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अधूरी इबादत भाग~49

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~49 पहला गिफ्ट

 

कमरे की हवा थमी हुई थी, दीवारें जैसे साँस रोक कर देख रही थीं कि अब आगे क्या होगा। 

रूहानी की पीठ दरवाज़े से लगी थी, और उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के कांप रही थीं। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि लगता था जैसे कोई दरवाज़े के इस पार खड़ा सुन लेगा।

एकांश ने जब अपने दोनों हाथ उसके कंधों पर रखे, तो वो छुअन किसी भूले हुए मौसम की तरह आई….. जानी-पहचानी, लेकिन अब अजनबी। 

“रूहानी…” एकांश की आवाज़ में तल्ख़ी थी, “at least मेरी आंखों में तो देखकर बात करो। शायद तब तुम्हारे झूठ को भी मैं सच मान लूं।”

रूहानी की सांस अटक गई। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन वो नमी किसी प्यार की नहीं, ठुकराए हुए भरोसे की थी। उसने धीरे से, बहुत एहतियात से, एकांश के हाथ अपने कंधों से हटा दिए। 

और तभी…

दरवाज़ा एक झटके में खुला — जैसे किसी ने कमरे की हदों पर शक कर लिया हो।

काम्या…. उसकी नज़रों में संदेह नहीं, फैसला था। उसने पहले कमरे को स्कैन किया, फिर एकांश पर एक पल को ठहरकर, अपनी नज़रों की तलवारें रूहानी पर गाड़ दीं।

“ओह… तो बंद कमरे में पुरानी इश्क लड़ाई जा रही है,” काम्या की मुस्कान तेज़ और ज़हर से भी तेज़ थी। “लगता है, अपनी डिज़ाइनिंग से ज़्यादा तुम्हारा ध्यान कुछ और ‘कनेक्शन’ बनाने पर रहता है। है ना?”

कमरा जैसे एकाएक सन्नाटे में डूब गया। रूहानी की साँस एक लहर की तरह रुकी, और फिर एक गहरी गर्मी उसके भीतर उठने लगी…. वो गुस्सा जो खुद को लंबे समय से दबा रहा था।

उसने सीधा खड़ा होकर काम्या की आँखों में आँखें डालीं। “काम्या, कम से कम मैं वो इंसान नहीं जो दूसरों के रिश्तों पर कीचड़ उछालकर अपनी खुद की खाली ज़िंदगी भरने की कोशिश करे।”

उसकी आवाज़ अब कांप नहीं रही थी। “और हाँ, ‘कनेक्शन’ बनाने की बात रही… तो मैं सिर्फ अपने काम से कनेक्शन बनाती हूं, तुम्हारी तरह लोगों की पीठ पीछे छुरा घोंपकर नहीं।”

एक पल को काम्या कुछ कह नहीं पाई…. जैसे शब्द उसकी जुबान तक आए ही नहीं।

“और अगर तुम्हें लगता है कि एक बंद कमरा और एक पुरानी जान-पहचान ‘इश्क लड़ाई’ है, तो ये तुम्हारी छोटी सोच है, मेरी नहीं।”

इतना कहकर रूहानी पलटी नहीं। वो सीधी दरवाज़े से बाहर चली गई, जैसे किसी courtroom से बाइज्ज़त बरी होकर निकली हो…. सिर ऊँचा, आत्मा शांत, और भीतर एक नई आग जलती हुई।

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जैसे ही रुहानी उस कमरे से बाहर आई, उसकी चाल में बेचैनी थी और आँखों में कुछ कह जाने की बेआवाज़ कोशिश। पलकें भारी, पर चेहरे पर एक नकली सामान्यता का मुखौटा। 

ठीक उसी वक़्त अद्वैत भी अपनी कार पार्क कर चुका था और स्टूडियो की ओर बढ़ा चला आ रहा था।

रूहानी उसकी तरफ़ बढ़ी, हल्की सांसों में एक स्थिरता लाने की कोशिश करते हुए और बिना किसी भूमिका के बोली, “अब हम भी घर चले? पार्टी वैसे भी लगभग खत्म हो चुकी है।”

अद्वैत ने उसकी आँखों में कुछ पल देखा, जैसे किसी उलझे हुए स्केच को समझने की कोशिश कर रहा हो। फिर शांत स्वर में बोला, “पहले स्टूडियो बंद करके चाबी ले लो, फिर चलते हैं।”

रूहानी कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से एक स्वर उभरा, हँसी और आवाज़ का एक अजीब मेल और एकांश व काम्या स्टूडियो main gate के ओर आते दिखाई दिए।

एकांश ने आते ही अद्वैत के कंधों को पकड़ कर हल्के से गले लगाया। यह एक सामान्य सा इशारा था, मगर उसके ठीक बाद रूहानी का एक क़दम पीछे हट जाना….. नज़रें नीची कर लेना…. अद्वैत की नज़रों से छुपा नहीं था। 

उस एक पल में जैसे कुछ अजीब सा फिसल गया हो उसके मन में। पर उसने उस क्षण को वहीं दफ़न कर दिया, कुछ न कहकर।

काम्या को शायद उस ख़ामोशी से चिढ़ हो गई। वो एकांश का हाथ कस कर पकड़ते हुए तिरछी मुस्कान में बोली, “अब मैं अपने पति के साथ अपनी रात enjoy करने जा रही हूँ। Wish you both… अद्वैत और रूहानी…. तुम भी अपनी रात enjoy करो।”

ताने की धार इतनी पैनी थी कि कमरे की हवा कुछ सेकंड को जैसे कट सी गई।

अद्वैत का चेहरा सख़्त हो गया। वो कुछ कहने ही वाला था कि रूहानी ने उसका हाथ पकड़ कर सिर ना में हिलाया…. जैसे कह रही हो, अभी नहीं।

पर अद्वैत ने उसका हाथ थामकर हल्के से थपथपाया…. एक सधी हुई, शांत ताक़त से भरा इशारा। फिर काम्या की ओर देखकर बोला, “Kamya, it’s my bedroom matters… and I don’t like to shamelessly public it.”

एकांश ने धीमे स्वर में कहा, “भाई! काम्या की तरफ से मैं माफ़ी मांगता हूँ, you’re right.”

अद्वैत ने रूहानी की ओर देखा, “सब चले ही गए हैं, स्टाफ्स को पेमेंट कर दो, फिर हम भी निकलते हैं।”

थोड़ी देर बाद काम्या और एकांश निकल गए। 

स्टूडियो का सन्नाटा अब एक भारी सी चुप्पी बनकर रह गया था। रूहानी ने काम निपटाया और फिर अद्वैत की कार की ओर चली। 

जब वह बैठी, उसकी उंगलियाँ अब भी सिहर रही थीं। पूरा दिन, वो कमरा, वो सारे पुराने लम्हे… सब उसके मन में घूम रहे थे। 

जैसे ही अद्वैत ने ड्राइविंग सीट पर आकर दरवाज़ा बंद किया, एक तेज़ आवाज़ के साथ, रूहानी हल्की सी कांप गई।

अद्वैत ने तुरंत उसकी ओर देखा, “Are you okay, Ruhani?”

रूहानी ने अपनी दोनों बाहों को अपनी हथेलियों से रगड़ा और जबरदस्ती मुस्कराते हुए बोली, “हाँ, ठीक हूँ… बस थक गई हूँ।”

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, अद्वैत ने जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

रूहानी ने आश्चर्य से पूछा, “मेरे लिए?”

अद्वैत ने सीधे शब्दों में बोला, “हाँ… तुम्हारे स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी पर मेरी तरफ़ से छोटा सा gift।”

रूहानी ने धीरे से बॉक्स खोला।

अंदर एक चाबी थी, लेकिन कोई साधारण चाबी नहीं। वो एक कीचेन से जुड़ी थी जो एक छोटे, चमकते हुए गाउन के आकार का था। सुनहरे धागों जैसी डिज़ाइन, बारीक नक्काशी, छोटे-छोटे embedded stones जैसे हर मोड़ कोई कहानी कहता हो और उस कीचेन से जुड़ा टैग “Stitch and Soul” का लोगो।

उसकी आँखों में पानी तैरने लगा। वो खिड़की की तरफ़ चेहरा मोड़कर जल्दी से आँखें पोछने लगी। फिर मुड़कर धीमे से पूछा, “ये किस चीज़ की चाबी है?”

अद्वैत ने उसकी ओर देखकर सहजता से कहा, “तुम्हारी कार की।”

रूहानी ने चौंक कर देखा, “मेरी… कार?”

“हाँ,” अद्वैत ने सिर हिलाया, “रोज़-रोज़ कैब से कितना ट्रैवल करोगी? तुम्हारा बजट और समय दोनों ही ज़्यादा जा रहा है। और फ्यूल की चिंता मत करो, I’ll make sure it’s always full.”

रूहानी ने धीरे से सिर ना में हिलाया, “पर मुझे तो कार चलाना नहीं आता।”

अद्वैत ने अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए कहा, “अगर तुम comfortable हो, तो मैं सिखा दूँगा।”

वो एक पल था, छोटा, शांत, लेकिन भीतर बहुत कुछ कहता हुआ। दोनों के बीच की अजनबीयत कुछ कम हुई थी, लेकिन उसका वज़न अभी भी मौजूद था।

पर शायद यही एक शुरुआत थी…. जहाँ दो अनजाने लोग, एक contract marriage की ज़िद और ज़रूरत से परे, इंसान की तरह एक-दूसरे को समझने की शुरुआत कर रहे थे।

तभी, सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी, और एक तेज़ हॉर्न की आवाज़ से पूरी रात चीख़ उठी… 

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क्या वो तेज़ रोशनी महज़ एक संयोग थी… या किसी आने वाले तूफ़ान की पहली दस्तक?

उस हॉर्न की चीख़ में छुपा था कोई इत्तिफ़ाक या कोई इरादा?

क्या रूहानी और अद्वैत के बीच की ये नज़दीकी किसी तीसरे की नज़र में खटकने लगी थी…? 

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