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टैग: #Horror #

  • आखिरी ट्रेन का यात्री भाग 4

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    “अगला यात्री… कबीर शर्मा…”

     

    कमरे में गूँजती आवाज़ के साथ ही कबीर के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।

     

    वह और रोहित किसी गहरी खाई में गिरने लगे।

     

    कबीर ने चीखते हुए रोहित का हाथ पकड़ लिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों नीचे गिरते रहे।

     

    फिर अचानक—

     

    धड़ाम!

     

    कबीर किसी कठोर चीज़ पर आकर गिरा।

     

    उसने आँखें खोलीं।

     

    वह एक ट्रेन के अंदर था।

     

    रोहित उसके पास पड़ा था।

     

    दोनों उठने की कोशिश करने लगे।

     

    कबीर ने चारों तरफ देखा।

     

    वह वही ट्रेन थी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही पीली रोशनी।

     

    वही पुराने यात्री।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन चल रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    रोहित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “हम कहाँ हैं?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर सीट नंबर 13 पर गई।

     

    सीट खाली थी।

     

    फिर पीछे से आवाज़ आई—

     

    “कबीर…”

     

    वह मुड़ा।

     

    वही बूढ़ा आदमी सामने खड़ा था।

     

    रघुवीर सिंह।

     

    लेकिन अब उसका चेहरा बूढ़ा नहीं था।

     

    वह लगभग तीस साल का दिखाई दे रहा था।

     

    “आपने हमें यहाँ क्यों बुलाया?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “मैंने नहीं बुलाया।”

     

    “तो कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर देखा।

     

    “वह।”

     

    “कौन वह?”

     

    रघुवीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने कबीर को एक पुराना कागज़ दिया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    कागज़ पर रघुवीर की लिखावट थी।

     

    “मैंने अपनी बेटी को नहीं मारा।”

     

    कबीर ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    “मैंने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    फिर अचानक ट्रेन जोर से हिली।

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।

     

    उनकी आँखें बंद थीं।

     

    रघुवीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “जब तक ट्रेन रुक न जाए, किसी यात्री से बात मत करना।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वे यात्री नहीं हैं।”

     

    रोहित ने धीरे से पूछा—

     

    “तो ये लोग कौन हैं?”

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “ये वे लोग हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी का आखिरी सफर पूरा नहीं किया।”

     

    अचानक सामने बैठे एक आदमी ने आँखें खोल दीं।

     

    उसने कबीर को देखा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें भी देर हो गई।”

     

    रघुवीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “चुप!”

     

    आदमी ने अपना सिर झुका लिया।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद सभी यात्रियों ने अपनी आँखें खोल दीं।

     

    एक साथ।

     

    तेरहों की आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    कबीर ने गिनना शुरू किया।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    बारह…

     

    वह रुक गया।

     

    सिर्फ बारह यात्री थे।

     

    तेरहवीं सीट खाली थी।

     

    सीट नंबर 13।

     

    रघुवीर ने कहा—

     

    “वह सीट हमेशा खाली रहती है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस दिन कोई उस पर बैठता है, ट्रेन उसे अपना बना लेती है।”

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    पीली रोशनी।

     

    अंधेरा।

     

    हर बार रोशनी वापस आती तो सीट नंबर 13 पर कोई अलग चीज़ दिखाई देती।

     

    पहली बार खाली।

     

    दूसरी बार एक लाल फ्रॉक।

     

    तीसरी बार एक छोटी बच्ची।

     

    मीरा।

     

    वह सीट पर बैठी थी।

     

    कबीर ने उसे देखते ही कहा—

     

    “मीरा!”

     

    रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “उससे बात मत करो!”

     

    लेकिन मीरा ने खुद कबीर की तरफ देखा।

     

    “भैया… पापा झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रघुवीर का चेहरा बदल गया।

     

    “मीरा!”

     

    बच्ची ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आपने मुझे बंद किया था।”

     

    कबीर ने रघुवीर की तरफ देखा।

     

    “क्या यह सच है?”

     

    रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    रोहित ने गुस्से में पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि उस रात मुझे पता चल गया था कि ट्रेन क्या चाहती है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “एक जीवित बच्चा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    रघुवीर ने आगे कहा—

     

    “हर साल 15 अगस्त की रात यह ट्रेन आती थी। पहले यह सिर्फ एक यात्री ले जाती थी। फिर हर साल इसकी भूख बढ़ती गई।”

     

    “तो मीरा?”

     

    “मैंने उसे ट्रेन से बचाने के लिए पुराने कमरे में छिपा दिया था।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन वह गायब कैसे हुई?”

     

    रघुवीर की आवाज़ टूट गई।

     

    “क्योंकि ट्रेन मेरे घर तक पहुँच गई।”

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “पापा ने दरवाज़ा खोला था।”

     

    रघुवीर ने सिर झुका लिया।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “और फिर?”

     

    “ट्रेन ने मीरा को ले लिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर आपने क्या किया?”

     

    रघुवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने ट्रेन से सौदा किया।”

     

    “कैसा सौदा?”

     

    “मैंने कहा कि अगर वह मीरा को वापस कर देगी, तो मैं हर साल एक यात्री उसे दे दूँगा।”

     

    रोहित चिल्लाया—

     

    “आपने लोगों को मरने के लिए भेजा?”

     

    रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    यात्रियों के चेहरे धीरे-धीरे बदलने लगे।

     

    उनमें से एक आदमी ने कहा—

     

    “हममें से किसी ने टिकट नहीं खरीदा था।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हमारे नाम उसने चुने थे।”

     

    तीसरे ने कहा—

     

    “हर साल एक।”

     

    कबीर को अचानक सब समझ आने लगा।

     

    यह ट्रेन यात्रियों को नहीं चुनती थी।

     

    कोई उसे यात्री देता था।

     

    और वह व्यक्ति था—

     

    रघुवीर।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो इस बार आपने मुझे चुना?”

     

    रघुवीर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन?”

     

    रघुवीर ने ट्रेन के आखिरी डिब्बे की तरफ देखा।

     

    “इस बार उसने खुद चुना है।”

     

    अचानक ट्रेन के पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    काला धुआँ पूरे डिब्बे में फैलने लगा।

     

    मीरा सीट से उतर गई।

     

    उसने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भैया, हमें भागना होगा।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “ट्रेन के इंजन तक।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वहीं उसकी मौत है।”

     

    कबीर ने चौंककर पूछा—

     

    “किसकी?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    अंधेरे में एक विशाल आकृति खड़ी थी।

     

    उसका शरीर इंसान जैसा था।

     

    लेकिन चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो लाल आँखें।

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “ट्रेन की।”

     

    रघुवीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    कबीर, रोहित और मीरा आगे की ओर दौड़े।

     

    लेकिन पीछे से यात्रियों की आवाज़ आने लगी।

     

    “हमें भी साथ ले चलो!”

     

    कबीर रुका।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    बारहों यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे।

     

    वे सभी अब इंसानों जैसे नहीं दिख रहे थे।

     

    उनके शरीर से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    उनमें से एक ने हाथ बढ़ाया।

     

    “हमें इस ट्रेन से बाहर निकालो…”

     

    कबीर ने मीरा की तरफ देखा।

     

    मीरा रो रही थी।

     

    “भैया… अगर उन्होंने हमें पकड़ लिया तो हम भी हमेशा के लिए यहीं रह जाएँगे।”

     

    तीनों इंजन की ओर दौड़े।

     

    ट्रेन के डिब्बे एक के बाद एक पार करते हुए वे सबसे आगे पहुँचे।

     

    इंजन के दरवाज़े पर वही काली आँखों वाला आदमी खड़ा था।

     

    कबीर रुक गया।

     

    वह आदमी धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।

     

    फिर उसने अपना चेहरा बदला।

     

    पहले वह बूढ़ा बना।

     

    फिर मीरा।

     

    फिर रोहित।

     

    और अंत में—

     

    कबीर।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें पता है असली कबीर कौन है?”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    वह नकली कबीर हँसने लगा।

     

    “तुम्हें कैसे पता कि तुम असली हो?”

     

    अचानक रोहित ने कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी बात सुन।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर हम तीनों यहाँ हैं… तो बाहर कौन है?”

     

    कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    क्योंकि उसी क्षण ट्रेन की खिड़की से बाहर उसे प्लेटफॉर्म दिखाई दिया।

     

    वहाँ एक आदमी खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल कबीर जैसा दिख रहा था।

     

    और उसके हाथ में कैमरा था।

     

    वह ट्रेन की तस्वीर ले रहा था।

     

    फिर उसने कैमरा नीचे किया और सीधे खिड़की की तरफ देखा।

     

    कबीर ने पहचान लिया।

     

    वह वही कबीर था जो उसे पहले तस्वीरों में दिखाई देता था।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    और उसके हाथ में एक टिकट था।

     

    सीट नंबर 13।

     

    मीरा ने कबीर से कहा—

     

    “भैया… वह असली है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो मैं कौन हूँ?”

     

    मीरा ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आप… इस ट्रेन के अगले यात्री हो।”

     

    और तभी ट्रेन की सीटी बजी।

     

    फूँऽऽऽऽऽ!

     

    सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

     

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • सुनसान रास्ता..(part-5)

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके कंधे पर रखा हाथ धीरे-धीरे ठंडा होता जा रहा था।

     

    कबीर सामने खड़ा चिल्लाया—

     

    “भैया! पीछे मत देखना!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कबीर, ये औरत कौन है?”

     

    कबीर ने जवाब दिया—

     

    “ये कोई औरत नहीं है।”

     

    आरव की सांस अटक गई।

     

    कबीर बोला—

     

    “ये उस मकान की रखवाली करने वाली आत्मा है। जो भी इंसान इसे पीछे मुड़कर देखता है, उसकी परछाई उससे अलग हो जाती है।”

     

    आरव ने नीचे जमीन की तरफ देखा।

     

    उसकी अपनी परछाई वहां नहीं थी।

     

    वह गायब हो चुकी थी।

     

    तभी पीछे खड़ी चीज ने हंसते हुए कहा—

     

    “अब तुम मेरे हो।”

     

    आरव ने अचानक जेब से मोबाइल निकाला और कैमरा ऑन कर दिया।

     

    मोबाइल की स्क्रीन में उसने देखा…

     

    उसके पीछे कोई बूढ़ी औरत नहीं थी।

     

    बल्कि एक बहुत लंबी, काली आकृति खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

     

    आरव ने हिम्मत करके आंखें बंद कीं और कबीर की तरफ दौड़ पड़ा।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ा और दोनों मकान से बाहर भागने लगे।

     

    जैसे ही वे दरवाजे से बाहर निकले, पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी—

     

    “आरव… तुम जा सकते हो, लेकिन अपनी परछाई यहीं छोड़कर!”

     

    आरव ने जमीन पर देखा।

     

    उसकी परछाई अब भी मकान के अंदर खड़ी थी।

     

    और वह…

     

    उसे हाथ हिला रही थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • सुनसान रास्ता..(part-3]

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

     

     

    आरव बाइक लेकर उस पुराने मकान के सामने रुक गया।

     

    उसे लगा कि शायद अंदर कोई इंसान होगा जो उसकी मदद कर सकता है।

     

    जैसे ही उसने दरवाजा खोला, दरवाजा अपने आप चरमराते हुए खुल गया।

     

    अंदर घुप अंधेरा था।

     

    आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    दीवारों पर पुराने परिवार की तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर देखकर आरव के कदम रुक गए।

     

    तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।

     

    बीच में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि तस्वीर के एक कोने में…

     

    आरव खुद खड़ा था।

     

    उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    आरव डरते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    हर सीढ़ी पर किसी के पैरों के निशान थे।

     

    गीले पैरों के निशान।

     

    और वे निशान ऊपर से नीचे की तरफ आ रहे थे।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    तभी पीछे से वही आवाज आई—

     

    “तुम आखिर वापस आ ही गए।”

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “जिसे तुमने दस साल पहले जंगल में छोड़ दिया था।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    उसे अचानक अपने बचपन की एक घटना याद आ गई।

     

    दस साल पहले इसी जंगल में उसका छोटा भाई गायब हुआ था।

     

    लेकिन आरव को याद था…

     

    उसका भाई कभी मिला ही नहीं था।

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  • सुनसान रास्ता…(part-1)

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

    रात के करीब 11 बज रहे थे। आरव अपनी बाइक से गाँव लौट रहा था। रास्ता सुनसान था और चारों तरफ घना जंगल था।

     

    अचानक उसकी बाइक बंद हो गई।

     

    आरव ने कई बार सेल्फ स्टार्ट दबाया, लेकिन बाइक चालू नहीं हुई। तभी उसे पीछे से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    जैसे कोई गीले पैरों से उसके पीछे चल रहा हो।

     

    आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और आवाज की तरफ देखने ही वाला था कि उसकी नजर सड़क किनारे लगे एक पुराने बोर्ड पर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “पीछे देखना मना है।”

     

    आरव घबरा गया।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने धीरे से फुसफुसाया—

     

    “तुमने पढ़ लिया… अब पीछे मत देखना।”

     

    आरव का पूरा शरीर कांपने लगा।

     

    उसने सामने देखा तो उसकी बंद बाइक अपने आप स्टार्ट हो चुकी थी।

     

    लेकिन तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    कॉल उठाते ही दूसरी तरफ से उसी की आवाज सुनाई दी—

     

    “आरव… बाइक मत चलाना। वो तुम्हारे पीछे बैठी है।”

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  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित की माँ ने उसका हाथ इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उंगलियाँ सुन्न होने लगी थीं।

     

    दोनों घर के बाहर खड़े थे।

     

    पीछे से अभी भी वही आवाज आ रही थी।

     

    “भैया…”

     

    अमित की आँखें बंद थीं।

     

    उसका दिल कह रहा था कि वह पीछे मुड़कर देखे।

     

    आखिर वह उसकी बहन थी।

     

    वही बहन, जिसकी यादें उसके दिमाग से मिटा दी गई थीं।

     

    लेकिन उसकी माँ लगातार फुसफुसा रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना… चाहे कुछ भी हो जाए।”

     

    अचानक पीछे से हँसी की आवाज आई।

     

    “माँ… आप अभी भी झूठ बोल रही हो?”

     

    अमित की माँ काँप गईं।

     

    आवाज अब नैना जैसी नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी भारी और डरावनी हो गई थी।

     

    फिर आवाज बदलकर अमित के पिता जैसी हो गई—

     

    “अमित, बेटा… पीछे देखो।”

     

    अमित ने दाँत भींच लिए।

     

    “यह मुझे क्यों बुला रहा है?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।”

     

    “किसलिए?”

     

    “अपनी दुनिया में वापस आने के लिए।”

     

    अमित ने पहली बार माँ की तरफ गौर से देखा।

     

    “माँ, मुझे सच बताइए। उस रात क्या हुआ था?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    “मैंने क्या किया था?”

     

    माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुमने कुछ नहीं किया था।”

     

    “तो फिर मेरी यादें क्यों मिटाई गईं?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता डर गए थे।”

     

    “किससे?”

     

    माँ ने पीछे घर की तरफ देखा।

     

    “नैना से नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    माँ ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “उस चीज से जो नैना के पीछे आई थी।”

     

    अमित का शरीर ठंडा पड़ गया।

     

    “क्या चीज?”

     

    “हम उसे नाम नहीं देते।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस चीज का नाम लिया जाता है, वह उसके पास पहुँच जाती है।”

     

    कुछ पल तक दोनों चुप रहे।

     

    अचानक घर की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

     

    धड़ाम!

     

    अंदर से ठंडी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में एक छोटी बच्ची खड़ी दिखाई दी।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    दो चोटियाँ।

     

    चेहरा सफेद।

     

    वह अमित को देख रही थी।

     

    फिर उसने हाथ उठाया।

     

    और मुस्कुराई।

     

    अमित की माँ ने उसे तुरंत दूसरी दिशा में खींच लिया।

     

    “इधर मत देखो!”

     

    लेकिन अमित के कदम रुक गए।

     

    उसने पूछा,

     

    “माँ… क्या वह नैना है?”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन उसका चेहरा—”

     

    “वह नैना का चेहरा पहनती है।”

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “तो असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपती आवाज में कहा,

     

    “शायद अभी भी उसी कमरे में।”

     

    “आपने कहा था वह मर गई।”

     

    “उसका शरीर मर गया था।”

     

    अमित ने माँ की तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसकी आत्मा?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय सड़क के दूसरी तरफ से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    छपाक…

     

    बारिश फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    अमित ने सामने देखा।

     

    सड़क के बीच बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    वही लालटेन।

     

    वही सफेद साड़ी।

     

    अमित ने राहत की साँस ली।

     

    “आप यहाँ कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    दोनों महिलाएँ एक-दूसरे को पहचानती थीं।

     

    अमित यह देखकर हैरान रह गया।

     

    “आप दोनों एक-दूसरे को जानती हैं?”

     

    माँ ने नजरें झुका लीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “बहुत पहले से।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने मुझे इस रास्ते पर भेजा था?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “तो फिर मैं वहाँ पहुँचा कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अमित की माँ की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ ने रास्ता खोला था।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “माँ?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “बारह साल पहले तुम्हारे पिता ने एक वादा किया था।”

     

    “किससे?”

     

    “उसी से जो तुम्हारे घर में है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कैसा वादा?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अगर वह तुम्हारे परिवार को छोड़ देगी, तो हर बार एक बच्चा उसके पास भेजा जाएगा।”

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    “एक बच्चा?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो नैना?”

     

    “पहली थी।”

     

    अमित की आँखें फैल गईं।

     

    “और मैं?”

     

    बूढ़ी औरत चुप रही।

     

    अमित समझ गया।

     

    “दूसरा?”

     

    बूढ़ी औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मैं तो बच गया।”

     

    “क्योंकि उस रात किसी ने नियम तोड़ दिया था।”

     

    “किसने?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ फूट-फूटकर रोने लगीं।

     

    “मैंने।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “आपने क्या किया?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “मैंने तुम्हें जंगल तक पहुँचने से पहले ही रोकने की कोशिश की थी। लेकिन तुम्हारे पिता ने मुझे कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “फिर?”

     

    “नैना को उसने कमरे में भेज दिया।”

     

    अमित की आँखों के सामने धुंध छाने लगी।

     

    धीरे-धीरे उसे सब याद आने लगा।

     

    वह रात।

     

    बारिश।

     

    बिजली की चमक।

     

    नैना का रोना।

     

    उसके पिता का गुस्सा।

     

    और वह पुराना आईना।

     

    उसके पिता ने नैना से कहा था—

     

    “बस एक बार पीछे देखो।”

     

    नैना डरते हुए पीछे मुड़ी थी।

     

    आईने में उसके पीछे एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    अमित चीखना चाहता था।

     

    लेकिन उसकी आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    फिर उसके पिता ने उसे खींचकर कमरे से बाहर कर दिया था।

     

    और दरवाजा बंद कर दिया था।

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद आ रहा है…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    “बेटा…”

     

    अमित ने माँ को दूर कर दिया।

     

    “आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

     

    “मुझसे मेरी बहन छीनकर?”

     

    माँ रोती रहीं।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अब पछताने का समय नहीं है।”

     

    “क्या करना होगा?”

     

    “आज रात अमावस्या है।”

     

    अमित ने आसमान की तरफ देखा।

     

    बादलों के पीछे चाँद बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    “इसका मतलब?”

     

    “आज वह पूरी तरह बाहर आ सकती है।”

     

    “और अगर हमने उसे रोक दिया?”

     

    “तो वह हमेशा के लिए तुम्हारे घर से चली जाएगी।”

     

    “कैसे रोकेंगे?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी लालटेन उठाई।

     

    “तुम्हें उसी कमरे में वापस जाना होगा।”

     

    अमित ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    बूढ़ी औरत बोली,

     

    “तुम्हें जाना ही होगा।”

     

    “वहाँ वह है।”

     

    “हाँ।”

     

    “और अगर उसने मुझे पकड़ लिया?”

     

    “तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने अपनी माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने सिर झुका लिया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “लेकिन तुम्हारे पास एक मौका है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे आईने के सामने अपना असली नाम बताना होगा।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “नैना का?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसका असली नाम।”

     

    “लेकिन आपने कहा था कि उसका नाम नहीं लेना चाहिए।”

     

    “तभी तो मुश्किल है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “आपको उसका नाम पता है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ घर की तरफ देखने लगी।

     

    ऊपर खिड़की में खड़ी बच्ची अब वहाँ नहीं थी।

     

    लेकिन जमीन पर लालटेन की रोशनी में छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    वे घर से निकलकर सड़क तक आ रहे थे।

     

    फिर अचानक रुक गए।

     

    बूढ़ी औरत ने उन निशानों को देखा और फुसफुसाई—

     

    “वह बाहर आ चुकी है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    बूढ़ी औरत ने पहली बार डरते हुए कहा—

     

    “जिसे हमने बारह साल से नैना समझ रखा था।”

     

    तभी अमित के मोबाइल पर एक संदेश आया।

     

    नंबर अनजान था।

     

    संदेश में सिर्फ एक लाइन थी—

     

    “भैया, अगर सच में मुझे बचाना चाहते हो तो अकेले कमरे में वापस आओ।”

     

    अमित ने संदेश पढ़ा।

     

    उसने माँ और बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    फिर घर की ओर बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था कि कमरे के अंदर उसका इंतजार नैना नहीं…

     

    बल्कि कोई और कर रहा था।

     

    और इस बार—

     

    वह उसे पीछे मुड़ने पर मजबूर करने वाला था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अमित कुछ सेकंड तक सीढ़ियों पर खड़े अपने ही चेहरे को देखता रहा।

     

    सामने खड़ा दूसरा अमित बिल्कुल उसकी तरह था।

     

    वही आँखें।

     

    वही बाल।

     

    वही कपड़े।

     

    यहाँ तक कि उसकी दाहिनी भौंह के ऊपर बचपन में लगी चोट का छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था।

     

    अमित के गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “डर गए?”

     

    अमित ने खुद को संभालते हुए पूछा,

     

    “तू कौन है?”

     

    सामने वाला हँसा।

     

    “मैंने बताया ना… तुम्हारी जगह लेने आया हूँ।”

     

    “मेरी जगह?”

     

    “हाँ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “हर जगह।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    उसी समय ऊपर बंद कमरे से बच्चे के रोने की आवाज फिर आई।

     

    “माँ…”

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    दूसरे अमित ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह सिर्फ मुस्कुराता रहा।

     

    अमित ने सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश की।

     

    लेकिन जैसे ही उसने पहला कदम आगे बढ़ाया, दूसरे अमित ने उसका रास्ता रोक लिया।

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    “तो मैं वहीं जाऊँगा।”

     

    “और अगर जवाब पसंद नहीं आया तो?”

     

    अमित ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “फिर भी जाऊँगा।”

     

    दूसरा अमित कुछ देर उसे देखता रहा।

     

    फिर अचानक एक तरफ हट गया।

     

    “जाओ।”

     

    अमित धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    हर कदम के साथ उसका दिल तेज धड़क रहा था।

     

    ऊपर पहुँचते ही उसने बंद कमरे को देखा।

     

    दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा था।

     

    उसने जेब से बूढ़ी औरत की दी हुई चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में डालते ही—

     

    क्लिक!

     

    ताला खुल गया।

     

    नीचे खड़ा दूसरा अमित अचानक चिल्लाया—

     

    “मत खोलो!”

     

    अमित रुक गया।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दूसरा अमित अब मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दे रहा था।

     

    “तू डर रहा है?” अमित ने पूछा।

     

    दूसरा अमित कुछ नहीं बोला।

     

    अमित ने दरवाजा खोल दिया।

     

    दरवाजा चरमराता हुआ अंदर की तरफ खुला।

     

    कमरे से बासी हवा का झोंका बाहर आया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    अमित ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

     

    कमरे में पुराने सामान रखे थे।

     

    एक टूटी हुई अलमारी।

     

    कुछ पुराने खिलौने।

     

    एक लकड़ी की मेज।

     

    दीवार पर धूल से ढकी तस्वीरें।

     

    और कमरे के बीच में एक पुराना आईना।

     

    अमित धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    आईने के सामने पहुँचते ही उसके कदम रुक गए।

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    वह प्रतिबिंब अमित की तरह खड़ा नहीं था।

     

    अमित सीधा खड़ा था।

     

    आईने वाला अमित थोड़ा झुका हुआ था।

     

    अमित ने अपना हाथ उठाया।

     

    आईने में हाथ उठ गया।

     

    लेकिन एक पल देर से।

     

    अमित का दिल जोर से धड़का।

     

    उसने दोबारा हाथ हिलाया।

     

    इस बार भी प्रतिबिंब एक पल बाद हिला।

     

    “यह क्या है?”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “यही तुम्हारा असली घर है।”

     

    अमित ने पलटकर देखा।

     

    दूसरा अमित दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “तू अंदर कैसे आया?”

     

    “यह कमरा मुझे भी पहचानता है।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “तुम दोनों का क्या संबंध है?”

     

    दूसरा अमित चुप रहा।

     

    तभी कमरे के एक कोने से किसी बच्चे के खिलखिलाने की आवाज आई।

     

    अमित ने टॉर्च उस तरफ घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक पुरानी गुड़िया बैठी थी।

     

    उसकी आँखें काली थीं।

     

    अमित ने गुड़िया को देखा।

     

    अचानक गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम गई।

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    दूसरा अमित बोला,

     

    “उसे मत छूना।”

     

    “यह क्या है?”

     

    “वह यहाँ बहुत पहले से है।”

     

    “कब से?”

     

    दूसरे अमित ने धीरे से कहा,

     

    “जब से तुम्हारी बहन मरी थी।”

     

    अमित का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी कोई बहन नहीं थी।”

     

    दूसरा अमित मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें यही बताया गया था।”

     

    अमित के दिमाग में जैसे कोई पुराना दरवाजा खुलने लगा।

     

    उसे बचपन की कुछ धुंधली यादें दिखाई देने लगीं।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    दो चोटियाँ।

     

    लाल फ्रॉक।

     

    वह उसे “दीदी” कहकर बुला रहा था।

     

    फिर एक कमरा।

     

    बहुत तेज बारिश।

     

    किसी के रोने की आवाज।

     

    और उसकी माँ चिल्ला रही थीं—

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    अमित ने सिर पकड़ लिया।

     

    “ये यादें… मुझे क्यों नहीं याद थीं?”

     

    दूसरा अमित धीरे से बोला,

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने उन्हें मिटाने की कोशिश की थी।”

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    दूसरा अमित आईने की तरफ देखने लगा।

     

    “क्योंकि उस रात जो हुआ था, उसके बाद तुम बदल गए थे।”

     

    अमित ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं?”

     

    “नहीं।”

     

    दूसरे अमित ने आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारा वह हिस्सा।”

     

    अमित ने आईने में देखा।

     

    इस बार उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन अमित नहीं मुस्कुरा रहा था।

     

    आईने वाला अमित धीरे-धीरे अपना मुँह खोलने लगा।

     

    उसके होंठ हिले—

     

    “भैया…”

     

    अमित के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    वही आवाज।

     

    वही बच्ची की आवाज।

     

    “भैया… तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गए?”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    आईने में बच्ची का चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

     

    पहले पाँच साल की बच्ची।

     

    फिर दस साल की।

     

    फिर एक किशोरी।

     

    फिर अचानक उसका चेहरा काला पड़ गया।

     

    आँखें खाली हो गईं।

     

    और उसने कहा—

     

    “तुम्हें याद करना ही पड़ेगा।”

     

    कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अमित ने दौड़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    दूसरा अमित कमरे के कोने में खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अब बदलने लगा था।

     

    त्वचा काली पड़ रही थी।

     

    आँखें लाल हो रही थीं।

     

    अमित चीखा—

     

    “तू इंसान नहीं है!”

     

    दूसरा अमित हँसने लगा।

     

    “अब समझे?”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

     

    काँच टूट गया।

     

    तस्वीर में चार लोग थे।

     

    अमित के पिता।

     

    उसकी माँ।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    और…

     

    अमित।

     

    लेकिन तस्वीर देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में अमित की उम्र लगभग आठ साल थी।

     

    उसके पास खड़ी बच्ची के चेहरे पर लाल निशान था।

     

    और तस्वीर के पीछे किसी ने तारीख लिखी थी—

     

    15 अगस्त 2010

     

    अमित ने काँपते हुए कहा,

     

    “यह मेरी बहन है?”

     

    दूसरे अमित ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “उसका नाम क्या था?”

     

    “नैना।”

     

    अमित की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    “नैना को क्या हुआ था?”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    फिर आईने के अंदर से वही बच्ची बोली—

     

    “भैया ने मुझे पीछे देखने को कहा था।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “नहीं…”

     

    “भैया ने कहा था कि पीछे कोई नहीं है।”

     

    “नहीं!”

     

    “मैंने पीछे देखा।”

     

    अमित अपने कान बंद करने लगा।

     

    “बस करो!”

     

    आईने में नैना का चेहरा अचानक विकृत हो गया।

     

    “और फिर… उसने मुझे देख लिया।”

     

    अमित चीख पड़ा।

     

    उसी समय कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    नीचे से उसकी माँ की आवाज आई—

     

    “अमित!”

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ भागा।

     

    नीचे उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    उनके चेहरे पर आँसू थे।

     

    “बेटा… तुम यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमित दौड़कर उनके पास पहुँचा।

     

    “माँ, नैना कौन थी?”

     

    माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    “फिर आपने मुझसे इतने साल झूठ क्यों बोला?”

     

    माँ रोने लगीं।

     

    “क्योंकि वह मरने के बाद भी घर से नहीं गई।”

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा—

     

    “वह क्या चाहती है?”

     

    माँ ने पीछे देखा।

     

    ऊपर कमरे के दरवाजे पर दूसरा अमित खड़ा था।

     

    माँ ने उसे देखते ही अमित का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    “क्यों?”

     

    माँ चिल्लाईं—

     

    “क्योंकि वह नैना नहीं है!”

     

    अमित ने ऊपर देखा।

     

    दूसरा अमित मुस्कुरा रहा था।

     

    और उसके पीछे आईने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    वह बच्ची धीरे-धीरे आईने से बाहर निकल रही थी।

     

    माँ ने अमित को खींचते हुए कहा—

     

    “अगर उसने तुम्हें छू लिया, तो तुम्हारी जगह वह ले लेगी।”

     

    अमित ने पूछा—

     

    “फिर असली नैना कहाँ है?”

     

    माँ ने काँपते हुए कहा—

     

    “वह तो उसी रात मर गई थी।”

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    ऊपर खड़ी परछाईं अब सीढ़ियों से उतर रही थी।

     

    लेकिन उसके कदमों की आवाज नहीं आ रही थी।

     

    वह धीरे-धीरे नीचे आ रही थी।

     

    और उसके पीछे…

     

    आईने से बाहर निकल चुकी छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।

     

    अमित की माँ ने दरवाजा खोलते हुए कहा—

     

    “बाहर निकलो!”

     

    दोनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही अमित ने घर के बाहर कदम रखा, उसके पीछे से एक मासूम आवाज आई—

     

    “भैया…”

     

    अमित रुक गया।

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पीछे मत देखना!”

     

    लेकिन तभी आवाज फिर आई—

     

    “भैया… अगर तुमने पीछे नहीं देखा… तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि मैं सच में नैना नहीं हूँ?”

     

    अमित की आँखें बंद हो गईं।

     

    उसके सामने अब सिर्फ एक सवाल था—

     

    क्या वह अपनी बहन की आवाज पर भरोसा करे… या बूढ़ी औरत की चेतावनी पर?

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित के हाथ से मोबाइल लगभग गिर ही गया।

     

    उसकी माँ की आखिरी बात उसके कानों में बार-बार गूँज रही थी—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है… और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कमरे में कुछ देर तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।

     

    बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी, लेकिन हवा अभी भी तेज चल रही थी। खिड़की के बाहर पेड़ों की शाखाएँ अंधेरे में हिल रही थीं।

     

    अमित ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    “मुझे घर जाना होगा।”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

     

    “अभी नहीं।”

     

    “मेरी माँ अकेली हैं।”

     

    “अगर तुम अभी घर गए, तो शायद तुम्हारी माँ तुम्हें पहचान भी न पाए।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आप कहना क्या चाहती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और कमरे के दूसरे हिस्से में चली गई।

     

    “तुम्हारे घर में जो है, वह तुम्हारी आवाज में बोल सकता है। तुम्हारा चेहरा भी बना सकता है। लेकिन एक चीज नहीं बना सकता।”

     

    “क्या?”

     

    “तुम्हारी परछाईं।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    “वह इंसान की तरह दिख सकता है, इंसान की तरह बोल सकता है, लेकिन उसकी परछाईं नहीं होती।”

     

    अमित ने तुरंत अपनी तरफ देखा।

     

    लालटेन की रोशनी में उसकी परछाईं फर्श पर साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “इसका मतलब तुम अभी वही हो जो तुम समझ रहे हो।”

     

    “और मेरे घर में?”

     

    “वहाँ जाकर देखना होगा।”

     

    “लेकिन कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने कमरे के कोने से एक पुराना कपड़ा उठाया। उसके नीचे एक लकड़ी का संदूक रखा था।

     

    उसने संदूक खोला।

     

    अंदर पुराने कागज, एक लोहे की चाबी और कुछ काले धागे रखे थे।

     

    उसने चाबी अमित की हथेली पर रख दी।

     

    “यह किसकी है?”

     

    “तुम्हारे घर की।”

     

    अमित चौंक गया।

     

    “आपके पास मेरे घर की चाबी कैसे?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यह तुम्हारे घर की मुख्य चाबी नहीं है। यह उस कमरे की चाबी है जिसे तुम्हारे परिवार ने वर्षों से बंद रखा है।”

     

    अमित का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    “मेरे घर में ऐसा कोई कमरा नहीं है।”

     

    बूढ़ी औरत हल्का सा मुस्कुराई।

     

    “हर घर में कुछ कमरे ऐसे होते हैं जिनके बारे में घर वाले भूल जाना चाहते हैं।”

     

    अमित को अचानक अपने बचपन की एक बात याद आई।

     

    जब वह छोटा था, घर की ऊपरी मंजिल पर एक कमरा हमेशा बंद रहता था।

     

    उसकी माँ उसे कभी वहाँ जाने नहीं देती थीं।

     

    जब भी अमित पूछता, माँ कहतीं—

     

    “वहाँ पुराना सामान रखा है।”

     

    एक बार उसने उस कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश की थी।

     

    उसी रात उसके पिता ने उसे बहुत डाँटा था।

     

    अगले दिन उस कमरे पर नया ताला लगा दिया गया था।

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब दिया,

     

    “वही, जिसकी वजह से वह तुम्हारे घर तक पहुँच चुका है।”

     

    अमित ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “मुझे वापस जाना होगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “आप मेरे साथ चलेंगी?”

     

    बूढ़ी औरत ने सिर हिला दिया।

     

    “मैं इस घर से बाहर नहीं जा सकती।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बहुत साल पहले मैंने भी पीछे मुड़कर देखा था।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला।

     

    बारिश लगभग रुक चुकी थी।

     

    बाहर उसकी बाइक खड़ी थी।

     

    लेकिन अमित ने जैसे ही बाइक की तरफ देखा, उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    बाइक के पीछे की सीट पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    एक नहीं।

     

    दो नहीं।

     

    बल्कि छोटे-छोटे पैरों के निशान।

     

    जैसे कोई बच्चा बारिश में भीगकर बाइक पर बैठा हो।

     

    अमित ने पीछे हटते हुए पूछा,

     

    “ये किसके निशान हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने उन्हें देखा और तुरंत नजरें झुका लीं।

     

    “उसे मत देखो।”

     

    “लेकिन—”

     

    “बाइक पर बैठो।”

     

    अमित बाइक पर बैठ गया।

     

    बूढ़ी औरत उसके पास आई और उसकी कलाई पर काला धागा बाँध दिया।

     

    “जब तक सूरज नहीं निकलता, इसे मत उतारना।”

     

    “और अगर यह टूट गया?”

     

    बूढ़ी औरत ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “तो किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    अमित ने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार इंजन पहली कोशिश में चालू हो गया।

     

    वह सड़क पर निकल पड़ा।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उसने पीछे से वही आवाज सुनी—

     

    “अमित…”

     

    उसने आँखें बंद करके एक पल के लिए साँस रोकी।

     

    फिर बाइक और तेज कर दी।

     

    आवाज फिर आई।

     

    इस बार वह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    “बेटा… रुक जाओ।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह जानता था कि उसकी माँ घर पर थीं।

     

    फिर भी दिल बार-बार कह रहा था कि शायद सच में माँ उसे पुकार रही हैं।

     

    “बेटा… मुझे छोड़कर मत जाओ।”

     

    अमित का हाथ ब्रेक की तरफ बढ़ा।

     

    तभी उसकी नजर कलाई पर बँधे काले धागे पर पड़ी।

     

    उसे बूढ़ी औरत की बात याद आई।

     

    “किसी भी आवाज का जवाब मत देना।”

     

    उसने ब्रेक नहीं लगाया।

     

    कुछ मिनट बाद जंगल खत्म हो गया।

     

    सड़क पर स्ट्रीट लाइट दिखाई देने लगीं।

     

    अमित को लगा कि वह बच गया।

     

    लेकिन तभी उसकी बाइक अपने आप धीमी होने लगी।

     

    उसने एक्सीलेटर दबाया।

     

    बाइक नहीं बढ़ी।

     

    अचानक इंजन बंद हो गया।

     

    सामने उसका घर था।

     

    अमित ने घर की तरफ देखा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में रोशनी जल रही थी।

     

    उसका वही कमरा।

     

    वह कमरा जो सालों से बंद था।

     

    अमित बाइक से उतरा।

     

    घर के बाहर उसकी माँ की चप्पलें पड़ी थीं।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    “माँ?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    अमित अंदर गया।

     

    घर में अजीब शांति थी।

     

    टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

     

    टीवी चल रहा था, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ काली-सफेद झिलमिलाहट थी।

     

    “माँ?”

     

    इस बार ऊपर से आवाज आई—

     

    “अमित… मैं ऊपर हूँ।”

     

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

     

    अमित सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

     

    पहली सीढ़ी पर कदम रखते ही उसके मोबाइल में एक संदेश आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    संदेश उसकी माँ के नंबर से था।

     

    “अमित, घर मत आना।”

     

    अमित जम गया।

     

    उसने तुरंत ऊपर देखा।

     

    “माँ?”

     

    ऊपर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “अमित… जल्दी ऊपर आओ।”

     

    अमित के माथे पर पसीना आ गया।

     

    उसने फोन मिलाया।

     

    माँ का नंबर व्यस्त था।

     

    उसी समय नीचे मुख्य दरवाजा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    चर्ररर…

     

    अमित ने पीछे देखा।

     

    दरवाजा पूरी तरह बंद हो चुका था।

     

    वह दौड़कर दरवाजे तक गया और हैंडल घुमाया।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

     

    ऊपर अंधेरे में कोई खड़ा था।

     

    पहले सिर्फ पैर दिखाई दिए।

     

    फिर शरीर।

     

    फिर चेहरा।

     

    वह चेहरा देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    वह खुद था।

     

    सीढ़ियों पर खड़ा दूसरा अमित धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने वही कपड़े पहन रखे थे।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आवाज।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए।”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    “तू कौन है?”

     

    दूसरा अमित सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।

     

    “मैं?”

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूँ, जो आज रात तुम्हारी जगह घर जाएगा।”

     

    अमित ने अपनी कलाई की तरफ देखा।

     

    काला धागा अभी भी बँधा था।

     

    दूसरे अमित ने भी अपनी कलाई दिखाई।

     

    उस पर भी वही काला धागा था।

     

    अमित के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    फिर दूसरा अमित धीरे से बोला—

     

    “तुम्हें लगता है बूढ़ी औरत ने तुम्हें बचाने के लिए वह धागा दिया था?”

     

    वह एक कदम और नीचे आया।

     

    “नहीं अमित… उसने तुम्हें पहचानने के लिए दिया था।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    दूसरे अमित ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि मैं कौन हूँ।”

     

    वह बिल्कुल उसके सामने आ गया।

     

    “असली सवाल यह है कि हम दोनों में से… असली अमित कौन है?”

     

    उसी क्षण ऊपर वाले बंद कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    और कमरे के अंदर से एक धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “माँ… उसने फिर से पीछे देख लिया।”

     

    अमित ने डरकर ऊपर देखा।

     

    और पहली बार उसे महसूस हुआ कि इस घर का रहस्य जंगल से भी ज्यादा पुराना है।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पीछे देखना मना है..!!

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    अमित कुछ पल तक उस बूढ़ी औरत को देखता रहा।

     

    उसके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसा अमित ने पहले कभी किसी इंसान के चेहरे पर नहीं देखा था।

     

    दरवाजा बंद हो चुका था।

     

    बाहर बारिश अब पहले से भी तेज हो गई थी।

     

    टप-टप की आवाज अब लगातार पड़ती बूंदों की तेज आवाज में बदल चुकी थी। मकान के चारों तरफ अंधेरा था। सिर्फ बूढ़ी औरत के हाथ में पकड़ी लालटेन की पीली रोशनी कमरे के एक छोटे से हिस्से को रोशन कर रही थी।

     

    अमित ने घबराकर पूछा,

     

    “आपने कहा था कि मैं जिसे रास्ते में छोड़कर आया हूँ, वह वापस आ गया है। आखिर कौन है वो?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह धीरे-धीरे कमरे के कोने में गई और एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गई।

     

    “बैठ जाओ,” उसने कहा।

     

    अमित बैठने ही वाला था कि बाहर से दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    अमित वहीं रुक गया।

     

    बूढ़ी औरत की आँखें दरवाजे पर टिक गईं।

     

    फिर दूसरी दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “चुप!”

     

    उसकी उंगलियाँ ठंडी थीं।

     

    “कोई आवाज मत करना।”

     

    अमित ने हैरानी से उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर बिल्कुल शांति रही।

     

    फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

     

    “अमित…”

     

    अमित का दिल जैसे सीने से बाहर निकलने लगा।

     

    वह आवाज उसी की थी।

     

    बिल्कुल उसकी अपनी आवाज।

     

    “दरवाजा खोलो… मैं बाहर हूँ।”

     

    अमित के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    वह आँखें बंद करके कुछ बुदबुदा रही थी।

     

    “यह तुम्हारी आवाज में क्यों बोल रहा है?” अमित ने फुसफुसाकर पूछा।

     

    बूढ़ी औरत ने आँखें खोलीं।

     

    “क्योंकि अब यह तुम्हें पहचान चुका है।”

     

    “कौन है यह?”

     

    “जिसे तुम जानना चाहते हो, उसके बारे में पूछना बंद करो।”

     

    बाहर से फिर आवाज आई।

     

    “अमित… दरवाजा खोलो।”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल सामान्य थी।

     

    ऐसी जैसे कोई परेशान होकर अपने दोस्त को बुला रहा हो।

     

    अमित के दिमाग में अचानक रवि का चेहरा घूम गया।

     

    “रवि!”

     

    उसने कहा,

     

    “शायद मेरा दोस्त मुझे ढूँढते हुए यहाँ आया है।”

     

    बूढ़ी औरत ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    “तुम्हारा दोस्त यहाँ नहीं है।”

     

    “लेकिन आवाज—”

     

    “वह आवाज तुम्हारे दोस्त की भी हो सकती है।”

     

    अमित चुप हो गया।

     

    बाहर अचानक किसी ने दरवाजे को खरोंचना शुरू कर दिया।

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    खर्र…

     

    ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने लंबे नाखून लकड़ी पर घिस रहा हो।

     

    अमित ने डरकर पीछे कदम किया।

     

    “मैं यहाँ से जाना चाहता हूँ।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने इस समय दरवाजा खोला, तो तुम अकेले नहीं जाओगे।”

     

    अमित कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    वहाँ कई पुराने कागज टंगे हुए थे।

     

    हर कागज पर किसी इंसान का नाम लिखा था।

     

    अमित धीरे-धीरे उनके पास गया।

     

    पहला नाम था—

     

    रमेश — 1998

     

    दूसरा—

     

    सुरेश — 2003

     

    तीसरा—

     

    नरेश — 2007

     

    फिर कई नाम।

     

    कुछ नामों के आगे तारीखें थीं।

     

    लेकिन आखिरी कागज देखकर अमित की साँस रुक गई।

     

    उस पर लिखा था—

     

    अमित — 15 अगस्त 2026

     

    उसने पीछे मुड़कर बूढ़ी औरत को देखा।

     

    “यह क्या है?”

     

    बूढ़ी औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    “यह मेरा नाम है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “और आज की तारीख भी।”

     

    “मुझे यह भी पता है।”

     

    अमित की आवाज काँपने लगी।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़ी औरत धीरे-धीरे उठी।

     

    “क्योंकि तुम पहले नहीं हो।”

     

    “क्या?”

     

    “हर कुछ साल में कोई न कोई उस रास्ते से गुजरता है।”

     

    वह दीवार पर लगे पुराने कागजों की तरफ देखने लगी।

     

    “उसे पीछे से कोई पुकारता है। वह आवाज सुनता है। अगर वह पीछे मुड़कर देख ले… तो फिर वह कभी अपने घर नहीं पहुँचता।”

     

    अमित ने पूछा,

     

    “और अगर पीछे न देखे?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “तो वह मेरे घर तक पहुँच जाता है।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर सुबह होने तक उसे यहाँ रहना पड़ता है।”

     

    “और उसके बाद?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उसके बाद फैसला होता है कि वह वापस जाएगा या नहीं।”

     

    अमित को लगा जैसे उसका सिर घूम रहा है।

     

    “किसका फैसला?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    अमित उछल पड़ा।

     

    “ऊपर कौन है?”

     

    बूढ़ी औरत ने तुरंत कहा,

     

    “कोई नहीं।”

     

    “लेकिन आवाज तो—”

     

    “ऊपर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहाँ जो रहता है, वह इंसान नहीं है।”

     

    अमित की नजर सीढ़ियों पर गई।

     

    लकड़ी की पुरानी सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं।

     

    उसे ऐसा लगा जैसे ऊपर कोई खड़ा उसे देख रहा है।

     

    “मुझे कोई दिखाई दे रहा है,” अमित ने कहा।

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “सीढ़ियों के ऊपर…”

     

    वह धीरे-धीरे ऊपर देखने लगी।

     

    अचानक उसका चेहरा बदल गया।

     

    “नीचे आओ!”

     

    अमित पीछे हट गया।

     

    ऊपर सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक काली परछाईं खड़ी थी।

     

    वह बिल्कुल स्थिर थी।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसकी दो सफेद आँखें साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    अमित की साँस अटक गई।

     

    परछाईं ने धीरे-धीरे सिर झुकाया।

     

    फिर उसी आवाज में बोली—

     

    “अमित…”

     

    अमित ने कान बंद कर लिए।

     

    बूढ़ी औरत ने लालटेन उठाई और तेज आवाज में कुछ मंत्र जैसा बोलना शुरू कर दिया।

     

    परछाईं अचानक गायब हो गई।

     

    कुछ सेकंड बाद ऊपर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    धड़…

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    अमित ने काँपते हुए पूछा,

     

    “वह क्या था?”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा,

     

    “तुम्हारा पीछा करने वाला।”

     

    “लेकिन वह ऊपर कैसे पहुँच गया?”

     

    “वह जहाँ चाहे पहुँच सकता है।”

     

    अमित की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मैंने उसका क्या बिगाड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “फिर वह मेरे पीछे क्यों पड़ा है?”

     

    बूढ़ी औरत कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने दीवार पर लगे अमित के नाम वाले कागज को उतार लिया।

     

    कागज के पीछे कुछ लिखा था।

     

    उसने अमित को वह कागज दिया।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसने तुम्हें रास्ते पर पुकारा, वह तुम्हें लेने नहीं आया था।”

     

    अमित ने पढ़कर पूछा,

     

    “तो फिर?”

     

    बूढ़ी औरत ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “वह तुम्हें घर तक पहुँचाना चाहता था।”

     

    अमित ने हैरानी से पूछा,

     

    “घर तक?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    बूढ़ी औरत ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “क्योंकि असली खतरा इस जंगल में नहीं है।”

     

    अमित ने धीरे से पूछा,

     

    “तो कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे घर में।”

     

    अमित का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल अचानक बज उठा।

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    ट्रिन…

     

    कमरे में मौजूद दोनों लोग जम गए।

     

    अमित ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।

     

    स्क्रीन पर उसके घर का नंबर दिखाई दे रहा था।

     

    माँ कॉल कर रही थीं।

     

    अमित ने कॉल उठाई।

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ सन्नाटा था।

     

    फिर उसकी माँ की घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

     

    “अमित… बेटा, तुम कहाँ हो?”

     

    “माँ, मैं रास्ते में हूँ।”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर माँ ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “नहीं बेटा… तुम रास्ते में नहीं हो।”

     

    अमित का दिल बैठ गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने कहा—

     

    “तुम्हारा कमरा अंदर से बंद है।”

     

    अमित कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी माँ फुसफुसाईं—

     

    “और अंदर से तुम्हारी आवाज आ रही है।”

     

    कॉल अचानक कट गई।

     

    अमित ने धीरे-धीरे बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

     

    बूढ़ी औरत ने सिर्फ इतना कहा—

     

    “अब तुम्हें समझ आया कि पीछे देखना मना क्यों है?”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 2: हवेली में पाँचवाँ कौन था?

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव दीवार के सामने खड़ा रह गया।

     

    उसके हाथ में टॉर्च काँप रही थी।

     

    दीवार पर लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

     

    निखिल, करण और मोहित उसके पीछे खड़े थे।

     

    चारों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    मोहित की आवाज काँप रही थी।

     

    “हम तो चार हैं…”

     

    करण ने तुरंत गिनती की।

     

    “आरव… निखिल… मोहित… मैं।”

     

    चार।

     

    फिर उसने पीछे देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन उसी समय तीसरे कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    “भैया…”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “ये हमें डराने की कोशिश कर रही है।”

     

    निखिल ने कहा—

     

    “लेकिन सीढ़ियाँ कहाँ गईं?”

     

    किसी के पास जवाब नहीं था।

     

    वे जिस रास्ते से ऊपर आए थे, वहाँ अब एक काली दीवार खड़ी थी।

     

    आरव ने दीवार को हाथ लगाया।

     

    वह पत्थर की तरह ठंडी थी।

     

    “पीछे हटो।”

     

    उसने लोहे की टॉर्च से दीवार पर वार किया।

     

    ठक!

     

    दीवार पर कोई निशान नहीं पड़ा।

     

    तभी पीछे से किसी ने धीरे से कहा—

     

    “सीढ़ियाँ तुम्हें जाने नहीं देंगी।”

     

    चारों एक साथ पलटे।

     

    गलियारे के आखिर में वही छोटी लड़की खड़ी थी, जिसे उन्होंने आईने में देखा था।

     

    इस बार वह सच में वहाँ थी।

     

    उसने सफेद रंग की पुरानी फ्रॉक पहन रखी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर बिखरे हुए थे।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह तीसरे कमरे की तरफ देखने लगी।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर इशारा किया।

     

    “उसके अंदर मत जाना।”

     

    मोहित ने पूछा—

     

    “कौन है अंदर?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो…”

     

    कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा—

     

    “जो मेरा पिता बनकर घूमता है।”

     

    चारों के चेहरे पर डर उतर आया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता कौन थे?”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “इस हवेली के मालिक।”

     

    “और उन्होंने तुम्हें कमरे में बंद किया था?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “उन्होंने मुझे नहीं बंद किया।”

     

    “फिर?”

     

    लड़की ने तीसरे कमरे की तरफ देखा।

     

    “उसने किया था।”

     

    अचानक कमरे के अंदर से किसी आदमी की आवाज आई—

     

    “झूठ बोल रही है।”

     

    लड़की डरकर पीछे हट गई।

     

    दरवाजे की जंजीर अपने आप हिलने लगी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    आरव ने देखा कि जंजीर धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    निखिल ने कहा—

     

    “भागो!”

     

    लेकिन लड़की ने जोर से चिल्लाया—

     

    “रुको!”

     

    जंजीर अचानक जमीन पर गिर गई।

     

    तीसरे कमरे का दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया।

     

    अंदर से घना अंधेरा दिखाई दे रहा था।

     

    और उस अंधेरे के बीच…

     

    एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आरव ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर चारों के मुँह से चीख निकल गई।

     

    चेहरा इंसान जैसा था…

     

    लेकिन आँखें नहीं थीं।

     

    जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काली त्वचा थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अंदर आओ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    आदमी ने फिर कहा—

     

    “तुम चार नहीं हो।”

     

    उसकी आवाज पूरे गलियारे में गूँजने लगी।

     

    “तुम पाँच हो।”

     

    मोहित ने डरते हुए पूछा—

     

    “पाँचवाँ कौन है?”

     

    वह आदमी हँसने लगा।

     

    फिर उसने उंगली आरव की तरफ कर दी।

     

    “वही।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसके पीछे कोई नहीं था।

     

    “मैं?”

     

    आदमी ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे अंदर पाँचवाँ पहले से है।”

     

    अचानक आरव को सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसे चक्कर आने लगे।

     

    उसके कानों में फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “मुझे याद करो…”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    और तभी उसे एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक छोटी बच्ची हवेली के आँगन में खेल रही थी।

     

    उसके साथ एक लड़का भी था।

     

    लड़के का चेहरा आरव जैसा था।

     

    आरव डरकर जमीन पर बैठ गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    लड़की उसके पास आई।

     

    उसने पहली बार अपना नाम बताया।

     

    “मेरा नाम मीरा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और वो लड़का?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वो मेरा भाई था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहाँ है वो?”

     

    मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे अंदर।”

     

    अचानक हवेली में जोर की घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कमरे के अंदर बैठा वह बिना आँखों वाला आदमी खड़ा हो गया।

     

    “अब समय आ गया है।”

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! दरवाजा बंद करो!”

     

    आरव ने पूरी ताकत से तीसरे कमरे का दरवाजा बंद करने की कोशिश की।

     

    लेकिन उस आदमी ने अंदर से दरवाजा पकड़ लिया।

     

    उसकी ताकत बहुत ज्यादा थी।

     

    करण और निखिल भी आरव की मदद करने लगे।

     

    मोहित पीछे खड़ा काँप रहा था।

     

    तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा।

     

    मोहित ने सोचा कि शायद करण है।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास फुसफुसाहट हुई—

     

    “पाँचवाँ मिल गया…”

     

    मोहित की आँखें फैल गईं।

     

    उधर आरव ने दरवाजा पूरी ताकत से बंद कर दिया।

     

    तीसरा कमरा बंद हो गया।

     

    कुछ सेकंड तक सब शांत रहा।

     

    फिर मोहित की चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    मोहित गलियारे के आखिरी कोने में खड़ा था।

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    और वह मुस्कुरा रहा था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मोहित?”

     

    मोहित ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

     

    लेकिन उसकी आँखों का रंग बदल चुका था।

     

    वे पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम लोगों ने गलत दरवाजा बंद किया है।”

     

    फिर पीछे की दीवार से आवाज आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    और इस बार आवाज तीसरे कमरे से नहीं…

     

    उनके पीछे से आ रही थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 1: आधी रात की दस्तक

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुरा।

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी।

     

    लोग उसे काली हवेली कहते थे।

     

    हवेली इतनी पुरानी थी कि उसकी दीवारों पर उगी काई ने पूरी इमारत को हरे और काले रंग में ढक दिया था। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लोहे की बड़ी-बड़ी कीलें लगी थीं।

     

    लेकिन उस हवेली की सबसे डरावनी बात उसका बंद पड़ा तीसरा कमरा था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि उस कमरे का दरवाजा पिछले पैंतीस साल से नहीं खुला था।

     

    और जो भी उसे खोलने की कोशिश करता…

     

    वह रात में गायब हो जाता।

     

    इसी गाँव में आरव नाम का एक लड़का रहता था।

     

    आरव को पुरानी जगहों और रहस्यमयी कहानियों में बहुत दिलचस्पी थी। वह हमेशा अपने दोस्तों से कहता था—

     

    “भूत होते तो आज तक किसी ने वीडियो बना लिया होता।”

     

    उसके तीन दोस्त थे—निखिल, करण और मोहित।

     

    एक दिन चारों स्कूल से लौट रहे थे।

     

    रास्ते में निखिल ने काली हवेली की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुझे पता है, कल रात वहाँ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई थी।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “तू भी दादी-नानी वाली कहानियों पर विश्वास करता है?”

     

    करण ने कहा—

     

    “मजाक मत कर। मेरे चाचा ने भी सुना है।”

     

    आरव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    उसकी तीसरी मंजिल की एक खिड़की खुली थी।

     

    “अगर वहाँ कोई है, तो आज रात पता कर लेते हैं।”

     

    मोहित तुरंत बोला—

     

    “तू पागल है क्या?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “डर नहीं लगा…”

     

    मोहित ने धीमे से कहा।

     

    “लेकिन उस हवेली के बारे में एक बात सच है।”

     

    “क्या?”

     

    “उसमें रात के बारह बजे कोई दरवाजा खटखटाता है।”

     

    चारों कुछ पल चुप रहे।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    मोहित ने सिर हिलाया।

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे चारों दोस्त हवेली के बाहर पहुँच गए।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    चाँद कभी बादलों के पीछे छिप जाता, कभी दिखाई देता।

     

    हवेली का मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    “चलो।”

     

    अंदर कदम रखते ही ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    हवेली के अंदर धूल की मोटी परत थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।

     

    एक चित्र में हवेली के मालिक का परिवार दिखाई दे रहा था।

     

    एक आदमी…

     

    एक औरत…

     

    और उनके बीच करीब दस साल की एक लड़की।

     

    मोहित ने तस्वीर पर टॉर्च डाली।

     

    “इस लड़की के चेहरे पर खरोंच क्यों है?”

     

    आरव ने पास जाकर देखा।

     

    लड़की के चेहरे को किसी नुकीली चीज से इतनी बार खरोंचा गया था कि चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    तभी ऊपर से आवाज आई।

     

    ठक…

     

    चारों ने सिर उठाया।

     

    फिर—

     

    ठक… ठक…

     

    जैसे कोई ऊपर की मंजिल पर चल रहा हो।

     

    करण ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “कोई है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “चलकर देखते हैं।”

     

    वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमरातीं।

     

    ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के आखिर में तीन दरवाजे थे।

     

    पहला कमरा खुला था।

     

    दूसरा बंद था।

     

    और तीसरे कमरे पर मोटी लोहे की जंजीर बंधी थी।

     

    जंजीर पर लाल रंग से कुछ लिखा था—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    आरव ने टॉर्च उस लिखावट पर डाली।

     

    मोहित पीछे हट गया।

     

    “हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    तभी तीसरे कमरे के अंदर से आवाज आई।

     

    बहुत धीमी।

     

    एक लड़की की आवाज।

     

    “भैया…”

     

    चारों जम गए।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    मोहित की साँसें तेज हो गईं।

     

    “यहाँ कोई बच्ची बंद है!”

     

    आरव ने जंजीर को देखा।

     

    “अगर सच में कोई अंदर है तो हमें मदद करनी चाहिए।”

     

    करण ने कहा—

     

    “लेकिन यह जंजीर…”

     

    आरव ने उसे पकड़ लिया।

     

    जंजीर बर्फ जैसी ठंडी थी।

     

    अचानक अंदर से जोर की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    चारों पीछे हट गए।

     

    फिर दरवाजे के नीचे से किसी की उंगलियाँ दिखाई दीं।

     

    पतली…

     

    सफेद…

     

    और असामान्य रूप से लंबी।

     

    वे उंगलियाँ धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से बाहर आईं।

     

    मोहित चीखने ही वाला था कि आरव ने उसका मुँह दबा दिया।

     

    अंदर से लड़की की आवाज आई—

     

    “भैया… तुम आ गए।”

     

    आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    कुछ सेकंड कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर अंदर से आवाज आई—

     

    “मैं वही हूँ… जिसे इस हवेली ने पैंतीस साल पहले बंद कर दिया था।”

     

    आरव ने करण की तरफ देखा।

     

    “पैंतीस साल?”

     

    तभी उसके पीछे लगे पुराने आईने में कुछ दिखाई दिया।

     

    चारों लड़के वहाँ खड़े थे।

     

    लेकिन आईने में…

     

    पाँच लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    उनके पीछे एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल काला था।

     

    और वह धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर तीसरे कमरे की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    आरव ने पलटकर पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    फिर आईने की तरफ देखा।

     

    लड़की अब भी वहाँ थी।

     

    उसने अपने होंठ खोले।

     

    और बिना आवाज के सिर्फ इतना कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    अचानक तीसरे कमरे के अंदर से जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आने लगी।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    और फिर एक आदमी की भारी आवाज गूँजी—

     

    “उसे बाहर मत निकालना!”

     

    चारों लड़के डरकर सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही आरव रुक गया।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ गायब थीं।

     

    उनकी जगह…

     

    एक लंबी, काली दीवार थी।

     

    और दीवार पर ताजा खून से लिखा था—

     

    “अब तुम पाँच हो।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।