शहर के एक छोटे से मोहल्ले में रवि अपनी मां और छोटी बहन राधा के साथ रहता था। पिता का कई साल पहले देहांत हो चुका था। पिता के जाने के बाद रवि ही घर का बड़ा बेटा था, लेकिन जिम्मेदारियां संभालने के बजाय वह नशे और गलत दोस्तों में फंस गया था।
शराब ने धीरे-धीरे रवि से उसका परिवार, उसका सम्मान और उसका आत्मविश्वास छीन लिया था। वह अक्सर रात में नशे में घर लौटता और छोटी-छोटी बातों पर मां और राधा से झगड़ता।
राधा अपने भाई को बहुत प्यार करती थी, लेकिन अब उसके व्यवहार से डरने लगी थी।
रक्षाबंधन का दिन आया।
सुबह से घर में त्योहार की तैयारी हो रही थी। मां ने रवि की पसंद की खीर बनाई थी। राधा ने अपने भाई के लिए एक सुंदर राखी खरीदी थी।
दोपहर तक रवि घर नहीं आया।
शाम को दरवाजा खुला और रवि लड़खड़ाते हुए अंदर आया।
राधा ने उसकी तरफ देखा और उसकी आंखों में आंसू आ गए।
“भैया… आज भी?”
रवि ने कुछ नहीं कहा।
राधा उसके सामने राखी लेकर बैठ गई।
“बैठिए भैया।”
रवि चुपचाप बैठ गया।
राधा ने राखी उसकी कलाई पर बांधी और बोली, “हर साल मैं आपसे अपनी रक्षा का वादा लेती हूं। लेकिन इस बार मुझे अपनी रक्षा का वादा नहीं चाहिए।”
रवि ने हैरानी से पूछा, “तो क्या चाहिए?”
राधा की आंखों से आंसू गिरने लगे।
“मुझे मेरा पुराना भैया चाहिए।”
रवि के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
राधा बोली, “मुझे वह भैया चाहिए जो पापा के जाने के बाद मेरा हाथ पकड़कर कहता था कि मैं कभी रोऊंगी नहीं। मुझे वह भैया चाहिए जो मेरी स्कूल की फीस के लिए अपनी नई शर्ट नहीं खरीदता था। मुझे वह भैया चाहिए जिस पर मुझे गर्व था।”
रवि की आंखें झुक गईं।
राधा ने उसकी कलाई पकड़कर कहा, “आज मैं आपसे वादा लेती हूं कि आप शराब छोड़ेंगे। गलत दोस्तों को छोड़ेंगे। अपना गुस्सा छोड़ेंगे। और सबसे बड़ा वादा… आप सिर्फ मेरी नहीं, हर लड़की की इज्जत करेंगे।”
रवि कुछ देर तक चुप रहा।
फिर उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
उसने शराब की बोतल उठाई और जमीन पर पटक दी।
“आज से खत्म।”
मां ने पहली बार अपने बेटे की आंखों में शर्म नहीं, बदलाव देखा।
अगले कुछ दिन रवि के लिए बहुत मुश्किल थे। नशे की आदत छोड़ना आसान नहीं था। उसके पुराने दोस्त उसे बुलाते।
“चल रवि, एक पैग लगा ले।”
रवि जवाब देता, “नहीं। मैंने अपनी बहन से वादा किया है।”
धीरे-धीरे उसने काम करना शुरू किया। सुबह जल्दी उठता, मजदूरी करता और शाम को घर लौटता।
कुछ महीने बाद उसका व्यवहार पूरी तरह बदलने लगा।
एक दिन रवि बाजार से लौट रहा था। उसने देखा कि कुछ लड़के एक लड़की का रास्ता रोककर उसे परेशान कर रहे हैं।
लड़की घबराई हुई थी।
रवि कुछ सेकंड के लिए रुका।
उसे राधा की बात याद आई—
“सिर्फ मेरी नहीं, हर लड़की की इज्जत करना।”
रवि आगे बढ़ा और उन लड़कों से बोला, “रास्ता छोड़ो।”
लड़कों ने उसका मजाक उड़ाया।
“तू हमें रोकेगा?”
रवि ने बिना लड़ाई किए आसपास के लोगों को बुलाया और पुलिस को सूचना दी। लड़कों को वहां से हटना पड़ा।
लड़की ने हाथ जोड़कर कहा, “भैया, धन्यवाद।”
रवि मुस्कुराया।
“धन्यवाद मुझे नहीं, मेरी बहन को देना। उसी ने मुझे सिखाया है कि किसी लड़की की मजबूरी तमाशा नहीं होती।”
कुछ समय बाद रवि ने मोहल्ले के युवाओं के साथ मिलकर एक छोटी सी टीम बनाई, जो स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों की सुरक्षा और जागरूकता के लिए काम करने लगी।
एक साल बाद फिर रक्षाबंधन आया।
राधा ने इस बार रवि की कलाई पर राखी बांधी।
रवि ने मुस्कुराकर कहा, “अब तो मैं वादा निभा रहा हूं।”
राधा बोली, “नहीं भैया… अब आप सिर्फ मेरा वादा नहीं निभा रहे। आप एक इंसान होने का फर्ज निभा रहे हैं।”
रवि ने अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा।
“तुमने मुझे राखी नहीं बांधी थी राधा… तुमने मुझे मेरी जिंदगी वापस दी थी।”
राधा रोते हुए भाई से लिपट गई।
उस दिन रवि समझ गया कि भाई होने का मतलब सिर्फ बहन की रक्षा करना नहीं है। असली भाई वह है जो हर लड़की को उसी सम्मान से देखे, जिस सम्मान से वह अपनी बहन को देखता है।
सीख:
नशा इंसान से सिर्फ उसकी सेहत नहीं छीनता, बल्कि उसके रिश्ते और सम्मान भी छीन लेता है। सच्चा बदलाव तब आता है जब इंसान अपनी गलती स्वीकार करके खुद को सुधारने का फैसला करता है। हर लड़की सम्मान की हकदार है और उसकी सुरक्षा सिर्फ उसके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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