Part 4
No love clause
विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”
अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।”उसकी ठंडी निगाहें सीधे विक्रम जी की आँखों में टिकी थीं।
कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।
कमरे में मौजूद बाकी लोगों को शायद अग्नि की यह बेबाकी बदतमीजी लग रही थी, लेकिन विक्रम राजावत उसे बस देखते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा जरूर था, मगर आँखों में कुछ और ही था, जिसे वहाँ मौजूद कोई भी पढ़ नहीं पाया।
आखिरकार उन्होंने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए कहा, “स्टडी में चलो। हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” कहकर वो हाथ पीछे बांधे आगे बढ़ गए।
अग्नि ने एक पल के लिए उनकी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ा।
दोनों पहली मंजिल पर बनी स्टडी की तरफ बढ़ गए।
कुछ ही देर में विक्रम जी ने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला और अंदर चले गए। अग्नि भी उनके पीछे कमरे में दाखिल हुआ।
राजावत मेंशन की बाकी जगहों की तरह यह कमरा भी बेहद आलीशान था, लेकिन इसमें दिखावे से ज्यादा एक अलग तरह की गंभीरता थी।
कमरे की एक पूरी दीवार पर लकड़ी की बनी खूबसूरत लाइब्रेरी थी। उसमें लगी लंबी-लंबी रैक में बिजनेस और मैनेजमेंट की किताबों से लेकर इतिहास, राजनीति, साहित्य और पुराने उपन्यास तक करीने से सजे हुए थे।
हर किताब अपनी जगह पर थी।
कुछ किताबों के किनारों पर हल्की धूल जरूर जमी थी, लेकिन उन्हें देखकर साफ पता चलता था कि इस कमरे में किताबें सिर्फ सजावट के लिए नहीं रखी गई थीं।
लाइब्रेरी के सामने एक बड़ी-सी आरामदायक विंग चेयर रखी थी, जिसके पास एक छोटा-सा लैम्प रखा हुआ था।
कमरे के बीचों-बीच गहरे रंग की लकड़ी की एक बड़ी मेज थी। उस पर कुछ जरूरी दस्तावेज, एक खुली हुई डायरी, चश्मे का केस और एक पुरानी चांदी की स्याहीदानी रखी थी।
कमरे की दूसरी दीवार पर राजावत परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में युवा विक्रम राजावत अपने बेटे के साथ खड़े थे।
दूसरी तस्वीर में उनकी पत्नी थीं।
और एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें बहुत छोटा-सा अग्नि अपने दादा की उंगली पकड़े खड़ा था।
अग्नि की नजर अनायास उस तस्वीर पर चली गई।
कुछ पल के लिए उसके चेहरे की कठोरता गायब हुई।
वह तस्वीर…
उसकी जिंदगी के उन कुछ खूबसूरत पलों में से एक थी, जिन्हें वह चाहकर भी भूल नहीं पाया था।
विक्रम जी ने उसकी नजर तस्वीर पर जाते देख ली।
लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस धीरे से अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े।
अग्नि भी तस्वीर से नजर हटाकर उनकी तरफ देखने लगा।
कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर अग्नि धीरे-धीरे आगे बढ़ा। और अचानक…
वह झुक गया। उसने विक्रम राजावत के पैर छू लिए।
विक्रम जी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गए।
शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अग्नि, जो कुछ सेकंड पहले तक उनसे इतनी नाराज़गी से बात कर रहा था, इस तरह उनके पैर छुएगा।
उनकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उन्होंने तुरंत अग्नि को उठाया और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
“मेरा बच्चा…” उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।
सिर्फ़ अपनापन था।
अग्नि ने भी आँखें बंद कर लीं। उस पल में वह राजावत ग्रुप का करोड़ों का मालिक या सख्त CEO नहीं था।
वह बस अपने दादा का पोता था।
वही बच्चा…
जो कभी उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था।
लेकिन अगले ही पल अग्नि के चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य हो जायेंगे। “ दादा जी, आप शादी करने के लिए मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते। शादी करना या ना करना ये मेरा निजी फैसला है।”
अग्नि की बात सुनकर विक्रम जी के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, वो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “कभी कभी हमें कुछ पहले लेने से पहले समय की नजाकत को देखना होता है।”
कहकर उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
अग्नि ने भौहें उचकाई, “ मैं आपकी शर्तें पढ़ चुका हूँ, बार बार मेरे सामने ये फाइल मत लाइए।”
विक्रम जी बोले, “ ये वो फाइल नहीं है, जो तुम समझ रहे हो।”
अग्नि के पहले विक्रम जी को देखा और फिर उनके हाथ में मौजूद फाइल को, फिर उसने वो फाइल अपने हाथों में पकड़ ली।
और चेयर खींचकर उसपर बैठ गया।
अग्नि ने फाइल अपने हाथों में ली और चेयर खींचकर उस पर बैठ गया। उसने फाइल को कुछ पल तक बिना खोले देखा।
फिर उसकी नजर अपने दादा जी पर गई। “अब इसमें और क्या है?”
विक्रम जी अपनी जगह खड़े रहे। “पहले पढ़ो।”
अग्नि ने हल्की-सी साँस छोड़ी और फाइल खोल दी।
पहले पन्ने पर वही वसीयत थी, जिसे वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। उसकी नजर तेजी से उन पंक्तियों पर दौड़ी। राजावत परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने के लिए अग्नि सिंह राजावत को अपने सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले विवाह करना अनिवार्य होगा।
अग्नि के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “मैंने कहा था ना दादा जी… मैं ये सब पहले ही पढ़ चुका हूँ।”
विक्रम जी ने कोई जवाब नहीं दिया। अग्नि ने अगला पन्ना पलटा। फिर एक और फिर…
उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।
उसके चेहरे पर आई हल्की-सी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“ये क्या है?”
विक्रम जी ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”
अग्नि ने फाइल से नजर उठाई। “ये हिस्सा पहले इस फाइल में नहीं था।”
विक्रम जी धीरे-धीरे उसके सामने रखी दूसरी चेयर पर जाकर बैठ गए। “क्योंकि तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।”
अग्नि की आँखें सिकुड़ गईं। “और अब पड़ गई?”
“हाँ।” कमरे में फिर खामोशी छा गई।
अग्नि ने उस पन्ने को दोबारा पढ़ा। उसमें वसीयत की संपत्ति से ज्यादा परिवार की कुछ जिम्मेदारियों और अधिकारों का उल्लेख था।
कुछ ऐसी बातें… जिन्हें पढ़कर अग्नि समझ गया था कि मामला सिर्फ़ पैसों का नहीं है। उसने फाइल बंद कर दी। “दादा जी, आप आखिर चाहते क्या हैं?”
विक्रम जी ने कुछ पल तक उसे देखा। “मैं चाहता हूँ कि तुम शादी करो।”
अग्नि ठंडी साँस छोड़ते हुए, “क्यों?”
विक्रम जी, “क्योंकि अब समय आ गया है।”
अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”
विक्रम जी चुप रहे
। अग्नि ने आगे झुककर कहा,
“आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”
कहानी आगे जारी रहेगी।
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मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

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