निर्जीव से भी करती थी वो बात
गाँव के किनारे एक छोटा-सा कच्चा घर था। उस घर में चौदह साल की एक लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। लोग कहते थे कि वह बहुत अजीब है। कोई उसे हँसता नहीं देखता था, फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी।
मीरा की सबसे अनोखी आदत थी कि वह निर्जीव चीज़ों से भी बातें करती थी। सुबह उठते ही वह अपने आँगन के पुराने नीम के पेड़ से कहती, “कैसे हो मेरे दोस्त? आज हवा थोड़ी तेज़ है, अपना ध्यान रखना।”
फिर वह अपने मिट्टी के घड़े से बोलती, “तू हर रोज़ सबकी प्यास बुझाता है, कभी थकता नहीं क्या?”
टूटी हुई चारपाई से कहती, “तू बूढ़ी हो गई है, लेकिन आज भी मेरा सहारा बनी हुई है।”
जो भी उसे देखता, बस यही कहता, “लड़की का दिमाग़ ठीक नहीं है।”
लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि मीरा ऐसा क्यों करती है।
जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके पिता का देहांत हो गया था। उसकी माँ कई महीनों से बीमार रहती थी। घर में गरीबी थी और रिश्तेदारों ने भी धीरे-धीरे साथ छोड़ दिया था। माँ अक्सर कहती, “बेटी, अगर कभी मैं न रहूँ तो हिम्मत मत हारना।”
मीरा हर बार माँ का हाथ पकड़कर कहती, “आप कहीं नहीं जाएँगी।”
लेकिन किस्मत ने उसकी बात नहीं सुनी।
एक बरसाती रात उसकी माँ ने भी दुनिया छोड़ दी।
उस दिन के बाद मीरा सचमुच अनाथ होने वाली थी। गाँव वालों ने कुछ दिन तक उसकी मदद की, फिर सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए।
अब उस छोटे-से घर में सिर्फ़ मीरा और उसकी यादें रहती थीं।
शायद इसी अकेलेपन ने उसे निर्जीव चीज़ों से बातें करना सिखा दिया था। उसे लगता था कि अगर इंसान साथ छोड़ दें, तो भी दीवारें, पेड़, हवा और पुरानी चीज़ें इंसान का साथ नहीं छोड़तीं।
वह जब रोती, तो घर की दीवार से टिककर कहती, “तूने मेरी माँ को देखा था न? मुझे लगता है वो अभी भी यहीं कहीं है।”
जब तेज़ बारिश होती, तो वह छत से टपकती बूंदों से कहती, “इतना मत रोओ… मैं भी रो पड़ूँगी।”
गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे।
“देखो… पगली फिर से पेड़ से बातें कर रही है।”
मीरा बस मुस्कुरा देती। उसे किसी से शिकायत नहीं थी।
धीरे-धीरे उसका यही स्वभाव उसकी ताकत बन गया। वह हर चीज़ में जीवन ढूँढने लगी—टूटी खिड़की की आवाज़ में भी, हवा की सरसराहट में भी। उसे लगता था कि दुनिया में हर चीज़ कुछ कहना चाहती है, बस सुनने वाला चाहिए।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि रास्ते में एक बूढ़े बाबा गिर गए हैं। लोग पास से निकलते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें उठाने की कोशिश नहीं की।
मीरा दौड़कर पहुँची। उसने बाबा को सहारा दिया, पानी पिलाया और उन्हें उनके घर तक छोड़ आई।
बाबा ने जाते-जाते पूछा, “बेटी, तू हर किसी का दर्द कैसे समझ लेती है?”
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “जिसने अपना सब कुछ खोया हो, उसे दूसरों का दर्द जल्दी समझ आ जाता है।”
बाबा की आँखें भर आईं।
कुछ दिनों बाद गाँव की एक बुज़ुर्ग अम्मा बीमार पड़ गईं। उनके बेटे शहर में रहते थे और कई महीनों से मिलने नहीं आए थे।
मीरा रोज़ उनके लिए खाना बनाकर ले जाती। दवा का समय याद दिलाती। रात को उनके पास बैठती और कहानियाँ सुनाती।
अम्मा कहतीं, “बेटी, तू तो मेरी अपनी बेटी से भी बढ़कर निकली।”
मीरा हँसकर कहती, “रिश्ते हमेशा खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”
धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने नोटिस किया कि जिस लड़की को वे पागल समझते थे, वही सबसे ज़्यादा संवेदनशील है।
एक दिन गाँव के स्कूल में बच्चों से पूछा गया, “सबसे दयालु इंसान किसे मानते हो?”
पहले तो सब चुप रहे। फिर एक बच्चे ने कहा, “मीरा दीदी।
यह सुनकर शिक्षक भी हैरान रह गए।
उन्होंने मीरा को बुलाया और पूछा, “तुम इतनी छोटी उम्र में सबकी मदद क्यों करती हो?”
मीरा ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि मैं जानती हूँ कि अकेलापन कितना दर्द देता है। मैं नहीं चाहती कि कोई और वह दर्द महसूस करे।”
उसकी यह बात सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
कुछ समय बाद शहर से एक समाजसेवी संस्था गाँव आई। उन्हें मीरा के बारे में पता चला। उन्होंने उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का फैसला किया।
पहली बार मीरा को लगा कि शायद भगवान देर से ही सही, लेकिन किसी न किसी रूप में मदद ज़रूर भेजते हैं।
शहर जाने से पहले वह अपने पुराने घर के आँगन में गई।
उसने नीम के पेड़ को गले लगाया और बोली, “मैं जा रही हूँ, लेकिन तुम्हें कभी नहीं भूलूँगी।”
फिर उसने मिट्टी के घड़े पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा, “तूने मेरा अकेलापन बाँटा था।”
दीवार को छूकर बोली, “तूने मेरी हर ख़ामोशी सुनी है।”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
आज पहली बार गाँव वालों ने भी उन निर्जीव चीज़ों को अलग नज़र से देखा। उन्हें एहसास हुआ कि जिनसे मीरा बातें करती थी, वे चीज़ें नहीं, उसके जीवन के साथी थे।
कई साल बाद मीरा पढ़-लिखकर एक सामाजिक कार्यकर्ता बनी। उसने अनाथ बच्चों के लिए एक छोटा-सा आश्रय गृह खोला।
वहाँ आने वाले हर बच्चे से वह एक ही बात कहती थी, “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो, तो याद रखना… दुनिया में कोई न कोई तुम्हारी बात सुनने वाला ज़रूर होता है। और जब तक वह नहीं मिलता, तब तक अपने हौसले से बातें करना।”
एक दिन एक छोटी बच्ची ने उससे पूछा, “दीदी, क्या आप आज भी पेड़ों और दीवारों से बातें करती हैं?”
मीरा मुस्कुराई और बोली, “हाँ… क्योंकि उन्होंने उस समय मेरा साथ दिया था, जब पूरी दुनिया मुझे अकेला छोड़ चुकी थी।”
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं, कृतज्ञता के आँसू थे।
और अब उसका आश्रय गृह सिर्फ बच्चों का घर नहीं था, बल्कि उम्मीदों का एक छोटा-सा संसार बन चुका था, जहाँ हर बच्चा यह सीखता था कि दर्द चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अगर दिल में अपनापन हो तो दुनिया फिर से जीने लायक बन जाती है।
कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द सहने वाले लोग ही दूसरों के आँसू
सबसे पहले पहचान लेते हैं। और जिनके पास अपना कोई नहीं होता, वही पूरी दुनिया को अपना बना लेते हैं।

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