इस बार राखी मत बांधना
रक्षाबंधन से दो दिन पहले तन्वी के मोबाइल पर उसके भाई विक्रम का फोन आया।
“तन्वी, इस बार घर मत आना।”
तन्वी ने सोचा शायद उसने गलत सुना है।
“क्या कहा आपने?”
विक्रम की आवाज दूसरी तरफ से बिल्कुल शांत थी।
“इस बार राखी मत बांधना।”
तन्वी कुछ सेकंड तक चुप रही।
फिर उसने धीरे से पूछा,
“भैया… सब ठीक है?”
“हां।”
“तो फिर ऐसी बात क्यों कर रहे हो?”
विक्रम ने कहा,
“बस, इस बार नहीं।”
और उसने फोन काट दिया।
तन्वी देर तक मोबाइल को देखती रही।
उसके लिए यह बात समझना मुश्किल था।
विक्रम कभी ऐसा नहीं था।
वह हर साल रक्षाबंधन से कई दिन पहले ही पूछना शुरू कर देता था—
“इस बार कितनी राखियां खरीद रही है?”
तन्वी कहती,
“एक ही भाई है मेरा।”
विक्रम जवाब देता,
“तो एक राखी से क्या होगा? मुझे तो कम से कम पांच चाहिए।”
“पांच क्यों?”
“एक हाथ के लिए, एक दूसरे हाथ के लिए और बाकी संभालकर रखूंगा।”
तन्वी हंस पड़ती।
लेकिन इस बार…
वही भाई कह रहा था—
“राखी मत बांधना।”
तन्वी ने कई बार फोन किया।
विक्रम ने नहीं उठाया।
उसने भाभी को फोन किया।
भाभी ने भी बस इतना कहा,
“तन्वी, भैया की बात मान लेना।”
अब तन्वी और परेशान हो गई।
उसने माँ से पूछा।
माँ कुछ पल चुप रहीं।
“शायद उसे थोड़ा समय चाहिए।”
“लेकिन क्यों?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
तन्वी के मन में कई सवाल थे।
क्या उसने कुछ गलत कहा था?
क्या भैया उससे नाराज थे?
क्या घर में कोई परेशानी थी?
लेकिन किसी ने उसे कुछ नहीं बताया।
रक्षाबंधन की सुबह तन्वी ने वही किया जो वह हर साल करती थी।
सुबह जल्दी उठी।
नहाई।
नई ड्रेस पहनी।
पूजा की थाली सजाई।
और अपने भाई के लिए राखी निकाली।
माँ ने उसे देखकर पूछा,
“तू जा रही है?”
तन्वी ने कहा,
“हां।”
“लेकिन विक्रम ने मना किया है।”
तन्वी की आंखें भर आईं।
“माँ, अगर मैं आज नहीं गई तो शायद जिंदगी भर पछताऊंगी कि मैंने कोशिश क्यों नहीं की।”
माँ उसे रोक नहीं सकीं।
तन्वी भाई के घर पहुंची।
दरवाजे पर भाभी खड़ी थीं।
उन्हें देखकर तन्वी ने पूछा,
“भैया कहां हैं?”
भाभी ने नजरें झुका लीं।
“अंदर।”
तन्वी तेजी से कमरे की तरफ गई।
दरवाजा आधा खुला था।
अंदर विक्रम खिड़की के पास बैठा था।
तन्वी ने कहा,
“भैया।”
विक्रम ने पलटकर देखा।
उसकी आंखें लाल थीं।
जैसे वह काफी देर से रोया हो।
तन्वी का गुस्सा तुरंत खत्म हो गया।
“क्या हुआ?”
विक्रम ने कहा,
“तुझे आने को मना किया था।”
तन्वी उसके पास बैठ गई।
“पहले बताओ क्या हुआ है।”
विक्रम चुप रहा।
तन्वी ने उसकी कलाई की तरफ देखा।
“आप मुझसे राखी क्यों नहीं बंधवाना चाहते?”
विक्रम ने धीरे से कहा,
“क्योंकि मुझे डर लग रहा है।”
तन्वी चौंक गई।
उसने अपने भाई को कभी डरते हुए नहीं देखा था।
बचपन में जब वह डरती थी तो विक्रम हमेशा कहता था—
“मैं हूं ना।”
आज वही भाई कह रहा था—
“मुझे डर लग रहा है।”
तन्वी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“किस बात का?”
विक्रम ने बहुत धीमी आवाज में कहा,
“इस बात का कि शायद मैं अब पहले जैसा भाई नहीं रह पाऊंगा।”
तन्वी समझ नहीं पाई।
“मतलब?”
विक्रम ने कमरे के कोने में रखी फाइल की तरफ देखा।
तन्वी ने फाइल उठाई।
उसमें कुछ अस्पताल के कागज थे।
तन्वी ने उन्हें पढ़ने की कोशिश की।
विक्रम ने उसका हाथ रोक लिया।
“नहीं।”
तन्वी ने उसकी आंखों में देखा।
“मुझसे क्या छिपा रहे हो?”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
“कुछ समय से मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा था। जांच करवाई है।”
तन्वी की आंखें भर आईं।
“तो?”
विक्रम ने कहा,
“डॉक्टर ने इलाज और आराम की बात कही है। अभी बहुत कुछ साफ नहीं है।”
तन्वी की सांस तेज हो गई।
विक्रम ने जल्दी से कहा,
“घबराने की जरूरत नहीं है। इलाज चल रहा है।”
तन्वी की आंखों से आंसू निकल आए।
“तो मुझे बताया क्यों नहीं?”
विक्रम ने कहा,
“क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तू मुझे देखकर डर जाए।”
तन्वी ने कहा,
“और आप अकेले डरते रहेंगे?”
विक्रम चुप रहा।
तन्वी ने उसकी कलाई पकड़ ली।
“भैया, राखी का मतलब जानते हो?”
विक्रम ने हल्की मुस्कान से कहा,
“तू बताएगी?”
“हां।”
तन्वी ने कहा,
“राखी का मतलब सिर्फ ये नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।”
विक्रम उसे सुनता रहा।
“रिश्ता एक तरफ से नहीं चलता। अगर आज आपको मेरी जरूरत है तो मैं आपके साथ खड़ी रहूंगी।”
विक्रम की आंखों से आंसू निकल आए।
“लेकिन मैं चाहता था कि तू मुझे कमजोर न देखे।”
तन्वी ने कहा,
“आप मेरे भाई हो, कोई कहानी के हीरो नहीं, जिसे कभी कमजोरी नहीं होती।”
विक्रम की आंखों में पहली बार हल्की मुस्कान आई।
तन्वी ने आगे कहा,
“मुझे मजबूत भाई नहीं चाहिए।”
“तो?”
“मुझे मेरा भाई चाहिए। जैसा भी है, जिस हालत में है, मेरे सामने है।”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
तन्वी ने राखी उठाई।
“अब हाथ आगे करो।”
विक्रम ने कहा,
“मैंने मना किया था।”
तन्वी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,
“आज पहली बार आपकी बात नहीं मानूंगी।”
विक्रम ने धीरे से अपनी कलाई आगे कर दी।
तन्वी ने तिलक लगाया।
राखी बांधी।
फिर उसका हाथ दोनों हाथों में लेकर कहा,
“आज इस राखी पर वादा मैं लूंगी।”
विक्रम ने पूछा,
“क्या?”
“अब से कोई परेशानी अकेले नहीं झेलोगे।”
विक्रम चुप रहा।
“वादा करो।”
उसने धीरे से कहा,
“वादा।”
“और एक बात।”
“अब क्या?”
तन्वी ने कहा,
“अगली बार मुझे ये मत कहना कि राखी मत बांधना।”
विक्रम मुस्कुराया।
“क्यों?”
“क्योंकि राखी बांधने के लिए भाई का मजबूत होना जरूरी नहीं है।”
उसकी आवाज भर आई।
“बस मेरा भाई होना जरूरी है।”
विक्रम की आंखों से आंसू निकल आए।
उसने बहन को गले लगा लिया।
दोनों देर तक कुछ नहीं बोले।
उस पल किसी को गिफ्ट की जरूरत नहीं थी।
न महंगे कपड़ों की।
न मिठाई की।
बस एक-दूसरे के साथ की जरूरत थी।
कुछ देर बाद भाभी कमरे में आईं।
उनके हाथ में चाय थी।
तन्वी ने कहा,
“भाभी, अब से इनकी सारी बातें मुझे बतानी होंगी।”
भाभी मुस्कुरा दीं।
“ये तो अब तुम्हारे भरोसे हैं।”
विक्रम ने कहा,
“मेरी शिकायत करने के लिए पूरी टीम बन गई।”
तन्वी ने तुरंत कहा,
“और ये टीम बहुत सख्त है।”
तीनों हल्का-सा हंस पड़े।
उस दिन के बाद तन्वी अक्सर भाई के पास जाती।
कभी दोनों पुरानी बातें करते।
कभी बिना किसी बात के चाय पीते।
कभी तन्वी उसे डांटती—
“आराम किया करो।”
विक्रम कहता,
“तू पहले भी इतना आदेश देती थी?”
तन्वी जवाब देती,
“पहले छोटी थी, अब बहन हूं।”
समय के साथ इलाज चलता रहा और परिवार साथ बना रहा।
कुछ महीनों बाद एक दिन विक्रम ने तन्वी को फोन किया।
“छोटी।”
“हां भैया?”
“अगली राखी की तैयारी कर लेना।”
तन्वी मुस्कुराई।
“कितनी चाहिए?”
विक्रम हंस पड़ा।
“पांच।”
“फिर वही?”
“हां।”
“लेकिन क्यों?”
विक्रम ने कहा,
“क्योंकि इस बार समझ गया हूं कि राखी सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है।”
तन्वी चुप हो गई।
विक्रम ने आगे कहा,
“जब मैं कहता था ‘मैं हूं ना’, तब शायद मुझे लगता था कि मुझे हमेशा सबके लिए मजबूत रहना पड़ेगा।”
“और अब?”
“अब पता चला… कभी-कभी किसी अपने को भी कहने देना चाहिए—मैं हूं ना।”
तन्वी की आंखें नम हो गईं।
उसने कहा,
“तो सुनो भैया।”
“हां?”
“मैं हूं ना।”
विक्रम मुस्कुराया।
उसकी कलाई पर बंधी राखी हल्की हवा में हिल रही थी।
और तन्वी को लगा कि इस साल उसने भाई की कलाई पर सिर्फ एक धागा नहीं बांधा।
उसने उसे यह भरोसा बांधा था कि—
मुश्किल समय में मजबूत होने का मतलब अकेले खड़े रहना नहीं होता।
कभी-कभी किसी अपने का हाथ पकड़ लेना भी ताकत होता है।
और शायद इसीलिए…
जिस भाई ने कहा था—
“इस बार राखी मत बांधना…”
उसी ने बाद में सबसे ज्यादा मजबूती से कहा—
“अगली राखी पर जरूर आना।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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