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बारिश में मिला राजकुमार

पढ़ने का समय : 8 मिनट

बारिश में मिला राजकुमार 

 

बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य के राजकुमार आदित्य अपनी समझदारी और अच्छे स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें नई-नई जगहें देखना और अलग-अलग लोगों से मिलना बहुत पसंद था। एक दिन वे अपने कुछ सैनिकों के साथ पड़ोसी राज्य की यात्रा पर निकले। रास्ता लंबा था और बीच में घना जंगल पड़ता था।

 

सुबह मौसम बिल्कुल साफ था। ठंडी हवा चल रही थी और पक्षियों की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज रही थी। आदित्य घोड़े पर बैठे रास्ते का आनंद ले रहे थे। लेकिन दोपहर होते-होते अचानक आसमान का रंग बदल गया। काले बादल चारों ओर फैल गए। तेज हवा चलने लगी और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

 

बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में रास्ता कीचड़ से भर गया। घोड़ों का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

 

आदित्य ने सैनिकों से कहा,

“पास में कोई सुरक्षित जगह ढूंढो, वरना रात यहीं जंगल में बितानी पड़ेगी।”

 

थोड़ी दूर उन्हें एक छोटा-सा मिट्टी का घर दिखाई दिया। घर गांव के आखिरी छोर पर था। उसके आसपास दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं था।

 

आदित्य घोड़े से उतरे और दरवाजे पर दस्तक दी।

 

कुछ पल बाद एक बुजुर्ग किसान ने दरवाजा खोला।

 

“कौन है बेटा?”

 

आदित्य ने हाथ जोड़कर कहा,

“हम मुसाफिर हैं। बारिश बहुत तेज है। अगर एक रात के लिए अपने घर में जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”

 

बुजुर्ग मुस्कुराए।

 

“अरे बेटा, मेहमान को मना थोड़ी किया जाता है। अंदर आ जाओ।”

 

उन्होंने आदित्य और उनके दो साथियों को अंदर बुला लिया। बाकी सैनिक पास की एक पुरानी सराय में चले गए।

 

घर बहुत छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा था। मिट्टी का आंगन, एक छोटा-सा चूल्हा और दीवारों पर टंगे मिट्टी के बर्तन पूरे घर को अपनापन दे रहे थे।

 

तभी एक लड़की पानी का लोटा लेकर आई।

 

उसका नाम गौरी था। वह किसान की इकलौती बेटी थी।

 

उसने मुस्कुराकर कहा,

“पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। मैं अभी गरम चाय लेकर आती हूं।”

 

आदित्य ने पहली बार उसे देखा। उसके चेहरे पर बनावटी सुंदरता नहीं थी, लेकिन उसकी सादगी और मुस्कान बहुत प्यारी थी।

 

कुछ ही देर में गौरी गरम चाय और पकौड़े लेकर आई।

 

वह बोली,

“बारिश में गरम-गरम चाय मिल जाए तो सारी थकान दूर हो जाती है।”

 

आदित्य मुस्कुराकर बोला,

“सच कहा तुमने।”

 

रात को गौरी की मां ने दाल, रोटी और सब्जी बनाई। सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

 

आदित्य को पहली बार लगा कि सादा खाना भी इतना स्वादिष्ट हो सकता है।

 

खाना खाते-खाते किसान ने पूछा,

“बेटा, तुम लोग कहां जा रहे हो?”

 

आदित्य ने अपनी असली पहचान छिपाते हुए कहा,

“दूसरे शहर काम से जा रहे हैं।”

 

किसान ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

 

रात को बिजली कड़क रही थी। बाहर तेज बारिश हो रही थी।

 

गौरी ने मेहमानों के लिए अपने कमरे की चारपाई दे दी और खुद अपनी मां के साथ दूसरे कमरे में सो गई।

 

आदित्य देर रात तक जागता रहा।

 

उसे बार-बार यही सोच आ रही थी कि इतने छोटे घर में रहने वाले लोग कितने बड़े दिल के हैं।

 

सुबह जब बारिश रुकी तो पूरे गांव में ठंडी हवा चल रही थी।

 

आदित्य बाहर निकले तो देखा गौरी आंगन में पक्षियों के लिए दाना डाल रही थी।

 

वह बोली,

“बारिश में बेचारे इन्हें भी खाना नहीं मिलता।”

 

आदित्य उसकी दयालुता देखकर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

 

उसी समय दूर से घोड़ों की आवाज़ सुनाई दी।

 

राजकुमार के बाकी सैनिक उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंच चुके थे।

 

जैसे ही उन्होंने आदित्य को देखा, सभी घोड़ों से उतरकर झुक गए और एक साथ बोले—

 

“राजकुमार आदित्य की जय हो!”

 

यह सुनते ही गौरी, उसके माता-पिता और आसपास खड़े गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस मुसाफिर को उन्होंने अपने घर में ठहराया था, वह वास्तव में एक बड़े राज्य का राजकुमार था।

 

आदित्य ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, लेकिन अब सबसे बड़ी मुश्किल शुरू होने वाली थी…

 

राजकुमार होने की बात सुनते ही गौरी के पिता घबरा गए। वे तुरंत आदित्य के सामने हाथ जोड़कर बोले,

 

“राजकुमार जी, हमें माफ कर दीजिए। अगर हमारी सेवा में कोई कमी रह गई हो तो क्षमा कर दें। हमें क्या पता था कि आप इतने बड़े राज्य के राजकुमार हैं।”

 

आदित्य ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“काका, आपने मुझे मेहमान नहीं, अपने बेटे की तरह रखा। इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता।”

 

गौरी चुपचाप खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। कल तक जो युवक उसे एक साधारण मुसाफिर लगा था, वह आज राजकुमार निकला।

 

विदा लेते समय आदित्य ने एक बार गौरी की ओर देखा। गौरी की आंखें भी उसी की ओर थीं। दोनों बहुत कुछ कहना चाहते थे, लेकिन शब्द किसी के पास नहीं थे।

 

कुछ ही देर बाद घोड़ों की टापों की आवाज़ दूर होती गई और राजकुमार अपनी यात्रा पर निकल गया।

 

उसके जाने के बाद घर पहले जैसा तो था, लेकिन अब कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था।

 

हर शाम गौरी अनजाने में उसी रास्ते की ओर देखने लगती, जहां से वह बारिश वाली रात वह मुसाफिर आया था।

 

उधर राजमहल पहुंचने के बाद भी आदित्य का मन कहीं नहीं लग रहा था।

 

दरबार चलता, मंत्री बातें करते, सैनिक अभ्यास करते, लेकिन आदित्य की आंखों के सामने बार-बार वही छोटा-सा घर और गौरी की मुस्कान आ जाती।

 

एक दिन राजा ने पूछा,

 

“आदित्य, कई दिनों से तुम परेशान दिखाई दे रहे हो। बात क्या है?”

 

आदित्य ने सारी बात सच-सच बता दी।

 

राजा कुछ देर चुप रहे।

 

फिर बोले,

 

“वह एक किसान की बेटी है। राजघराने की अपनी मर्यादाएं होती हैं।”

 

आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

 

“पिताजी, इंसान की पहचान उसके कपड़ों या घर से नहीं, उसके संस्कारों से होती है।”

 

राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

 

कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री को गांव भेजा ताकि गौरी और उसके परिवार के बारे में जानकारी मिल सके।

 

मंत्री वापस लौटे और बोले,

 

“महाराज, वह परिवार गरीब जरूर है, लेकिन पूरे गांव में उनकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार की मिसाल दी जाती है।”

 

फिर भी राजा ने एक छोटी-सी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

 

उन्होंने गौरी और उसके माता-पिता को राजमहल बुलवाया।

 

महल देखकर गौरी घबरा गई, लेकिन उसने विनम्रता नहीं छोड़ी।

 

राजा ने पूछा,

 

“अगर तुम इस महल की रानी बन गईं, तो सबसे पहले क्या बदलोगी?”

 

गौरी मुस्कुराई और बोली,

 

“महाराज, मैं महल की दीवारें नहीं बदलूंगी। मैं इतना जरूर चाहूंगी कि यहां रहने वाला हर व्यक्ति एक-दूसरे का सम्मान करे। महल की असली सुंदरता सोने-चांदी से नहीं, लोगों के व्यवहार से होती है।”

 

राजा उसके उत्तर से प्रभावित हुए।

 

उसी समय एक सेवक घबराकर आया। उसके हाथ से पानी का घड़ा टूट गया था।

 

वह डरते हुए बोला,

 

“महाराज, मुझसे गलती हो गई।”

 

राजा कुछ कहते, उससे पहले गौरी ने सेवक से कहा,

 

“घड़ा टूट गया तो क्या हुआ? गलती इंसान से ही होती है। डरने की जगह अगली बार संभलकर काम करना।”

 

राजा यह सब ध्यान से देख रहे थे।

 

उन्होंने महसूस किया कि गौरी के अंदर दया, धैर्य और सम्मान जैसे गुण हैं।

 

यही गुण एक सच्ची रानी में होने चाहिए।

 

राजा मुस्कुराए और आदित्य की ओर देखकर बोले,

 

“तुमने सही कहा था। जन्म नहीं, संस्कार इंसान को बड़ा बनाते हैं।”

 

यह सुनते ही आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

 

कुछ ही दिनों बाद पूरे राज्य में उनके विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।

 

जिस गांव के आखिरी छोर पर वह छोटा-सा घर था, वहां पहली बार राजमहल से सजे हुए रथ पहुंचे।

 

पूरा गांव खुशी से झूम उठा।

 

गौरी दुल्हन बनी तो उसकी मां की आंखों से खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

 

किसान पिता बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहे थे।

 

विवाह बड़े धूमधाम से हुआ।

 

राजा ने स्वयं गौरी का हाथ पकड़कर उसे महल में प्रवेश कराया।

 

उन्होंने कहा,

 

“आज से यह सिर्फ मेरी बहू नहीं, इस राज्य की बेटी भी है।”

 

रात को महल की छत पर खड़े होकर आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“याद है, उस दिन मुझे सिर्फ बारिश से बचने के लिए एक छत चाहिए थी।”

 

गौरी मुस्कुराई और बोली,

 

“और मुझे क्या पता था कि एक साधारण मुसाफिर मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन जाएगा।”

 

इतना कहते ही फिर से हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई।

 

दोनों आसमान की ओर देखने लगे।

 

आदित्य ने गौरी का हाथ थाम लिया और कहा,

 

“कभी-कभी भगवान हमारी किस्मत बदलने के लिए तूफान भेजते हैं। अगर उस दिन बारिश न होती, तो शायद मैं तुम्हारे दरवाजे तक कभी नहीं पहुंचता।”

 

गौरी मुस्कुराकर बोली,

 

“इसलिए अब जब भी बारिश होगी, मुझे उस पहली मुलाकात की याद जरूर आएगी।”

 

दोनों की मुस्कान के साथ बारिश की बूंदें महल की छत पर गिरती रहीं। उस दिन हर किसी को यकीन हो गया कि सच्चा प्यार न अमीरी देखता है, न गरीबी वह बस एक सच्चे दिल की तलाश करता है।

 

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