🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

राखी का वो आखिरी धागा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

राखी का वो आखिरी धागा

सावन की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। शहर की एक छोटी-सी गली में बने पुराने से घर की खिड़की के पास नैना चुपचाप बैठी थी। उसके हाथ में एक सुंदर-सी राखी थी, जिसे उसने पूरे दो दिन लगाकर खुद बनाया था।

 

राखी में लाल और पीले रंग के धागे थे और बीच में एक छोटा-सा चाँदी का मोती लगा था।

 

नैना बार-बार दरवाजे की तरफ देखती और फिर अपनी राखी को देखने लगती।

 

उसकी माँ रसोई से बोलीं,

“नैना, बेटा… कब तक दरवाजे को देखती रहेगी? शायद इस बार भी तेरा भाई नहीं आ पाएगा।”

 

नैना ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“नहीं माँ, भैया जरूर आएंगे।”

 

“हर साल यही कहती है।”

 

नैना कुछ पल चुप रही।

 

फिर धीरे से बोली,

“इस बार उन्होंने खुद कहा है कि राखी पर जरूर आएंगे।”

 

उसका भाई अमन पिछले चार साल से दूसरे शहर में नौकरी कर रहा था। पहले वह हर रक्षाबंधन पर घर जरूर आता था। लेकिन पिछले दो सालों से काम का बहाना बनाकर नहीं आ पाया था।

 

नैना को उससे शिकायत थी।

 

बहुत ज्यादा।

 

लेकिन उससे भी ज्यादा उसे अपने भाई की याद आती थी।

 

बचपन में दोनों की खूब लड़ाई होती थी।

 

कभी नैना अमन की किताब छिपा देती, तो कभी अमन उसकी गुड़िया के बाल काट देता।

 

माँ दोनों को डांटतीं और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर खाना खाने लगते।

 

एक बार नैना को तेज बुखार हुआ था। रातभर अमन उसके सिरहाने बैठा रहा था।

 

नैना ने उस समय पूछा था,

“भैया, आप सोते क्यों नहीं?”

 

अमन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,

“तू ठीक हो जा, फिर मैं पूरी जिंदगी सो लूंगा।”

 

नैना हंस पड़ी थी।

 

आज भी वह बात उसे याद थी।

 

तभी बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई।

 

नैना तुरंत उठकर दरवाजे की तरफ भागी।

 

“भैया!”

 

लेकिन दरवाजे पर दूध वाला खड़ा था।

 

नैना का चेहरा उतर गया।

 

माँ ने उसकी तरफ देखा और कुछ नहीं कहा।

 

रात हो गई।

 

अमन का फोन भी बंद आ रहा था।

 

नैना ने राखी अपने पास रख ली।

 

उस रात वह ठीक से सो नहीं पाई।

 

अगली सुबह रक्षाबंधन था।

 

घर में बाकी सब तैयारियां चल रही थीं, लेकिन नैना के मन में बस एक ही सवाल था—

 

“क्या भैया सच में आएंगे?”

 

दोपहर तक अमन का कोई फोन नहीं आया।

 

नैना ने खुद फोन लगाया।

 

इस बार फोन बजा।

 

उसने जल्दी से फोन कान पर लगाया।

 

“हैलो भैया?”

 

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

 

फिर एक आदमी की आवाज आई।

 

“क्या आप अमन की बहन बोल रही हैं?”

 

नैना का दिल धक से रह गया।

 

“जी… लेकिन आप कौन?”

 

आवाज आई—

 

“मैं अस्पताल से बोल रहा हूँ।”

 

नैना के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

 

“अमन को क्या हुआ?”

 

“आप घबराइए मत… उनका छोटा-सा एक्सीडेंट हुआ है।”

 

“वो ठीक हैं ना?”

 

“अभी डॉक्टर उनका इलाज कर रहे हैं।”

 

नैना की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

उसने तुरंत माँ को बताया।

 

कुछ ही देर में दोनों अस्पताल के लिए निकल गए।

 

अस्पताल पहुंचकर नैना भागते हुए रिसेप्शन पर पहुंची।

 

“अमन… अमन शर्मा… उनका एक्सीडेंट हुआ है।”

 

नर्स ने कुछ जानकारी लेने के बाद कहा,

“ऑपरेशन चल रहा है। आप बाहर इंतजार कीजिए।”

 

नैना वहीं फर्श के पास लगी कुर्सी पर बैठ गई।

 

उसके हाथ में अब भी वही राखी थी।

 

माँ ने उसकी तरफ देखा।

 

“बेटा, भगवान सब ठीक करेंगे।”

 

नैना ने राखी को कसकर पकड़ लिया।

 

“माँ… मैंने भैया से बहुत नाराजगी रखी है।”

 

“तो क्या हुआ?”

 

“मैंने उनसे कितनी बार कहा था कि मुझे फोन किया करो… लेकिन मैं खुद भी कई बार उनसे ठीक से बात नहीं करती थी।”

 

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

 

“रिश्तों में छोटी-छोटी नाराजगी होती रहती है।”

 

कई घंटे बीत गए।

 

आखिरकार डॉक्टर बाहर आए।

 

“अमन की हालत अब खतरे से बाहर है। लेकिन उन्हें कुछ समय आराम की जरूरत होगी।”

 

नैना ने राहत की सांस ली।

 

कुछ देर बाद उसे अमन से मिलने दिया गया।

 

अमन आंखें बंद किए लेटा था।

 

नैना उसके पास जाकर बैठ गई।

 

उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।

 

“भैया…”

 

अमन ने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।

 

उसे देखते ही हल्की मुस्कान आई।

 

“तू… रो रही है?”

 

नैना ने गुस्से में कहा,

“आपको क्या लगता है? मैं नाचूंगी?”

 

अमन हल्का-सा हंसने लगा।

 

“मुझे पता था… तू मुझे डांटेगी।”

 

“आपने आने का वादा किया था।”

 

“मैं आया तो हूं।”

 

“लेकिन अस्पताल में!”

 

दोनों कुछ पल चुप रहे।

 

फिर अमन ने कमजोर आवाज में पूछा,

“राखी लाई है?”

 

नैना ने अपनी मुट्ठी खोली।

 

वही लाल-पीली राखी देखकर अमन की आंखों में चमक आ गई।

 

“इतनी सुंदर राखी… मेरे लिए?”

 

नैना ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

उसने धीरे से अमन की कलाई पर राखी बांधी।

 

अमन ने आंखें बंद कर लीं।

 

नैना बोली—

 

“इस बार मैं कोई बड़ा गिफ्ट नहीं मांगूंगी।”

 

अमन मुस्कुराया।

 

“तो क्या चाहिए?”

 

“बस एक वादा।”

 

“बोल।”

 

“अगले रक्षाबंधन पर मुझे अस्पताल में राखी नहीं बांधनी पड़ेगी।”

 

अमन की आंखें नम हो गईं।

 

उसने नैना का हाथ पकड़कर कहा,

 

“वादा।”

 

कुछ दिन बाद अमन घर वापस आ गया।

 

लेकिन उस हादसे ने दोनों भाई-बहन को बदल दिया था।

 

अब छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी नहीं होती थी।

 

अमन हर शाम अपनी बहन को फोन करता।

 

नैना भी उसकी आवाज सुनकर मुस्कुरा देती।

 

एक साल बाद फिर रक्षाबंधन आया।

 

नैना सुबह से दरवाजे पर बैठी थी।

 

इस बार उसके चेहरे पर चिंता नहीं थी।

 

अचानक दरवाजा खुला।

 

अमन सामने खड़ा था।

 

हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

 

“मैडम, राखी बांधने का समय हो गया है।”

 

नैना की आंखें भर आईं।

 

वह दौड़कर भाई के गले लग गई।

 

“आप सच में आ गए।”

 

अमन ने हंसते हुए कहा,

 

“इस बार कोई हादसा नहीं। सीधे घर आया हूं।”

 

नैना ने राखी बांधी।

 

अमन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

 

उसमें एक चांदी का छोटा-सा कंगन था।

 

“तेरे लिए।”

 

नैना ने कहा,

“मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

 

“तो?”

 

“बस ऐसे ही हर साल आते रहना।”

 

अमन कुछ नहीं बोला।

 

उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

 

और दोनों की आंखों में एक ही बात थी—

 

राखी सिर्फ एक धागा नहीं होती।

 

वह बचपन की याद होती है।

 

वह हजारों झगड़ों के बाद भी बचा हुआ प्यार होती है।

 

और कभी-कभी…

 

वही छोटा-सा धागा किसी रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *