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अधूरी इबादत भाग~46

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~46 वो थी… वो है… 

 

काम्या रैना अपने कमरे में आई तो दरवाज़ा बंद करते ही जैसे उसके अंदर की तमाम आवाज़ें गूँजने लगीं। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, पर चेहरा अब भी ठंडा, सख्त और संजीदा था…. जैसे कोई मलबे के नीचे दबे सच को पहचान गया हो।

उसने मोबाइल उठाया, तेज़ी से Instagram खोला, वो लगभग भूल ही चुकी थी कि रूहानी कब से गायब थी सोशल मीडिया से। 

लेकिन आज, उसने रूहानी के तीन-तीन नए पोस्ट देखे। पहली पोस्ट, जो कुछ एक हफ्ते पहले ली गई थी, किसी जमे हुए वक़्त का दरवाज़ा खोल रही थी…..

Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

तस्वीरें थीं, रूहानी के पुराने स्टूडियो की….. धूल से भरी खिड़कियाँ, टूटे मनीक्विन्स, बिखरे स्केच, और एक शांत-सी रूहानी, खड़ी हुई अपने खंडहरों के बीच। 

काम्या ने उस तस्वीर को ज़ूम करके देखा। रूहानी की आँखों में डर नहीं था, दर्द था, मगर उस दर्द में भी एक तरह की शांति थी…. जैसे किसी ने खुद को माफ़ कर दिया हो।

दूसरी पोस्ट ने जैसे काम्या की साँसें रोक दीं। 

Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

रूहानी के नए स्टूडियो की झलक, minimalist décor, dreamy pastels, mood boards से भरी दीवारें और बीच में खड़ी थी रूहानी, एक मजबूत औरत के रूप में, जो अपने हाथों से खुद को फिर से गढ़ चुकी थी। 

रूहानी की आँखें अब पहले जैसी नहीं लग रही थीं, उनमें कोई डर या दुःख नहीं था, बल्कि चुनौती थी, खुद से भी और दुनिया से भी।

तीसरी पोस्ट, जैसे एक तीर की तरह सीधा काम्या के दिल को चीर गया। 

एक डिजिटल इनविटेशन, Grand Opening of Ruhani Studio – This Friday, 6 PM। 

उसी फॉन्ट में, उसी लाल और सुनहरे रंग के कॉम्बिनेशन में, जैसा रूहानी अपने पुराने दिनों में डिज़ाइन किया करती थी।

काम्या ने फोन को एकटक घूरा। फिर उसे लगा जैसे उसकी साँस रुक गई हो। 

एक गुस्से की लहर उसके अंदर दौड़ी, पर वो गुस्सा सिर्फ रूहानी पर नहीं था। वो अपने आप पर भी थी… 

उसने कैसे समझ लिया था कि रूहानी अगर उस दिन टूटी थी तो फिर कभी जुड़ेगी नहीं….. 

कैसे मान लिया था कि एक औरत जिसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धोखा मिला था, वो फिर कभी नहीं उठ पाएगी।

“Unbelievable…” काम्या के होंठों से निकला, पर वो शब्द सिर्फ तंज नहीं था, वो एक डर था… एक ऐसा डर जो किसी अतीत से उठी राख से फिर जलने वाले शोले को देखकर पैदा होता है।

उसने खुद को आईने में देखा। 

“She’s back… and this time, it’s not just about designs. It’s war.”

उसके चेहरे की रंगत अब तेज़ थी। गालों पर हल्की सी जलन, माथे की नसें तन गईं थीं। 

उसने फोन उठाया, किसी को कॉल करने के लिए…. शायद अपनी टीम को, शायद अपने PR को…. मगर उंगलियाँ ठिठक गईं।

क्योंकि कहीं ना कहीं, काम्या जानती थी, कि जो जंग वो अब देख रही थी… उसमें रूहानी सिर्फ एक फाइटर नहीं थी। वो खुद को फिर से लिख रही थी, एक ऐसी किताब की तरह जिसे काम्या ने अधूरा समझकर बंद कर दिया था।

और काम्या… उसे ये कतई मंजूर नहीं था। रूहानी को वापसी करते हुए देखना, फिर से….. उसकी आंखों के सामने, उसी शहर में… और शायद, उसी एकांश के दिल में एक बार फिर से जगह बनाते हुए।

काम्या की आँखों में उस वक़्त एक अजीब सी दहशत थी…. जैसे किसी ने उसकी आत्मा के भीतर उतरकर वहाँ कुछ ऐसा बो दिया हो जो वो चाहकर भी उखाड़ नहीं सकती। 

एकांश की जुबां से रूहानी का नाम सुनकर और उस एक नाम के पीछे की सारी भावनाएँ देखकर, काम्या के भीतर की सारी दीवारें ढह चुकी थीं। उसका आत्मविश्वास, जो सालों की मेहनत से गढ़ा गया था, पहली बार चटक गया था।

रूहानी का अस्तित्व अब उसके लिए सिर्फ एक बीती कहानी नहीं, एक ज़िंदा चुनौती बन चुका था। वह डर गई थी…. नहीं, डर से भी कहीं गहरी कोई अनुभूति थी ये, जैसे किसी को खोने से पहले ही उसकी छाया से जलन होना।

और उस डर में डूबी काम्या ने बिना एक पल गंवाए रूहानी को मैसेज कर दिया — “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।”

उसके अंदर एक बेचैनी थी, एक अंधा आवेग जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। 

वह तेज़ी से हॉल की ओर गई, जहाँ एकांश को देखने की बेचैनी ने उसे घेर लिया था। पर जो देखा, वो अप्रत्याशित था।

एकांश ज़मीन पर था, सोफे से गिरा हुआ, पीठ सीधी फर्श से लगी और आँखें छत की तरफ स्थिर…. बिना पलक झपकाए। जैसे वक़्त थम गया हो उसके लिए, या जैसे कोई अदृश्य भार हो, जो उसे उठने नहीं दे रहा।

काम्या का दिल काँप उठा। उसके होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली, बस कदम तेज़ी से भागे और वो एकांश के पास जा पहुँची।

घुटनों के बल बैठकर उसने एकांश को अपनी गोद में उठाया और उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थामकर काँपती आवाज़ में कहा— “मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई है, एकांश? मैं क्या भर नहीं पाई? मैं हर उस रूप में खुद को ढालती रही हूँ जैसी तुम्हें चाहिए थी। रूहानी… रूहानी मेरे सामने कुछ भी नहीं है। ना नाम में, ना चेहरे में, ना शोहरत में।”

एकांश ने उसकी आँखों में देखा। उसमें आँसू नहीं थे, मगर कुछ था….. एक थकावट, एक शिकस्त, और एक गूंगी चीख़ जो शायद सालों से अंदर दब रही थी।

काम्या ने उसे सीने से लगा लिया, जैसे किसी टूटी हुई चीज़ को समेटना चाहती हो। एकांश की साँसें थोड़ी देर में स्थिर हो गईं, और तभी काम्या ने उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चुम्बनों की बौछार शुरू कर दी…. कपोलों पर, माथे पर, पलकों के पास। उसका हर स्पर्श इस बात का गवाह था कि वो किसी और को वहाँ जगह नहीं लेने देगी।

और फिर, वहीं हॉल में, उनके बीच की दूरी सिमटने लगी। वो एक दुस्स्वप्न से जागे प्रेमियों की तरह एक-दूसरे में शरण लेने लगे….. बिना कहे, बिना समझाए, बस उस क्षण को थामे हुए, जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।

रात के सन्नाटे में जब दोनों अपने कमरे के बिस्तर पर थे, तब एकांश गहरी नींद में खो गया था। लेकिन काम्या… अब भी जाग रही थी।

वो एकांश के बालों में अपनी उंगलियाँ फेर रही थी, बड़े सलीके से, जैसे किसी टूटे हुए विश्वास को सहेज रही हो। उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं था, बस एक निश्चय था….. एक ठंडी आग जो धीमे-धीमे उसकी आत्मा में जल रही थी।

उसने मन ही मन खुद से वादा किया, “अब चाहे जो करना पड़े… मैं करूँगी। लेकिन एकांश के लबों पर दोबारा ‘रूहानी’ का नाम नहीं आने दूँगी।”

कमरे में गहरी नींद की एक परत थी, पर काम्या के भीतर अब एक नई रात जाग चुकी थी… एक ऐसी रात, जो शायद अब कभी सुबह होने नहीं देगी।

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एकांश की आंखें जैसे किसी पुराने ख्वाब के जमे हुए कांच को तोड़ रही थीं। 

“Stitch & Soul” का बोर्ड देखते ही उसके सीने में एक अजीब सी कसक उठी थी, मगर उसने खुद को संभाल लिया था। 

पर अब, जैसे ही दरवाज़े की दहलीज़ पार की, हवा में तैरती वही जानी-पहचानी खुशबू…. वो हल्की सी सैंडलवुड की परफ्यूम, जो रूहानी हमेशा लगाती थी…. उसकी सांसों में समा गई।

उसके कदम थम गए। सामने, रंग-बिरंगी fairy lights के बीच, pastel shades में सजे हॉल के बीचोंबीच रूहानी खड़ी थी। उसके चेहरे पर सुकून और एक artist जैसी शांति थी।

एकांश की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी उंगलियां अनायास सिहर उठीं।

“रूहानी?” उसने लगभग फुसफुसाते हुए खुद से कहा, जैसे किसी भूली हुई धुन को फिर से सुन लिया हो।

उसी क्षण, उसके बाजू में खड़ी काम्या ने अपना हाथ कसकर उसकी बांह में डाल दिया और तीखी मुस्कान के साथ कहा, “हमें नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

उसकी आवाज़ में मिठास कम और चुनौती ज़्यादा थी।

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क्या एकांश की साँसें वाकई थम गई थीं… या बस वक़्त ने कुछ कहने से पहले उसे रोक लिया था?

क्या रूहानी की वापसी सिर्फ़ एक स्टूडियो की शुरुआत थी… या किसी अधूरे हिसाब का इशारा?

काम्या की मुस्कान के पीछे जो चुप्पी थी, क्या वो किसी तूफ़ान का इंतज़ार था?

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