हम तेरे इश्क़ में बावरी हो गए,
तुझसे दूर जाना था हमें,
पर तेरी मोहब्बत में ही दीवानी हो गए।
सोचा था तुझसे दूरी बना लेंगे,
तेरी यादों को दिल से मिटा देंगे,
पर ना जाने कब तेरे इश्क़ में
खुद को ही भूल गए…
और तेरे होकर रह गए। ❤️🥀

Part 7
शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”
अग्नि ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।
फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।
Veda Sharma.
अग्नि ने मैसेज पढ़ा और फोन वापिस टेबल पर रख दिया और अपने लिए ड्रिंक बनाने लगा। लेकिन वो शायद कुछ सोच भी रहा था।
शुभम ने उसकी हरकत नोटिस कर ली। “क्या हुआ?”
अग्नि, “कुछ नहीं।”
शुभम ने पूछा, “किसका मैसेज था?”
अग्नि बोला, “ऑफिस का।”
शुभम ने आँखें सिकोड़कर उसकी तरफ देखा। “वेदा का?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “तुझे उसका नाम कैसे पता?”
शुभम हँस पड़ा। “भाई, मैं तेरा दोस्त हूँ। तेरी सेक्रेटरी के बारे में इतना तो जानता ही हूँ कि वो पिछले तीन साल से तेरे साथ काम कर रही है।”
अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया। शुभम ने मुस्कुराकर पूछा, “वैसे कैसी है?”
अग्नि ने सामान्य स्वर में कहा, “कौन?”
शुभम कूल अंदाज में, “वेदा।”
अग्नि ने कंधे उचकाए, “मुझे क्या पता?”
“अच्छा?” शुभम ने शरारत से कहा, “अभी दो मिनट पहले तक तू बता रहा था कि तुझे एक समझदार, सादगी पसंद लड़की चाहिए…”
अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम।”
शुभम, “हाँ भाई?”
अग्नि बोला, “अपनी बकवास बंद कर।” क्योंकि वो समझ गया था कि शुभम कहना क्या चाह रहा है,लेकिन उसे शुभम की बात बुरी भी नहीं लगी।
शुभम हँस पड़ा। लेकिन अग्नि के मन में पहली बार एक विचार आया।
एक ऐसा विचार जिसे उसने तुरंत अपने दिमाग से निकालने की कोशिश की।
वेदा शर्मा।
अग्नि ने गिलास में ड्रिंक डाली और उसे धीरे-धीरे घुमाने लगा।
शुभम अब भी उसे ही देख रहा था। “क्या सोच रहा है?”
अग्नि ने गिलास होंठों तक ले जाते हुए कहा, “कुछ नहीं।” लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी सहजता नहीं थी।
शुभम ने भौंहें उठाईं। “तू जब ‘कुछ नहीं’ बोलता है ना, तब समझ आता है कि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।”
अग्नि ने उसे घूरा। “तू मेरा दिमाग पढ़ना कब से सीख गया?”
“जब से तू मेरा दोस्त बना है।” शुभम ने आराम से सोफे की पीठ से सिर टिकाया। “वैसे एक बात बता… तेरी सेक्रेटरी शादीशुदा तो नहीं है?”
अग्नि ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “नहीं।” जवाब इतना जल्दी आया कि शुभम के चेहरे पर शरारती मुस्कान और गहरी हो गई।
“ओहो… तो जानकारी पूरी है।”
अग्नि ने गिलास टेबल पर रख दिया। “शुभम।”
शुभम, “अरे मैं तो बस पूछ रहा था।”
अग्नि, “और मैं बस जवाब दे रहा हूँ।”
शुभम, “ चल तू अब ज्यादा मत सोच, मैं कुछ करता हूँ।”
अग्नि में हां में सिर हिलाया और बोला, “ बस इसी जवाब की उम्मीद थी।”
अगली सुबह… राजावत ग्रुप।
सुबह के ठीक नौ बजे।
अग्नि हमेशा की तरह अपने ऑफिस पहुँच चुका था।
उसका केबिन पूरी तरह व्यवस्थित था।
टेबल पर जरूरी फाइलें रखी थीं। कॉफी उसके सामने थी।
लेकिन आज पहली बार… उसकी नजर बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थी।
तभी डोर नॉक हुआ।
अग्नि, “ come in!”
निशांत अंदर आया। “Good morning, sir.”
अग्नि, “Morning.” निशांत ने फाइल आगे बढ़ाई।
“आज दस बजे की बोर्ड मीटिंग है। ग्यारह बजे मल्होत्रा ग्रुप के साथ मीटिंग और दोपहर में…”
अग्नि, “निशांत।”
निशांत, “जी, सर?”
अग्नि ने बिना किसी रिएक्शन के पूछा, “वेदा आई?”
निशांत कुछ पल उसे देखता रहा। फिर बोला, “अभी तक नहीं, सर।”
अग्नि ने अपनी घड़ी देखी। नौ बजकर दस मिनट।
“आते ही उसे मेरे केबिन में भेजना।”
निशांत ने सिर हिलाया, “जी सर।”
निशांत जाने लगा। फिर अग्नि ने उसे रोक लिया। “और निशांत…”
निशांत रूककर पीछे मुड़ा, “जी?”
“अगर वो आज भी ऑफिस नहीं आ पाए तो…” अग्नि कुछ पल रुका। “पहले मुझसे बात करना।”
निशांत ने सिर हिलाया। “जी सर।”
दरवाजा बंद हो गया। अग्नि कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने खुद से सवाल किया, वो आखिर वेदा का इंतजार क्यों कर रहा था?
उसे अपनी ही बेचैनी अजीब लग रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
अग्नि की नजर दरवाजे पर गई। “Come in.”
दरवाजा खुला। और सामने… वेदा खड़ी थी।
आज भी उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिखाई दे रही थी। बाल जल्दी में बाँधे हुए थे।
चेहरा थका हुआ था।
लेकिन हाथ में हमेशा की तरह ऑफिस की फाइलें थीं।
“Good morning, sir.”
अग्नि कुछ सेकंड उसे देखता रहा। फिर बोला, “Sit.”
वेदा चुपचाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
अग्नि ने अपने सामने रखी फाइल बंद कर दी।
कुछ पल तक वो उसे देखता रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला, “वेदा…”
वेदा ने हैरानी से अग्नि की तरफ देखा, क्योंकि ये शायद पहली बार था जब वो उसे इस तरह से पुकार रहा था। “जी, सर?”
“मुझे तुमसे ऑफिस के काम के अलावा…”
वो एक पल के लिए रुका। “…एक बेहद निजी बात करनी है।”
वेदा की भौंहें सिकुड़ गईं। उसे समझ नहीं आया कि अग्नि आखिर उससे क्या पूछने वाला है।
और अग्नि…
वो भी शायद पहली बार अपने जीवन का सबसे असामान्य प्रस्ताव किसी के
सामने रखने जा रहा था।
क्रमशः…
💕 No Love Clause
कभी-कभी जिंदगी सबसे बड़ा सौदा वहीं रखती है, जहाँ इंसान सबसे ज्यादा मजबूर होता है।

Part 6
राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गया। कार का दरवाजा बंद होते ही बाहर की दुनिया की आवाजें जैसे अचानक उससे दूर हो गईं।
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर, विला चलें?”
अग्नि कुछ नहीं बोला।
उसकी नजर कार की खिड़की से बाहर टिकी थी। मुंबई की सड़कें हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से भाग रही थीं। कहीं ट्रैफिक में फँसी गाड़ियाँ थीं, कहीं सड़क किनारे भागते लोग, कहीं चमचमाती इमारतें और कहीं फुटपाथ पर अपनी जिंदगी समेटे बैठे लोग।
लेकिन अग्नि का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।
उसके दिमाग में सिर्फ एक शब्द घूम रहा था।
शादी।
उसने आँखें बंद कर लीं। उसे दादाजी की आवाज़ याद आ रही थी। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”
फिर उनकी दूसरी बात…
“तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”
आखिर ऐसा क्या था जिसे दादा जी उससे छिपा रहे थे?
वो फाइल… उसमें मौजूद वो अतिरिक्त हिस्सा…
और फिर उनका इतना आसानी से उसकी शर्त मान लेना।
अग्नि ने भौंहें सिकोड़ लीं। उसे आज अपने दादा जी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लग रहा था। वो उन्हें सालों से जानता और समझता था। दादा जी कभी किसी बात को इतनी आसानी से नहीं मानते थे।
खासकर तब…
जब बात राजावत परिवार और उसकी विरासत की हो।
लेकिन आज उन्होंने उसकी हर शर्त बिना किसी सवाल के स्वीकार कर ली थी।
“लड़की मैं खुद चुनूँगा।”
अग्नि के अपने ही शब्द उसके कानों में गूँज गए।
उसने आँखें खोलीं।
“सर?” ड्राइवर की आवाज़ सुनकर उसका ध्यान टूटा।
अग्नि, “बोलो!”
ड्राइवर ने पूछा, “विला चलना है?”
अग्नि कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसने बिना किसी भाव के कहा, “नहीं।”
ड्राइवर ने रियर-व्यू मिरर से उसकी तरफ देखा। “सर?”
अग्नि ने अपनी घड़ी पर नजर डाली। शाम के करीब साढ़े आठ बज रहे थे। उसने धीमे स्वर में कहा, “कार क्लब ले चलो”
ड्राइवर ने तुरंत सिर हिलाया। “जी सर।” कहकर उसने कार की दिशा बदल दी।
वहीं अग्नि ने अपने फोन से अपने दोस्त शुभम को भी क्लब आने का मैसेज कर दिया।
क्योंकि उसे पता था उसके सामने जो दुविधा अभी है उसका हल शुभम में बेहतर कोई नहीं दे सकता। क्योंकि उसके पास हर बात का सॉल्यूशन होता है।
कुछ देर बाद…
मुंबई के सबसे प्राइवेट और एलीट क्लबों में से एक के बाहर काली कार आकर रुकी। कार के रुकते ही एक स्टाफ मेंबर तुरंत आगे बढ़ा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।
अग्नि कार से बाहर निकला। ब्लैक शर्ट, ब्लैक ट्राउजर और उसके ऊपर पहना डार्क ब्लेजर…
उसके चेहरे पर वही ठंडा आत्मविश्वास था जिसके कारण राजावत ग्रुप में हर कोई उससे एक दूरी बनाकर रखता था।
क्लब का स्टाफ उसे देखते ही सतर्क हो गया। “Good evening, Mr. Rajawat.”
अग्नि ने सिर्फ़ हल्का-सा सिर हिलाया और अंदर चला गया। क्लब का माहौल हमेशा की तरह शांत लेकिन आलीशान था।
हल्की रोशनी… धीमा म्यूजिक…
बार के पीछे सजी महँगी शराब की बोतलें…
और शहर के कुछ बेहद प्रभावशाली लोग अपने-अपने ग्रुप में बैठे हुए थे, तो वहीं कुछ लड़के लड़कियां फ्लोर पर डांस कर रहे थे। कही छोटे छोटे कपड़े पहने लड़कियां गेस्ट को ड्रिंक सर्व कर रहे थे।
अग्नि की नजर किसी पर नहीं गई। वह सीधे अपने हमेशा वाले प्राइवेट लाउंज की तरफ बढ़ गया।
लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा खोला, “आ गया हमारा दूल्हा!” अंदर से आवाज आई।
अग्नि के कदम वहीं रुक गए। उसने सामने देखा।
शुभम उसका दोस्त सोफे पर आराम से बैठा हुआ था।
उसके हाथ में ड्रिंक थी और चेहरे पर हमेशा वाली शरारती मुस्कान।
अग्नि ने उसे घूरा। “बकवास बंद कर।”
शुभम ने मुस्कुराते हुए ग्लास उठाया।
“ये बकवास… बहुत ही जल्द हकीकत में बदलने वाली है मेरे दोस्त…।”
अग्नि अंदर आया और सामने वाले सोफे पर बैठ गया।
“बकवास मत कर।”
शुभम ने उसे गौर से देखा। “ कुछ बात है…?” अग्नि के फेस के रिएक्शन देखते ही वो समझ गया कि आज अग्नि के साथ कुछ तो अजीब है।
अग्नि ने कोई जवाब नहीं दिया।
शुभम ने अपना ग्लास टेबल पर रखा। “दादाजी से मिलने गया था ना?”
अग्नि ने बस सिर हिलाया।
“और?”
“वही शादी का मुद्दा।” अग्नि ने जवाब दिया।
शुभम ने गहरी साँस ली। “मुझे पता था।”
कुछ पल चुप्पी रही। फिर शुभम ने पूछा, “तो इस बार भी मना कर दिया?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “नहीं।”
शुभम की भौंहें ऊपर उठ गईं। “क्या?”
अग्नि ने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा, “मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ।”
शुभम के हाथ से ग्लास लगभग छूटते छूटते बचा। वो आँखें बड़ी किए अग्नि को देख रहा था। “तू?”
अग्नि ने उसे घूरा। “हाँ, मैं।”
शुभम, “तू सच में शादी करेगा?”
अग्नि, “क्यों? मैं इंसान नहीं हूँ क्या?”
शुभम हँस पड़ा। “नहीं… तू इंसान तो है। लेकिन पिछले पाँच सालों से तेरी बातें सुनकर मुझे शक होने लगा था।”
अग्नि ने आँखें बंद कर लीं। “शुभम…”
“ओके। ओके।” शुभम ने खुद को संभाला। “लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ?”
अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “दादा जी ने कुछ ऐसी बातें बताईं जिनके बाद मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।”
शुभम की मुस्कान गायब हो गई। “क्या बात है?”
“मैं अभी नहीं बता सकता।” अग्नि ने बताने से साफ इनकार कर दिया।
शुभम ने घूरा, “अग्नि…”
अग्नि ने सख्त लहजे में कहा, “मैंने कहा ना, अभी नहीं।”
शुभम ने उसकी आँखों में देखा। उसे समझ आ गया कि इस बार मामला सचमुच गंभीर है।
उसने बात बदलते हुए पूछा, “ठीक है। लेकिन एक बात बता… लड़की कौन है?”
अग्नि ने उसकी तरफ देखा। “कोई लड़की नहीं है।”
शुभम, “मतलब?”
अग्नि, “मैंने अभी तक किसी को चुना ही नहीं।”
शुभम ने हैरानी से कहा, “तो फिर शादी करेगा किससे?”
अग्नि ने धीमे स्वर में कहा, “ इसलिए ही तो तुझे यहाँ बुलाया है?”
शुभम उसकी बात समझने की कोशिश करने लगा। “मतलब? मेरा मैरिज breau नहीं है।”
अग्नि आगे झुक गया। “ उसकी जरूरत भी नहीं। देख, मुझे प्यार नहीं चाहिए। मुझे कोई ऐसी लड़की नहीं चाहिए जो मेरे पैसे, मेरे नाम या राजावत परिवार की जिंदगी का हिस्सा बनने के सपने देखे।”
“मुझे सिर्फ़ एक समझदार लड़की चाहिए। जो छह महीने के बाद अपनी जिंदगी में वापस चली जाए।”
शुभम कुछ पल उसे देखता रहा। फिर उसने धीरे से पूछा, “तू कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की बात कर रहा है?”
अग्नि की आँखों में हल्की-सी ठंडक उतर आई। “Exactly.”
शुभम कुछ सेकंड चुप रहा। फिर अचानक हँस पड़ा।
“तू पागल हो गया है!”
अग्नि ने उसे घूरा। “मुझे इसमें मजाक की कोई बात नहीं दिख रही।”
“मुझे दिख रही है।” शुभम ने हँसी रोकते हुए कहा, “तू शादी से इतना नफरत करता था कि अब तूने शादी को बिजनेस डील बना दिया।”
अग्नि ने बिना मुस्कुराए कहा, “मेरे लिए शादी हमेशा से एक डील ही थी।”
शुभम उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया। उसे मालूम था कि अग्नि शादी को लेकर इतना कठोर क्यों था।
उसने धीरे से पूछा, “और अगर वो लड़की तुझसे प्यार कर बैठी तो?”
अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं करेगी।”
शुभम, “तुझे इतना यकीन कैसे है?”
अग्नि कुछ पल शांत रहा। फिर बोला, “क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट में साफ लिखा होगा… छह महीने बाद कोई रिश्ता नहीं रहेगा।”
शुभम ने सिर हिलाया। ” चल मान लिया उसे प्यार नहीं भी हुआ लेकिन अगर तू प्यार कर बैठा तो?”
इस बार अग्नि चुप हो गया। कुछ सेकंड तक उसने कोई जवाब नहीं दिया।
फिर उसकी आवाज़ बेहद ठंडी थी। “ऐसा नहीं होगा।”
शुभम ने उसकी आँखों में देखा। “तुझे खुद पर इतना भरोसा है?”
अग्नि ने बिना झिझके कहा, “हाँ।”
शुभम हल्का-सा मुस्कुराया। “ठीक है… फिर देखते हैं छह महीने बाद कौन सही साबित होता है।”
अग्नि ने उसकी बा
त को नजरअंदाज कर दिया। उसने टेबल पर रखा अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर कई नोटिफिकेशन थे। उसने एक-एक करके उन्हें देखा।
फिर अचानक उसकी उंगली एक नाम पर जाकर रुक गई।
Veda Sharma.

Part 5
No love clause
अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”
विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,
“आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”
विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”
“तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।
“मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”
विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।
“और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”
कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।
फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”
अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”
“नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”
अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”
विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”
अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”
विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”
विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”
विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”
अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”
विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”
अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”
विक्रम जी “नहीं।”
अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”
विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”
अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”
विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”
अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”
विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”
फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”
अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”
अग्नि “मैं जानता हूँ।”
“नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”
अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”
विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।
बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”
अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”
उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”
फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,
“लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”
विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”
अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”
विक्रम जी, “हूँ?”
अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।
“तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”
विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”
अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।
उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।
छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।
विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।
उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।
अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।
अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।
जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।
अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।
“अग्नि…”
सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।
उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी।
उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”
अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,
“माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”
सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”
अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”
सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”
उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”
अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”
सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया।
“अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।
लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।
उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।
लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”
सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”
सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”
सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”
सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।
लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था।
वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।
ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”
अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़
एक ही बात घूम रही थी… शादी।
कहानी आगे जारी रहेगी।
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Part 4
No love clause
विक्रम राजावत ने गुस्से में कहा, “हमारे संस्कारों में सबसे पहले बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।”
अग्नि ने कहा, “ बड़े आशीर्वाद देने के लायक होते तो जरूर लेता।”उसकी ठंडी निगाहें सीधे विक्रम जी की आँखों में टिकी थीं।
कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।
कमरे में मौजूद बाकी लोगों को शायद अग्नि की यह बेबाकी बदतमीजी लग रही थी, लेकिन विक्रम राजावत उसे बस देखते रहे। उनके चेहरे पर गुस्सा जरूर था, मगर आँखों में कुछ और ही था, जिसे वहाँ मौजूद कोई भी पढ़ नहीं पाया।
आखिरकार उन्होंने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए कहा, “स्टडी में चलो। हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी है।” कहकर वो हाथ पीछे बांधे आगे बढ़ गए।
अग्नि ने एक पल के लिए उनकी तरफ देखा, फिर बिना कुछ कहे उनके पीछे चल पड़ा।
दोनों पहली मंजिल पर बनी स्टडी की तरफ बढ़ गए।
कुछ ही देर में विक्रम जी ने भारी लकड़ी का दरवाजा खोला और अंदर चले गए। अग्नि भी उनके पीछे कमरे में दाखिल हुआ।
राजावत मेंशन की बाकी जगहों की तरह यह कमरा भी बेहद आलीशान था, लेकिन इसमें दिखावे से ज्यादा एक अलग तरह की गंभीरता थी।
कमरे की एक पूरी दीवार पर लकड़ी की बनी खूबसूरत लाइब्रेरी थी। उसमें लगी लंबी-लंबी रैक में बिजनेस और मैनेजमेंट की किताबों से लेकर इतिहास, राजनीति, साहित्य और पुराने उपन्यास तक करीने से सजे हुए थे।
हर किताब अपनी जगह पर थी।
कुछ किताबों के किनारों पर हल्की धूल जरूर जमी थी, लेकिन उन्हें देखकर साफ पता चलता था कि इस कमरे में किताबें सिर्फ सजावट के लिए नहीं रखी गई थीं।
लाइब्रेरी के सामने एक बड़ी-सी आरामदायक विंग चेयर रखी थी, जिसके पास एक छोटा-सा लैम्प रखा हुआ था।
कमरे के बीचों-बीच गहरे रंग की लकड़ी की एक बड़ी मेज थी। उस पर कुछ जरूरी दस्तावेज, एक खुली हुई डायरी, चश्मे का केस और एक पुरानी चांदी की स्याहीदानी रखी थी।
कमरे की दूसरी दीवार पर राजावत परिवार की कई पुरानी तस्वीरें लगी थीं। एक तस्वीर में युवा विक्रम राजावत अपने बेटे के साथ खड़े थे।
दूसरी तस्वीर में उनकी पत्नी थीं।
और एक तस्वीर ऐसी भी थी जिसमें बहुत छोटा-सा अग्नि अपने दादा की उंगली पकड़े खड़ा था।
अग्नि की नजर अनायास उस तस्वीर पर चली गई।
कुछ पल के लिए उसके चेहरे की कठोरता गायब हुई।
वह तस्वीर…
उसकी जिंदगी के उन कुछ खूबसूरत पलों में से एक थी, जिन्हें वह चाहकर भी भूल नहीं पाया था।
विक्रम जी ने उसकी नजर तस्वीर पर जाते देख ली।
लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस धीरे से अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े।
अग्नि भी तस्वीर से नजर हटाकर उनकी तरफ देखने लगा।
कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर अग्नि धीरे-धीरे आगे बढ़ा। और अचानक…
वह झुक गया। उसने विक्रम राजावत के पैर छू लिए।
विक्रम जी कुछ पल के लिए बिल्कुल स्तब्ध रह गए।
शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अग्नि, जो कुछ सेकंड पहले तक उनसे इतनी नाराज़गी से बात कर रहा था, इस तरह उनके पैर छुएगा।
उनकी आँखों में अचानक नमी उतर आई। उन्होंने तुरंत अग्नि को उठाया और उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
“मेरा बच्चा…” उनकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था।
सिर्फ़ अपनापन था।
अग्नि ने भी आँखें बंद कर लीं। उस पल में वह राजावत ग्रुप का करोड़ों का मालिक या सख्त CEO नहीं था।
वह बस अपने दादा का पोता था।
वही बच्चा…
जो कभी उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था।
लेकिन अगले ही पल अग्नि के चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य हो जायेंगे। “ दादा जी, आप शादी करने के लिए मुझे ब्लैकमेल नहीं कर सकते। शादी करना या ना करना ये मेरा निजी फैसला है।”
अग्नि की बात सुनकर विक्रम जी के चेहरे के भाव गंभीर हो गए, वो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “कभी कभी हमें कुछ पहले लेने से पहले समय की नजाकत को देखना होता है।”
कहकर उन्होंने एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
अग्नि ने भौहें उचकाई, “ मैं आपकी शर्तें पढ़ चुका हूँ, बार बार मेरे सामने ये फाइल मत लाइए।”
विक्रम जी बोले, “ ये वो फाइल नहीं है, जो तुम समझ रहे हो।”
अग्नि के पहले विक्रम जी को देखा और फिर उनके हाथ में मौजूद फाइल को, फिर उसने वो फाइल अपने हाथों में पकड़ ली।
और चेयर खींचकर उसपर बैठ गया।
अग्नि ने फाइल अपने हाथों में ली और चेयर खींचकर उस पर बैठ गया। उसने फाइल को कुछ पल तक बिना खोले देखा।
फिर उसकी नजर अपने दादा जी पर गई। “अब इसमें और क्या है?”
विक्रम जी अपनी जगह खड़े रहे। “पहले पढ़ो।”
अग्नि ने हल्की-सी साँस छोड़ी और फाइल खोल दी।
पहले पन्ने पर वही वसीयत थी, जिसे वह पहले भी कई बार पढ़ चुका था। उसकी नजर तेजी से उन पंक्तियों पर दौड़ी। राजावत परिवार की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने के लिए अग्नि सिंह राजावत को अपने सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले विवाह करना अनिवार्य होगा।
अग्नि के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। “मैंने कहा था ना दादा जी… मैं ये सब पहले ही पढ़ चुका हूँ।”
विक्रम जी ने कोई जवाब नहीं दिया। अग्नि ने अगला पन्ना पलटा। फिर एक और फिर…
उसकी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।
उसके चेहरे पर आई हल्की-सी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“ये क्या है?”
विक्रम जी ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”
अग्नि ने फाइल से नजर उठाई। “ये हिस्सा पहले इस फाइल में नहीं था।”
विक्रम जी धीरे-धीरे उसके सामने रखी दूसरी चेयर पर जाकर बैठ गए। “क्योंकि तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।”
अग्नि की आँखें सिकुड़ गईं। “और अब पड़ गई?”
“हाँ।” कमरे में फिर खामोशी छा गई।
अग्नि ने उस पन्ने को दोबारा पढ़ा। उसमें वसीयत की संपत्ति से ज्यादा परिवार की कुछ जिम्मेदारियों और अधिकारों का उल्लेख था।
कुछ ऐसी बातें… जिन्हें पढ़कर अग्नि समझ गया था कि मामला सिर्फ़ पैसों का नहीं है। उसने फाइल बंद कर दी। “दादा जी, आप आखिर चाहते क्या हैं?”
विक्रम जी ने कुछ पल तक उसे देखा। “मैं चाहता हूँ कि तुम शादी करो।”
अग्नि ठंडी साँस छोड़ते हुए, “क्यों?”
विक्रम जी, “क्योंकि अब समय आ गया है।”
अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”
विक्रम जी चुप रहे
। अग्नि ने आगे झुककर कहा,
“आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”
कहानी आगे जारी रहेगी।
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Bound by Fate
भाग 3
राधे राधे दोस्तों ❤️
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अगली सुबह
सुबह के आठ बजे
खिड़की से आती सूरज की हल्की किरणें धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। कमरे में रात की खामोशी अब भी मौजूद थी।
तभी बेड पर लेटी लड़की के हाथों में हल्की-सी हरकत हुई। उसकी पलकों में कंपन हुआ। कुछ ही सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोल दीं। कमरे में अभी भी हल्का अंधेरा था, बस कमरे के पर्दों से छनकर आती सूरज की किरणें कमरे को हल्की रोशनी से भर रही थीं।
आंखें खुलते ही उसने छत की तरफ देखा। कुछ पल तक वह यूं ही देखती रही। फिर उसकी नजरें कमरे में घूमने लगीं। लेकिन उसे कुछ भी पहचान में नहीं आया।
वह कहां थी?
उसने उठकर बैठने की कोशिश की। लेकिन शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वह ठीक से बैठ भी नहीं पाई।
उसने दोबारा कोशिश की। इस बार किसी तरह उठकर बैठ गई।
उसका सिर भारी था। शरीर में दर्द था और गला बिल्कुल सूख रहा था। उसने अपने कपड़ों की तरफ देखा।
उसने जो लाल सूट पहना था…
वो अब वहां नहीं था।
उसकी जगह उसने एक मुलायम-सा ढीला कुर्ता पहन रखा था।
वो घबरा गई।
तभी…
दरवाजा खुला।
लड़की ने तुरंत नजरें उठाईं।
सामने दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।
वही आदमी…
जिसने पिछली रात उसे सड़क से उठाया था।
रूद्रांश शेखावत।
गेहुआं रंग… लगभग छह फुट दो इंच लंबा कद… गहरी नीली आंखें… शार्प जॉलाइन… हल्की बियर्ड… सख्त चेहरे की बनावट…
और चेहरे पर एक ऐसा अजीब-सा आकर्षण, जिससे नजरें हटाना आसान नहीं था।
उसका शरीर बेहद फिट था और उसकी पूरी personality में एक अलग ही रौब था।
वह जितना हैंडसम था…
उतना ही रहस्यमयी भी।
रूद्रांश की नजर जैसे ही लड़की पर पड़ी, उसने शांत स्वर में कहा,
“आखिर तुम होश में आ ही गईं।”
उसकी आवाज सुनकर लड़की का ध्यान टूटा। उसने घबराकर उसे देखा और अनजाने में ब्लैंकेट को अपनी मुट्ठियों में कस लिया।
रूद्रांश ने तुरंत ही उसकी घबराहट नोटिस कर ली। वह कुछ कदम आगे बढ़ा, लेकिन उससे उचित दूरी बनाकर रुक गया।
“हे, डरो मत।”
उसकी आवाज इस बार थोड़ी नरम थी।
“तुम यहां बिल्कुल सेफ हो।”
लड़की की आंखों में अब भी डर और उलझन थी।
उसने मुश्किल से अपनी आवाज निकाली।
“आ… आप कौन हैं?”
कुछ पल रुककर उसने पूछा,
“और मैं यहां कैसे आई?”
रूद्रांश के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“ये सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”
फिर वह बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला,
“लेकिन चलो… पहले मैं ही बता देता हूं।”
उसने लड़की की तरफ देखते हुए कहा,
“मेरा नाम रूद्रांश शेखावत है। शायद तुमने मेरा नाम सुना होगा।”
लड़की चुप रही।
रूद्रांश ने आगे पूछा,
“अब तुम बताओ… तुम कौन हो?”
वह कुछ पल चुप रही।
जैसे अपने ही नाम को याद करने की कोशिश कर रही हो।
उसके होंठ हिले।
“म… मेरा नाम…”
वह रुक गई।
उसने अपनी आंखें बंद कीं।
कुछ सोचने के बाद बहुत धीमी आवाज में बोली,
“ई… ईशानी…”
रूद्रांश के चेहरे के भाव सामान्य रहे।
“ओके…”
उसने सिर थोड़ा झुकाया।
“तो मिस ईशानी… कल रात तुम उस सुनसान सड़क पर अकेली क्या कर रही थीं?”
लेकिन उसकी तेज निगाहें ईशानी के चेहरे के भावों को परख रही थीं।
ईशानी का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी आंखों में बेचैनी फैल गई।
वह कुछ याद करने की कोशिश करने लगी।
लेकिन…
कुछ भी साफ याद नहीं आया।
सिर्फ धुंधली-सी तस्वीरें।
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
अचानक सिर में तेज दर्द उठा।
“आह…”
उसके मुंह से दर्द भरी आवाज निकली।
रूद्रांश तुरंत उठ खड़ा हुआ।
“रिलैक्स!”
उसने गंभीर लेकिन शांत आवाज में कहा,
“फिलहाल, कुछ याद करने की जरूरत नहीं है।”
ईशानी ने उसकी तरफ देखा।
रूद्रांश कुछ पल उसे देखता रहा।
उसे समझ आ गया कि मामला उसकी सोच से कहीं ज्यादा उलझा हुआ था।
वह अपनी जेब की तरफ हाथ ले गया।
सिगरेट निकालने वाला था…
लेकिन फिर रुक गया।
उसने सिगरेट वापस जेब में रख दी।
वो हमेशा ऐसा ही करता था।
जब कोई चीज उसे परेशान करती या कोई मामला उसकी समझ से बाहर होता, तो वह सिगरेट जला लेता था।
लेकिन आज…
पता नहीं क्यों, उसके सामने बैठी ये लड़की उसकी उस आदत को भी रोक रही थी।
रूद्रांश ने आखिरकार कहा,
“शायद तुमने काफी समय से ठीक से कुछ खाया नहीं, इसलिए मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ भिजवा रहा हूँ। उसके बाद तुम्हें दवाई भी लेनी है।”
कहकर वह कमरे से बाहर निकला और उसने दरवाजा भी बंद कर दिया।
ईशानी कुछ पल तक उसी दरवाजे को देखती रही।
फिर उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।
वह याद करने की कोशिश करने लगी।
कुछ…
बहुत धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में उभरने लगीं।
एक मंडप…
चारों तरफ लोग…
कोई उसका हाथ जबरदस्ती पकड़कर उसे खींच रहा था…
उसकी चीख…
किसी की तेज आवाज…
फिर अंधेरा…
और उसके बाद…
बारिश में भागती हुई वो खुद।
अचानक उसे किसी पुरुष की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी।
“तुम कहीं नहीं जा सकतीं!”
ईशानी का पूरा शरीर कांप उठा।
उसने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।
एक पल के लिए उसे किसी के हाथ में चमकती हुई अंगूठी दिखाई दी…
फिर लाल रंग…
बहुत सारा लाल रंग…
और उसके कानों में किसी लड़की के रोने की आवाज गूंजने लगी।
लेकिन इससे पहले कि वह उस आवाज को पहचान पाती, सब कुछ फिर से धुंधला हो गया।
ईशानी ने अचानक आंखें खोल दीं।
उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।
उसने अपने सीने पर हाथ रखा।
दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।
उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
“मैं…”
उसकी आवाज कांप रही थी।
“मैं किसी से भाग रही थी…”
वह कुछ पल के लिए चुप हुई।
फिर उसकी आंखों में डर उतर आया।
“लेकिन किससे?”
उसने अपना सिर पकड़ लिया।
“और… क्यों?”
कमरे में उसकी कांपती आवाज गूंजकर रह गई।
उसे नहीं पता था कि उसकी यादों में छिपा सच उसकी जिंदगी को दोबारा तोड़ने वाला था…
या फिर उसी सच की वजह से उसे एक ऐसा
रिश्ता मिलने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी।
लेकिन एक बात तय थी…
उसकी याददाश्त में छिपा हर राज उसे धीरे-धीरे उसी रात की तरफ ले जाने वाला था।
और उस रात से जुड़ा एक नाम…
शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बनने वाला था।
रूद्रांश शेखावत।
क्या रूद्रांश और ईशानी की ये मुलाकात महज एक इत्तेफाक थी…
या तकदीर ने दोनों को एक-दूसरे से मिलाने के लिए ये खेल रचा था?
जानने के लिए पढ़िए Bound by Fate ❤️
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भाग 2
राधे राधे दोस्तों ❤️
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करीब एक घंटे बाद…
गाड़ी एक बड़े और आलीशान विला के सामने आकर रुकी।
गाड़ी की हेडलाइट पड़ते ही सामने खड़ा गार्ड तुरंत चौकन्ना हो गया और उसने विला का बड़ा-सा गेट खोल दिया।
गाड़ी अंदर दाखिल हुई और कुछ ही सेकंड बाद पोर्च में जाकर रुक गई। बारिश अब भी तेज थी। ड्राइवर तुरंत बाहर निकला और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला।
रूद्रांश गाड़ी से बाहर आया। उसकी नजर लड़की पर गई। वह अब भी बेहोश थी। चेहरा हल्का पीला पड़ चुका था। होंठ सूख गए थे और भीगे हुए कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।
रूद्रांश ने बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाहों में उठा लिया।
तभी पास खड़े एक नौकर ने हैरानी से पूछा, “सर… ये कौन हैं?” क्योंकि आजतक कभी किसी ने रुद्रांश के साथ किसी लड़की को नहीं देखा था।
रूद्रांश ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “फालतू सवाल मत पूछो। जल्दी जाकर दरवाजा खोलो।”
नौकर तुरंत दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया। रूद्रांश लड़की को लेकर अंदर चला गया। विला अंदर से बेहद शानदार था।
ऊंची छतों से लटकते खूबसूरत झूमर, सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श, दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स और सलीके से सजाया गया विशाल हॉल…
हर चीज रूद्रांश की हैसियत की कहानी बयां कर रही थी।
लेकिन इस वक्त उसे इनमें से किसी चीज की परवाह नहीं थी।
वह सीधे सीढ़ियों से ऊपर गया और एक कमरे का दरवाजा खोलकर लड़की को बेड पर लिटा दिया। पीछे आया नौकर दरवाजे पर ही रुक गया। “साहब… डॉक्टर को बुला दूं?”
रूद्रांश ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा, “हां। और जल्दी।”
“जी, साहब।” नौकर तुरंत वहां से चला गया।
कमरे में अब सिर्फ रूद्रांश और वो अनजान लड़की थे। रूद्रांश कुछ पल तक उसे देखता रहा।
उसने अपने गीले बालों पर हाथ फेरा और फिर अपना जैकेट उतारकर पास रखी कुर्सी पर डाल दिया।
उसकी नजर लड़की के चेहरे पर टिक गई। “तुम आखिर हो कौन?”
उसने धीमे से कहा। लेकिन सामने लेटी उस लड़की के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।
या शायद… उस जवाब तक पहुंचने के लिए रूद्रांश को उसकी जिंदगी के कई बंद दरवाजे खोलने पड़ने वाले थे।
और उसे अभी ये अंदाजा भी नहीं था कि जिस लड़की को वह आज रात सिर्फ इंसानियत के नाते अपने घर लेकर आया है… वही लड़की बहुत जल्द उसकी पूरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत…
और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली है।
फिर उसने कॉरिडोर में रेलिंग के पास खड़े होकर अपने विला में काम कर रही एक फीमेल हाउस हेल्प को आवाज लगाई। “जेनिफ़र!”
आवाज पूरे हॉल में गूंजी। कुछ ही सेकंड में एक अधेड़ उम्र की महिला तेजी से वहां पहुंची।
वो जेनिफ़र थी। पिछले कई सालों से वो रूद्रांश के विला में काम कर रही थी और उसे अच्छी तरह जानती थी।
“जी, सर?”
रूद्रांश ने कहा, ” जल्दी से मेरे रूम में आओ और उस लड़की के कापड़े चेंज कर दो। “
जेनिफर तुरंत ऊपर आ गई।
फिर वह कुछ पल के लिए रुका और क्लोसेट की तरफ बढ़ गया।
उसने वहां से अपना एक ढीला-सा कुर्ता निकाला और जेनिफ़र की तरफ बढ़ा दिया। “ये पहना देना।”
जेनिफ़र ने तुरंत कुर्ता ले लिया। उसकी नजर अब लड़की पर थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और ठंड की वजह से उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था।
जेनिफ़र ने ध्यान से देखा तो उसकी कलाई पर चोट के गहरे निशान नजर आए।
गर्दन के पास भी खरोंचें थीं। चेहरे पर चोट के हल्के निशान अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहे थे।
जेनिफ़र के चेहरे पर चिंता उभर आई।
उसे देखकर साफ लग रहा था कि इस लड़की ने सिर्फ बारिश में रात नहीं बिताई थी…
बल्कि वो किसी बहुत बुरे दौर से गुजरकर यहां तक पहुंची थी।
जेनिफ़र ने बिना कोई सवाल किए जल्दी से उसके कपड़े बदल दिए और बाहर चली गई।
तब तक रूद्रांश भी अपने कपड़े बदल चुका था। कुछ देर बाद… रूद्रांश कमरे में वापस आया।
वह बेड के सिरहाने जाकर बैठ गया और सामने लेटी लड़की को गौर से देखने लगा।
अब वह पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी। गोरा रंग… बड़ी-बड़ी आंखें, जिन पर घनी और लंबी पलकें थीं… गुलाबी होंठ… और निचले होंठ के ठीक नीचे एक छोटा-सा तिल।
छोटी-सी नाक, जिसमें एक नन्ही-सी नोज पिन चमक रही थी। वो लड़की किसी मासूम-सी तस्वीर की तरह लग रही थी।
रूद्रांश की नजर कुछ पल उसके चेहरे पर ठहर गई।
उसे खुद समझ नहीं आया कि वह इस अनजान लड़की को इतनी गौर से क्यों देख रहा था। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी।
खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पैदा कर रही थी। कमरे में जल रही हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
चेहरा बेहद मासूम था…
लेकिन उन बंद आंखों के पीछे जैसे कोई बहुत गहरा राज छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर भी वहां पहुंच गए।
रूद्रांश तुरंत उठकर एक तरफ हो गया। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और लड़की की जांच शुरू कर दी।
उन्होंने उसकी नब्ज चेक की। फिर उसकी कलाई, गर्दन और चेहरे पर मौजूद चोटों को ध्यान से देखा।
रूद्रांश की गहरी नजरें लगातार डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।
जैसे वह डॉक्टर की हर बात से इस लड़की के बारे में कुछ समझ लेना चाहता हो।
कुछ देर जांच करने के बाद डॉक्टर ने गहरी सांस ली।
“मिस्टर शेखावत…”
रूद्रांश की नजरें डॉक्टर पर टिक गईं। “क्या हुआ है इसे?”
डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, “ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के साथ काफी ज्यादती हुई है। इसके शरीर पर कई जगह चोटों के निशान हैं। कुछ चोटें पुरानी हैं और कुछ बिल्कुल ताजा।”
रूद्रांश की आंखों में अचानक गुस्सा उतर आया।
उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
डॉक्टर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि ये लड़की किसी बहुत बड़े सदमे से गुजरी है। इसी वजह से इसकी हालत ऐसी है।”
रूद्रांश की नजर एक बार फिर लड़की पर चली गई।
उसका मासूम चेहरा देखकर उसके जबड़े कस गए।
डॉक्टर कुछ पल रुके और फिर बोले, “और एक बात…”
रूद्रांश ने उनकी तरफ देखा। “इसे शायद कई घंटों से कुछ भी खाने को नहीं मिला है। शरीर में काफी कमजोरी है। इसी वजह से ये बेहोश हुई होगी।”
डॉक्टर ने अपने बैग से एक इंजेक्शन निकाला। “मैंने इसे इंजेक्शन दे दिया है। उम्मीद है कि सुबह तक इसे होश आ जाएगा।” फिर उन्होंने कुछ दवाइयां निकालकर रूद्रांश की तरफ बढ़ा दीं। “होश में आने के बाद इसे कुछ हल्का और पौष्टिक खाना दीजिएगा। और ये दवाइयां समय पर देनी होंगी।”
रूद्रांश ने बिना कुछ कहे सारी दवाइयां ले लीं।
डॉक्टर अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चले गए।
दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।
रूद्रांश धीरे से बेड पर बैठ गया।
लड़की की सांसें अब पहले से थोड़ी सामान्य थीं।
उसका चेहरा अभी भी पीला था और माथे पर हल्की शिकन थी।
जैसे नींद में भी कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो।
रूद्रांश कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर धीमी आवाज में बोला, “आखिर हो कौन तुम?”
कोई जवाब नहीं आया। उसने उसकी तरफ देखते हुए दोबारा कहा, “और किसने तुम्हें इस हालत में पहुंचाया?”
खामोशी…
बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी। रात और गहरी हो गई थी। रूद्रांश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली।
उसने सिगरेट होंठों के बीच रखी और लाइटर निकालने ही वाला था कि एक पल के लिए उसकी नजर सामने सो रही लड़की पर गई।
कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर उसने सिगरेट वापस अपनी जेब में रख ली।
शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों किया।
रूद्रांश उठकर सोफे पर जाकर
वह इस अनजान लड़की के बारे में सोचता रहा।
लेकिन कब उसकी आंखें लग गईं…
उसे खुद पता नहीं चला।
कहानी आगे जारी रहेगी…🙏🏻

भाग 2
दिन के करीब बारह बजे…
वेदा अभी भी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। पूरी रात की जागी हुई आँखें लाल हो चुकी थीं।
उसके हाथ में विहान की मेडिकल रिपोर्ट थी और दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था, एक करोड़ बीस लाख… आएँगे कहाँ से? उसके पास तो कोई सेविंग तक नहीं है क्योंकि सब पैसे घर के खर्चों में, रेंट के और विहान की दवाइयों में ही लग जाते थे।
वो गहरी सोच में बैठी थी…तभी उसके सामने एक कॉफी का कप आकर रुका। “पकड़…”
वेदा ने सिर उठाया। “अपर्णा…” उसकी आवाज में नमी थी।
अगले ही पल वह उठकर अपनी सबसे अच्छी दोस्त के गले लग गई। जो आँसू अब तक उसने खुद में कैद कर रखे थे, वे अपर्णा के कंधे पर सिर रखते ही बह निकले।
अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलाई। “सब ठीक हो जाएगा… यार “
वेदा हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कुराहट ऐसी थी जैसे वो खुद पर हँस रही हो। “झूठ बोलना आज भी नहीं आया तुझे…”
कहते हुए उसने अपर्णा को देखा।
फिर दोनों कुर्सी पर बैठ गई। अपर्णा भी फीकी-सी मुस्कुराई। “ झूठ बोलने से तसल्ली तो मिलती है , अगर सच बोल दूँ तो तू और टूट जाएगी… ना यार।”
अपर्णा ने वेदा के कंधे को सहलाते हुए कहा।
उसके बाद दोनों कुछ देर चुप रहीं। फिर अपर्णा ने धीरे से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”
वेदा ने काँपते हाथों से रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।
अपर्णा ने जैसे-जैसे रिपोर्ट पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया।
“ यार ये तो… खर्चा कितना आएगा?”
उसने दबी हैरानी भरी आवाज में पूछा।
वेदा काँपते होंठों से, “एक करोड़ बीस लाख…!”
अपर्णा, “ क्या…? एक करोड़ बीस लाख…?”
वेदा ने बस सिर झुका दिया। “मेरे पास सिर्फ़ बीस दिन हैं, अपर्णा।”
“मैंने बैंक में बात की… लोन नहीं मिलेगा। माँ के इलाज में पहले ही सब कुछ बिक चुका है। रिश्तेदार हैं नहीं… और जिन लोगों को जानती हूँ, उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई भी इतनी नहीं होगी कि…”
कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी।
अपर्णा कुछ पल सोचती रही। अचानक उसे कुछ याद आया। “सुन…”
वेदा ने उसकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा, “हम HR से बात करते हैं। कंपनी की एम्प्लॉयी मेडिकल लोन पॉलिसी है ना… शायद कोई रास्ता निकल आए।”
अपर्णा की बात सुनकर वेदा को कुछ उम्मीद जागी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपर्णा की तरफ देखा। “हाँ… कम्पनी में ये पॉलिसी है तो सही। लेकिन रकम बहुत बड़ी है।”
अपर्णा ने उसे हिम्मत दी, “ कोशिश करके तो देख सकते हैं, वैसे भी तू कोई मामूली पोस्ट पर नहीं है। तू बॉस की सेक्रेटरी है।”
वेदा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “चल… एक बार कोशिश करके देख लेते हैं। अगर किस्मत ने साथ दिया तो शायद…”
अपर्णा तुरंत उठ खड़ी हुई। “बस यही हुई ना मेरी शेरनी वाली बात। चल, अब देर मत कर।”
दोनों अस्पताल से बाहर निकल आईं।
——–
वहीं दूसरी तरफ अग्नि सिंह राजावत अपनी आलीशान और लग्जरी केबिन में अपनी लेदर की चेयर पर बैठा हुआ था।
उसकी नजर सामने टेबल पर रखी फाइल पर टिकी थी।
तभी उसके केबिन का डोर नॉक हुआ।
और अगले ही पल दरवाजा खुला और अंदर अग्नि का मैनेजर निशांत आया।
उसके हाथ में एक फाइल थी जिसपर उसे अग्नि के अर्जेंट साइन चाहिए थे।
“ सर इस फाइल पर आपके साइन चाहिए।” उसने अग्नि के सामने फाइल रखते हुए कहा।
अग्नि ने फाइल पढ़ी और उसपर अपने साइन कर दिए फिर जैसे ही निशांत जाने लगा,
“ वेदा को बोलो मेरे केबिन में आए।”
अग्नि ने कहा।
(असल में वेदा, अग्नि की कम्पनी में ही जॉब करती है और उसकी ही सेक्रेटरी है।)
ये सुनते ही निशांत के चेहरे पर हल्की सी घबराहट आ गई। क्योंकि उसे पता था कि वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई और उसने इसका रीजन भी कुछ नहीं बताया।
निशांत के चेहरे पर आई घबराहट अग्नि की तेज़ नज़रों से छिप नहीं सकी।
अग्नि ने फाइल से नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”
निशांत, “स… सर… वो…”
“Speak.” उसने सख्त लहजे में कहा।
निशांत बोला, “सर, मिस वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई हैं।”
यह सुनते ही अग्नि का चेहरा और सख्त हो गया।
“ What…! Nonsense…” उसने तेज आवाज में कहा। “ दोपहर के बारह बजने को आए हैं और तुम मुझे ये अभी बता रहे हो कि वो ऑफिस नहीं आई।”
“ सर मुझे लगा आपको पता होगा क्योंकि वो सुबह सबसे पहले आकर आपको ही रिपोर्टिंग करती है।” निशांत ने कहा।
उसकी बात सुनकर अग्नि को एहसास हुआ कि निशांत सही कह रहा है। वेदा उसकी सेक्रेटरी है और वो सुबह से उसके पास एक बार भी नहीं आई। तभी उसे महसूस हुआ कि सुबह से उसके केबिन में असामान्य-सी खामोशी थी। उसकी रोज़ की ब्रीफिंग भी नहीं हुई थी।
उसने दो फिंगर उठाकर निशांत को जाने का इशारा किया। निशांत तुरंत ही केबिन से बाहर चला गया।
वहीं अग्नि सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो वेदा ऑफिस नहीं आई और उसने किसी को इनफॉर्म भी नहीं किया।
वो सोच ही रहा था तभी बिना किसी सूचना के उसके केबिन का डोर खुला।
अग्नि की आंखों में ये देख गुस्सा उतरा ही था तभी उसकी नजर सामने गई जहाँ उसका बचपन का दोस्त शुभम खन्ना खड़ा हुआ था।
उसे देख अग्नि ने अपनी आँखें बंद कर ली जैसे अपना गुस्सा शांत करने की कोशिश कर रहा हो।
शुभम, “ क्या यार ऐसी सड़ी सी शक्ल बनाकर क्यों बैठा हुआ है?”
उसने कुर्सी खींचते हुए कहा। और फिर पूरे एटिट्यूड के साथ बैठ गया।
अग्नि ने अपनी नीली आंखों से उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और बोला, “ तुझे कोई काम वाम नहीं है क्या ? जो यहाँ टाइम पास करने चला आया।”
शुभम ने आराम से कुर्सी पर पैर चढ़ाते हुए कहा, “काम ही तो है, तभी आया हूँ। वरना तेरी शक्ल देखने का शौक मुझे भी नहीं है।”
अग्नि ने भौंहें चढ़ाईं। “जो कहना है, जल्दी बोल। मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।”
“अरे बाबा… इतना गुस्सा किस बात का? सुबह-सुबह किसने तेरे कॉफी मग में ज़हर मिला दिया?”
अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम…”
“ओके… ओके…” शुभम ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। “सीरियस हो जाता हूँ।”
उसने कुछ पल तक अग्नि को गौर से देखा। फिर बोला,
“अब बता भी दे… बात क्या है? तेरे चेहरे पर साफ़ लिखा है कि अंदर कुछ चल रहा है।”
अग्नि अपनी कुर्सी से उठकर केबिन की काँच की दीवार के सामने जाकर खड़ा हो गया। नीचे भागती हुई मुंबई की सड़कें दिखाई दे रही थीं, लेकिन उसकी नज़र कहीं और ही खोई हुई थी।
कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,
“आज शाम दादाजी ने मुझे राजावत मेंशन बुलाया है।”
शुभम ने सहज भाव से पूछा, “कोई खास बात?”
अग्नि हल्का-सा हँसा, लेकिन उस हँसी में व्यंग्य था। “खास… बहुत खास।”
“मुझे पूरा यकीन है कि आज फिर वही पुराना मुद्दा उठेगा…”
“शादी।”
शुभम ने गहरी साँस छोड़ी। उसे पहले से अंदाज़ा था कि बात आखिर इसी तरफ जाएगी। “तो इस बार क्या सोच रखा है?”
अग्नि की आँखों में ठंडक उतर आई। “जो भी होगा… मेरी शर्तों पर होगा।”
उसने मुड़कर शुभम की तरफ देखा। “मैं किसी रिश्ते में बंधने नहीं जा रहा…”
“अगर शादी करनी भी पड़ी… तो सिर्फ़ एक समझौता होगी, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।”
शुभम ने महसूस किया कि अग्नि के मन में शादी के लिए नफरत पहले से भी गहरी हो चुकी थी।
उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। उसे पता था…
अग्नि जब तक खुद न चाहे, उसके दिल की दीवारें कोई नहीं तोड़ सकता।
क्रमशः
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और मैं यहां नई हूँ, इसलिए मुझे यहाँ का थोड़ा समझने में प्रॉब्लम हो रही है और कमेंट सेक्शन भी नहीं दिखा
अगर हो तो कमेंट भी जरूर कीजिएगा।
भाग~18 इमोशन्स का बीमा
पंजीकरण कार्यालय की उस सफ़ेद, ठंडी दीवारों वाली बिल्डिंग में ~भी उस वक़्त एक अजीब सी गर्माहट फैल गई थी, जब रुहानी के हाथों में काग़ज़ का वो पुलिंदा रखा गया – अद्वैत द्वारा तैयार किया गया विवाह अनुबंध।
बाहर हल्की धूप थी, अंदर ट्यूब लाइट की सफेद रौशनी और दोनों के बीच कुछ ऐसा था जो रौशनी से ज़्यादा कुछ कहता था…. एक मौन संवाद।
रुहानी के हाथ काँपते नहीं रहे थे, पर उसकी आँखें एक-एक शब्द पर रुकती चली जा रही थीं, जैसे कोई मन के अंदर झाँकने का हक़ मांग रहा हो।
उसके सामने अद्वैत खड़ा था, एकदम शांत, जैसे उसने अपने भीतर की हर हलचल को ताले में बंद कर रखा हो। वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस रुहानी के चेहरे को पढ़ रहा था…. उसकी हर मरोड़, हर रुकावट, हर सांस की गहराई को।
उधर रुहानी, एक-एक शब्द पढ़ती जा रही थी…..
विवाह अनुबंध-पत्र (Contract Marriage Agreement)
(स्वतंत्रता, सीमाओं और गोपनीयता के स्पष्ट निर्देशों सहित)
पक्ष 1:
नाम: अद्वैत अवस्थी
उम्र: 28 वर्ष
पेशा: लेखक एवं सामाजिक वक्ता
निवास: विमान नगर, पुणे
पक्ष 2:
नाम: रुहानी चौहान
उम्र: 24 वर्ष
पेशा: स्वतंत्र वस्त्र डिज़ाइनर
निवास: हडपसर, पुणे८
स्पष्ट और पारदर्शी शर्तें: (Clear and Transparent Terms)
1. यह विवाह केवल एक सामाजिक औपचारिकता है, जो एक वर्ष तक सीमित रहेगा।
2. यह विवाह दिखावे का है, लेकिन इ⁹सके बावजूद किसी भी प्रकार के अतिरिक्त विवाहिक संबंध (extra-marital affair) की अनुमति नहीं होगी।
3. दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे। कोई भी पक्ष बिना पूर्व अनुमति के दूसरे के निजी स्थान में प्रवेश नहीं करेगा।
4. शारीरिक संपर्क केवल सार्वजनिक मौकों पर “विवाहित जोड़े” की छवि बनाए रखने के लिए सीमित होगा, और वह भी केवल सामाजिक मर्यादाओं के भीतर।
5. अनुबंध की अवधि में किसी भी प्रकार की शारीरिक निकटता की कोई अनिवार्यता नहीं होगी। न कोई अपेक्षा, न कोई ज़ोर।
6. यह स्पष्ट रूप से समझा जाता है कि “दिल लगाना मना है” (falling in love is not allowed)…… किसी भी भावनात्मक जुड़ाव की कोई ज़रूरत या बाध्यता नहीं है।
7. कोई भी inappropriate या असहज करने वाला स्पर्श, शब्द या व्यवहार इस अनुबंध का उल्लंघन माना जाएगा।
8. दोनों अपने-अपने पेशेवर जीवन में पूर्ण स्वतंत्र रहेंगे। कोई भी एक-दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करेगा, न आलोचना, न सलाह बिना माँगे।
9. दोनों को अपने सामाजिक, व्यक्तिगत और मानसिक क्षेत्र में स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है।
10. इस अनुबंध की जानकारी एक सीमित दायरे तक ही रखी जाएगी: सिर्फ अद्वैत, रुहानी, उनके वकील और मैनेजर तक।
11. यदि इस अनुबंध की कोई भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो यह समझा जाएगा कि अनुबंध समाप्त हो चुका है। फिर दोनों पक्ष एक-दूसरे से पूर्णतः अजनबी हो जाएंगे, और इस शर्त के उल्लंघन करने वाले को किसी भी तरह की कोई बात करने का अधिकार नहीं होगा।
हस्ताक्षर:
पक्ष 1 (अद्वैत अवस्थी): _______________
पक्ष 2 (रुहानी चौहान): _______________
विधिक सलाहकार: _______________
तिथि: _______________
रुहानी ने अनुबंध के पहले कुछ खंडों को पढ़ते हुए महसूस किया कि यह किसी और दुनिया का समझौता था। यह अनुबंध उससे दूर था, फिर भी जैसे वह खुद को इसमें बांधने जा रही हो।
“दोनों के कमरे अलग-अलग होंगे… दिल लगाना मना है… कोई भी शारीरिक निकटता अनुबंध का हिस्सा नहीं होगी…” जैसे हर शब्द उसकी सोच में एक छोटी सी सुई चुभो रहा हो, मगर दर्द की जगह एक अजीब किस्म की ठंडक भर रही थी।
“कमाल है…” उसने हल्की सी हँसी में फुसफुसाया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे, “तुमने तो हर इमोशन का बीमा करवा लिया है इस कॉन्ट्रैक्ट में।”
अद्वैत ने पहली बार पलकें झपकाईं, फिर बहुत धीरे से कहा, “इमोशन्स ही तो सबसे ज़्यादा नुकसान करते हैं और मुझे अब कोई भी नुकसान नहीं चाहिए।”
रुहानी आगे पढ़ी। अगली शर्त थी….‘पब्लिक प्लेस में साथ दिखना होगा, पर कोई भी स्पर्श मर्यादित रहेगा। सिर्फ़ दिखावे के लिए।’
“मतलब… हमें भीड़ में हाथ पकड़ना होगा, पर एक छत के ही नीचे होने पर कोई स्पर्श नहीं होगा?” उसकी आवाज़ में एक टुकड़ा था…न गुस्से का, न दुःख का… बस एक उलझा हुआ विस्मय।
अद्वैत ने सिर झुकाया, जैसे मान लेना चाहता हो कि हाँ, ये सब शायद असहज है, पर है ज़रूरी।
“ये सब ज़रूरी है, रुहानी,” उसने नज़रों को दूर खिड़की की दिशा में टिकाते हुए कहा, “मेरे करियर की एक धारणा है, जो टूटी तो सब बिखर जाएगा। मुझे अपने शब्दों को बचाना है… और अब… अपना चेहरा भी।”
रुहानी की आँखें कुछ पल के लिए अद्वैत की आंखों पर टिक गईं, जैसे उसकी पुतली में कोई अनकहा डर देख रही हों। फिर वो बोली, धीरे, लेकिन बिलकुल साफ़…. “मेरे लिए भी तो ज़रूरी है अब ये सब। पापा के मेरी मर्ज़ी के खिलाफ, जबरदस्ती उनकी पसंद के दकियानूसी सोच वाले इंसान से शादी करने से तो ये झूठी शादी ही सही… कम से कम यहाँ मेरी रज़ामंदी तो है और वैसे भी मुझे भी तो अपने प्रोफेशन में सेटल होने के लिए वक्त चाहिए।”
उसके शब्दों में आंसू नहीं थे, लेकिन आवाज़ जैसे किसी जले हुए पत्ते पर चल रही थी… खुरदरी, सूखी, फिर भी सच्ची। अद्वैत ने उसे गौर से देखा, पहली बार जैसे उसकी मजबूरी की असल शक्ल को पहचाना हो। कमरा कुछ देर के लिए सांस लेना भूल गया था।
रुहानी ने आख़िरी पन्ने पर दस्तख़त करने से पहले काग़ज़ को हल्के से मोड़ा, जैसे कोई किताब के किसी अधूरे अध्याय को दबा कर रख देता है… ताकि कोई और उस अधूरेपन को महसूस न कर पाए।
रजिस्टार ने दोनों से कहा, “अब आप दोनों एक दूसरे को वरमाला पहनाएं ताकि यह पूरी प्रक्रिया असली शादी जैसा लगे।” कमरे में खामोशी छा गई। अद्वैत और रुहानी एक दूसरे को देखते रहे, जैसे दोनों एक अजीब सी स्थिति में फंसे हों। उनकी आँखों में सवाल था, न जाने कितना कुछ कहना चाहते थे, पर शब्द नहीं मिल रहे थे।
अद्वैत की आँखों में कुछ छिपा हुआ था, जैसे वह खुद को इस पल से बाहर निकालने का रास्ता ढूँढ़ रहा हो। रुहानी ने धीमे से कहा, “हम दोनों खुद ही माला पहन लेते हैं,” और अद्वैत ने भी हामी भरी, मानो वह इस छोटी सी समझौते में अपने कर्तव्यों से बाहर आना चाहता हो।८
वकील ने कहा, “जैसा आप दोनों चाहें, वैसा ही सही,”
फिर दोनों ने बिना किसी और शब्दों के खुद के गले में माला डाल दी. वकील की मंजूरी के बाद, जब वे कमरे से बाहर निकले, तो रुहानी का छोटा भाई यश वहाँ खड़ा था।
जैसे ही उसने रुहानी को देखा, खुशी से दौड़ते हुए उसके गले लग गया और बोला, “अब पापा की जबरदस्ती किसी और जगह शादी नहीं कर पाएंगे, मैं बहुत खुश हूं आपके लिए।” उसका चेहरा जैसे किसी छोटे बच्चे की खुशी से भर गया हो, और रुहानी के मन में एक हल्की सी राहत महसूस हुई।
अद्वैत ने चुपचाप देखा, मानो वह इस नये रिश्ते में खुद को थोड़ा और खोता जा रहा हो, पर उसकी आँखों में कोई अजीब सी गहराई थी, जैसे वह इस रिश्ते के बारे में बहुत कुछ सोच रहा हो।
यश खुशी से अद्वैत के पास आकर बोला, “जीजाजी तो बोल सकता हूं न अब आपको, चलिए मेरे साथ मेरे पापा के घर, अब पापा भी जान जाएंगे कि रूहानी दीदी की शादी हो गई है तो अब सब ठीक हो जाएगा।” यश की आवाज में उम्मीद और राहत थी, जैसे उसने किसी बड़े संकट से निकलने का रास्ता पा लिया हो।
लेकिन अद्वैत और रूहानी एक दूसरे को प्रश्नवाचक नजरों से देखकर उस बात पर चुप रहे। उनके दिलों में अनकहे सवाल थे…..क्या सच में सब ठीक हो जाएगा?
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क्या ये अनुबंध दोनों के लिए यह एक ऐसा चक्रव्यूह बन जाएगा, जिसमें वे खुद ही फंसते चले जाएंगे?
अद्वैत और रुहानी के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी, जो टूटेगी या फिर और मजबूत होगी?
क्या वे सच में अपनी इच्छाओं और डर से बच पाएंगे, या यह शादी उन्हें उन भावनाओं के सबसे करीब ले आएगी, जिनसे बचने के लिए उन्होंने ये अनुबंध किया था?