शहर के एक छोटे से घर में मीरा अपनी मां और बड़े भाई मोहन के साथ रहती थी। मोहन एक साधारण नौकरी करता था और अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता था।
हर साल रक्षाबंधन पर मीरा अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती और बदले में मोहन उसे कोई न कोई उपहार जरूर देता।
कभी नई ड्रेस, कभी चूड़ियां, कभी उसकी पसंद की मिठाई।
लेकिन इस साल हालात कुछ अलग थे।
मोहन की नौकरी छूट गई थी।
घर का किराया बाकी था और मां की दवाइयों का खर्च भी चल रहा था।
मीरा यह सब जानती थी, लेकिन उसने भाई के सामने कभी अपनी परेशानी नहीं रखी।
रक्षाबंधन से एक दिन पहले मीरा बाजार गई।
उसकी नजर एक सुंदर राखी पर पड़ी।
राखी बहुत महंगी नहीं थी, लेकिन उसमें एक छोटा सा चांदी जैसा चमकता हुआ फूल लगा था।
मीरा ने अपनी जमा की हुई थोड़ी सी रकम से वह राखी खरीद ली।
अगले दिन सुबह उसने घर सजाया।
मोहन चुपचाप बैठा हुआ था।
उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “भैया, आज तो मुस्कुराइए। आज राखी है।”
मोहन ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“हां, मेरी बहन। लेकिन इस बार शायद मैं तुम्हें कोई तोहफा नहीं दे पाऊंगा।”
मीरा ने तुरंत उसके मुंह पर हाथ रख दिया।
“मुझे कोई तोहफा नहीं चाहिए।”
“लेकिन हर साल तो…”
“हर साल आप मुझे बाजार से चीजें लाकर देते थे। इस बार मुझे आपसे कुछ और चाहिए।”
मोहन ने पूछा, “क्या?”
मीरा ने राखी की थाली उसके सामने रखी।
“आप मेरा हाथ पकड़कर एक वादा कीजिए।”
मोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
मीरा बोली, “चाहे जिंदगी में कितनी भी परेशानी आए, आप कभी हार नहीं मानेंगे।”
मोहन चुप हो गया।
मीरा की आंखों में आंसू थे।
“आप मेरे भाई हैं। अगर आप टूट जाएंगे तो मैं किससे हिम्मत लेना सीखूंगी?”
मोहन की आंखें भी भर आईं।
मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।
“मुझे बस इतना चाहिए कि आप कोशिश करते रहिए।”
मोहन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।
“मैं वादा करता हूं।”
उस दिन के बाद मोहन ने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया।
कई जगह से जवाब नहीं आया।
कहीं उसे मना कर दिया गया।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
सुबह नौकरी की तलाश करता और शाम को छोटी-मोटी मजदूरी करके घर चलाता।
एक दिन उसे एक कंपनी में काम मिल गया।
वेतन पहले से कम था, लेकिन मोहन बहुत खुश था।
धीरे-धीरे घर की स्थिति सुधरने लगी।
कुछ महीने बाद मोहन ने अपनी पहली अच्छी तनख्वाह से मीरा के लिए एक सुंदर ड्रेस खरीदी।
जब उसने ड्रेस मीरा को दी तो मीरा की आंखें नम हो गईं।
“भैया, इसकी क्या जरूरत थी?”
मोहन मुस्कुराया।
“तुमने मुझे उस दिन जो दिया था, उसके सामने ये कुछ भी नहीं।”
मीरा ने पूछा, “मैंने क्या दिया था?”
मोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी दिखाई।
“तुमने मुझे उम्मीद दी थी।”
कई साल बाद मोहन की जिंदगी काफी बदल चुकी थी।
वह मेहनत करके एक छोटे से व्यवसाय का मालिक बन गया।
उसके पास अब पैसे की कमी नहीं थी।
लेकिन हर रक्षाबंधन पर वह उसी पुराने तरीके से अपनी बहन के सामने बैठता।
एक दिन मीरा ने मजाक में पूछा, “भैया, अब तो आप बहुत अमीर हो गए हैं। इस बार मेरा सबसे महंगा तोहफा क्या है?”
मोहन हंसते हुए बोला, “तुम्हें जो चाहिए मांग लो।”
मीरा कुछ देर सोचकर बोली—
“मुझे वही चाहिए जो आपने पहली राखी पर दिया था।”
मोहन हैरान हुआ।
“क्या?”
मीरा मुस्कुराई।
“आपका साथ।”
मोहन की आंखों में आंसू आ गए।
उसने बहन को गले लगा लिया।
उसे समझ आ गया कि रिश्तों में सबसे महंगा तोहफा सोना, कपड़े या पैसे नहीं होते।
सबसे अनमोल तोहफा होता है—मुश्किल समय में किसी का साथ।
सीख:
रिश्तों की कीमत उपहारों से नहीं, बल्कि मुश्किल समय में साथ खड़े रहने से होती है। कभी-कभी किसी के जीवन में उम्मीद के दो शब्द ही सबसे बड़ा तोहफा बन जाते हैं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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