सूरजपुर में सुबह किसी त्योहार की तरह नहीं, किसी शोक की तरह हुई।
हर घर में लोग अपने-अपने आईने के टुकड़े को देखकर डर रहे थे।
किसी को अपनी पत्नी का छिपा हुआ दुख दिखाई दे रहा था।
किसी को पिता का अपराध।
किसी को भाई की धोखाधड़ी।
और किसी को अपना ही चेहरा इतना अजनबी लग रहा था कि वह खुद से नजरें नहीं मिला पा रहा था।
देवेंद्र चौहान रातोंरात गायब हो गया।
लोगों ने उसकी तलाश शुरू की।
लेकिन आरव जानता था कि वह कहाँ होगा।
पुरानी हवेली में।
वही हुआ।
देवेंद्र तहखाने में उस जगह बैठा था जहाँ कभी मीरा को छिपाया गया था।
उसके हाथ में आईने का एक टुकड़ा था।
आरव ने उसे देखा।
“यहाँ क्यों आए हो?”
देवेंद्र ने कहा—
“मैंने सोचा था कि अगर आईना टूट गया तो सब खत्म हो जाएगा।”
“लेकिन नहीं हुआ।”
देवेंद्र हँसने लगा।
“क्योंकि असली आईना शीशे का नहीं था।”
आरव ने कहा—
“तुम्हें अब सच बोलना होगा।”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
“तुम भी बोलोगे?”
आरव चुप हो गया।
देवेंद्र ने कहा—
“तुम्हारा सच भी सबके सामने आएगा।”
आरव ने धीरे से कहा—
“हाँ।”
“डर नहीं लगता?”
“बहुत।”
“फिर?”
“फिर भी बोलूँगा।”
देवेंद्र कुछ पल उसे देखता रहा।
पहली बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं था।
सिर्फ थकान थी।
“मैंने बहुत कुछ किया,” उसने कहा।
और फिर उसने सब बता दिया।
किस तरह उसने सरकारी जमीन बेचने में मदद की।
किस तरह गरीबों के नाम पर आए पैसे अपने लोगों में बाँटे।
किस तरह मीरा के पिता की शिकायत दबाई गई।
और सबसे बड़ी बात—
मीरा की हत्या के बाद उसने उस मामले को दबाने में मदद की थी।
आरव ने उसकी पूरी बात रिकॉर्ड कर ली।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
अचानक तहखाने में वही लड़की दिखाई दी।
मीरा।
इस बार उसका चेहरा शांत था।
उसने देवेंद्र की तरफ देखा।
“अब तुमने सच बोल दिया।”
देवेंद्र रोने लगा।
“क्या अब मुझे माफ करोगी?”
मीरा ने कहा—
“माफी मेरे हाथ में नहीं।”
“फिर?”
“न्याय समाज के हाथ में है।”
और वह गायब हो गई।
अगले दिन आरव ने सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए।
कस्बे में हड़कंप मच गया।
पुलिस ने देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया।
पुराने मामलों की जाँच फिर से शुरू हुई।
मीरा की हत्या का केस दोबारा खोला गया।
हरिदास बाबा ने अदालत में गवाही दी।
वह जानते थे कि इससे उनका अपना अपराध भी सामने आएगा।
लेकिन उन्होंने कहा—
“मैंने वर्षों तक चुप रहकर अपराध किया। अब सच बोलकर जितनी सजा मिलेगी, स्वीकार करूँगा।”
आरव ने अपनी पुरानी गलती भी सार्वजनिक कर दी।
उसने बताया कि उसने कभी पैसे लेकर एक खबर रोक दी थी।
लोगों ने उसका विरोध किया।
कुछ ने उसे गालियाँ दीं।
कुछ ने कहा कि वह भी बाकी लोगों जैसा है।
लेकिन आरव ने पहली बार सफाई नहीं दी।
उसने सिर्फ कहा—
“हाँ। मैं गलत था।”
धीरे-धीरे सूरजपुर बदलने लगा।
लोगों ने एक-दूसरे को आईने के टुकड़े दिखाना बंद कर दिया।
उन्होंने उन्हें संभालकर रखा।
क्योंकि अब उन्हें समझ आ चुका था कि आईना किसी को शर्मिंदा करने के लिए नहीं था।
वह खुद को देखने के लिए था।
लेकिन एक रात आरव के घर के बाहर फिर एक काँच का टुकड़ा मिला।
उसमें कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“एक समाज तब नहीं बदलता जब अपराधी पकड़ा जाता है… समाज तब बदलता है जब लोग अपनी चुप्पी पहचानते हैं।”
आरव ने वह टुकड़ा उठाया।
तभी पीछे से आवाज आई—
“क्या तुम्हें लगता है सब खत्म हो गया?”
आरव ने पलटकर देखा।
हरिदास बाबा खड़े थे।
“क्या मतलब?”
बाबा ने कहा—
“तुमने सिर्फ सूरजपुर का सच देखा है।”
“और?”
“यह आईना सिर्फ एक जगह का नहीं था।”
आरव की आँखें फैल गईं।
“तो फिर?”
बाबा ने अपनी जेब से एक और काँच का टुकड़ा निकाला।
उसमें सूरजपुर नहीं था।
एक दूसरा शहर दिखाई दे रहा था।
लखनऊ।
फिर दिल्ली।
फिर मुंबई।
फिर हजारों अनजान चेहरे।
आरव की साँस रुक गई।
“यह कैसे?”
बाबा बोले—
“क्योंकि समाज हर जगह एक जैसा है।”
“क्या आईना हर जगह है?”
बाबा मुस्कुराए।
“नहीं।”
“फिर?”
“हर इंसान के भीतर एक आईना है।”
आरव ने काँच को देखा।
अचानक उसमें उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।
लेकिन इस बार चेहरा साफ था।
उसने पूछा—
“तो क्या अब मैं सच से डरता नहीं?”
आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।
“डरते हो।”
“फिर?”
“लेकिन अब भागते नहीं।”
अचानक काँच का टुकड़ा गर्म होने लगा।
उस पर एक आखिरी शब्द उभरा—
“अगला।”
आरव का चेहरा गंभीर हो गया।
“अगला कौन?”
आईना शांत रहा।
फिर उसमें एक बच्चा दिखाई दिया।
एक छोटा बच्चा।
वह अपने कमरे में बैठा था।
उसके सामने वही आईना था।
और उसके पीछे कोई खड़ा था।
एक काली परछाईं।
आरव ने ध्यान से देखा।
परछाईं धीरे-धीरे मुड़ी।
उसका चेहरा दिखाई दिया।
आरव पीछे हट गया।
वह चेहरा…
आरव का ही था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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