🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~29

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~29 मुस्कुराते जख्म

 

मीना का अचानक अपने दोनों बच्चों के साथ घर आ जाना अद्वैत और रूहानी के लिए किसी अनचाही दस्तक की तरह था। दोनों ही उस क्षण के लिए तैयार नहीं थे और उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाला था उसका बेझिझक सवाल, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?” 

उस एक वाक्य ने जैसे रूहानी की रगों में ठंडा लावा भर दिया। उसकी साँस अटक गई, दिल धड़कने के बजाय थम सा गया और पल भर के लिए उसकी सोचने-समझने की ताकत जैसे वहीं कहीं गुम हो गई।

वो पल, जब उसका दिल और दिमाग एक-दूसरे से सवाल करने लगे….. अगर अब सच सामने आ गया तो? अगर मीना ने बात आगे बढ़ा दी तो? क्या उसका करियर जो अभी दोबारा सांस लेना शुरू ही कर रहा है, फिर से खत्म हो जाएगा? क्या वो फिर वहीं लौट जाएगी जहां से वो आई थी… अकेलेपन, असुरक्षा और असफलता के अंधेरे में?

रूहानी की आँखें अद्वैत की तरफ उठीं, जिसमें डर, उलझन और एक खामोश मदद की गुहार थी। अद्वैत ने उसकी ओर देखा और जैसे ही मीना के सवाल की गंभीरता को उसने समझा, उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें नाटक था, समझदारी थी और समय की नजाकत को पकड़ लेने की कला भी।

“अरे मीना,” अद्वैत ने एकदम सहजता से कहा, “ये तो मेरी नई कहानी की स्क्रिप्ट थी। रूहानी को बस वही पढ़ने दी थी, उसका फीडबैक लेना था।”

उसके कहते ही जैसे रूहानी को भी अपनी आवाज़ वापस मिल गई। वो तुरंत बात को पकड़ते हुए मुस्कुरा कर बोली, “हाँ, अद्वैत ने इतना अच्छा लिखा है कि तुम भी कन्फ्यूज़ हो गई।”

उन दोनों के बीच एक नजरों की मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मानो उस छोटे से झूठ ने एक बड़ा तूफान टाल दिया हो। अद्वैत ने बिना कुछ कहे ही सारे दस्तावेज़ समेट लिए…. पर उस कमरे में कुछ था जो अब भी अधूरा था… एक अनकहा सच, जो बस एक और सवाल की दूरी पर था।

मीना ने जैसे ही ‘हाँ’ में सिर हिलाया, माहौल में एक हल्की सी सहजता लौटती दिखाई दी। वो मुस्कुराते हुए सोफे के पास आई और रूहानी के पास बैठते हुए बोली, “यही मेरी बेटी है, इसी का जन्मदिन आने वाला है, जिसके लिए मुझे कपड़े बनवाने थे।”

रूहानी ने अपनी आंखें धीरे से उस बच्ची की ओर घुमाईं। लगभग दस-ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में जिज्ञासा और सादगी का उजाला था। उसके पास खड़ा उसका छोटा भाई, करीब छह-सात साल का, अपनी बहन की उंगलियों में उंगलियाँ फंसाए, थोड़ा सकुचाया हुआ लेकिन उतना ही प्यारा।

रूहानी को अपनी ओर यूँ देखते पाकर दोनों बच्चों ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते।” उनके भोलेपन से उसका दिल भी एक पल को हल्का हो गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से पूछा, “क्या नाम है तुम दोनों का?”

बच्ची ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नाम गुनगुन है।” लड़के ने झेंपते हुए जवाब दिया, “मेरा नाम चीकू है।”

रूहानी ने हल्के अंदाज़ में ताली बजाते हुए कहा, “अरे, कितने प्यारे नाम हैं तुम दोनों के! बिलकुल तुम लोगों जैसे ही खुशबूदार और मीठे।”

तभी रूहानी से थोड़ी दूरी पर बैठा अद्वैत, जो यह दृश्य चुपचाप देख रहा था, मीना की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, “पहले बच्चों के लिए कुछ स्नैक्स तो ले आओ, मीना।”

अद्वैत की आवाज़ में अपनापन और ज़िम्मेदारी का मेल था, जिसने मीना को जैसे नींद से जगाया। वो तुरंत हड़बड़ाते हुए बोली, “जी सर, अभी लाती हूँ।” और जल्दी से किचन की ओर बढ़ गई।

उस एक नज़र में रूहानी की आंखों में जो नूर था, वो किसी अनकहे एहसास का आईना था… शायद अधूरी ममता की वो आवाज़, जो दिल के किसी कोने में गूँज रही थी, या फिर कोई ऐसा जज़्बा जो अभी लबों तक आना चाहता था, मगर शब्दों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था।

जब दोनों बच्चे खुशी-खुशी स्नैक्स में मगन हो गए, तो मीना ने थोड़ी झिझक के साथ रूहानी की ओर देखा और बोली, “मेरे पास उस ड्रेस का कोई फोटो तो नहीं है, मैडम… लेकिन मैं आपको बता सकती हूं कि वो कैसी दिखती थी।”

रूहानी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तुम बताओ, मैं उसका स्केच बना लेती हूं।”

मीना की आंखें चमक उठीं और वो अपने शब्दों से एक तस्वीर गढ़ने लगी, “मैडम, वो एक लाल रंग का बड़ा सा फ्रॉक था… छम-छम करता हुआ, जैसे शाम के वक्त ढलते सूरज की रोशनी में आसमान रंगीन हो जाता है। उस पर छोटी-छोटी सुनहरी कलियाँ थीं, जो बिल्कुल अमावस की रात में टिमटिमाते तारों जैसे लगती थीं। और उसकी चुनरी… वो अलग से नहीं थी, कंधे से जड़ी थी, बहुत हल्की… जैसे कोई धुंधली बदली हो, लेकिन मोतियों के तारों से सजी हुई।”

मीना के शब्दों से जैसे रंग झरने लगे और रूहानी का हाथ खुद-ब-खुद चलने लगा। वह बड़ी तल्लीनता से स्केच बना रही थी। उसकी उंगलियाँ कागज़ पर नर्म लकीरें खींच रही थीं और उसकी आंखें उस कल्पना को सच में ढाल रही थीं।

उस पल अद्वैत चुपचाप बैठा, सिर्फ रूहानी को ही देख रहा था। उसके चेहरे की एक-एक रेखा, उसके हिलते होंठ, उसके पलकें झपकाने का अंदाज़… सब कुछ उसे असामान्य रूप से आकर्षित कर रहा था। वो उस पल की मासूमियत और रूहानी की गंभीरता में कहीं गुम होता जा रहा था। लेकिन रूहानी को इस टकटकी का कोई आभास नहीं था।

जब स्केच पूरा हुआ, तो रूहानी ने गुनगुन को पास बुलाया और उसका नाप भी बड़े प्यार से लिया। अद्वैत बस बैठा रहा, जैसे वो उस दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई दर्शक हो… मगर उसके भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे खिंचता चला जा रहा था…. अदृश्य डोर सा।

इस सबके बाद रूहानी ने मीना के साथ किचन में जाकर धीरे से पूछा, “मैंने तुमसे सुबह पूछा था, यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली? तुम्हें पता चला क्या?” उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी, जो कहीं दबे हुए बोझ से निकल रही थी।

मीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, एक जगह तो है, लेकिन यहाँ से 10-15 मिनट की दूरी पर।” रूहानी की आंखों में एक हल्की सी चमक आई, मानो एक दरवाजा खुलने वाला हो। 

उसने तुरंत कहा, “क्या तुम अभी चल सकती हो? तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, अद्वैत के पास।”

मीना ने थोड़ा हिचकते हुए हामी भरी और कुछ कहने लगी, तभी रूहानी बिना किसी देरी के अद्वैत के पास गई और बोली, “हमें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना है, तुम जब तक बच्चों को देख लेना।” 

अद्वैत पहले तो अचानक चौंक गया, उसकी सांसों में अचानक रुकावट सी आई, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसने मान लिया हो कि ये जरूरी है।

मीना बार-बार पूछती रही, “सच में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, सर?” और रूहानी ने उसका हाथ पकड़ते हुए हल्का सा खींचा, दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा, “हम दोनों बस आधे घंटे में आ जाएंगे, तब तक अद्वैत अंकल के साथ मस्ती करना।” मीना ने राहत भरी सांस ली और दोनों बहार निकल गईं।

दरवाजा बंद होते ही, अद्वैत की आँखों में एक अनकही बेचैनी और सवालों की गूंज थी, जो हवा में तैर रही थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी, जैसे कोई अनजाना तूफ़ान उसके अंदर उठ रहा हो। वह उन क्षणों को समझने की कोशिश था। 

“क्या ये सच में इतना कठिन है?” अद्वैत खुद से कहता हुआ, अपने दिल की गहराई में कहीं एक तूफान उठने लगा था। बाहर की ठंडी हवा की तरह, जो आंधी में बदलने को हो, जैसे किसी बड़े बदलाव की आहट हो।

और तभी, अद्वैत के मोबाइल की घंटी ने कमरे की चुप्पी को तोड़ा…. एक अनजान नंबर से कॉल आ रही थी, जिससे उनकी ज़िंदगियाँ एक नई मुड़ाव लेने वाली थीं…

————

क्या रूहानी और अद्वैत के बीच जो मुस्कुराहट थी, वह सच में एक झूठ छुपा रही थी? 

वह अनजान नंबर… क्या वह कॉल उनके अब तक छुपे हुए अतीत की कोई भूली हुई कहानी वापस लेकर आने वाली थी?

किस्मत के इस नए मोड़ पर, क्या वे तैयार थे सच का सामना करने के लिए?

 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *