भाग~14 उसके जाने के बाद
अद्वैत की कार धीरे-धीरे शहर की जगमगाती सड़कों से गुज़र रही थी, लेकिन उसके भीतर एक अंधेरा लगातार फैलता जा रहा था। बाहर की दुनिया रोशनी से सराबोर थी, रेड लाइट पर रुकती गाड़ियों की कतारें, फुटपाथ पर चलते लोग, ट्रैफिक सिग्नल की टिमटिमाती बत्तियाँ… मगर अद्वैत की आंखों में इन सबका कोई प्रतिबिंब नहीं था। वह कार की खिड़की से बाहर देख ज़रूर रहा था, पर उसकी नज़रें उन दृश्यों को चीरती हुई कहीं बहुत भीतर, बहुत दूर चली जा रही थीं।
वह बाहर से शांत दिखने की कोशिश कर रहा था, उसकी गर्दन सीधी, आँखें स्थिर, हाथ स्टीयरिंग पर टिके हुए… जैसे सब कुछ सामान्य हो। लेकिन भीतर एक उथल-पुथल चल रही थी, जैसे कोई जलप्रलय उसके भीतर ही फट पड़ा हो। मीडिया में आई तस्वीरें, लोगों की निगाहें, वो फुसफुसाहटें — “वो लड़की कौन है?”, “क्या सच में उसके साथ रह रहा है?”, “अब तक तो उसकी पत्नी मर चुकी थी, तो ये कौन है?” हर एक सवाल अद्वैत के मन में नश्तर की तरह चुभ रहा था।
उसका मन बार-बार रूहानी की ओर भाग रहा था। लेकिन साथ ही उसे अब उस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरेज’ की बात भी याद आ रही थी जो उसके मैनेजर ने सुझाई थी। यह सोचते ही उसका माथा भिंच गया।
“मैं उससे कैसे कहूँगा ये बात? वो कोई चीज़ नहीं है कि एक कागज़ पर साइन करवा लिया और मामला खत्म।”
“और फिर, मैंने उसे जाना ही कितना है?”
उसने खुद से एक सवाल पूछा, “क्या वाकई में मुझे हक है उससे यह प्रस्ताव रखने का?”
वह जानता था कि यह प्रस्ताव एक शर्त की तरह लगेगा, एक सौदा “मेरी छवि बचाने के लिए, मुझे अपने साथ तुम्हारा नाम चाहिए।” और यह ख्याल ही उसे भीतर से झकझोर गया।
“क्या वो लड़की, जो पुल से छलांग लगाने जा रही थी, अब मेरी वजह से किसी और बोझ तले दब जाएगी?”
कार फिर एक मोड़ पर धीमी हुई। सड़कों पर अब भीड़ कम हो चुकी थी, लेकिन अद्वैत का मन और अधिक भारी होता जा रहा था।
“काश मैंने उससे बात की होती, काश उसके भीतर की परतों को समझने की कोशिश की होती… कम से कम इतना तो पूछता कि वो हर रात खिड़की की तरफ चुपचाप क्या देखती है?”
अब जब उससे एक बेहद निजी प्रस्ताव रखने की नौबत आई थी, तब उसे यह अहसास हो रहा था कि वह तो उस लड़की का नाम भर जानता है, उसकी कहानी नहीं।
अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। उसने आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस ली।
“ये गलत है… ये सब कुछ गलत है। लेकिन फिर, मैं झूठी अफवाहों से खुद को कैसे बचाऊँ? ये दुनिया सच नहीं पूछती, बस दिखावे पर यकीन करती है। और इस दिखावे से बाहर निकलने के लिए, मुझे रूहानी का नाम चाहिए… कम से कम बाहर की दुनिया के लिए।”
उसने खुद से धीरे से कहा — “शायद, अब मुझे उससे सच में बात करनी ही होगी… पहली बार।”
कार अब घर के गेट पर पहुंच चुकी थी। दरवाज़ा खुला और अद्वैत भीतर दाखिल हुआ… कमरा हल्का सा अस्त – व्यवस्त था। सोफे और हॉल के दरवाजे के बीच की जगह में बहुत कुछ बिखरा हुआ पड़ा था। उसकी आँखें उस बिखरे सामान में से एक चीज़ पर टिक गई -“रूहानी के नाम वाली ब्रेसेलेट”।
वह ब्रेसेलेट गिरकर टूट चुका था। अद्वैत कुछ पल के लिए वहीं खड़ा हो गया मानो कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।
उसका दिल अचानक तेज़ी से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे ब्रेसेलेट के पास गया, ब्रेसलेट उठाते समय उसके हाथ कांप रहे थे। वह सोचने लगा, “क्या हुआ है आखि़र यहां” उसके मन में एक हलचल सी मची हुई थी।
अद्वैत ने पुकारा, “रूहानी… रूहानी…” लेकिन कही से कोई आवाज नहीं आई। कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने एक बार फिर से आवाज लगाई, “रूहानी!” लेकिन उसके शब्द हवा में खो गए।
अब उसकी चिंता और बढ़ने लगी। वह घर के हर कोने में उसे खोजने लगा। उसकी आँखों में बेचैनी, घबराहट और कुछ समझ न पाने की स्थिति में थी।
शाम पहले ही हो चुकी थी और अंधेरा होने को था। अद्वैत को अचानक ख्याल आया, “क्यों न रूहानी को कॉल कर लूँ?”
लेकिन उसके चेहरे पर छाई मुस्कान गायब हो गई जब उसे याद आया कि उसने कभी रूहानी का नंबर एक्सचेंज ही नहीं किया था।
अद्वैत असमंजस में पड़ गया, “क्या करूँ अब?” उसके भीतर कुछ टूट सा गया। उसने जो उम्मीद की थी, वह अचानक उससे छिन गई। वह थक कर सोफे पर धड़ाम से गिर पड़ा। उसकी आँखें बंद हो गई और वह अपनी स्थिति पर सोचने लगा।
अद्वैत को जैसे कुछ अजीब सा अहसास हो रहा था कि रूहानी, उसका टूटा हुआ ब्रेसेलेट और यह पल कुछ गहरे अर्थ छुपाए हुए हैं। उसके मन में एक तूफान सा मचा हुआ था। वो खुद से सवाल की “क्या हुआ होगा रूहानी के साथ? क्या उसे कुछ हो गया?”
वह खुद को यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि वह तो रूहानी को ठीक से जानता भी नहीं तो ऐसा क्यों महसूस हो रहा है?
तभी अचानक, सोफे के निचले साइड टेबल पर रखा हुआ फोन न बजने लगा। अद्वैत चौक कर देखा तो फोन रूहानी का था, और उस पर वही “my life” का कॉल आ रहा था। अद्वैत का मन तेज़ी से दौड़ने लगा।
क्या यह रूहानी से जुड़ी कोई अहम बात है?
क्या उसे कुछ हुआ है?
जैसे ही उसने फोन पर कान लगाया, दूसरी तरफ से एक किशोर लड़के की आवाज सुनाई दी, जो हड़बड़ाहट में बोल रहा था, “क्या मेरी बात अद्वैत अवस्थी से हो रही है?”
अद्वैत ने धीरे से जवाब दिया, “हां, मैं अद्वैत हूं। तुम कौन हो? और रूहानी का फोन यहां क्यों है? वो कहां है? कहीं उसे कुछ तो नहीं हो गया?”
उसका मन पूरी तरह से घबराहट से भर चुका था। उसकी आँखों में अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई बुरी खबर सुनने को मिल सकती हो।
उधर से यशस्वी के भाई यश ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। आपकी बातों का जवाब देने के लिए, लेकिन इतना जान लीजिए कि मैं रूहानी दीदी का छोटा भाई हूं और मैं आपको एक पता मैसेज कर रहा हूं। कल सुबह अगर आप वहां पहुंचेंगे, तो आपसे सारी बातें हो पाएंगी।”
अद्वैत की आँखें अचानक से चौड़ी हो गई। उसके मस्तिष्क में एक साथ कई सवाल उठ पड़े।
रूहानी का भाई?…..
क्या यह सच है?
क्या वह सच में रूहानी का भाई है?
यह नया मोड़ उसे और भी अधिक उलझा रहा था।
अद्वैत कुछ कहने ही वाला था कि अचानक कॉल कट गया। फोन के स्क्रीन पर सन्नाटा छा गया, जैसे कोई जरूरी बात अधूरी रह गई हो। वह कुछ क्षण यूं ही थमा रहा, जैसे समय रुक गया हो। फिर धीरे-धीरे उसकी आँखों में विचारों की लहरें उठने लगीं।
“अगर रूहानी का परिवार है… तो उसने उस रात यह क्यों कहा कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं है?” यह सवाल उसके भीतर लगातार गूंजता रहा। उसकी सांसें भारी हो गईं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि रूहानी ने ऐसा झूठ क्यों बोला। आखिर वजह क्या थी?
अद्वैत की आंखों में उस रात की छवि लौट आई… वो रात जब रूहानी खुद को खत्म करने जा रही थी और उसने उसे बचाया था। लेकिन एक बात उसे अब चुभने लगी… उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि रूहानी ऐसा कदम क्यों उठाना चाहती थी।
फिर एक हल्की सी अपराधबोध की लहर उसके दिल में दौड़ गई। मगर उसी के साथ एक दूसरा ख्याल भी आया, एक तर्क….”किसी को बचा लेना तो ठीक है… पर क्या किसी की निजी ज़िंदगी में यूं झांकना सही होता है? खासकर तब, जब वो व्यक्ति अजनबी हो?”
यह विचार उसके मन को और भी उलझा दिया। वो खुद से लड़ने लगा…. “क्या वाकई में मैंने कुछ गलत किया? या फिर मैंने वही किया जो उस वक्त ज़रूरी था?”
उसके दिल के किसी कोने में अब यह जानने की जिद गहराने लगी थी कि रूहानी ने झूठ क्यों बोला।
उसकी आंखें फोन की स्क्रीन पर रूहानी की तस्वीर पर टिक गई जैसे वो उससे जवाब मांग रहा हो। मगर जवाब तो अब उस पते पर था, जो उसे सुबह मिलना था।
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क्या रूहानी ने जानबूझकर अपनी सच्चाई छुपाई थी?
क्या “इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है” महज़ एक झूठ था या कोई गहरा राज़?
अब अद्वैत के सामने सवाल ही सवाल थे… लेकिन जवाब कहाँ थे कि उस पते पर क्या इंतज़ार कर रहा था?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹


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