंदगी दोनों झलक रही थी।

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क्या रूहानी के सपनों की ये दुकान सचमुच उसकी आज़ादी की चाबी बनेगी, या उसके अतीत के साये फिर से उस पर मंडराएंगे?

क्या अद्वैत के उस खामोश नज़र में छुपा वो अनकहा सवाल, रूहानी के दिल की सबसे नाज़ुक जगह को छू पाएगा, या दोनों के बीच की दीवारें और गहरी होंगी? 

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