सीमा हर साल रक्षाबंधन पर अपने भाई राजू का इंतजार करती थी।
राजू कई साल पहले नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया था।
शुरुआत में वह हर महीने घर आता था, लेकिन धीरे-धीरे काम बढ़ता गया और उसका घर आना कम होता गया।
सीमा हर रक्षाबंधन पर उसे फोन करती।
“भैया, इस बार तो जरूर आना।”
राजू हर बार कहता—
“इस बार कोशिश करूंगा।”
लेकिन कई बार कोशिश पूरी नहीं हो पाती।
एक साल रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले सीमा ने भाई को फोन किया।
“भैया, इस बार भी नहीं आओगे क्या?”
राजू कुछ सेकंड चुप रहा।
“सीमा, ऑफिस में बहुत जरूरी काम है। शायद नहीं आ पाऊंगा।”
सीमा ने धीरे से कहा, “ठीक है।”
फोन कट गया।
लेकिन उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
मां ने पूछा, “क्या हुआ?”
सीमा ने कहा, “कुछ नहीं।”
मां सब समझ गई।
रक्षाबंधन की सुबह घर में मिठाई बनी।
आस-पड़ोस की लड़कियां अपने भाइयों को राखी बांधने जा रही थीं।
सीमा बार-बार दरवाजे की तरफ देखती।
दोपहर हो गई।
फिर शाम हो गई।
लेकिन राजू नहीं आया।
सीमा ने अपनी राखी संभालकर रख दी।
रात को अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।
सीमा ने दरवाजा खोला।
सामने राजू खड़ा था।
सीमा कुछ पल उसे देखती रह गई।
“भैया!”
वह दौड़कर भाई से लिपट गई।
राजू ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“माफ करना बहन। इस बार मैं देर से आया।”
सीमा की आंखों में आंसू थे।
“आपको पता है मैंने कितनी देर इंतजार किया?”
राजू ने कहा, “पता है।”
सीमा ने पूछा, “फिर आए क्यों?”
राजू मुस्कुराया।
“क्योंकि रास्ते में मुझे पापा की एक बात याद आ गई।”
सीमा चुप हो गई।
राजू बोला—
“पापा कहते थे कि दुनिया में कितना भी बड़ा काम क्यों न हो, अपने लोगों के लिए समय निकालना जरूरी है।”
राजू ने अपनी जेब से एक छोटा सा डिब्बा निकाला।
उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में दोनों बच्चे थे।
सीमा ने तस्वीर हाथ में ली और रोने लगी।
“आपने इसे संभालकर रखा?”
राजू बोला, “तुम्हारी हर राखी संभालकर रखी है।”
सीमा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।
“इस बार मैं आपसे कोई वादा नहीं लूंगी।”
राजू ने पूछा, “क्यों?”
सीमा बोली, “क्योंकि आज मुझे समझ आया कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी के दिन नहीं होता।”
राजू ने कहा, “तो फिर?”
“जब मैं खुश हूं, तब भी आप मेरे भाई हैं। जब मैं दुखी हूं, तब भी। और जब आप दूर हैं, तब भी।”
राजू की आंखें भर आईं।
उसने बहन से कहा, “मैं वादा करता हूं कि चाहे जिंदगी कितनी भी व्यस्त हो जाए, तुम्हारे लिए मेरे पास हमेशा समय रहेगा।”
उस दिन दोनों देर रात तक बचपन की बातें करते रहे।
सुबह राजू को वापस जाना था।
सीमा ने दरवाजे पर उसे विदा करते हुए कहा—
“भैया, अगली राखी पर देर मत करना।”
राजू मुस्कुराया।
“अगली राखी पर मैं सबसे पहले दरवाजे पर खड़ा मिलूंगा।”
कुछ महीने बाद राजू की नौकरी में बड़ी तरक्की हुई।
उसने सबसे पहले अपनी बहन को फोन किया।
“सीमा, तुम्हारे लिए एक खबर है।”
“क्या?”
“मैंने अपने ऑफिस के पास एक घर ले लिया है।”
सीमा खुश होकर बोली, “अच्छा! अब तो आप हमें जल्दी-जल्दी मिलने आओगे।”
राजू हंस पड़ा।
“नहीं। अब तुम और मां मेरे पास आओगी।”
सीमा कुछ बोल नहीं पाई।
उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
उसने सिर्फ इतना कहा—
“भैया, इस बार राखी का इंतजार बहुत छोटा होगा।”
राजू ने जवाब दिया—
“क्योंकि अब मैं समझ गया हूं कि जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके लिए समय निकालना नहीं पड़ता… उन्हें समय देना पड़ता है।”
सीख:
रिश्ते दूरी से कमजोर नहीं होते, लेकिन समय न देने से जरूर कमजोर हो सकते हैं। अपने प्रिय लोगों को यह महसूस कराते रहिए कि वे आपकी जिंदगी में महत्वपूर्ण हैं। त्योहार सिर्फ रस्म नहीं, रिश्तों को फिर से करीब लाने का अवसर होते हैं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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