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बिछड़ा भाई

पढ़ने का समय : 7 मिनट

राखी के दिन मिला बिछड़ा भाई

 

“किसी ने सही कहा है… कुछ रिश्ते कितनी भी दूर चले जाएं, दिल उन्हें ढूंढ ही लेता है।”

 

रेलवे स्टेशन की भीड़ में पायल एक छोटे-से बच्चे का हाथ पकड़े खड़ी थी। उसकी आंखें बार-बार प्लेटफॉर्म पर जा रही थीं।

 

आज रक्षाबंधन था।

 

वह अपनी माँ के साथ मायके जा रही थी, लेकिन उसके मन में त्योहार की खुशी से ज्यादा एक पुरानी कमी थी।

 

उसका भाई समीर।

 

पंद्रह साल पहले दोनों अलग हो गए थे।

 

तब पायल सिर्फ सात साल की थी और समीर दस साल का।

 

उनके पिता का एक छोटे शहर में किराने का कारोबार था। घर की हालत ठीक थी, लेकिन एक दिन अचानक पिता का निधन हो गया।

 

घर पर कर्ज बढ़ता गया।

 

माँ ने रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह घर चलाने की कोशिश की।

 

लेकिन उसी दौरान एक रिश्तेदार ने बच्चों को शहर के एक आश्रम में भेजने की बात कही।

 

माँ मजबूर थीं।

 

पायल को रिश्तेदारों के साथ भेज दिया गया और समीर को दूसरे शहर के एक बाल गृह में।

 

माँ ने दोनों से कहा था,

 

“कुछ दिन की बात है बेटा। हालात ठीक होते ही मैं तुम्हें वापस ले आऊंगी।”

 

लेकिन हालात ठीक नहीं हुए।

 

समय बीतता गया।

 

पायल को माँ के साथ रहने का मौका मिल गया, लेकिन समीर का पता धीरे-धीरे खो गया।

 

किसी ने कहा वह दूसरे शहर चला गया।

 

किसी ने कहा उसे किसी परिवार ने गोद ले लिया।

 

और फिर एक दिन…

 

उसका नाम सिर्फ पुरानी याद बनकर रह गया।

 

लेकिन पायल ने कभी उसे भुलाया नहीं।

 

हर रक्षाबंधन पर वह एक राखी खरीदती।

 

माँ से कहती,

 

“जब भैया मिलेंगे ना, तब मैं सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

 

माँ की आंखों में आंसू आ जाते।

 

लेकिन वह हमेशा कहतीं,

 

“जरूर मिलेगा।”

 

आज पंद्रह साल बाद पायल फिर मायके जा रही थी।

 

उसके बैग में एक राखी थी।

 

इस बार भी वही उम्मीद थी।

 

ट्रेन स्टेशन पर पहुंची।

 

पायल और उसकी माँ उतरकर बाहर जाने लगीं।

 

तभी उसकी नजर सामने बैठे एक युवक पर पड़ी।

 

वह लगभग पच्चीस साल का था।

 

साधारण कपड़े, हाथ में छोटा बैग और चेहरे पर थकान।

 

पायल कुछ कदम आगे बढ़ी।

 

फिर अचानक रुक गई।

 

उस युवक की कलाई पर एक पुराना निशान था।

 

बचपन में समीर के हाथ पर भी ऐसा ही निशान था।

 

पायल का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

वह धीरे-धीरे उसके पास गई।

 

“माफ कीजिए… आपका नाम क्या है?”

 

युवक ने उसकी तरफ देखा।

 

“समीर।”

 

पायल की आंखें फैल गईं।

 

“क्या?”

 

“समीर।”

 

पायल की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

उसने कांपती आवाज में पूछा,

 

“आपकी बहन का नाम… पायल था?”

 

युवक अचानक चुप हो गया।

 

“आपको मेरा नाम कैसे पता?”

 

पायल ने अपने बैग से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर में दो छोटे बच्चे खड़े थे।

 

एक लड़की और एक लड़का।

 

लड़के के हाथ में छोटी-सी लकड़ी की कार थी।

 

समीर ने तस्वीर देखते ही उसे अपने हाथ में ले लिया।

 

उसका चेहरा बदल गया।

 

“ये…”

 

पायल रोते हुए बोली,

 

“ये मैं हूं।”

 

समीर कुछ बोल नहीं पाया।

 

फिर उसकी आंखों में पहचान की चमक आई।

 

“पायल?”

 

पायल ने सिर हिलाया।

 

“भैया…”

 

अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से लिपट गए।

 

पंद्रह साल की दूरी उस एक पल में जैसे खत्म हो गई।

 

समीर रोते हुए कह रहा था,

 

“मैंने तुझे बहुत ढूंढा था।”

 

पायल ने कहा,

 

“मैं भी।”

 

“मुझे लगा तू मुझे भूल गई।”

 

“मैं हर साल तुम्हारे लिए राखी खरीदती थी।”

 

समीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“हर साल?”

 

पायल ने अपने बैग से राखी निकाली।

 

“आज भी।”

 

समीर की आंखें भर आईं।

 

उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

 

“तो बांध दे।”

 

पायल ने स्टेशन के एक कोने में ही भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

 

उसके हाथ कांप रहे थे।

 

“भैया… इतने सालों से ये राखी आपके लिए बची थी।”

 

समीर ने राखी को देखते हुए कहा,

 

“और मैं सोचता रहा कि शायद मुझे कोई याद भी नहीं करता।”

 

पायल ने कहा,

 

“माँ ने कभी आपको भुलाया नहीं।”

 

समीर ने तुरंत पूछा,

 

“माँ?”

 

“वो मेरे साथ हैं।”

 

समीर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

 

“क्या वो मुझे पहचानेंगी?”

 

पायल ने उसकी तरफ देखा।

 

“माँ तुम्हें भूल सकती हैं क्या?”

 

कुछ देर बाद तीनों घर पहुंचे।

 

दरवाजे पर माँ खड़ी थीं।

 

पायल ने कुछ नहीं कहा।

 

बस पीछे हट गई।

 

समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“माँ…”

 

माँ ने उसे देखा।

 

पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

 

फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए।

 

“समीर?”

 

समीर घुटनों के बल बैठ गया।

 

“माँ…”

 

माँ ने उसे गले लगा लिया।

 

तीनों रोते रहे।

 

उस दिन घर में कोई बड़ी सजावट नहीं थी।

 

कोई महंगी मिठाई नहीं थी।

 

लेकिन घर में पंद्रह साल बाद एक ऐसी खुशी लौटी थी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता था।

 

शाम को पायल ने भाई से पूछा,

 

“भैया, आप इतने साल कहां थे?”

 

समीर ने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनाई।

 

बाल गृह से उसे एक दूसरे शहर में काम सीखने के लिए भेज दिया गया था।

 

वह बड़ा हुआ, काम करने लगा।

 

कई बार उसने परिवार को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कोई सही पता नहीं मिला।

 

कुछ साल पहले उसे पिता का पुराना शहर पता चला था।

 

वह वहां गया भी था।

 

लेकिन तब तक घर बिक चुका था।

 

उसे लगा शायद सब लोग कहीं और चले गए।

 

“फिर आज यहां कैसे?”

 

पायल ने पूछा।

 

समीर मुस्कुराया।

 

“मैं अपनी पुरानी यादों के पीछे आया था।”

 

“मतलब?”

 

“आज रक्षाबंधन था। बचपन में तू कहती थी कि एक दिन मुझे बहुत बड़ी राखी बांधेगी।”

 

पायल हंसते हुए रो पड़ी।

 

“तो आज बांध दी।”

 

समीर ने अपनी कलाई देखी।

 

“हां… और शायद यही राखी मुझे यहां तक खींच लाई।”

 

पायल ने कहा,

 

“अब कहीं मत जाना।”

 

समीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“नहीं जाऊंगा।”

 

माँ ने दोनों को पास बुलाया।

 

“एक बात कहूं?”

 

दोनों ने उनकी तरफ देखा।

 

माँ बोलीं,

 

“मैंने इतने साल भगवान से सिर्फ एक चीज मांगी थी।”

 

“क्या?”

 

“रक्षाबंधन के दिन मेरी बेटी की राखी मेरे बेटे की कलाई पर देखना।”

 

माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

 

उस रात पायल ने अपनी पुरानी राखियों का डिब्बा निकाला।

 

उसमें पंद्रह राखियां थीं।

 

हर साल की एक राखी।

 

समीर ने डिब्बा देखा तो हैरान रह गया।

 

“तूने ये सब संभालकर रखीं?”

 

पायल मुस्कुराई।

 

“मैंने कहा था ना… जब तुम मिलोगे, तब सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

 

समीर ने मजाक में कहा,

 

“पंद्रह राखियां एक साथ बांधेगी तो मेरी कलाई टूट जाएगी।”

 

पायल हंस पड़ी।

 

“तो अगले पंद्रह साल तक धीरे-धीरे बांध दूंगी।”

 

माँ भी हंसने लगीं।

 

उस रात घर में बहुत सालों बाद भाई की आवाज गूंजी।

 

पायल को लगा जैसे उसका बचपन वापस आ गया हो।

 

वही भाई।

 

वही हंसी।

 

वही रिश्ता।

 

बस वक्त बहुत आगे निकल चुका था।

 

अगली सुबह समीर ने अपनी बहन से कहा,

 

“पायल, एक बात समझ आई।”

 

“क्या?”

 

“रिश्ते खोते नहीं हैं।”

 

“फिर?”

 

“बस कभी-कभी उनसे मिलने में देर हो जाती है।”

 

पायल ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

 

“और कुछ राखियां रास्ता दिखाती रहती हैं।”

 

समीर मुस्कुराया।

 

उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

“अब हर रक्षाबंधन पर मैं खुद तेरे सामने बैठूंगा।”

 

पायल ने कहा,

 

“वादा?”

 

“वादा।”

 

और इस बार उस वादे का गवाह कोई तस्वीर या पुरानी राखी नहीं थी।

 

गवाह था…

 

पंद्रह साल बाद मिला एक भाई, उसकी बहन की कलाई में बंधा प्यार और वह घर, जिसने आखिरकार अपने दोनों बच्चों को फिर से एक साथ देख लिया था।

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