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  • 😱श्रापित महल का रहस्य 😱भाग–3 : श्राप का अंत😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    😱श्रापित महल का रहस्य 😱भाग–3 : श्राप का अंत😱

     

     

     

    भूमिगत कक्ष भयावह गर्जनाओं से काँप रहा था। ऊपर महल की दीवारें एक-एक करके दरक रही थीं। बाहर मूसलाधार वर्षा थमने का नाम नहीं ले रही थी। बिजली की हर चमक के साथ ऐसा लगता था मानो स्वयं आकाश इस अंतिम युद्ध का साक्षी बन गया हो।

     

    राजा वीरेंद्र सिंह ने दिव्य तलवार दोनों हाथों से कसकर पकड़ ली। तलवार से निकलता स्वर्णिम प्रकाश पूरे अंधकार को चीर रहा था।

     

    उनके सामने रक्त-पिशाच रुद्रकेतु खड़ा था। उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला भड़क रही थी। उसके विशाल शरीर से काला धुआँ निकल रहा था और उसके हर कदम से धरती काँप रही थी।

     

    रुद्रकेतु गरजा, “सदियों तक ऋषि मुझे बाँधते रहे, पर आज कोई मुझे रोक नहीं सकता। इस रात के बाद पूरा आर्यावर्त मेरे भय से काँपेगा।”

     

    राजा ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया, “जिस शक्ति की नींव निर्दोषों के रक्त पर रखी गई हो, उसका अंत निश्चित होता है।”

     

    यह सुनते ही रुद्रकेतु बिजली की गति से राजा पर झपटा। उसके नुकीले पंजों ने पत्थर की दीवारों को चीर डाला। राजा ने दिव्य तलवार से वार रोका। दोनों शक्तियों के टकराते ही एक भीषण प्रकाश फूटा। पूरे कक्ष में गूँजती गर्जना से पत्थरों की छत टूटने लगी।

     

    रानी मृणालिनी की आत्मा ने सातों ऋषियों की ओर देखा। वे ध्यानमग्न होकर मंत्रोच्चार करने लगे। उनके मंत्रों की ध्वनि से कक्ष में दिव्य ऊर्जा फैलने लगी। रुद्रकेतु का चेहरा विकृत होने लगा। वह तड़प उठा, लेकिन उसका क्रोध और बढ़ गया।

     

    उसने अपनी दोनों भुजाएँ आकाश की ओर उठाईं। अचानक महल के चारों ओर घूमती काली आत्माएँ भूमिगत कक्ष में उतरने लगीं। वे वही निर्दोष लोग थे जिनकी बलि सदियों पहले दी गई थी। उनके चेहरे पीड़ा से भरे थे।

     

    रुद्रकेतु हँस पड़ा।

     

    “देखो! ये सब अब मेरे दास हैं।”

     

    लेकिन तभी राजा ने उन आत्माओं की ओर देखा और ऊँचे स्वर में कहा, “यदि तुम निर्दोष हो, तो अन्याय का साथ मत दो। तुम्हारा शत्रु मैं नहीं, वही है जिसने तुम्हारा जीवन छीना था।”

     

    राजा के शब्द सुनते ही आत्माओं के चेहरों पर परिवर्तन आने लगा। उनकी आँखों का अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। एक वृद्ध आत्मा आगे बढ़ी और बोली, “हम बदले की आग में भटकते रहे, पर हमारा शत्रु यही राक्षस है।”

     

    क्षणभर में सैकड़ों आत्माएँ रुद्रकेतु से दूर हट गईं।

     

    रुद्रकेतु पहली बार भयभीत हुआ।

     

    “नहीं! तुम सब मेरे आदेश के बिना नहीं जा सकते!”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    सातों ऋषियों ने एक साथ अपने हाथ उठाए। उनके चारों ओर प्रकाश का विशाल मंडल बन गया। उसी समय रानी मृणालिनी ने राजा से कहा, “राजन, उसका अंत केवल दिव्य तलवार से नहीं होगा। उसके हृदय में जो काला मणि छिपा है, उसे नष्ट करना होगा। वही उसकी अमरता का स्रोत है।”

     

    रुद्रकेतु ने यह सुनते ही भीषण गर्जना की और अंतिम बार पूरी शक्ति से राजा पर टूट पड़ा।

     

    राजा भी बिना डरे आगे बढ़े।

     

    दोनों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जैसा सदियों से किसी ने नहीं देखा था। तलवार और पंजों की टक्कर से चिंगारियाँ उड़ रही थीं। महल की छत लगातार टूट रही थी। बाहर तूफ़ान और तेज़ होता जा रहा था।

     

    अचानक रुद्रकेतु ने राजा को ज़ोरदार प्रहार से दूर फेंक दिया। दिव्य तलवार उनके हाथ से छूटकर पत्थरों के बीच जा गिरी।

     

    रुद्रकेतु धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा।

     

    “अब तुम्हारा अंत निश्चित है।”

     

    राजा घायल थे, लेकिन उनका साहस अडिग था। उन्होंने घुटनों के बल उठकर फिर तलवार की ओर छलाँग लगाई। उसी क्षण रानी मृणालिनी ने अपने अस्तित्व की सारी शक्ति तलवार में समर्पित कर दी।

     

    तलवार सूर्य की तरह चमक उठी।

     

    राजा ने पूरी शक्ति से छलाँग लगाई और रुद्रकेतु के सीने पर वार कर दिया।

     

    तलवार उसके शरीर को चीरती हुई भीतर तक उतर गई।

     

    रुद्रकेतु दर्द से चीख उठा।

     

    उसके सीने से काले धुएँ के साथ एक चमकता हुआ काला मणि बाहर निकला।

     

    राजा ने बिना विलंब किए उसी तलवार से उस मणि पर प्रहार किया।

     

    मणि टूटते ही ऐसा लगा मानो हजारों बिजली एक साथ गिर पड़ी हों।

     

    पूरा महल भयंकर प्रकाश से भर गया।

     

    रुद्रकेतु की गर्जना धीरे-धीरे कराह में बदल गई।

     

    उसका विशाल शरीर राख बनकर बिखरने लगा।

     

    वह अंतिम बार बोला, “अहंकार… ही… मेरा… विनाश… बना…”

     

    और अगले ही क्षण उसका अस्तित्व सदा के लिए समाप्त हो गया।

     

    जैसे ही रुद्रकेतु नष्ट हुआ, महल में कैद सभी आत्माएँ मुक्त होने लगीं। उनके चेहरों पर वर्षों बाद शांति दिखाई दी। वे एक-एक कर प्रकाश में विलीन होने लगीं।

     

    रानी मृणालिनी राजा के सामने आई। अब उसके चेहरे पर भय नहीं, एक शांत मुस्कान थी।

     

    “राजन, आपने केवल मुझे ही नहीं, इस महल और उन सभी आत्माओं को भी मुक्त कर दिया। आपका नाम सदियों तक धर्म और साहस के प्रतीक के रूप में लिया जाएगा।”

     

    राजा ने आदरपूर्वक सिर झुका दिया।

     

    “रानी, आपकी आत्मा को शांति मिले।”

     

    रानी ने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए। धीरे-धीरे उसका रूप स्वर्णिम प्रकाश में बदल गया और वह आकाश में विलीन हो गई।

     

    उसी क्षण वर्षा रुक गई।

     

    काले बादल छँटने लगे।

     

    पूर्व दिशा में उगते सूर्य की पहली किरण टूटी हुई खिड़कियों से होकर भूमिगत कक्ष में पहुँची।

     

    महल का श्राप समाप्त हो चुका था।

     

    राजा वीरेंद्र सिंह बाहर निकले। उनके बचे हुए कुछ सैनिक, जो महल के बाहर बेहोश मिले थे, धीरे-धीरे होश में आने लगे। किसी को भीतर हुई घटनाओं का पूरा स्मरण नहीं था, पर सभी ने देखा कि जिस महल से रात भर भयावह चीखें आ रही थीं, वह अब शांत था।

     

    राजा ने आदेश दिया कि उस महल को फिर कभी किसी लालच या शक्ति की चाह में न खोला जाए। उसके स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाया जाए, जहाँ हर वर्ष निर्दोषों की स्मृति में दीप जलाए जाएँ।

     

    कुछ वर्षों बाद सूर्यगढ़ पहले से भी अधिक समृद्ध और न्यायप्रिय राज्य बन गया। लोग अपने बच्चों को यह कथा सुनाते थे कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, धर्म, साहस और करुणा में होती है।

     

    कहा जाता है कि आज भी बरसात की किसी गहरी रात में, यदि कोई उस पहाड़ी से गुज़रे, तो दूर कहीं टूटे हुए महल के स्थान पर एक हल्की स्वर्णिम आभा दिखाई देती है। लोग मानते हैं कि वह रानी मृणालिनी की आत्मा नहीं, बल्कि उस धर्म की ज्योति है जिसने एक भयानक श्राप का अंत किया था।

     

    और उसी के साथ श्रापित महल की कथा सदा के लिए इतिहास बन गई।

  • 😱श्रापित महल का रहस्य😱 भाग–2 : रक्त पिशाच का जागरण😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    😱श्रापित महल का रहस्य😱 भाग–2 : रक्त पिशाच का जागरण😱

     

     

     

    महल के हर कोने में गूँजते भयावह ठहाकों ने राजा वीरेंद्र सिंह का हृदय भी एक पल के लिए दहला दिया। बाहर मूसलाधार वर्षा पहले से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी थी। बिजली की हर चमक के साथ महल की दीवारों पर बनी टूटी-फूटी मूर्तियाँ जीवित होती हुई प्रतीत होती थीं।

     

    ऊपरी झरोखे में खड़ा काला साया धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया और आँखों के सामने गायब हो गया।

     

    राजा ने तलवार कसकर पकड़ ली।

     

    “कायर! सामने आ!”

     

    अचानक पीछे से किसी ने फुसफुसाया—

     

    “वह सामने कभी नहीं आता… वह केवल मृत्यु भेजता है…”

     

    राजा मुड़े।

     

    रानी मृणालिनी की आत्मा वहीं खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा पहले से अधिक उदास था।

     

    “राजन, समय बहुत कम है। यदि आज की रात समाप्त होने से पहले श्राप नहीं टूटा, तो सूर्यगढ़ भी इसी महल की तरह उजड़ जाएगा।”

     

    “मुझे सब सच बताओ।”

     

    रानी ने गहरी साँस ली।

     

    “सैकड़ों वर्ष पहले इस महल पर महाराज रुद्रकेतु का शासन था। वे वीर थे, लेकिन अमर होने की लालसा ने उन्हें अंधा बना दिया। एक तांत्रिक ने उन्हें विश्वास दिलाया कि यदि सौ निर्दोष लोगों की बलि दी जाए, तो मृत्यु भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी।”

     

    “और उन्होंने…?”

     

    “हाँ…”

     

    रानी की आँखों से रक्त के आँसू बह निकले।

     

    “पूरे राज्य में मासूमों का रक्त बहाया गया। अंत में तांत्रिक ने स्वयं राजा को धोखा दिया। अमर होने के स्थान पर वह एक रक्त-पिशाच बन गया। उसका शरीर नष्ट हो गया, लेकिन उसकी आत्मा इस महल में कैद हो गई।”

     

    इतना कहते ही पूरे महल में भूकंप जैसा कंपन होने लगा।

     

    ऊपरी मंज़िल से किसी भारी वस्तु के घसीटे जाने की आवाज़ आने लगी।

     

    घड़… घड़… घड़…

     

    आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की ओर बढ़ रही थी।

     

    रानी अचानक भयभीत हो उठी।

     

    “वह जाग चुका है!”

     

    उसी क्षण सीढ़ियों के ऊपर एक विशाल काला शरीर दिखाई दिया।

     

    लगभग नौ फुट लंबा।

     

    पूरे शरीर पर जली हुई त्वचा।

     

    लाल चमकती आँखें।

     

    नुकीले दाँत।

     

    हाथों में लोहे जैसी लंबी उँगलियाँ।

     

    वह कोई मनुष्य नहीं था।

     

    वह रुद्रकेतु का अभिशप्त रूप था।

     

    उसकी आवाज़ पूरे महल में गूँजी—

     

    “एक और राजा… एक और आत्मा…”

     

    राजा वीरेंद्र सिंह ने बिना देर किए तलवार उठाई और पूरी शक्ति से उस राक्षस पर प्रहार किया।

     

    लेकिन तलवार उसके शरीर के आर-पार निकल गई।

     

    राक्षस ज़ोर से हँसा।

     

    “लोहे से मृत्यु नहीं होती… श्राप से होती है…”

     

    इतना कहकर उसने अपना हाथ हवा में घुमाया।

     

    अचानक महल की टूटी हुई मूर्तियाँ एक-एक कर जीवित हो गईं।

     

    पत्थर के सैनिक राजा की ओर बढ़ने लगे।

     

    राजा चारों ओर से घिर चुके थे।

     

    उन्होंने एक-एक कर कई पत्थर सैनिकों के सिर धड़ से अलग कर दिए, लेकिन वे फिर उठ खड़े होते।

     

    तभी रानी मृणालिनी ने पुकारा—

     

    “राजन! महल के नीचे गुप्त सुरंग है। वहीं श्राप तोड़ने का उपाय छिपा है।”

     

    राजा तुरंत उसके पीछे दौड़ पड़े।

     

    महल के पिछले हिस्से में एक विशाल शिव मंदिर था।

     

    मंदिर वर्षों से वीरान पड़ा था।

     

    रानी ने शिवलिंग के सामने रखा एक पत्थर हटाया।

     

    उसके नीचे अंधेरे में उतरती हुई सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    राजा मशाल लेकर नीचे उतरने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे नीचे जा रहे थे, हवा और ठंडी होती जा रही थी।

     

    दीवारों पर प्राचीन संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।

     

    अचानक एक कक्ष आया।

     

    उसके बीचोंबीच सात लोहे के संदूक रखे थे।

     

    हर संदूक पर एक अलग ताला।

     

    और हर ताले पर रक्त से बना एक चिन्ह।

     

    रानी बोली—

     

    “इनमें उन सात ऋषियों की अस्थियाँ हैं जिन्होंने रुद्रकेतु को श्राप दिया था। यदि ये संदूक खुल गए… तो उसका बंधन पूरी तरह टूट जाएगा।”

     

    इतने में पीछे से ज़ोरदार धमाका हुआ।

     

    रुद्रकेतु सुरंग में उतर चुका था।

     

    उसकी गर्जना से पूरा भूमिगत कक्ष काँप उठा।

     

    “बहुत भाग लिए, वीरेंद्र…”

     

    राजा ने तलवार उठाई।

     

    लेकिन इस बार रानी ने उनका हाथ रोक लिया।

     

    “नहीं! इसे शक्ति से नहीं… सत्य से हराया जा सकता है।”

     

    “कैसे?”

     

    रानी ने काँपते हुए कहा—

     

    “सातवाँ संदूक खोलिए…”

     

    राजा ने भारी ताला तोड़ा।

     

    संदूक खुलते ही तेज़ स्वर्णिम प्रकाश पूरे कक्ष में फैल गया।

     

    उसके भीतर एक प्राचीन तलवार रखी थी।

     

    तलवार की मूठ पर लिखा था—

     

    ‘धर्म ही विजय है।’

     

    जैसे ही राजा ने तलवार हाथ में ली, वह दिव्य प्रकाश से चमक उठी।

     

    रुद्रकेतु पहली बार पीछे हट गया।

     

    उसकी आँखों में भय दिखाई दिया।

     

    “नहीं… यह असंभव है…”

     

    राजा आगे बढ़े।

     

    “आज निर्दोषों के रक्त का हिसाब होगा।”

     

    रुद्रकेतु ने भयानक गर्जना की और पूरा भूमिगत कक्ष अंधकार से भर गया।

     

    तभी…

     

    सभी संदूक अपने-आप खुलने लगे।

     

    सातों ऋषियों की दिव्य आत्माएँ प्रकाश के रूप में प्रकट हुईं।

     

    उन्होंने एक साथ कहा—

     

    “अंतिम युद्ध आरंभ हो चुका है…”

     

    उसी क्षण महल की नींव हिलने लगी।

     

    ऊपर बिजली गिरी।

     

    महल की सबसे ऊँची मीनार टूटकर गिर पड़ी।

     

    और रुद्रकेतु ने ऐसी गर्जना की कि पूरी पहाड़ी काँप उठी।

     

    राजा वीरेंद्र सिंह ने दिव्य तलवार दोनों हाथों से उठाई…

     

    और अंतिम युद्ध के लिए रुद्रकेतु की ओर बढ़ गए।

  • 😱श्रापित महल का रहस्य😱भाग 1: बारिश की वह अभिशप्त रात😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    😱श्रापित महल का रहस्य😱भाग 1: बारिश की वह अभिशप्त रात😱

     

     

     

    आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। बिजली बार-बार आसमान को चीरती हुई चमक रही थी और उसकी भयावह रोशनी घने जंगलों को पलभर के लिए उजाला देकर फिर गहरे अंधकार में डुबो देती थी। मूसलाधार बारिश मानो वर्षों का क्रोध एक ही रात में धरती पर बरसा रही थी। तेज़ हवाएँ विशाल साल और पीपल के वृक्षों को इस तरह झकझोर रही थीं जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें उखाड़ फेंकना चाहती हो।

     

    ऐसी ही भयावह रात में सूर्यगढ़ राज्य के सैनिक मशालें लिए जंगल के बीच बने पुराने मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। उनके घोड़े बार-बार हिनहिना रहे थे, मानो किसी अनजाने खतरे को महसूस कर रहे हों।

     

    सबसे आगे स्वयं सूर्यगढ़ के युवा और पराक्रमी राजा वीरेंद्र सिंह थे। वे युद्ध से लौट रहे थे। उन्होंने पड़ोसी राज्य पर विजय प्राप्त की थी, पर उनके चेहरे पर जीत की खुशी नहीं थी। युद्ध के दौरान उन्हें एक रहस्यमय साधु ने चेतावनी दी थी—

     

    “राजन… विजय तो तुम्हारी होगी, लेकिन लौटते समय बारिश की रात यदि काले पहाड़ के पास बने पुराने महल में प्रवेश किया… तो तुम्हारा भाग्य सदा के लिए बदल जाएगा।”

     

    राजा ने उस समय उस चेतावनी को अंधविश्वास समझकर अनदेखा कर दिया था।

     

    अब वही काला पहाड़ उनके सामने खड़ा था।

     

    अचानक एक भीषण गर्जना हुई। बिजली इतनी निकट गिरी कि घोड़े बेकाबू होकर उछल पड़े। सैनिकों में भगदड़ मच गई। तभी सेना के वृद्ध सेनापति बोले—

     

    “महाराज, आगे बढ़ना मृत्यु को बुलाना है। सामने जो खंडहर दिखाई दे रहा है, वहीं रात बिताना उचित होगा।”

     

    राजा ने दूर देखा।

     

    बारिश की धुंध के बीच एक विशाल महल दिखाई दे रहा था। उसके ऊँचे शिखर टूट चुके थे, लेकिन फिर भी वह किसी सोए हुए दैत्य की तरह अंधेरे में खड़ा था।

     

    महल के मुख्य द्वार पर पत्थर की दो विशाल सिंह प्रतिमाएँ थीं। वर्षों की बारिश और समय ने उन्हें जर्जर कर दिया था, लेकिन उनकी आँखें अब भी जीवित प्रतीत होती थीं।

     

    सैनिकों ने महल का द्वार धक्का देकर खोला।

     

    द्वार खुलते ही भीतर से बर्फ जैसी ठंडी हवा का झोंका निकला। कई मशालें एक साथ बुझ गईं।

     

    एक सैनिक काँपते हुए बोला, “महाराज… यह स्थान शुभ नहीं लगता।”

     

    राजा ने तलवार निकालते हुए कहा, “भय केवल मन में होता है। चलो।”

     

    महल के भीतर सन्नाटा था।

     

    दीवारों पर बनी चित्रकारी धूल से ढकी हुई थी। लंबे गलियारों में पानी टपकने की आवाज़ गूँज रही थी। ऐसा लगता था मानो कोई अदृश्य व्यक्ति दूर कहीं धीरे-धीरे चल रहा हो।

     

    सैनिकों ने एक विशाल सभा कक्ष में विश्राम की तैयारी की।

     

    तभी…

     

    महल के भीतर से एक स्त्री के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    सभी सैनिक एक साथ उठ खड़े हुए।

     

    “कौन है वहाँ?” सेनापति ने ऊँची आवाज़ में पूछा।

     

    कोई उत्तर नहीं मिला।

     

    कुछ क्षण बाद वही रोने की आवाज़ और भी निकट सुनाई दी।

     

    राजा स्वयं मशाल लेकर उस दिशा में बढ़े।

     

    लंबे गलियारे के अंत में एक विशाल कक्ष था।

     

    कक्ष का द्वार आधा खुला हुआ था।

     

    राजा ने धीरे से उसे खोला।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन कमरे के बीचोंबीच एक स्वर्ण सिंहासन रखा था, जिस पर धूल का एक कण भी नहीं था।

     

    उस सिंहासन के पीछे दीवार पर एक अत्यंत सुंदर रानी का चित्र बना था।

     

    चित्र की आँखें इतनी सजीव थीं कि ऐसा लगता था वह सीधे राजा को देख रही है।

     

    अचानक…

     

    चित्र से एक लाल बूँद टपकी।

     

    राजा चौंक गए।

     

    उन्होंने ध्यान से देखा।

     

    वह लाल रंग नहीं…

     

    रक्त था।

     

    एक के बाद एक रक्त की बूँदें चित्र से टपकने लगीं।

     

    उसी क्षण कमरे का द्वार अपने आप बंद हो गया।

     

    बाहर खड़े सैनिकों ने जोर-जोर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

     

    “महाराज!”

     

    लेकिन भीतर राजा अकेले थे।

     

    चित्र में बनी रानी मुस्कुराने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसकी मुस्कान विकृत होती गई।

     

    उसकी आँखों से भी रक्त बहने लगा।

     

    अचानक पूरे कमरे में एक भयावह स्त्री स्वर गूँजा—

     

    “सैकड़ों वर्षों बाद… कोई राजा इस महल में आया है…”

     

    राजा ने तलवार तान दी।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    स्वर फिर गूँजा—

     

    “मैं इस महल की अंतिम रानी… मृणालिनी हूँ।”

     

    कमरे का तापमान अचानक इतना गिर गया कि राजा की साँसों से धुआँ निकलने लगा।

     

    चित्र से काला धुआँ उठने लगा।

     

    कुछ ही क्षणों में धुएँ के बीच एक स्त्री का रूप प्रकट हुआ।

     

    उसके लंबे बाल ज़मीन तक लटक रहे थे।

     

    सफेद वस्त्र रक्त से सने हुए थे।

     

    चेहरा सुंदर था, पर आँखों में ऐसा शून्य था जिसे देखकर सबसे साहसी योद्धा भी काँप उठे।

     

    राजा ने दृढ़ स्वर में पूछा, “यदि तुम रानी हो तो इस दशा में क्यों हो?”

     

    रानी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “क्योंकि इस महल से विश्वासघात हुआ था…”

     

    “किसने?”

     

    “मेरे अपने लोगों ने।”

     

    इतना कहकर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    राजा के सामने एक-एक कर दृश्य बदलने लगे।

     

    उन्होंने देखा—

     

    यह महल कभी अपार वैभव से भरा था।

     

    संगीत, नृत्य और उत्सव होते थे।

     

    फिर एक रात…

     

    राजदरबार के ही एक तांत्रिक ने अमर होने की लालसा में महल के सभी लोगों की बलि दे दी।

     

    राजा, रानी, राजकुमार, सैनिक…

     

    कोई जीवित नहीं बचा।

     

    मरते समय रानी ने श्राप दिया—

     

    “जिस रात मूसलाधार वर्षा होगी… और कोई राजा इस महल में आएगा… उसी दिन यह श्राप फिर जाग उठेगा।”

     

    दृश्य समाप्त हुआ।

     

    राजा स्तब्ध रह गए।

     

    “तो क्या मैं वही राजा हूँ?”

     

    रानी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ… और अब श्राप तुम्हारे साथ भी बंध चुका है।”

     

    अचानक बाहर से सैनिकों की चीखें सुनाई दीं।

     

    राजा ने पूरी शक्ति से द्वार खोला।

     

    दृश्य देखकर उनका रक्त जम गया।

     

    सभा कक्ष में कोई सैनिक दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    सिर्फ उनकी तलवारें, ढालें और भीगी हुई पगड़ियाँ ज़मीन पर पड़ी थीं।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे पूरा दल हवा में विलीन हो गया हो।

     

    उसी समय महल की ऊपरी मंज़िल से किसी के ज़ोर-ज़ोर से हँसने की आवाज़ आई।

     

    राजा ने ऊपर देखा।

     

    अंधेरे झरोखे में एक लंबा काला साया खड़ा था।

     

    उसकी आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं।

     

    वह धीमे स्वर में बोला—

     

    “स्वागत है, वीरेंद्र सिंह… मैं सदियों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था…”

     

    यह सुनते ही महल की सभी बुझी हुई मशालें एक साथ स्वयं जल उठीं।

     

    • और पूरे महल में भयावह ठहाके गूँजने लगे…
  • 😱 Blood Raven -Part-3😱

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

    😱 ब्लड रैवन (Blood Raven)😱

    1. भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप😱

     

    भाग–3 : रक्त का अंतिम श्राप

     

    तीसरी रात…

     

    पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।

     

    आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।

     

    आरव पूरी रात जाग रहा था।

     

    उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।

     

    उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।

     

    उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

     

    उसने थैला उठाकर खोला।

     

    अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।

     

    पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

     

    “यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”

     

    आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”

     

    नीचे एक नक्शा बना था।

     

    वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।

     

    हरिदास ने पन्ना पढ़ा।

     

    उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।

     

    “यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”

     

    लेकिन तभी…

     

    पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।

     

    और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”

     

    आरव समझ गया…

     

    ब्लड रैवन सब जान चुका था।

     

     

    आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।

     

    हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।

     

    हज़ारों…

     

    शायद लाखों…

     

    लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

     

    सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…

     

    सारे कौए एक साथ उड़ गए।

     

    उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।

     

    “का…आ…आ…”

     

    ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।

     

    मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।

     

    सब अंदर गए।

     

    गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।

     

    बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।

     

    उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “यही है श्राप का पत्थर…”

     

    लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।

     

    सारी मशालें बुझ गईं।

     

    घना अंधेरा छा गया।

     

    और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।

     

    ब्लड रैवन…

     

    वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।

     

    आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।

     

    उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।

     

    उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।

     

    लेकिन जब उसने मुँह खोला…

     

    तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।

     

    “डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”

     

    “सात आत्माएँ…”

     

    “और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”

     

    अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।

     

    उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।

     

    वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।

     

    उनकी आँखें खाली थीं।

     

    वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।

     

    आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “डरो मत…”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।

     

    अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं पहला शिकार था…”

     

    “मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

     

    उसने अपनी हथेली खोली।

     

    उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।

     

    “यही पवित्र अग्नि है…”

     

    “इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।

     

    आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।

     

    उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।

     

    गुफा ज़ोर से हिलने लगी।

     

    पत्थर टूटने लगे।

     

    हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।

     

    कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।

     

    चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।

     

    ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।

     

    उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।

     

    लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।

     

    वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।

     

    अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—

     

    “अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसे लगा…

     

    क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?

     

    तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।

     

    उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    उन्होंने एक साथ कहा—

     

    “हमें मुक्त कर दो…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।

     

    क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।

     

    फिर…

     

    पत्थर में महीन दरार पड़ी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।

     

    गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।

     

    ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।

     

    उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।

     

    उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।

     

    रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—

     

    “नहीं… यह असंभव है…”

     

    “मैं अमर हूँ…”

     

    लेकिन श्राप टूट चुका था।

     

    कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।

     

    उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।

     

    उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।

     

    वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।

     

    और अंत में वही छोटा बालक बोला—

     

    “धन्यवाद…”

     

    फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।

     

    गुफा पूरी तरह शांत हो गई।

     

    बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।

     

    लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।

     

    कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।

     

    ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।

     

     

    सुबह जब सूरज निकला…

     

    तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।

     

    दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।

     

    हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।

     

    “श्राप समाप्त हो गया…”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।

     

    लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—

     

    “हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”

     

     

    एक वर्ष बाद…

     

    आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।

     

    रात हो चुकी थी।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।

     

    उसने ब्रेक लगाए।

     

    बाहर उतरकर पंख उठाया।

     

    पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—

     

    “फिर…”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।

     

    बहुत दूर…

     

    बादलों के बीच…

     

    दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।

     

    फिर अंधेरे में गायब हो गईं।

     

    और उसी पल…

     

    हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—

     

    “का…आ…आ…”

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

     

     

    तीसरी रात…

     

    पूरा कालीघाट गाँव मौत की खामोशी में डूबा हुआ था।

     

    आसमान पर काले बादलों का साम्राज्य था। बिजली चमकती तो कुछ पल के लिए पहाड़ों की चोटियाँ दिखाई देतीं, फिर सब कुछ फिर से अंधेरे में खो जाता।

     

    आरव पूरी रात जाग रहा था।

     

    उसकी मेज़ पर वही पुरानी तांत्रिक पुस्तक खुली हुई थी।

     

    उसकी नज़र बार-बार उस फटे हुए आख़िरी पन्ने पर जा रही थी।

     

    उसी समय दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन ज़मीन पर एक पुराना कपड़े का थैला रखा था।

     

    उसने थैला उठाकर खोला।

     

    अंदर वही फटा हुआ पन्ना रखा था जिसकी तलाश उसे थी।

     

    पन्ने के नीचे लाल स्याही से लिखा था—

     

    “यदि तुमने यह पढ़ लिया है… तो तुम्हारे पास केवल आज की रात बची है।”

     

    आरव ने काँपते हाथों से पन्ना खोला।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “रुद्रनाथ को कोई हथियार नहीं मार सकता। उसकी शक्ति उसके शरीर में नहीं, बल्कि उस पत्थर में कैद है जिस पर उसने पहला रक्त चढ़ाया था। यदि उस पत्थर को पवित्र अग्नि में भस्म कर दिया जाए, तो ब्लड रैवन भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।”

     

    नीचे एक नक्शा बना था।

     

    वह उसी प्राचीन मंदिर के पीछे छिपी गुफा की ओर इशारा कर रहा था।

     

    हरिदास ने पन्ना पढ़ा।

     

    उनकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की हल्की-सी चमक दिखाई दी।

     

    “यही वह रहस्य है जिसे हमारे पूर्वजों ने छिपा दिया था।”

     

    लेकिन तभी…

     

    पूरा कमरा अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    एक काला पंख उड़ता हुआ भीतर आया।

     

    और हवा में एक भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “अब कोई मुझे नहीं रोक सकता…”

     

    आरव समझ गया…

     

    ब्लड रैवन सब जान चुका था।

     

     

    आधी रात होने से पहले आरव, हरिदास और गाँव के पाँच साहसी युवक मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    आज जंगल पहले से भी ज़्यादा भयावह लग रहा था।

     

    हर पेड़ की डाल पर कौए बैठे थे।

     

    हज़ारों…

     

    शायद लाखों…

     

    लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

     

    सिर्फ़ उनकी लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    जैसे ही दल मंदिर पहुँचा…

     

    सारे कौए एक साथ उड़ गए।

     

    उनके पंखों की आवाज़ से पूरा आकाश भर गया।

     

    “का…आ…आ…”

     

    ऐसा लगा जैसे पूरी धरती काँप उठी हो।

     

    मंदिर के पीछे पत्थरों के बीच एक संकरी गुफा थी।

     

    सब अंदर गए।

     

    गुफा की दीवारों पर पुराने संस्कृत मंत्र खुदे हुए थे।

     

    बीचों-बीच एक विशाल काला पत्थर रखा था।

     

    उस पर सूखे रक्त के निशान अब भी दिखाई दे रहे थे।

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “यही है श्राप का पत्थर…”

     

    लेकिन उसी क्षण गुफा के भीतर तेज़ हवा चली।

     

    सारी मशालें बुझ गईं।

     

    घना अंधेरा छा गया।

     

    और अंधेरे के बीच दो लाल आँखें चमकीं।

     

    ब्लड रैवन…

     

    वह धीरे-धीरे अंधेरे से बाहर आया।

     

    आज उसका आकार किसी घोड़े जितना विशाल था।

     

    उसके पंख फैलते ही पूरी गुफा ढक गई।

     

    उसकी चोंच से रक्त जैसी लाल बूँदें टपक रही थीं।

     

    लेकिन जब उसने मुँह खोला…

     

    तो आवाज़ रुद्रनाथ की थी।

     

    “डेढ़ सौ वर्षों से मैं इस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था…”

     

    “सात आत्माएँ…”

     

    “और आज सातवीं आत्मा तुम्हारी होगी, आरव।”

     

    अचानक उसके चारों ओर काला धुआँ फैल गया।

     

    उस धुएँ से छह धुँधली आकृतियाँ बाहर निकलीं।

     

    वे वही लोग थे जो ब्लड रैवन का शिकार बन चुके थे।

     

    उनकी आँखें खाली थीं।

     

    वे किसी कठपुतली की तरह रुद्रनाथ के इशारों पर चल रहे थे।

     

    आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

     

    लेकिन तभी…

     

    एक छोटी-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “डरो मत…”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वही रहस्यमयी बालक खड़ा था, जो जंगल में मिला था।

     

    अब उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मैं पहला शिकार था…”

     

    “मैं डेढ़ सौ साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

     

    उसने अपनी हथेली खोली।

     

    उसमें एक छोटी-सी अग्नि जल रही थी।

     

    “यही पवित्र अग्नि है…”

     

    “इसे पत्थर तक पहुँचा दो…”

     

    इतना कहकर वह धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गया।

     

    आरव ने अग्नि अपने हाथों में ली।

     

    उसी समय ब्लड रैवन भयानक चीख के साथ उसकी ओर झपटा।

     

    गुफा ज़ोर से हिलने लगी।

     

    पत्थर टूटने लगे।

     

    हरिदास और गाँव वाले मंत्र पढ़ने लगे।

     

    कौओं का विशाल झुंड गुफा में घुस आया।

     

    चारों ओर सिर्फ़ पंख ही पंख दिखाई दे रहे थे।

     

    ब्लड रैवन बार-बार आरव पर हमला कर रहा था।

     

    उसके पंजों से आरव के कंधे पर गहरा घाव हो गया।

     

    लेकिन उसने अग्नि नहीं छोड़ी।

     

    वह धीरे-धीरे श्राप वाले पत्थर की ओर बढ़ता रहा।

     

    अचानक रुद्रनाथ की आवाज़ गूँजी—

     

    “अगर पत्थर जल गया… तो मेरी आत्मा के साथ इन सभी आत्माओं का भी अंत हो जाएगा!”

     

    आरव रुक गया।

     

    उसे लगा…

     

    क्या सचमुच वह उन निर्दोष आत्माओं को भी नष्ट कर देगा?

     

    तभी उन छह आत्माओं ने एक साथ उसकी ओर देखा।

     

    उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी।

     

    उन्होंने एक साथ कहा—

     

    “हमें मुक्त कर दो…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूरी ताकत से पवित्र अग्नि उस काले पत्थर पर रख दी।

     

    क्षणभर के लिए सब कुछ शांत हो गया।

     

    फिर…

     

    पत्थर में महीन दरार पड़ी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और अगले ही पल भयंकर विस्फोट हुआ।

     

    गुफा सफेद प्रकाश से भर गई।

     

    ब्लड रैवन ने ऐसी चीख मारी कि पहाड़ गूँज उठे।

     

    उसके विशाल काले पंख एक-एक करके राख बनने लगे।

     

    उसकी लाल आँखों की चमक बुझने लगी।

     

    रुद्रनाथ की आवाज़ दर्द से भर उठी—

     

    “नहीं… यह असंभव है…”

     

    “मैं अमर हूँ…”

     

    लेकिन श्राप टूट चुका था।

     

    कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर राख बनकर हवा में बिखर गया।

     

    उसी समय छहों आत्माएँ मुस्कुराईं।

     

    उनके चेहरे से भय गायब हो चुका था।

     

    वे धीरे-धीरे उजाले में बदलकर आकाश की ओर उठ गईं।

     

    और अंत में वही छोटा बालक बोला—

     

    “धन्यवाद…”

     

    फिर वह भी प्रकाश बनकर विलीन हो गया।

     

    गुफा पूरी तरह शांत हो गई।

     

    बाहर बैठे लाखों कौए एक साथ उड़ गए।

     

    लेकिन इस बार उनकी आवाज़ भयावह नहीं थी।

     

    कुछ ही क्षणों बाद पूरा आकाश खाली हो गया।

     

    ब्लड रैवन का अस्तित्व समाप्त हो चुका था।

     

     

    सुबह जब सूरज निकला…

     

    तो कई वर्षों बाद कालीघाट में बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    लोग अपने घरों से बिना डर के बाहर निकले।

     

    दरवाज़ों पर बँधे काले धागे उतार दिए गए।

     

    हरिदास ने आसमान की ओर देखकर गहरी साँस ली।

     

    “श्राप समाप्त हो गया…”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने इस पूरे रहस्य पर एक पुस्तक लिखी।

     

    लेकिन उसने उस पुस्तक की अंतिम पंक्ति में केवल एक चेतावनी लिखी—

     

    “हर श्राप समाप्त हो जाता है… यदि उसका सामना साहस से किया जाए। लेकिन कुछ अंधेरे कभी पूरी तरह नहीं मरते। वे केवल सही समय का इंतज़ार करते हैं।”

     

     

    एक वर्ष बाद…

     

    आरव अपनी पुस्तक के विमोचन से लौट रहा था।

     

    रात हो चुकी थी।

     

    सड़क सुनसान थी।

     

    अचानक उसकी कार के सामने एक काला पंख आकर गिरा।

     

    उसने ब्रेक लगाए।

     

    बाहर उतरकर पंख उठाया।

     

    पंख पर लाल रंग से केवल एक शब्द लिखा था—

     

    “फिर…”

     

    आरव का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उसने धीरे-धीरे ऊपर आसमान की ओर देखा।

     

    बहुत दूर…

     

    बादलों के बीच…

     

    दो लाल आँखें कुछ क्षणों के लिए चमकीं।

     

    फिर अंधेरे में गायब हो गईं।

     

    और उसी पल…

     

    हवा में एक बहुत धीमी, लेकिन परिचित आवाज़ तैर गई—

     

    “का…आ…आ…”

     

    समाप्त… या शायद नहीं।

  • 😱 Blood Raven -Part-2😱

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    1. 😱ब्लड रैवन (Blood Raven) भाग–2 : शापित जंगल और सात नाम😱

    2.  
    3.  
    4.  
    5. सुबह की पहली किरण कालीघाट की पहाड़ियों पर पड़ी, लेकिन गाँव में किसी ने सूर्योदय का स्वागत नहीं किया। हर घर का दरवाज़ा बंद था। हवा में धूप, राख और भय की गंध घुली हुई थी। गाँव के बीचोंबीच उस युवक का अंतिम संस्कार किया जा रहा था, जिसकी मृत्यु पिछली रात हुई थी। उसके परिवार का हर सदस्य रो रहा था, लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि मृत युवक के चेहरे पर भय की जमी हुई परछाईं अब भी साफ़ दिखाई दे रही थी। हरिदास ने चिता की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा, “यह मौत नहीं… बुलावा है।” आरव ने पूछा, “क्या हर बार ऐसा ही होता है?” हरिदास ने सिर हिलाया। “ब्लड रैवन किसी को मारने से पहले उसका नाम चुनता है। सात नाम पूरे होते ही वह फिर गायब हो जाता है… और तीस वर्षों बाद लौटता है।” आरव ने गहरी साँस ली। “अगर उसका सामना किया जाए तो?” “जिसने भी कोशिश की… वह कभी लौटकर नहीं आया।” उसी समय गाँव की एक वृद्धा दौड़ती हुई आई। उसके हाथ काँप रहे थे। “हरिदास… जंगल वाले मंदिर का दरवाज़ा खुल गया है!” यह सुनते ही वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का चेहरा सफेद पड़ गया। “कौन-सा मंदिर?” आरव ने पूछा। हरिदास ने उत्तर दिया, “वही… जहाँ रुद्रनाथ ने आख़िरी तांत्रिक अनुष्ठान किया था। डेढ़ सौ वर्षों से वह बंद था।” कुछ देर बाद हरिदास, आरव और गाँव के चार साहसी लोग मशालें लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में कदम रखते ही वातावरण बदल गया। सूरज ऊपर था, फिर भी पेड़ों के बीच अजीब अँधेरा फैला हुआ था। हवा बिल्कुल शांत थी। लेकिन हजारों कौओं की धीमी आवाज़ हर दिशा से सुनाई दे रही थी। चलते-चलते आरव की नज़र एक पुराने पेड़ पर पड़ी। उसकी छाल पर नाखूनों से सात नाम लिखे हुए थे। छह नाम धुंधले पड़ चुके थे। सातवाँ नाम खाली था। हरिदास ने काँपती आवाज़ में कहा, “हर बार ऐसा ही होता है… सातवाँ नाम आख़िर में लिखा जाता है।” जैसे ही वे आगे बढ़े, अचानक एक तेज़ झोंका आया। सभी मशालें एक साथ बुझ गईं। चारों ओर घना अँधेरा छा गया। तभी किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी। आरव ने टॉर्च जलाई। सामने एक छोटा लड़का खड़ा था। उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे और उसके हाथ में एक काला पंख था। “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा। लड़के ने मुस्कुराकर कहा, “मैं रास्ता दिखाने आया हूँ।” “तुम गाँव के हो?” लड़का बोला, “मैं था…” इतना कहकर वह मुड़ा और जंगल के भीतर चलने लगा। हरिदास ने तुरंत आरव का हाथ पकड़ लिया। “उसके पीछे मत जाना!” लेकिन अगले ही पल वह लड़का धुएँ की तरह हवा में गायब हो गया। कुछ दूरी पर एक टूटा हुआ पत्थर का मंदिर दिखाई दिया। मंदिर के विशाल दरवाज़े सचमुच खुले हुए थे। अंदर घुसते ही उन्हें ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। दीवारों पर कौओं की आकृतियाँ बनी थीं। बीच में एक पत्थर की वेदी थी, जिस पर सूखा हुआ लाल रंग फैला हुआ था। वेदी के पीछे एक लोहे का संदूक रखा था। आरव ने सावधानी से उसे खोला। अंदर एक चमड़े से बँधी पुरानी पुस्तक रखी थी। उसके पहले पन्ने पर लिखा था— “जो इसे पढ़ेगा, वह सत्य देखेगा… और सत्य उसे कभी नहीं छोड़ेगा।” आरव ने पुस्तक पलटनी शुरू की। उसमें रुद्रनाथ की लिखावट थी। “मैंने मृत्यु को हराने की कोशिश की। मैंने सात निर्दोष आत्माओं की शक्ति अपने भीतर बाँधनी चाही। परंतु अंतिम क्षण में मंत्र उल्टा पड़ गया। मेरा शरीर नष्ट हो गया और मेरी आत्मा रक्त-पिपासु पक्षी में कैद हो गई। जब तक सात भयभीत आत्माएँ मुझे नहीं मिलेंगी… मैं मुक्त नहीं हो सकूँगा।” आरव के हाथ काँपने लगे। “तो ब्लड रैवन लोगों की जान इसलिए लेता है…” हरिदास ने उत्तर दिया, “अपनी अधूरी साधना पूरी करने के लिए।” तभी मंदिर की छत से कुछ टपका। आरव ने ऊपर

       देखा। सैकड़ों काले कौए उल्टे लटके हुए थे। उनकी लाल आँखें एक साथ खुलीं। पूरा मंदिर चीखों से गूँज उठा। “का…आ…आ…” गाँव के लोग डरकर बाहर भागे। आरव भी दौड़ा, लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँचा, उसके सामने वही विशाल ब्लड रैवन उतर आया। उसके पंख इतने बड़े थे कि पूरा रास्ता ढक गया। उसकी आँखों में जलती हुई लाल रोशनी थी। वह धीरे-धीरे आरव की ओर बढ़ा। फिर इंसानी आवाज़ में बोला— “दूसरा नाम…” इतना कहते ही वह धुएँ में बदलकर गायब हो गया। मंदिर फिर शांत हो गया। गाँव लौटते समय किसी ने एक शब्द तक नहीं कहा। उस रात पूरे गाँव में किसी ने दीपक तक नहीं बुझाया। हर घर में लोग जागते रहे। लेकिन आधी रात होते ही फिर वही आवाज़ सुनाई दी— “का…आ…आ…” इस बार आवाज़ पूरे गाँव के ऊपर से आई। लोग घरों से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पाए। अचानक एक घर की खिड़की अपने आप खुल गई। अंदर रहने वाली वृद्ध महिला चीख उठी। जब लोग सुबह पहुँचे… वह बिस्तर पर मृत पड़ी थी। कमरे में कोई संघर्ष नहीं हुआ था। उसकी मुट्ठी में केवल एक काला पंख दबा हुआ था। हरिदास की आँखें नम हो गईं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “अब दो नाम पूरे हो चुके हैं…” आरव को अब यह समझ आने लगा था कि यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक जीवित श्राप था। उसने तय किया कि वह ब्लड रैवन को रोकने का तरीका खोजेगा। रात के अंतिम पहर उसने फिर वही पुरानी पुस्तक खोली। आख़िरी पन्नों में एक अधूरा वाक्य लिखा था— “यदि रक्त से जन्मे रैवन का हृदय उस पत्थर पर लौटे जहाँ श्राप शुरू हुआ था… तभी उसका अंत संभव है।” लेकिन आगे का हिस्सा फटा हुआ था। किसी ने जानबूझकर वह पन्ना निकाल लिया था। आरव समझ गया— रहस्य अभी अधूरा है। और शायद वही फटा हुआ पन्ना पूरे गाँव की किस्मत बदल सकता है। उसी समय बाहर ज़ोरदार बिजली कड़की। खिड़की खुल गई। एक काला पंख उड़ता हुआ कमरे के बीच आकर गिरा। उस पर लाल रंग से केवल दो शब्द लिखे थे— “तीसरी रात…” आरव ने काँपते हाथों से पंख उठाया। बाहर पहाड़ी की चोटी पर ब्लड रैवन बैठा था। उसकी लाल आँखें सीधे आरव पर टिकी थीं। और फिर पूरी घाटी में उसकी भयावह आवाज़ गूँज उठी— “का…आ…आ…” आरव को पहली बार महसूस हुआ… अगला नाम शायद उसी का होने वाला था।

  • 😱ब्लड रैवन (Blood Raven) भाग–1 : काली आँखों वाला कौआ😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    😱 ब्लड रैवन (Blood Raven) 😱

    भाग–1 : 😱 काली आँखों वाला कौआ 😱

     

    रात के ठीक बारह बजे, उत्तर भारत के पहाड़ों के बीच बसे छोटे-से गाँव कालीघाट में एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने पूरे गाँव की नींद छीन ली।

     

    “का…आ…आ…”

     

    यह किसी साधारण कौए की आवाज़ नहीं थी।

     

    उसकी चीख ऐसी थी, मानो किसी इंसान की आख़िरी साँस उसके गले में फँस गई हो।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति, हरिदास, अपने बिस्तर से घबराकर उठ बैठे। उनके चेहरे का रंग उड़ चुका था। काँपते हाथों से उन्होंने अपनी खिड़की बंद की और बुदबुदाए—

     

    “वह लौट आया… ब्लड रैवन वापस आ गया…”

     

    उसी समय गाँव से कई किलोमीटर दूर, शहर में रहने वाला आरव, जो एक युवा पत्रकार था, अपने लैपटॉप पर रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ी रिपोर्ट तैयार कर रहा था।

     

    अचानक उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    “अगर सच जानना चाहते हो… तो कालीघाट चले आओ।”

     

    आवाज़ बूढ़े आदमी की थी।

     

    “कौन बोल रहे हैं?”

     

    लेकिन दूसरी तरफ़ से केवल कौए की भयानक आवाज़ सुनाई दी।

     

    “का…आ…आ…”

     

    कॉल कट गया।

     

    आरव को लगा कोई मज़ाक कर रहा है।

     

    लेकिन अगले ही पल उसके ईमेल पर एक पुरानी तस्वीर आई।

     

    तस्वीर में एक विशाल काला कौआ था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और उसकी चोंच पर ताज़ा खून जैसा लाल दाग़ था।

     

    तस्वीर के नीचे केवल तीन शब्द लिखे थे—

     

    “Blood Raven Awaits.”

     

    आरव ने उसी रात कालीघाट जाने का निर्णय लिया।

     

     

    अगले दिन शाम तक वह गाँव पहुँच गया।

     

    पहाड़ों से घिरा हुआ वह गाँव असामान्य रूप से शांत था।

     

    न बच्चे खेल रहे थे।

     

    न कहीं पशुओं की आवाज़।

     

    यहाँ तक कि हवा भी मानो धीरे चल रही थी।

     

    बस एक चीज़ साफ़ सुनाई दे रही थी—

     

    दूर जंगल से आती कौओं की आवाज़।

     

    गाँव में प्रवेश करते ही उसने देखा कि लगभग हर घर के दरवाज़े पर काले धागे और नींबू-मिर्च लटके हुए थे।

     

    कुछ दरवाज़ों पर राख से बने अजीब निशान बने थे।

     

    आरव ने एक महिला से पूछा—

     

    “यह सब क्यों लगाया है?”

     

    महिला ने उसकी ओर देखा।

     

    उसकी आँखों में डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    “सूरज ढलने से पहले यहाँ से चले जाओ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    “अगर ब्लड रैवन ने तुम्हें देख लिया… तो सुबह नहीं देख पाओगे।”

     

    इतना कहकर वह घर के अंदर चली गई।

     

    आरव ने इसे अंधविश्वास समझा।

     

    वह गाँव के पुराने सरपंच हरिदास के घर पहुँचा।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर धूप और कपूर की तेज़ गंध थी।

     

    हरिदास ने उसे देखते ही पूछा—

     

    “तुम्हें किसने बुलाया?”

     

    आरव ने ईमेल और कॉल के बारे में बताया।

     

    यह सुनते ही बूढ़े के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “उसने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    “किसने?”

     

    “ब्लड रैवन ने।”

     

    आरव मुस्कराया।

     

    “एक कौआ किसी इंसान को क्यों चुनेगा?”

     

    हरिदास धीरे-धीरे उठे।

     

    उन्होंने लकड़ी की एक पुरानी संदूक खोली।

     

    उसमें सौ साल पुरानी डायरी रखी थी।

     

    डायरी खोलते ही धूल का बादल उठा।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिसने भी यह पढ़ा… वह अब सुरक्षित नहीं है।”

     

    आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    हरिदास ने पढ़ना शुरू किया—

     

    “लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले इस गाँव में एक तांत्रिक रहता था। उसका नाम रुद्रनाथ था। वह अमर होना चाहता था। उसने एक भयानक अनुष्ठान किया। लेकिन अंतिम रात अनुष्ठान बिगड़ गया। उसके शरीर का अधिकांश भाग राख बन गया… पर उसकी आत्मा एक विशाल काले कौए में कैद हो गई।”

     

    “वही ब्लड रैवन है।”

     

    “वह हर तीस वर्ष बाद लौटता है।”

     

    “और सात लोगों की जान लेकर फिर गायब हो जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर यह सच है तो किसी ने उसे मारा क्यों नहीं?”

     

    हरिदास की आँखें भर आईं।

     

    “क्योंकि वह मरता नहीं।”

     

    उसी समय बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

     

    खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    कमरे की मोमबत्ती बुझ गई।

     

    पूरा घर अँधेरे में डूब गया।

     

    फिर…

     

    “का…आ…आ…”

     

    इतनी नज़दीक से आवाज़ आई कि लगा कौआ कमरे के अंदर ही बैठा है।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    खिड़की पर एक विशाल काला कौआ बैठा था।

     

    उसकी आँखें चमकते अंगारों जैसी लाल थीं।

     

    वह बिना पलक झपकाए आरव को देख रहा था।

     

    फिर उसने अपनी चोंच काँच पर तीन बार मारी।

     

    टक…

     

    टक…

     

    टक…

     

    और उड़ गया।

     

    हरिदास ज़मीन पर बैठ गए।

     

    “अब देर हो चुकी है…”

     

    “उसने तुम्हें पहचान लिया।”

     

     

    उस रात आरव गाँव के एक पुराने अतिथि-गृह में रुका।

     

    कमरा पुराना था।

     

    दीवारों पर नमी थी।

     

    बाहर लगातार कौओं की आवाज़ आ रही थी।

     

    रात के लगभग दो बजे उसकी नींद खुली।

     

    उसे लगा कोई उसके कमरे में चल रहा है।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    वे दरवाज़े से शुरू होकर सीधे उसके बिस्तर तक आए थे।

     

    और वहीं खत्म हो गए।

     

    अचानक कमरे के कोने से धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    आरव ने टॉर्च घुमाई।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर खून जैसे लाल रंग से लिखा था—

     

    “सात रातें…”

     

    आरव घबरा गया।

     

    उसने तुरंत दरवाज़ा खोला और बाहर भागा।

     

    पूरा गलियारा सुनसान था।

     

    तभी ऊपर की मंज़िल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा।

     

    कमरा खुला था।

     

    अंदर एक लकड़ी का पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    पालने में कोई बच्चा नहीं था।

     

    लेकिन रोने की आवाज़ लगातार आ रही थी।

     

    जैसे ही वह पास पहुँचा—

     

    आवाज़ बंद हो गई।

     

    कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।

     

    फिर उसके पीछे किसी ने बहुत धीरे से फुसफुसाया—

     

    “मुड़कर मत देखना…”

     

    आरव का शरीर काँप उठा।

     

    उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

     

    लेकिन जिज्ञासा उस पर भारी पड़ गई।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाज़े पर वही विशाल काला कौआ खड़ा था।

     

    इस बार उसकी आँखों से लाल आँसुओं जैसी धार बह रही थी।

     

    उसकी चोंच खुली।

     

    लेकिन आवाज़ इंसान की निकली—

     

    “पहला नाम मिल गया…”

     

    1. कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    अँधेरा छा गया।

     

    और उसी क्षण पूरे गाँव में किसी की दर्दनाक चीख गूँज उठी।

     

    सुबह जब लोग उस दिशा में पहुँचे, तो गाँव का एक युवक अपने घर के आँगन में मृत मिला।

     

    उसके शरीर पर कोई घाव नहीं था।

     

    लेकिन उसके पास ज़मीन पर कौए का एक काला पंख पड़ा था।

     

    हरिदास ने पंख उठाया।

     

    उनके होंठ काँप रहे थे।

     

    उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “एक चला गया…”

     

    “अब छह बाकी हैं…”

     

    और दूर पहाड़ की सबसे ऊँची चट्टान पर, धुंध के बीच, ब्लड रैवन अपनी लाल आँखों से पूरे गाँव को देख रहा था।

     

    उसकी भयावह चीख एक बार फिर घाटी में गूँज उठी—

     

    “का…आ…आ…”