गांव की गलियों में पहला एहसास
काव्या अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। छोटे से परिवार में उसकी दुनिया बस उसके पापा और मां तक ही सीमित थी। उसके पापा सरकारी नौकरी करते थे और कुछ सालों से शहर में ही पोस्टेड थे। काव्या ने भी अपना बचपन उसी शहर में बिताया था।
शहर की जिंदगी उसे बहुत पसंद थी। सुबह कॉलेज, शाम को अपनी सहेलियों के साथ थोड़ी बातें और रात को पढ़ाई। उसे बेवजह बाहर घूमना बिल्कुल पसंद नहीं था।
लेकिन एक दिन उसके पापा घर लौटे तो उनके चेहरे पर कुछ परेशानी थी।
“क्या हुआ पापा?” काव्या ने पूछा।
पापा ने लंबी सांस लेते हुए कहा, “मेरा ट्रांसफर हो गया है।”
“कहां?”
“एक छोटे से गांव में।”
काव्या कुछ पल चुप रही।
“गांव में? लेकिन पापा… मेरी पढ़ाई?”
“वहीं पास के कॉलेज में तुम्हारा एडमिशन करवा देंगे। बस कुछ साल की ही तो बात है।”
काव्या ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वह खुश नहीं थी।
कुछ दिनों बाद पूरा परिवार उस छोटे से गांव में पहुंच गया।
गांव शहर से बिल्कुल अलग था। यहां शाम होते ही ज्यादातर दुकानें बंद हो जाती थीं। लड़कियां ज्यादा देर तक घर से बाहर रहें तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते थे। पढ़ाई से ज्यादा लोगों को इस बात की चिंता रहती थी कि कौन किसके साथ घूम रहा है।
काव्या को यह सब बहुत अजीब लगता था।
एक सुबह वह अपने नए कॉलेज जाने के लिए तैयार हुई।
मां ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “देख बेटा, यहां का माहौल शहर जैसा नहीं है। संभलकर रहना।”
“हां मां, आप चिंता मत करो।”
काव्या ने अपना बैग उठाया और घर से निकल गई।
कॉलेज गांव से थोड़ी दूर था। रास्ते में मिट्टी की सड़क, दोनों तरफ खेत और जगह-जगह बैठे लड़कों के छोटे-छोटे समूह नजर आते थे।
काव्या ने नजरें नीचे कर लीं और चुपचाप आगे बढ़ती रही।
उसी समय कॉलेज के गेट के पास खड़ा अनुराग अपने दोस्तों के साथ बातें कर रहा था।
अनुराग उसी गांव का रहने वाला था। कॉलेज में उसका नाम तो था, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उसका ध्यान दोस्तों और घूमने-फिरने में रहता था।
तभी उसकी नजर काव्या पर पड़ी।
वह अचानक चुप हो गया।
“क्या हुआ?” उसके दोस्त ने पूछा।
अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर बस काव्या पर थी।
काव्या बिना किसी को देखे कॉलेज के अंदर चली गई।
अनुराग के दोस्त ने मुस्कुराते हुए कहा, “लगता है भाई को कोई पसंद आ गया।”
अनुराग ने उसे घूरकर देखा।
“चुप कर।”
लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान छिप नहीं पाई।
उस दिन के बाद अनुराग की नजर अक्सर काव्या को ढूंढने लगी।
काव्या बिल्कुल शांत स्वभाव की थी। वह कॉलेज आती, अपनी क्लास करती और छुट्टी होते ही घर चली जाती।
न उसे किसी से ज्यादा बात करनी थी और न ही किसी के साथ बेवजह घूमना।
एक दिन काव्या कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठी अपनी किताब पढ़ रही थी। तभी उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है।
उसने नजर उठाई।
दूर अनुराग खड़ा था।
दोनों की नजरें मिलीं।
काव्या तुरंत अपनी किताब में देखने लगी।
अनुराग मुस्कुराकर वहां से चला गया।
काव्या को समझ नहीं आया कि वह लड़का उसे क्यों देख रहा था।
अगले दिन भी वही हुआ।
फिर अगले दिन भी।
आखिर एक दिन काव्या से रहा नहीं गया।
वह कॉलेज की सीढ़ियों से उतर रही थी तभी अनुराग सामने आ गया।
काव्या ने पहली बार सीधे उससे पूछा,
“आप मुझे रोज क्यों देखते हैं?”
अनुराग कुछ पल के लिए चुप हो गया।
“मैं… बस ऐसे ही।”
“ऐसे ही कोई किसी को रोज नहीं देखता।”
अनुराग मुस्कुराया।
“सही कह रही हो।”
“तो फिर?”
“पता नहीं।”
“क्या पता नहीं?”
अनुराग ने धीरे से कहा, “शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”
काव्या का चेहरा लाल हो गया।
उसने तुरंत नजरें झुका लीं।
“मुझे ऐसी बातें पसंद नहीं हैं।”
इतना कहकर वह वहां से चली गई।
अनुराग उसे जाते हुए देखता रहा।
उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद उसकी जिंदगी में किसी के लिए सच में कुछ बदल रहा था।
लेकिन काव्या के लिए बात इतनी आसान नहीं थी।
वह घर लौटकर काफी देर तक सोचती रही।
मां ने पूछा, “क्या हुआ? आज बहुत चुप हो।”
“कुछ नहीं मां।”
“कॉलेज में किसी से झगड़ा हुआ?”
“नहीं।”
काव्या ने मुस्कुराने की कोशिश की।
लेकिन उसके मन में बार-बार वही बात घूम रही थी।
“शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”
वह खुद से सवाल कर रही थी कि आखिर उसे उस लड़के की बात इतनी याद क्यों आ रही है।
अगले कुछ दिनों तक अनुराग ने काव्या से बात करने की कोशिश नहीं की। वह दूर से उसे देखता, लेकिन उसके पास नहीं जाता।
काव्या ने भी इस बदलाव को महसूस किया।
एक दिन कॉलेज की छुट्टी के बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। काव्या कॉलेज के बरामदे में खड़ी होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी।
तभी अनुराग वहां आया।
उसके हाथ में छाता था।
“तुम्हें घर जाना है?”
काव्या ने सिर हिलाया।
“बारिश बहुत तेज है।”
अनुराग ने छाता उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“तुम ले जाओ।”
“और आप?”
“मैं चला जाऊंगा।”
“लेकिन आपके पास छाता नहीं होगा।”
“मैं भीग जाऊंगा।”
काव्या ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।
“आप अजीब हैं।”
अनुराग भी मुस्कुरा दिया।
“तुम्हारे लिए शायद।”
काव्या ने छाता लिया और कुछ कदम आगे बढ़ी।
फिर अचानक पीछे मुड़ी।
“धन्यवाद।”
“इतने से धन्यवाद से काम नहीं चलेगा।”
काव्या ने हैरानी से पूछा, “तो क्या चाहिए?”
“बस… कभी मुझसे नाराज मत होना।”
काव्या कुछ नहीं बोली।
बस हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई और वह वहां से चली गई।
उस दिन के बाद दोनों के बीच एक छोटी सी दोस्ती शुरू हो गई।
अनुराग अब काव्या की पढ़ाई में मदद करने लगा। काव्या भी उसे पढ़ाई के लिए समझाती।
“तुम्हें कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजा गया है, घूमने के लिए नहीं,” काव्या अक्सर कहती।
अनुराग हंसकर कहता, “अब तुम बोलोगी तो पढ़ना ही पड़ेगा।”
धीरे-धीरे अनुराग बदलने लगा।
जो लड़का पहले कॉलेज से भागने के बहाने ढूंढता था, अब लाइब्रेरी में बैठने लगा।
उसके दोस्तों को यह बदलाव समझ नहीं आ रहा था।
एक दिन उसके दोस्त ने पूछा, “भाई, तू बदल कैसे गया?”
अनुराग ने मुस्कुराकर कहा,
“किसी को देखकर अच्छा इंसान बनने का मन हो जाए, तो उसे पसंद करना कहते हैं शायद।”
उधर काव्या भी अनुराग को लेकर कुछ महसूस करने लगी थी।
लेकिन उसने अपने मन की बात किसी को नहीं बताई।
उसे डर था कि कहीं उसके पापा को पता चल गया तो?
उसके पापा बहुत सख्त थे। वह अपनी बेटी को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे।
एक शाम काव्या कॉलेज से घर लौट रही थी। रास्ते में उसने देखा कि उसके पापा घर के बाहर किसी से बात कर रहे थे।
वह पास पहुंची तो उनके हाथ में एक कागज था।
“क्या हुआ पापा?”
पापा ने उसकी तरफ देखा और बोले,
“कुछ नहीं बेटा। तुम्हारे कॉलेज के बारे में किसी ने शिकायत की है।”
काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।
“मेरी?”
“नहीं… बस गांव में कुछ लड़कों के बारे में बातें हो रही थीं। मुझे उम्मीद है तुम किसी परेशानी में नहीं पड़ोगी।”
काव्या चुप रही।
उसे अचानक अनुराग का चेहरा याद आ गया।
उस रात वह अपने कमरे में बैठी बहुत देर तक सोचती रही।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने दिल की बात सुने या अपने परिवार का डर।
और उसे यह भी नहीं पता था कि अगले दिन कॉलेज में उसके और अनुराग के बीच ऐसा क्या होने वाला है, जो उनकी इस छोटी सी दोस्ती को हमेशा के लिए बदल देगा।
अगली सुबह काव्या कॉलेज पहुंची तो उसका मन बिल्कुल ठीक नहीं था। पिछली रात पापा की बात उसके दिमाग में घूमती रही थी।
कॉलेज के गेट पर अनुराग उसे देखते ही पास आया।
“क्या हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो?”
काव्या ने धीरे से कहा, “पापा को हमारे बारे में पता चल गया है।”
अनुराग का चेहरा गंभीर हो गया।
“क्या कहा उन्होंने?”
“बस इतना कहा कि गांव में बातें हो रही हैं। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं किसी परेशानी में तो नहीं हूं।”
अनुराग कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला, “काव्या, अगर मेरी वजह से तुम्हें कोई परेशानी हो रही है तो मैं तुमसे दूर हो जाऊंगा।”
काव्या ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“नहीं अनुराग, बात इतनी भी बड़ी नहीं है।”
“लेकिन तुम्हारे पापा तुम्हें लेकर परेशान हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी पढ़ाई खराब हो।”
काव्या कुछ नहीं बोली।
तभी कॉलेज के कुछ लड़के वहां से गुजरते हुए दोनों को देखकर हंसने लगे।
“देखो, शहर से आई मैडम और गांव का अनुराग।”
काव्या ने नजरें झुका लीं।
अनुराग को गुस्सा आया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।
उस दिन से उसने काव्या से दूरी बनानी शुरू कर दी। न वह उससे बात करता और न ही उसके पास जाता।
काव्या को यह बदलाव बहुत बुरा लग रहा था।
एक दिन उसने आखिर अनुराग को रोक लिया।
“मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे?”
“क्योंकि तुम्हें परेशानी हो रही है।”
“लेकिन फैसला तुम अकेले कैसे कर सकते हो?”
अनुराग चुप रहा।
काव्या ने कहा, “अगर तुम सच में मेरे दोस्त हो तो मुश्किल वक्त में मेरा साथ छोड़कर मत जाओ।”
अनुराग ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।
“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रहा काव्या। मैं बस चाहता हूं कि तुम्हारे पापा को मुझ पर भरोसा हो।”
उसी समय काव्या के पापा कॉलेज पहुंच गए। उन्होंने दूर से दोनों को बात करते देख लिया।
अनुराग ने उन्हें आते हुए देखा तो सीधा उनके सामने चला गया।
“अंकल, मुझे आपसे कुछ कहना है।”
काव्या घबरा गई।
पापा ने गंभीर आवाज में पूछा, “क्या?”
अनुराग बोला, “काव्या ने कभी पढ़ाई से समझौता नहीं किया। अगर गांव में कोई उसके बारे में गलत बात कह रहा है तो उसकी गलती नहीं है। और अगर मेरी वजह से आपको चिंता हुई है तो मैं माफी चाहता हूं।”
पापा कुछ देर उसे देखते रहे।
फिर बोले, “तुम्हें पता है मैं अपनी बेटी को लेकर इतना सख्त क्यों हूं?”
“जी।”
“क्योंकि मैं चाहता हूं कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो।”
अनुराग ने सिर हिलाया।
“मैं भी यही चाहता हूं अंकल।”
पापा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
“तो फिर पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। बाकी चीजों का फैसला वक्त करेगा।”
काव्या ने राहत की सांस ली।
अनुराग मुस्कुराया।
उस दिन दोनों समझ गए कि उनका रिश्ता अभी किसी नाम का मोहताज नहीं था।
बस एक भरोसा था जो धीरे-धीरे दोस्ती से बढ़कर एक खूबसूरत एहसास बन रहा था।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे