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पढ़ने का समय : 13 मिनट 😱 ब्लड रैवन (Blood Raven)😱
- भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप😱
भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप
तीसरी रात…
पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।
आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।
आरव पूरी रात जाग रहा था।
उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।
उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।
उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।
ठक…
ठक…
ठक…
आरव ने दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।
उसने थैला उठाकर खोला।
अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।
पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—
“यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”
आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।
उसमें लिखा था—
“रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”
नीचे एक नक्शा बना था।
वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।
हरिदास ने पन्ना पढ़ा।
उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।
“यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”
लेकिन तभी…
पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।
खिड़की अपने आप खुल गई।
एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।
और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—
“अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”
आरव समझ गया…
ब्लड रैवन सब जान चुका था।
—
आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।
आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।
हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।
हज़ारों…
शायद लाखों…
लेकिन कोई आवाज़ नहीं।
सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।
जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…
सारे कौए एक साथ उड़ गए।
उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।
“का…आ…आ…”
ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।
मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।
सब अंदर गए।
गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।
बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।
उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।
हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—
“यही है श्राप का पत्थर…”
लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।
सारी मशालें बुझ गईं।
घना अंधेरा छा गया।
और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।
ब्लड रैवन…
वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।
आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।
उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।
उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।
लेकिन जब उसने मुँह खोला…
तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।
“डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”
“सात आत्माएँ…”
“और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”
अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।
उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।
वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।
उनकी आँखें खाली थीं।
वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।
आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
लेकिन तभी…
एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।
“डरो मत…”
आरव ने पीछे देखा।
वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।
अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
उसने कहा—
“मैं पहला शिकार था…”
“मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
उसने अपनी हथेली खोली।
उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।
“यही पवित्र अग्नि है…”
“इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”
इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।
आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।
उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।
गुफा ज़ोर से हिलने लगी।
पत्थर टूटने लगे।
हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।
कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।
चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।
ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।
उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।
लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।
वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।
अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—
“अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”
आरव रुक गया।
उसे लगा…
क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?
तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।
उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।
उन्होंने एक साथ कहा—
“हमें मुक्त कर दो…”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।
क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।
फिर…
पत्थर में महीन दरार पड़ी।
एक…
दो…
तीन…
और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।
गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।
ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।
उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।
उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।
रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—
“नहीं… यह असंभव है…”
“मैं अमर हूँ…”
लेकिन श्राप टूट चुका था।
कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।
उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।
उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।
वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।
और अंत में वही छोटा बालक बोला—
“धन्यवाद…”
फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।
गुफा पूरी तरह शांत हो गई।
बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।
लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।
कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।
ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।
—
सुबह जब सूरज निकला…
तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।
लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।
दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।
हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।
“श्राप समाप्त हो गया…”
कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।
लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—
“हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”
—
एक वर्ष बाद…
आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।
रात हो चुकी थी।
सड़क सुनसान थी।
अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।
उसने ब्रेक लगाए।
बाहर उतरकर पंख उठाया।
पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—
“फिर…”
आरव का चेहरा पीला पड़ गया।
उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।
बहुत दूर…
बादलों के बीच…
दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।
फिर अंधेरे में गायब हो गईं।
और उसी पल…
हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—
“का…आ…आ…”
समाप्त… या शायद नहीं।
तीसरी रात…
पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।
आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।
आरव पूरी रात जाग रहा था।
उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।
उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।
उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।
ठक…
ठक…
ठक…
आरव ने दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।
उसने थैला उठाकर खोला।
अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।
पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—
“यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”
आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।
उसमें लिखा था—
“रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”
नीचे एक नक्शा बना था।
वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।
हरिदास ने पन्ना पढ़ा।
उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।
“यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”
लेकिन तभी…
पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।
खिड़की अपने आप खुल गई।
एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।
और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—
“अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”
आरव समझ गया…
ब्लड रैवन सब जान चुका था।
—
आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।
आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।
हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।
हज़ारों…
शायद लाखों…
लेकिन कोई आवाज़ नहीं।
सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।
जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…
सारे कौए एक साथ उड़ गए।
उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।
“का…आ…आ…”
ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।
मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।
सब अंदर गए।
गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।
बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।
उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।
हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—
“यही है श्राप का पत्थर…”
लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।
सारी मशालें बुझ गईं।
घना अंधेरा छा गया।
और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।
ब्लड रैवन…
वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।
आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।
उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।
उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।
लेकिन जब उसने मुँह खोला…
तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।
“डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”
“सात आत्माएँ…”
“और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”
अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।
उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।
वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।
उनकी आँखें खाली थीं।
वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।
आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
लेकिन तभी…
एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।
“डरो मत…”
आरव ने पीछे देखा।
वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।
अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
उसने कहा—
“मैं पहला शिकार था…”
“मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
उसने अपनी हथेली खोली।
उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।
“यही पवित्र अग्नि है…”
“इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”
इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।
आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।
उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।
गुफा ज़ोर से हिलने लगी।
पत्थर टूटने लगे।
हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।
कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।
चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।
ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।
उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।
लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।
वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।
अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—
“अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”
आरव रुक गया।
उसे लगा…
क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?
तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।
उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।
उन्होंने एक साथ कहा—
“हमें मुक्त कर दो…”
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।
क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।
फिर…
पत्थर में महीन दरार पड़ी।
एक…
दो…
तीन…
और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।
गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।
ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।
उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।
उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।
रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—
“नहीं… यह असंभव है…”
“मैं अमर हूँ…”
लेकिन श्राप टूट चुका था।
कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।
उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।
उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।
वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।
और अंत में वही छोटा बालक बोला—
“धन्यवाद…”
फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।
गुफा पूरी तरह शांत हो गई।
बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।
लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।
कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।
ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।
—
सुबह जब सूरज निकला…
तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।
लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।
दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।
हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।
“श्राप समाप्त हो गया…”
कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।
लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—
“हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”
—
एक वर्ष बाद…
आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।
रात हो चुकी थी।
सड़क सुनसान थी।
अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।
उसने ब्रेक लगाए।
बाहर उतरकर पंख उठाया।
पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—
“फिर…”
आरव का चेहरा पीला पड़ गया।
उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।
बहुत दूर…
बादलों के बीच…
दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।
फिर अंधेरे में गायब हो गईं।
और उसी पल…
हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—
“का…आ…आ…”
समाप्त… या शायद नहीं।
NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।