🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: #प्यार #इंतज़ार

  • रक्षाबंधन का दिन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    रक्षाबंधन का दिन था।

     

    घर में सुबह से ही हलचल थी। माँ रसोई में मिठाई तैयार कर रही थीं और रिया अपने कमरे में बैठी राखी की थाली सजा रही थी।

     

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

     

    उसकी सहेली ने सुबह ही उसे अपनी राखी का गिफ्ट दिखाया था।

     

    महंगा फोन।

     

    नई घड़ी।

     

    कपड़े।

     

    और भी बहुत कुछ।

     

    रिया ने बस मुस्कुराकर कहा था,

     

    “बहुत अच्छा है।”

     

    लेकिन उसके मन में एक पुरानी बात फिर से आ गई।

     

    उसके भाई आरव ने उसे कभी राखी पर कोई गिफ्ट नहीं दिया था।

     

    कभी चॉकलेट नहीं।

     

    कभी कोई कपड़ा नहीं।

     

    कभी कोई खास चीज नहीं।

     

    रिया बचपन से हर साल उसे राखी बांधती थी और आरव बस इतना कहता था,

     

    “धन्यवाद, छोटी।”

     

    फिर चला जाता।

     

    रिया को यह बात हमेशा चुभती थी।

     

    वह सोचती थी,

     

    “शायद भैया को मेरी उतनी परवाह नहीं है।”

     

    उस दिन भी आरव सुबह से घर पर नहीं था।

     

    रिया ने माँ से पूछा,

     

    “भैया कहां गए हैं?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “काम से बाहर गए हैं।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “आज के दिन भी?”

     

    माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रिया की सहेलियों ने अपनी तस्वीरें भेजनी शुरू कर दीं।

     

    किसी ने लिखा—

     

    “मेरे भाई ने मुझे सरप्राइज दिया!”

     

    किसी ने लिखा—

     

    “बेस्ट भाई!”

     

    रिया ने मोबाइल बंद कर दिया।

     

    उसकी आंखें नम हो गईं।

     

    वह धीरे से बोली,

     

    “सबके भाई ऐसे होते हैं… बस मेरे नहीं।”

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने सुन लिया।

     

    “ऐसा क्यों कह रही है?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि सच है।”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तेरे भैया तुझसे बहुत प्यार करते हैं।”

     

    रिया हंस पड़ी।

     

    “कैसा प्यार, माँ?”

     

    माँ चुप रहीं।

     

    रिया ने कहा,

     

    “उन्होंने कभी मुझे महसूस ही नहीं होने दिया।”

     

    “हर कोई प्यार एक जैसा नहीं दिखाता बेटा।”

     

    रिया ने नाराज़ होकर कहा,

     

    “लेकिन कभी तो दिखाना चाहिए।”

     

    शाम होने लगी।

     

    आरव अभी तक घर नहीं आया था।

     

    रिया ने राखी की थाली एक तरफ रख दी।

     

    “अब नहीं बांधूंगी।”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “जब उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता तो मुझे क्यों पड़े?”

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया तेजी से बाहर आई।

     

    सामने आरव खड़ा था।

     

    उसके कपड़े धूल से भरे थे।

     

    चेहरे पर थकान थी।

     

    हाथ में कोई गिफ्ट नहीं था।

     

    रिया ने उसे देखकर मुंह फेर लिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “राखी नहीं बांधेगी?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “आपको क्या फर्क पड़ता है?”

     

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    “फर्क पड़ता है।”

     

    रिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    आरव ने जवाब नहीं दिया।

     

    रिया ने गुस्से में कहा,

     

    “आपको कभी कुछ देना नहीं होता। कभी कोई गिफ्ट नहीं। कभी कोई सरप्राइज नहीं।”

     

    आरव शांत खड़ा रहा।

     

    रिया की आवाज भर आई।

     

    “मैं आपकी बहन हूं या बस राखी बांधने वाली कोई लड़की?”

     

    यह सुनकर माँ की आंखें भर आईं।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “रिया, पहले राखी बांध दे।”

     

    रिया ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    आरव पहली बार थोड़ा गंभीर हुआ।

     

    “प्लीज।”

     

    रिया चुप हो गई।

     

    माँ ने थाली उसकी तरफ बढ़ाई।

     

    रिया ने बिना कुछ बोले तिलक लगाया और राखी बांध दी।

     

    आरव ने अपनी कलाई को कुछ देर देखा।

     

    फिर अपनी जेब से एक पुराना-सा कागज निकाला।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    आरव ने वह कागज उसके हाथ में रख दिया।

     

    रिया ने पढ़ा।

     

    वह एक कोचिंग संस्थान की फीस की रसीद थी।

     

    रिया हैरान हुई।

     

    “ये मेरी कोचिंग की फीस है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन ये तो पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं बेटा।”

     

    रिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    आरव बोला,

     

    “पापा की दुकान में उस समय बहुत परेशानी थी।”

     

    रिया का चेहरा बदल गया।

     

    “तो फीस किसने दी?”

     

    आरव चुप रहा।

     

    रिया ने रसीद पर नाम देखा।

     

    आरव शर्मा।

     

    रिया के हाथ कांपने लगे।

     

    “आपने?”

     

    आरव ने हल्की आवाज में कहा,

     

    “हां।”

     

    रिया को याद आया कि उस साल आरव ने नया फोन खरीदने की बहुत इच्छा जताई थी।

     

    लेकिन उसने कभी नहीं खरीदा।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “लेकिन आपने कहा था कि आपको फोन पसंद नहीं आया।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “झूठ बोला था।”

     

    रिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    आरव ने जेब से एक और कागज निकाला।

     

    यह उसकी कॉलेज की फीस की रसीद थी।

     

    फिर एक और।

     

    उसकी किताबों की।

     

    उसके प्रतियोगी फॉर्म की।

     

    रिया अब कुछ बोल नहीं पा रही थी।

     

    “ये सब… आपने किया?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तू पढ़ना चाहती थी।”

     

    “लेकिन आप?”

     

    “मैं काम कर रहा था।”

     

    रिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    आरव ने उसकी कलाई की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू ये कभी महसूस न करे कि तेरी पढ़ाई किसी पर बोझ है।”

     

    रिया रो पड़ी।

     

    उसे अचानक पिछले कई साल याद आने लगे।

     

    हर बार जब उसे किसी चीज की जरूरत होती, माँ कहतीं—

     

    “देखते हैं।”

     

    और कुछ दिनों बाद वह चीज उसके पास होती।

     

    रिया सोचती थी घर में सब सामान्य है।

     

    उसे नहीं पता था कि उसका भाई उसके लिए अपनी जरूरतें पीछे करता रहा।

     

    रिया ने रोते हुए कहा,

     

    “लेकिन राखी पर आपने मुझे कभी गिफ्ट नहीं दिया।”

     

    आरव ने पहली बार हल्के से हंसकर कहा,

     

    “इसका जवाब मेरे पास है।”

     

    वह अंदर गया।

     

    कुछ देर बाद एक छोटा-सा डिब्बा लेकर आया।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “खोल।”

     

    रिया ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर बहुत सारी छोटी-छोटी चीजें थीं।

     

    एक बचपन की तस्वीर।

     

    उसकी टूटी हुई पेंसिल का छोटा हिस्सा।

     

    एक पुराना हेयर क्लिप।

     

    स्कूल की एक छोटी फोटो।

     

    रिया की बनाई हुई राखियां।

     

    हर साल की।

     

    रिया हैरान होकर बैठ गई।

     

    “आपने ये सब संभालकर रखा?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “पता नहीं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “मैं गिफ्ट खरीदने में अच्छा नहीं हूं।”

     

    रिया हल्का-सा हंस पड़ी।

     

    “तो?”

     

    “लेकिन चीजें संभालकर रखने में अच्छा हूं।”

     

    रिया ने डिब्बे में रखी राखियों को छुआ।

     

    हर साल की राखी।

     

    किसी का धागा टूट चुका था।

     

    किसी का रंग फीका पड़ गया था।

     

    लेकिन आरव ने एक भी नहीं फेंकी थी।

     

    रिया ने पूछा,

     

    “भैया, आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं कि आप ये सब रखते हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तूने कभी पूछा नहीं।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैंने पूछा था… कि आप मुझसे प्यार करते हो या नहीं।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “तब मैं क्या बोला था?”

     

    रिया को याद आया।

     

    वह शायद दस साल की थी।

     

    उसने गुस्से में पूछा था,

     

    “भैया, आप मुझे प्यार करते हो?”

     

    आरव ने जवाब दिया था—

     

    “बहुत सवाल करती है।”

     

    उस समय रिया रो पड़ी थी।

     

    आज आरव ने कहा,

     

    “मुझे उस समय कहना चाहिए था।”

     

    रिया की आंखें भर आईं।

     

    “तो आज कहो।”

     

    आरव उसकी तरफ देखने लगा।

     

    रिया ने फिर कहा,

     

    “आज साफ-साफ कहो।”

     

    आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां रिया।”

     

    उसकी आवाज धीमी थी।

     

    “मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं।”

     

    रिया फूटकर रो पड़ी।

     

    वह अपने भाई के गले लग गई।

     

    आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    रिया रोते हुए बोली,

     

    “आप बहुत बुरे हो।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “अब क्या कर दिया?”

     

    “पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “तूने फिर पूछा नहीं।”

     

    रिया ने पीछे हटकर कहा,

     

    “अब पूछूंगी भी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब पता है।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    रिया ने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा रखा।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    आरव ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर-सी घड़ी थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    रिया ने कहा,

     

    “क्योंकि हर रक्षाबंधन पर सिर्फ भाई ही नहीं देता।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    रिया ने कहा,

     

    “इस बार मेरी बारी है।”

     

    आरव की आंखें नम हो गईं।

     

    रिया ने उसकी पुरानी राखियों वाले डिब्बे को देखते हुए कहा,

     

    “भैया, आप गिफ्ट देना नहीं जानते थे…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    रिया मुस्कुराई।

     

    “आपने मुझे सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है—बिना बताए हमेशा मेरे साथ रहना।”

     

    उस दिन रिया को कोई महंगा फोन नहीं मिला।

     

    न कोई चमकदार गिफ्ट।

     

    लेकिन उसे एक ऐसा सच मिल गया, जो किसी भी तोहफे से ज्यादा कीमती था।

     

    उसे समझ आ गया कि—

     

    हर प्यार बोलकर नहीं दिखाया जाता।

     

    कुछ लोग हमें “आई लव यू” नहीं कहते।

     

    वे हमारी फीस भरते हैं।

     

    हमारी जरूरतें पूरी करते हैं।

     

    हमारी छोटी-छोटी बातें याद रखते हैं।

     

    और हमारी बांधी हुई राखियां सालों तक संभालकर रखते हैं।

     

    उस शाम रिया ने भाई की कलाई पर बंधी राखी को देखा और मुस्कुराई।

     

    उसे आखिरकार अपना रक्षाबंधन का गिफ्ट मिल गया था।

     

    एक ऐसा भाई, जिसने शायद कभी प्यार के बड़े-बड़े शब्द नहीं बोले… लेकिन अपनी हर छोटी-बड़ी चीज में बहन के लिए प्यार छिपाकर रखा।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मेरी बहन ने राखी नहीं खरीदी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    मेरी बहन ने राखी क्यों नहीं खरीदी?

    “माँ, इस साल दीदी ने मेरे लिए राखी खरीदी ही नहीं।”

     

    रोहन ने यह बात थोड़ी नाराज़गी और थोड़े दुख के साथ कही।

     

    माँ रसोई में खड़ी थीं। उन्होंने पलटकर अपने बेटे को देखा।

     

    “तुझे कैसे पता?”

     

    रोहन ने मोबाइल एक तरफ रखते हुए कहा,

     

    “हर साल रक्षाबंधन से पहले वो मुझे फोन करके पूछती थी कि इस बार कौन-सी राखी पसंद है। इस बार उसने एक बार भी नहीं पूछा।”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    “शायद व्यस्त होगी।”

     

    रोहन ने तुरंत कहा,

     

    “दीदी कभी इतनी व्यस्त नहीं होती कि राखी भूल जाए।”

     

    उसकी आवाज में शिकायत थी।

     

    दरअसल, रोहन और उसकी बड़ी बहन काव्या का रिश्ता बहुत खास था।

     

    काव्या रोहन से सात साल बड़ी थी। बचपन से ही वह उसकी दूसरी माँ जैसी थी।

     

    जब रोहन छोटा था, काव्या ही उसे स्कूल के लिए तैयार करती।

     

    उसके जूते ढूंढती।

     

    होमवर्क करवाती।

     

    और जब वह रोता, तो माँ से पहले काव्या उसके पास पहुंचती।

     

    लेकिन पिछले दो सालों में काव्या की शादी हो गई थी।

     

    अब वह दूसरे शहर में रहती थी।

     

    फिर भी हर रक्षाबंधन पर वह सबसे पहले घर आती थी।

     

    रोहन हमेशा उसका इंतजार करता।

     

    लेकिन इस बार…

     

    रक्षाबंधन से तीन दिन पहले तक भी काव्या का कोई फोन नहीं आया था।

     

    रोहन ने खुद भी उसे फोन नहीं किया।

     

    उसने सोचा,

     

    “अगर दीदी को याद होगा, तो खुद फोन करेंगी।”

     

    लेकिन फोन नहीं आया।

     

    अगले दिन भी नहीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह रोहन देर तक सोता रहा।

     

    माँ ने कई बार आवाज लगाई।

     

    “रोहन, उठ जा बेटा।”

     

    “नहीं उठना।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “तो?”

     

    माँ उसके पास बैठ गईं।

     

    “तू नाराज़ है?”

     

    रोहन ने करवट बदल ली।

     

    “नहीं।”

     

    माँ हल्का सा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे तो लग रहा है बहुत नाराज़ है।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “दीदी भूल गईं।”

     

    माँ ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।

     

    “हर बात के पीछे कोई वजह होती है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “इस बार उनकी कोई वजह नहीं सुननी।”

     

    माँ चुप हो गईं।

     

    दोपहर हो गई।

     

    रोहन बार-बार फोन देखने लगा।

     

    लेकिन कोई कॉल नहीं।

     

    शाम होने लगी।

     

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रोहन तेजी से उठा।

     

    उसे लगा काव्या होगी।

     

    लेकिन बाहर पड़ोस का एक बच्चा खड़ा था।

     

    उसने रोहन को एक छोटा-सा लिफाफा दिया।

     

    “ये आपके लिए है।”

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “किसने दिया?”

     

    बच्चा बोला,

     

    “एक दीदी ने।”

     

    रोहन ने तुरंत लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक छोटा-सा कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “भैया, आज शाम 7 बजे पुराने पार्क में आ जाना। अकेले।”

     

    नीचे लिखा था—

     

    “तुम्हारी बहन।”

     

    रोहन का गुस्सा अचानक कम होने लगा।

     

    लेकिन उसने सोचा,

     

    “अब याद आई राखी?”

     

    माँ ने पूछा,

     

    “कहां जा रहा है?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “थोड़ी देर में आता हूं।”

     

    ठीक सात बजे वह पुराने पार्क पहुंच गया।

     

    पार्क में हल्का अंधेरा था।

     

    एक कोने में पीली रोशनी जल रही थी।

     

    वहां एक बेंच पर काव्या बैठी थी।

     

    रोहन को देखते ही वह खड़ी हो गई।

     

    उसके चेहरे पर थकान थी।

     

    रोहन उसके सामने जाकर रुक गया।

     

    “अब याद आई मैं?”

     

    काव्या मुस्कुराने की कोशिश करने लगी।

     

    “तुझे कभी भूली थी क्या?”

     

    “तो फोन क्यों नहीं किया?”

     

    “काम था।”

     

    रोहन नाराज़ हो गया।

     

    “बस? इतनी बड़ी वजह?”

     

    काव्या चुप रही।

     

    “और राखी?”

     

    रोहन ने पूछा।

     

    काव्या ने अपने बैग की तरफ देखा।

     

    “नहीं खरीदी।”

     

    रोहन का दिल टूट गया।

     

    “मतलब सच में भूल गईं?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    उसने बैग से एक छोटा-सा कपड़े का टुकड़ा निकाला।

     

    उस पर लाल धागे से कुछ बनाया गया था।

     

    रोहन ने ध्यान से देखा।

     

    वह राखी थी।

     

    बहुत साधारण।

     

    धागे से बनी हुई।

     

    बीच में छोटे-छोटे मोती लगे थे।

     

    रोहन ने पूछा,

     

    “ये आपने बनाई है?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “लेकिन आप तो हमेशा बाजार से सबसे सुंदर राखी लाती थीं।”

     

    काव्या की आंखें नम हो गईं।

     

    “इस बार बाजार जाने का समय नहीं मिला।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    फिर उसने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    काव्या ने बैग से एक और चीज निकाली।

     

    एक छोटा-सा अस्पताल का बिल।

     

    रोहन ने उसे देखा।

     

    “ये किसका है?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मेरा नहीं।”

     

    “फिर किसका?”

     

    “माँ का।”

     

    रोहन का चेहरा बदल गया।

     

    “माँ?”

     

    “कुछ दिनों पहले उनकी तबीयत खराब हुई थी। उन्होंने तुझसे छिपाया क्योंकि तेरी परीक्षाएं थीं।”

     

    रोहन स्तब्ध रह गया।

     

    “लेकिन आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    काव्या ने कहा,

     

    “क्योंकि तू परेशान हो जाता।”

     

    रोहन को अचानक याद आया।

     

    पिछले कई दिनों से माँ उससे कह रही थीं—

     

    “तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे।”

     

    अब उसे सब समझ आने लगा।

     

    काव्या ने कहा,

     

    “मैं पिछले तीन दिनों से शहर में थी। माँ के इलाज और बाकी काम में लगी थी।”

     

    रोहन की आंखें भर आईं।

     

    “और आपने मुझे बताया भी नहीं।”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “बड़ी बहन होने की एक बीमारी होती है।”

     

    “क्या?”

     

    “छोटे भाई को परेशान नहीं होने देती।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन मैं अब छोटा नहीं हूं, दीदी।”

     

    काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मेरे लिए हमेशा रहेगा।”

     

    रोहन चुप हो गया।

     

    काव्या ने राखी उठाई।

     

    “बांध दूं?”

     

    रोहन ने तुरंत अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    काव्या के हाथ कांप रहे थे।

     

    राखी बांधते हुए उसने कहा,

     

    “मुझे लगा था इस बार शायद तू मुझसे नाराज़ रहेगा।”

     

    रोहन ने धीरे से कहा,

     

    “था।”

     

    “अब?”

     

    “अब भी हूं।”

     

    काव्या उसे देखने लगी।

     

    रोहन ने पहली बार मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मुझे इतना बड़ा समझा ही नहीं कि सच बता सकें।”

     

    काव्या की आंखों में आंसू के साथ मुस्कान आ गई।

     

    “तो माफ कर दे।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “एक शर्त पर।”

     

    “क्या?”

     

    “अगली बार कुछ भी हो, मुझसे छिपाना नहीं।”

     

    काव्या ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है।”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    काव्या ने अपनी उंगली आगे की।

     

    “वादा।”

     

    रोहन ने अचानक पूछा,

     

    “दीदी, आपने मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं खरीदा?”

     

    काव्या ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “इस बार नहीं।”

     

    रोहन ने बनावटी दुख दिखाया।

     

    “वाह! राखी भी हाथ से बनी और गिफ्ट भी नहीं।”

     

    काव्या हंस पड़ी।

     

    “बहुत बुरे भाई हो तुम।”

     

    “और आप बहुत बुरी बहन हैं।”

     

    दोनों कुछ सेकंड चुप रहे।

     

    फिर अचानक रोहन ने अपनी बहन को गले लगा लिया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए दीदी।”

     

    काव्या ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    रोहन ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को छुआ।

     

    “बस अगली बार मुझे भूलना मत।”

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “तू मेरे लिए सांस लेने जैसा है। कोई अपनी सांस भूल सकता है क्या?”

     

    रोहन की आंखें फिर भर आईं।

     

    कुछ देर बाद दोनों घर लौट आए।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    रोहन ने उन्हें देखते ही कहा,

     

    “माँ, आप दोनों ने मुझे बच्चा समझ रखा है क्या?”

     

    माँ और काव्या एक-दूसरे को देखने लगीं।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तुझे पता चल गया?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “हां।”

     

    फिर वह माँ के पास गया।

     

    “अगली बार मुझसे कुछ छिपाया तो मैं सच में नाराज़ हो जाऊंगा।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब नहीं छिपाएंगे।”

     

    रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “पक्का?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “पक्का।”

     

    उस रात रोहन अपने कमरे में बैठा अपनी कलाई की तरफ देख रहा था।

     

    वह राखी बहुत साधारण थी।

     

    न उसमें सोने की चमक थी।

     

    न महंगे पत्थर।

     

    न बाजार जैसी सजावट।

     

    लेकिन रोहन को लगा कि उसने जिंदगी की सबसे कीमती राखी पहनी है।

     

    क्योंकि उस राखी को खरीदने के लिए बहन के पास समय नहीं था…

     

    लेकिन भाई के लिए अपने हाथों से बनाने का प्यार जरूर था।

     

    अगले दिन काव्या वापस अपने घर जाने लगी।

     

    रोहन ने दरवाजे पर उसे रोक लिया।

     

    “दीदी!”

     

    “हां?”

     

    उसने कहा,

     

    “अगले साल मुझे कौन-सी राखी बांधोगी?”

     

    काव्या मुस्कुराई।

     

    “तुझे कौन-सी चाहिए?”

     

    रोहन ने अपनी कलाई पर बंधी राखी को देखते हुए कहा,

     

    “ऐसी ही।”

     

    “इतनी साधारण?”

     

    रोहन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    काव्या ने पूछा,

     

    “फिर कैसी?”

     

    रोहन ने कहा,

     

    “जिसे बनाने में बाजार के पैसे नहीं, मेरी बहन का दिल लगा हो।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    बस मुस्कुराई और अपने भाई के सिर पर हाथ रख दिया।

     

    और उस दिन रोहन को समझ आया—

     

    हर राखी की कीमत उसके धागे से नहीं होती।

     

    कुछ राखियां इसलिए सबसे कीमती होती हैं…

     

    क्योंकि उन्हें बांधने वाला इंसान हमें बिना बताए भी हमारी फिक्र करता रहता है।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक राखी हजारों यादें

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक राखी, हजारों यादें

     

    “भैया की अलमारी खोलने की इजाजत मुझे कभी नहीं थी।”

     

    मीरा ने अलमारी के सामने खड़े होकर धीरे से खुद से कहा।

     

    आज कई साल बाद वह अपने पुराने घर में आई थी। माँ ने उसे फोन करके कहा था कि कमरे की सफाई कर दे, क्योंकि काफी समय से बंद पड़ा था।

     

    अलमारी खोलते ही पुराने कपड़ों की खुशबू कमरे में फैल गई।

     

    मीरा कपड़े निकालकर अलग कर रही थी कि अचानक पीछे की तरफ रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा नीचे गिर पड़ा।

     

    उसने डिब्बा उठाया।

     

    ऊपर धूल जमी थी।

     

    मीरा ने अपनी हथेली से धूल हटाई।

     

    डिब्बे पर छोटे अक्षरों में लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन के लिए।”

     

    मीरा का हाथ रुक गया।

     

    यह उसके भाई आरव की लिखावट थी।

     

    वही आरव, जो छह साल पहले घर छोड़कर चला गया था।

     

    उसके बाद कभी वापस नहीं आया।

     

    घरवालों से उसकी आखिरी मुलाकात भी बहुत अच्छी नहीं रही थी।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां रखी थीं।

     

    कुछ टूट चुकी थीं, कुछ के रंग फीके पड़ गए थे।

     

    सबसे ऊपर एक छोटी-सी राखी रखी थी, जो शायद मीरा ने बचपन में बनाई थी।

     

    उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया।

     

    वह आठ साल की थी और आरव उससे छह साल बड़ा था।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह भाई के पीछे भागती थी।

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    आरव हाथ पीछे कर लेता।

     

    “पहले बताओ गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    मीरा मुंह बनाकर कहती,

     

    “आप पहले राखी बंधवाओ।”

     

    “नहीं। पहले गिफ्ट।”

     

    “ठीक है, इस बार गिफ्ट नहीं दूंगी।”

     

    “तो राखी भी नहीं बंधवाऊंगा।”

     

    दोनों की नोकझोंक चलती रहती।

     

    फिर आखिर में आरव खुद हाथ आगे कर देता।

     

    “चल, बांध दे।”

     

    मीरा हंसते हुए राखी बांधती और आरव उसके सिर पर हाथ रखकर कहता,

     

    “हमेशा खुश रहना।”

     

    मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने अगली राखी उठाई।

     

    उसके साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा की स्कूल फीस भरने के लिए मैंने अपनी नई साइकिल नहीं खरीदी थी।”

     

    मीरा चौंक गई।

     

    उसे वह बात कभी पता नहीं थी।

     

    उसे हमेशा लगा था कि आरव ने साइकिल खरीदी ही नहीं क्योंकि उसे साइकिल पसंद नहीं थी।

     

    उसने अगली पर्ची उठाई।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा को तेज बुखार था और मैंने पूरी रात उसके पास बैठकर बिताई थी।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसे याद था।

     

    उस रात वह बार-बार कह रही थी,

     

    “भैया, मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव उसका हाथ पकड़कर कह रहा था,

     

    “मैं हूं ना। तू सो जा।”

     

    मीरा ने अगली राखी उठाई।

     

    फिर एक और।

     

    हर राखी के साथ एक याद जुड़ी थी।

     

    कहीं उसने मीरा की स्कूल फीस के लिए अपनी चीज बेची थी।

     

    कहीं उसकी किताबें खरीदी थीं।

     

    कहीं उसकी गलती छिपाकर उसे पापा की डांट से बचाया था।

     

    मीरा डिब्बे के नीचे तक पहुंच गई।

     

    वहां एक बंद लिफाफा रखा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था—

     

    “मीरा को तभी देना, जब उसे लगे कि उसका भाई उसे छोड़कर चला गया।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    “मीरा,

     

    अगर तू ये पत्र पढ़ रही है, तो शायद तू मुझसे बहुत नाराज होगी।

     

    तुझे लगेगा कि मैं बिना कुछ कहे घर छोड़कर चला गया।

     

    तुझे लगेगा कि मुझे तुझसे कोई प्यार नहीं था।

     

    लेकिन सच कुछ और है।

     

    पापा की बीमारी के बाद घर पर बहुत कर्ज हो गया था। मैं चाहता था कि तेरी पढ़ाई किसी भी हालत में न रुके।

     

    मुझे शहर से बाहर नौकरी मिली थी।

     

    मैं जानता था कि अगर मैं चला गया तो तू मुझसे नाराज होगी।

     

    लेकिन अगर मैं नहीं जाता, तो शायद तेरी पढ़ाई रुक जाती।

     

    इसलिए मैंने जाने का फैसला किया।

     

    माँ से कहा कि तुझे मत बताना।

     

    मैं चाहता था कि तू पढ़ाई करे और अपने सपने पूरे करे।

     

    मैंने कभी तुझे अकेला छोड़ना नहीं चाहा।

     

    बस चाहता था कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

     

    और हां…

     

    हर रक्षाबंधन पर मैं तेरी राखी लेने आता था।

     

    तू मुझे देख नहीं पाती थी, क्योंकि मैं दूर से माँ को राखी दे जाता था।

     

    मुझे डर था कि अगर मैं सामने आ गया तो शायद वापस जाने की हिम्मत नहीं कर पाऊंगा।

     

    तू मुझे याद करती होगी।

     

    मैं भी तुझे हर दिन याद करता हूं।

     

    तेरा भाई।”

     

    मीरा पत्र को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई,

     

    “तुझे मिल गया?”

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    “माँ… आपने मुझसे ये सब क्यों छिपाया?”

     

    माँ की आंखें भी भर आईं।

     

    “क्योंकि ये आरव की इच्छा थी।”

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “पता नहीं।”

     

    मीरा ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    “पिछले साल तक वह कभी-कभी फोन करता था। फिर उसका फोन बंद हो गया।”

     

    मीरा का दिल बैठ गया।

     

    उसने तुरंत भाई का पुराना नंबर मिलाया।

     

    फोन बंद था।

     

    वह पूरी रात आरव की तस्वीरें देखती रही।

     

    बचपन की तस्वीरें।

     

    स्कूल की तस्वीरें।

     

    रक्षाबंधन की तस्वीरें।

     

    हर तस्वीर में एक ही चीज दिखाई दे रही थी—

     

    आरव की कलाई पर राखी।

     

    अगली सुबह मीरा ने फैसला किया।

     

    “माँ, मैं भैया को ढूंढने जाऊंगी।”

     

    “लेकिन कहां?”

     

    “जहां से उनका आखिरी फोन आया था।”

     

    कई घंटों की तलाश के बाद उसे पता चला कि आरव जिस शहर में काम करता था, वहां एक छोटी-सी दुकान थी जहां वह अक्सर जाया करता था।

     

    मीरा वहां पहुंची।

     

    दुकानदार ने उसे देखते ही पूछा,

     

    “आप आरव की बहन हैं?”

     

    मीरा की आंखें चमक उठीं।

     

    “जी! आपको पता है वो कहां हैं?”

     

    दुकानदार मुस्कुराया।

     

    “वो कुछ महीने पहले यहां से गया था। लेकिन जाने से पहले एक चीज मेरे पास छोड़ गया था।”

     

    उसने दराज से एक छोटा डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक नई राखी थी।

     

    और एक छोटी-सी पर्ची।

     

    “इस बार शायद मैं घर न आ पाऊं। लेकिन मेरी बहन राखी बांधना मत भूलना।”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह उसी समय घर लौट आई।

     

    माँ के सामने बैठकर उसने राखी उठाई।

     

    “भैया जहां भी होंगे, आज मैं उन्हें राखी बांधूंगी।”

     

    उसने राखी अपनी कलाई पर बांधी।

     

    फिर आंखें बंद करके बोली,

     

    “भैया, आपने कहा था ना कि मैं हमेशा खुश रहूं?”

     

    उसकी आवाज भर्रा गई।

     

    “तो आप भी जहां हैं, खुश रहना।”

     

    अचानक बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    माँ ने दरवाजा खोला।

     

    सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    हाथ में छोटा-सा बैग था।

     

    चेहरे पर हल्की मुस्कान।

     

    मीरा ने उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे पहचान ही नहीं पाई।

     

    फिर उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “भैया…!”

     

    आरव ने मुस्कुराकर हाथ आगे कर दिया।

     

    “राखी लाई है?”

     

    मीरा दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “इतने साल कहां थे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तेरी यादों में।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब नहीं जाऊंगा।”

     

    मीरा ने पुराने लकड़ी के डिब्बे को देखा।

     

    उसमें पड़ी हर राखी अब उसे सिर्फ धागा नहीं लग रही थी।

     

    हर राखी में उसके भाई का एक त्याग था।

     

    एक कहानी थी।

     

    एक याद थी।

     

    और सबसे बढ़कर…

     

    एक ऐसा प्यार था, जिसे दूरी भी खत्म नहीं कर सकी।

     

    उसने डिब्बा बंद किया और मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “भैया, अब समझ आया… एक राखी में सिर्फ एक धागा नहीं होता। उसमें बचपन की शरारतें, लड़ाइयां, आंसू, त्याग और हजारों यादें बंधी होती हैं।”

    आरव ने उसकी कलाई पर हाथ रखा।

    “और उन यादों में सबसे खूबसूरत तू है।”

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन ने सिर्फ राखी का त्योहार नहीं मनाया।

    उन्होंने उन छह सालों को फिर से जी लिया…

    जिनमें दूरी बहुत थी,लेकिन प्यार उससे भी ज्यादा था।

    Avatar photo

    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं