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बंद कमरे की आवाज़ भाग 3 — आखिरी दरवाज़ा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

आरव कुछ क्षण तक अपने ही चेहरे को अंधेरे में देखता रहा।

 

उसके सामने खड़ा व्यक्ति बिल्कुल उसी जैसा था।

 

वही चेहरा।

 

वही आँखें।

 

वही कपड़े।

 

लेकिन उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था।

 

कबीर पीछे हट गया।

 

“आरव… ये क्या है?”

 

सामने खड़ा दूसरा आरव मुस्कुराया।

 

“तुम्हें सच जानना है?”

 

असली आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“तुम कौन हो?”

 

दूसरा आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“मैं वो हूँ जो हर बार यहाँ आने वाले लोगों की यादों से पैदा होता है।”

 

“क्या मतलब?”

 

“यह कमरा लोगों को मारता नहीं। यह उनकी यादों को अपने अंदर कैद करता है।”

 

अचानक आरव के सिर में तेज़ दर्द होने लगा।

 

उसकी आँखों के सामने पुराने दृश्य घूमने लगे।

 

एक छोटी बच्ची।

 

एक बंद कमरा।

 

एक आदमी जंजीर लगा रहा था।

 

और…

 

एक बच्चा कमरे के बाहर खड़ा होकर रो रहा था।

 

आरव ने सिर पकड़ लिया।

 

“ये सब क्या है?”

 

दूसरे आरव ने कहा—

 

“तुमने बचपन में यह हवेली देखी थी। तुम्हें याद नहीं।”

 

आरव को धीरे-धीरे कुछ याद आने लगा।

 

वह लगभग पाँच साल का था।

 

अपने नाना के साथ गाँव आया था।

 

एक दिन वह खेलते-खेलते हवेली के अंदर चला गया था।

 

उसी समय उसने एक बच्ची को कमरे की खिड़की से देखा था।

 

वह बच्ची रो रही थी।

 

उसने आरव से कहा था—

 

“दरवाज़ा खोल दो।”

 

लेकिन आरव डरकर भाग गया था।

 

उस रात हवेली में आग लगी थी।

 

मीरा गायब हो गई थी।

 

और आरव की याददाश्त से वह पूरी घटना मिट गई थी।

 

सामने खड़ा दूसरा आरव बोला—

 

“तुम्हारे डर ने तुम्हारी याद को बंद कर दिया था। लेकिन कमरे ने उसे नहीं भुलाया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“मीरा कहाँ है?”

 

अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

 

वही मासूम चेहरा।

 

वही चाँदी की पायल।

 

मीरा।

 

उसकी आँखों में आँसू थे।

 

“मैं यहाँ हूँ।”

 

आरव उसके पास गया।

 

“तुम्हें किसने बंद किया था?”

 

मीरा ने पीछे देखा।

 

“मेरे पिता ने।”

 

“क्यों?”

 

मीरा बोली—

 

“क्योंकि मैं उस चीज़ को देख सकती थी जो दीवार के पीछे रहती थी।”

 

अचानक सुरंग काँपने लगी।

 

मीरा ने कहा—

 

“वो चीज़ मेरे डर से बड़ी होती गई। हर बार जब कोई इस कमरे में आता है, वो उसकी आवाज़ चुरा लेती है। फिर उसकी याद। और आखिर में उसका चेहरा।”

 

आरव ने सफेद आँखों वाली लड़की को याद किया।

 

“वो क्या है?”

 

मीरा ने कहा—

 

“उसका कोई नाम नहीं। लोग उसे अलग-अलग नाम देते रहे। लेकिन वह असल में डर है।”

 

कबीर ने पूछा—

 

“इसे खत्म कैसे किया जा सकता है?”

 

मीरा ने अपनी पायल उतारी।

 

“इसे उसी जगह लौटाना होगा जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

 

सुरंग के अंत में एक छोटा कमरा था।

 

कमरे के बीचोंबीच पत्थर का एक पुराना चबूतरा था।

 

उस पर एक गोल निशान बना था।

 

मीरा ने कहा—

 

“यहीं मेरी पायल रख दो।”

 

आरव ने पायल चबूतरे पर रख दी।

 

अचानक पूरी हवेली में जोरदार चीख गूँजी।

 

सफेद आँखों वाली लड़की सुरंग में दिखाई दी।

 

इस बार उसका चेहरा भयानक था।

 

उसने कहा—

 

“तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

 

आरव ने साहस जुटाकर कहा—

 

“तू भूत नहीं है। तू सिर्फ हमारा डर है।”

 

वह चीखी।

 

“डर को खत्म नहीं किया जा सकता!”

 

आरव ने कहा—

 

“लेकिन उसका सामना किया जा सकता है।”

 

अचानक सुरंग की दीवारों पर कैद सभी आवाज़ें एक साथ गूँजने लगीं।

 

“हमें बचाओ!”

 

“हमें बाहर निकालो!”

 

“बहुत अंधेरा है!”

 

कबीर ने चिल्लाकर कहा—

 

“आरव! कुछ करो!”

 

आरव ने चबूतरे पर हाथ रखा।

 

उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके भीतर वर्षों से छिपा डर बाहर निकल रहा है।

 

उसे अपना बचपन दिखाई दिया।

 

वह बच्चा आरव कमरे के सामने खड़ा था।

 

मीरा अंदर से मदद माँग रही थी।

 

बच्चा आरव डरकर भाग रहा था।

 

इस बार उसने खुद को भागने नहीं दिया।

 

वह उस पुराने दृश्य में वापस गया।

 

मीरा ने हाथ बढ़ाया।

 

“आरव… दरवाज़ा खोल दो।”

 

इस बार आरव ने दरवाज़ा खोल दिया।

 

कमरे के भीतर घना अंधेरा था।

 

अंधेरे में वही सफेद आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

 

उसने कहा—

 

“तुम मुझे स्वीकार करोगे तो मैं तुम्हारा हिस्सा बन जाऊँगी।”

 

आरव ने कहा—

 

“नहीं। मैं अपने डर को स्वीकार करता हूँ… लेकिन उसे अपने ऊपर राज नहीं करने दूँगा।”

 

उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

 

अचानक लड़की चीखने लगी।

 

उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।

 

कमरे की दीवारें टूटने लगीं।

 

काला हाथ दीवार से अलग होकर जमीन पर गिरा।

 

और फिर…

 

सब कुछ शांत हो गया।

 

सुरंग में सुबह की रोशनी फैलने लगी।

 

मीरा आरव के सामने खड़ी थी।

 

अब उसके चेहरे पर डर नहीं था।

 

वह मुस्कुराई।

 

“अब मैं जा सकती हूँ।”

 

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

“तुम्हें बहुत पहले जाना चाहिए था।”

 

मीरा ने कहा—

 

“तुमने बहुत देर से सही… लेकिन इस बार दरवाज़ा खोल दिया।”

 

उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदल गया।

 

चाँदी की पायल जमीन पर गिर गई।

 

और मीरा गायब हो गई।

 

कुछ ही क्षण बाद पूरी हवेली काँपने लगी।

 

आरव और कबीर सुरंग से बाहर भागे।

 

जैसे ही वे हवेली से बाहर निकले, पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

 

धड़ाम!

 

पूरी पुरानी हवेली का बीच वाला हिस्सा ढह गया।

 

कुछ देर तक धूल हवा में उड़ती रही।

 

फिर सब शांत हो गया।

 

गाँव वाले वहाँ इकट्ठा हो गए।

 

नाना भी दौड़ते हुए पहुँचे।

 

उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

 

“तुम ठीक हो?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

उसने अपनी जेब से चाँदी की पायल निकाली।

 

नाना उसे देखते ही समझ गए कि सब खत्म हो चुका है।

 

“मीरा…”

 

उन्होंने बस इतना कहा।

 

उस रात आरव पहली बार बिना डर के सोया।

 

सुबह जब वह गाँव से जाने लगा तो उसने आखिरी बार हवेली की तरफ देखा।

 

जहाँ कभी वह काला कमरा था, वहाँ अब सिर्फ मलबा था।

 

लेकिन तभी…

 

उसे बहुत हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी।

 

“आरव…”

 

वह रुक गया।

 

कुछ क्षण बाद वही आवाज़ फिर आई।

 

“धन्यवाद।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

उसे पता था कि यह मीरा की आवाज़ थी।

 

वह कार में बैठ गया और गाँव से निकल गया।

 

कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी।

 

लेकिन…

 

उस रात शहर लौटने के बाद आरव ने अपने कमरे की अलमारी खोली।

 

अंदर उसे वही पुरानी चाँदी की पायल दिखाई दी।

 

जबकि वह पायल तो उसने हवेली के मलबे के पास छोड़ दी थी।

 

आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

 

पायल के नीचे एक छोटा-सा कागज़ रखा था।

 

उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“हर बंद कमरा खाली नहीं होता।”

 

आरव ने कागज़ को देखा।

 

और तभी उसके कमरे के बंद दरवाज़े पर…

 

ठक… ठक… ठक…

 

तीन बार दस्तक हुई।

 

आरव ने दरवाज़े की ओर देखा।

 

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

 

फिर बाहर से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

 

“आरव…”

 

लेकिन इस बार वह आवाज़ मीरा की नहीं थी।

 

और कहानी यहीं समाप्त होती है।

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