🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~41

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~41 ये सब क्यों? 

शाम ढलने को थी और स्टूडियो की हल्की रोशनी अब गोधूलि की परछाइयों में घुलने लगी थी।

रेनोवेशन का काम लगभग पूरा हो चुका था….. हर दीवार अब सफेद नहीं, बल्कि उम्मीद की तरह उजली लग रही थी और हर कोना जैसे एक नई शुरुआत की सुगंध लिए हुए था।

मगर रूहानी का चेहरा आज फिर वही पुरानी थकान ओढ़े हुए था, जिसे किसी ने फिर से भीतर तक झकझोर दिया हो।

वो अपनी ही साँसों में उलझी हुई थी, जब अचानक मोबाइल की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन चमका। एक अनजाना नंबर… और सिर्फ़ एक लाइन: “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती।”

जैसे किसी ने उसके सीने पर ठंडा पानी डाल दिया हो। पलभर को तो उसका मन किया कि फोन वहीं दीवार पर फेंक दे। मगर फिर, जैसे आत्मा में जमी कोई पुरानी आदत जाग उठी…. खामोश रहना, जवाब न देना… सिर्फ़ महसूस करना। 

वो थक गई थी, हर बार साबित करते करते कि वो किसी को छीनने नहीं, बस खुद को ढूँढने निकली है।

धीरे से उसने एक स्टूल खींचा और उस पर बैठ गई। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, पर उसने उन्हें रोका नहीं। फोन का कैमरा ऑन किया। फ्रेम में स्टूडियो आया…. अभी अधूरा, पर उसका।

एक-एक करके उसने तस्वीरें खींचीं…. वो कोना जहाँ वर्क टेबल होगा, वो दीवार जहाँ स्केचिंग बोर्ड टंगेगा और वो छत जो कुछ कहती सी लगती थी।

इंस्टाग्राम खोला, कुछ पल देखा स्क्रीन को… फिर धीरे से टाइप किया….

Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

उसने पोस्ट बटन दबाया। जानती थी, फिर लोग बात करेंगे। कुछ उसे नौटंकी कहेंगे, कुछ एकांश का नाम जोड़कर तमाशा बनाएँगे।

पर इस बार रूहानी ने खुद से कहा, “कभी-कभी जवाब देना, जीत नहीं होती… जवाब न देना, शांति होती है।”

स्टूल पर बैठी वो लड़की उस शाम कोई एलान नहीं कर रही थी, बस अपने टूटे हिस्सों को फिर से जोड़ रही थी…. किसी आवाज़ के बिना, किसी शोर के बिना… पर बहुत कुछ कहती हुई।

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

कमरे का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि दीवारें तक काँप गईं, जैसे किसी ने भीतर छुपे तूफ़ान को बंद करने की नाकाम कोशिश की हो। 

एकांश राठौड़ अपने ही घर में दाख़िल हुआ, लेकिन उसके क़दमों की आवाज़ में ऐसा कंपन था, जैसे वो घर नहीं, किसी जंग के मैदान में दाख़िल हो रहा हो।

उसकी आँखों में जलन थी, पर आँसू नहीं… वो बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि रूहानी इतनी आसानी से उसकी ज़िंदगी से निकलकर, अब अद्वैत की ज़िंदगी में घुल गई है। 

उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन वो दौड़कर नहीं आया था, वो गुस्से से उबलते खून के साथ आया था, उस सवाल के साथ जो उसे नज़रें झुकाने नहीं दे रहा था और न ही किसी जवाब को स्वीकार करने की इजाज़त दे रहा था।

वो ड्राइंग रूम में पहुँचा और जैसे ही उसने सामने शीशे में खुद को देखा, उसकी आँखों की नसें तनी हुई दिखीं। होंठ कसे हुए, जबड़े की मांसपेशियाँ खिंची हुईं, और आँखों में एक साया था… चोट खाई हुई मोहब्बत का, अपमानित आत्मा का, और सबसे बढ़कर, छले गए दिल का।

“नहीं… ये नहीं हो सकता! ये… ये नहीं हो सकता!” एकांश की आवाज़ किसी टूटते हुए शीशे जैसी थी, चुभती, बिखरती और हर कोने में फैलती।

“रूहानी… तुझे हक किसने दिया, हाँ? कौन सा वक़्त था जिसमें तूने मुझे पीछे छोड़ना मंज़ूर कर लिया?” उसके स्वर में कोई तर्क नहीं था, सिर्फ़ एक बेकाबू, बेबस चीख़ थी, जो उसके सीने से निकलकर दीवारों पर टकरा रही थी।

“मैंने तो तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की, पर तुमने तो मुझे जीने भी नहीं दिया। जब तुम मेरे साथ थी, तो क्या मैं तुम्हें छूने की कोशिश करता था? करता क्या… तुमने कभी मौक़ा ही नहीं दिया। ‘शादी के बाद’ — ये तेरी टेप रिकॉर्डर वाली लाइन थी, रूहानी!” उसकी आवाज़ अब काँपती नहीं, फट रही थी।

उसने एक कुर्सी की तरफ़ देखा, पर हाथ बढ़ाने से खुद को रोक लिया। नहीं, ये उसका घर नहीं था…. ये उसकी पत्नी का था, और उसे अपनी औक़ात याद थी।

“मैंने तो सोचा था… जब तुम सुननोगी कि मैंने शादी कर ली है, तब तुम्हारी नींदें उड़ जाएँगी। तुम्हारे आँसू तुम्हारे गाल नहीं, तुम्हारी आत्मा से बहेंगे। तुम भागती हुई मेरे पास आओगी… पूछेगी क्यों किया ऐसा? तुम टूटी हुई होगी, पागलों की तरह… मेरी तस्वीरें देखोगी, हमारे पुराने मेसेज पढ़ोगी, रातों को जगकर खुद को कोसोगी कि क्यों मुझे छोड़ा।”

एकांश अब आगे बढ़ा, दीवार के पास खड़ा होकर ज़ोर से घूंसा मारा। एक झन्नाटेदार आवाज़ हुई, और उसके नखूनों के नीचे से खून की पतली धार बहने लगी।

“लेकिन नहीं… तुम तो जैसे मेरी ज़िंदगी से निकलकर सीधी अद्वैत की बाँहों में चली गई। और वो भी… कौन…. मेरा भाई। मेरा अपना खून… जिसे मैंने हमेशा भगवान की तरह चाहा, उसकी आँखों में अपने लिए इज़्ज़त देखी… और तू उसकी पत्नी बन गई?” उसकी आवाज़ अब रुकती-रुकती चल रही थी, जैसे हर शब्द कोई नश्तर हो जो ज़ुबान से निकलते ही दिल में उतर जाता हो।

“तुम्हारे उस वादे का क्या, रूहानी? कि शादी से पहले कुछ नहीं… कुछ भी नहीं। उस दिन, जब मैंनेतुम्हे छूना चाहा था, तुमने कहा था, ‘एकांश, शादी के बाद सबकुछ तुम्हारा होगा।’ 

“और आज? आज तुम उसके बिस्तर पर सोती हो, उसके साथ साँसें बाँटती हो? तो क्या अब तुम पूरी तरह से उसकी हो चुकी है? क्या अब तुम केवल उसके नाम से सिसकती हो?”

उसकी आँखों की कोरें भीगने लगीं, पर ये आँसू प्यार के नहीं थे…. ये अपमान और क्रोध के थे, वो जहर जो दिल में घुला हो पर बाहर बहने की इजाज़त अब मिला हो।

वो शीशे की तरफ़ गया, वहाँ खड़ा होकर खुद को देखा। उसका चेहरा फूला हुआ, आँखें लाल, और उंगलियों से खून बहता हुआ। उसने एक ग्लास उठाया, साफ़, बर्फ़ जैसा चमकता हुआ और उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा कि हाथ की नसों में दर्द उभर आया।

ग्लास उसके हाथ में धीरे-धीरे चटकने लगा। पहली दरार दिखी, फिर दूसरी। अगले ही पल एकांश की हथेली से काँच के टुकड़े चुभकर उसकी चमड़ी में समा गए। एक पल को उसने खुद को देखा….. खून गिरता हुआ, धीमी बूँदों में, जैसे हर बूँद एक टूटे रिश्ते की कहानी कह रही हो।

“मैं तुझसे नफरत नहीं कर सकता और खुद से प्यार अब होता नहीं। मैं सिर्फ तुम्हे चाहता हूँ, रूहानी… अब भी… इस कदर कि चाहता हूँ जब तुम केवल मेरे बिस्तर पर हो और मेरे नाम से सिसकियाँ भरे। ये इश्क़ है या पागलपन, मुझे नहीं पता। पर ये जुनून अब मेरी रगों में खून से तेज़ बहता है।”

धीरे-धीरे उसकी आवाज़ उभरी, मगर इस बार वो चीख नहीं थी, बल्कि राख से निकली कोई धीमी चिंगारी –

“मुझे लगा था… सच में लगा था, कि तुम मेरा इंतज़ार कर रही होगी, रूहानी। कि एक दिन जब मैं तुम्हारे सामने फिर से खड़ा होऊँगा… तो तुम्हारी आँखों में वही सवाल होंगे, वही तड़प… और फिर मैं… मैं तुम्हें अपना बना लूंगा। हमेशा के लिए… बिना किसी शर्त के।”

उसकी आवाज़ टूट गई थी, मगर उसने खुद को ज़बरदस्ती संभाला। 

उसने एक गहरी साँस ली, घाव से खून साफ़ किया और सोफ़े पर बैठ गया। उसका चेहरा अब शांत था, पर वो शांति वैसी थी जैसे किसी शेर ने खुद को पिंजरे में बंद कर लिया हो।

मैं तुझे छीनना नहीं चाहता… पर खुद को खोते नहीं देख सकता। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती… तो याद रखना, रूहानी… तुम किसी और की भी नहीं होगी, कभी नहीं….।”

कमरे में सन्नाटा फिर से फैल गया। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी, पर अंदर की हवा अब ठहरी हुई थी…. जैसे वो एकांश की साँसों की गवाही दे रही हो।

वो सोफ़े पर सिर टिकाए बैठा था, आंखें बंद, और उस चेहरों की भीड़ में एक ही शक्ल थी…. रूहानी। 

उसकी साँस, उसका घाव, उसकी चाहत… और अब… उसकी जंग।

होंठों पर कसमसी तीखी सांसें… लेकिन भीतर कोई कोहराम अभी थमा नहीं था।

तभी…. एक नर्म, मगर काँपती हुई आवाज़ ने सन्नाटा चीर दिया।

“ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?”

—————-

क्या रूहानी वाक़ई भूल चुकी है… या अब भी किसी कोने में उसकी साँसें एकांश के नाम से धड़कती हैं?

उस आवाज़ के पीछे कौन था?…. क्या वाक़ई रूहानी लौट आई थी… या ये सिर्फ़ एकांश की टूटती चेतना का धोखा था? 

क्या अद्वैत जान पाएगा कि उसकी दुनिया में जो सबसे करीबी दो लोग हैं… वो अब एक चुपचाप तूफ़ान के बिल्कुल किनारे खड़े हैं? 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *