रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।शहर का पुराना रेलवे स्टेशन लगभग खाली हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर इक्का-दुक्का यात्री ही दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवा के कारण स्टेशन की पीली लाइटें बार-बार झपक रही थीं।
आरव प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अकेला बैठा अपनी घड़ी देख रहा था।
उसकी ट्रेन रात 11:55 पर आने वाली थी।
आरव को अपने गाँव जाना था। उसकी माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह ऑफिस से सीधे स्टेशन पहुंचा था।
उसने मोबाइल निकाला।
नेटवर्क गायब था।
“अजीब है,” उसने खुद से कहा।
स्टेशन पर इतनी भीड़ होने के बावजूद उसके फोन में नेटवर्क नहीं था।
तभी लाउडस्पीकर से आवाज आई—
“यात्रियों से अनुरोध है कि प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली ट्रेन के लिए तैयार रहें।”
आरव ने राहत की सांस ली।
लेकिन अगले ही पल उसे कुछ अजीब लगा।
स्टेशन की बाकी सभी घड़ियाँ 11:55 दिखा रही थीं।
उसकी घड़ी में भी 11:55 था।
लेकिन ट्रेन नहीं आई।
पाँच मिनट बीते।
दस मिनट।
फिर आधा घंटा।
प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे खाली होने लगा।
आरव ने टिकट काउंटर की तरफ देखा।
वहाँ बैठा कर्मचारी भी गायब था।
चाय की दुकान बंद हो चुकी थी।
सफाई करने वाला आदमी भी चला गया था।
पूरा प्लेटफॉर्म सुनसान हो गया।
आरव ने मोबाइल देखा।
समय अभी भी 11:55 था।
उसने घड़ी उतारी।
घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं।
लेकिन समय आगे नहीं बढ़ रहा था।
अचानक स्टेशन के दूसरे छोर से ट्रेन के आने की आवाज सुनाई दी।
छुक… छुक… छुक…
आरव खड़ा हो गया।
दूर अंधेरे में एक ट्रेन दिखाई दी।
उसकी सारी खिड़कियाँ काली थीं।
कोई लाइट नहीं।
कोई हॉर्न नहीं।
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।
दरवाजा अपने आप खुला।
अंदर बैठे यात्रियों ने आरव की तरफ देखा।
सभी बिल्कुल शांत थे।
किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
आरव ने अपना टिकट देखा।
टिकट पर ट्रेन का नाम लिखा था—
“निशा एक्सप्रेस”
लेकिन उसने ऐसी किसी ट्रेन का नाम पहले कभी नहीं सुना था।
फिर भी उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
वह ट्रेन में चढ़ गया।
जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
डिब्बे में करीब बीस लोग बैठे थे।
सभी लोग सीधे सामने देख रहे थे।
कोई बात नहीं कर रहा था।
आरव ने एक खाली सीट देखकर बैठने की कोशिश की।
तभी सामने बैठे एक बूढ़े आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“यहाँ मत बैठो।”
आरव घबरा गया।
“क्यों?”
बूढ़े ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि यह सीट किसी और की है।”
आरव ने सीट की तरफ देखा।
सीट खाली थी।
“किसकी?”
बूढ़े ने खिड़की की तरफ देखा।
“जो अभी आएगा।”
आरव ने मजाक समझकर बात टाल दी।
कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी।
लेकिन बाहर कोई स्टेशन, शहर या सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।
सिर्फ घना अंधेरा।
आरव ने मोबाइल निकाला।
अब उसमें नेटवर्क था।
लेकिन स्क्रीन पर एक अजीब मैसेज आया—
“आपका गंतव्य: मृत्यु जंक्शन।”
आरव के हाथ कांपने लगे।
उसने मैसेज हटाया।
कुछ सेकंड बाद वही मैसेज फिर आया।
फिर तीसरी बार।
तभी सामने बैठे बूढ़े आदमी ने कहा—
“पहली बार आए हो?”
आरव ने पूछा—
“आपको कैसे पता?”
बूढ़ा मुस्कुराया।
“जो पहली बार आता है, वही मोबाइल देखता है।”
“आप कितनी बार आए हैं?”
बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ अपनी कलाई दिखाई।
उसकी कलाई पर टिकट की तरह एक काला निशान बना हुआ था।
आरव ने पूछा—
“ये क्या है?”
बूढ़े ने कहा—
“वापसी का टिकट।”
आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ट्रेन अचानक रुक गई।
चीईईईं…
सभी यात्री एक साथ अपनी सीट से उठ खड़े हुए।
दरवाजे खुल गए।
बाहर स्टेशन था।
लेकिन स्टेशन का नाम देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
बोर्ड पर लिखा था—
“भैरव घाट स्टेशन”
आरव ने मोबाइल में समय देखा।
11:55
अब भी वही समय।
सामने बैठे बूढ़े ने धीरे से कहा—
“अब फैसला करना होगा।”
“कैसा फैसला?”
बूढ़े ने ट्रेन के बाहर देखा।
“अगर तुम इस स्टेशन पर उतर गए… तो वापस कभी नहीं चढ़ पाओगे।”
आरव ने पूछा—
“और अगर नहीं उतरा?”
बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तो ट्रेन तुम्हें वहाँ ले जाएगी जहाँ से कोई वापस नहीं आता।”
तभी प्लेटफॉर्म पर एक लड़की दिखाई दी।
उसने सफेद कपड़े पहने थे।
वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
आरव ने उसे देखा।
लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।
उसका चेहरा देखकर आरव की सांस रुक गई।
वह लड़की…
आरव की छोटी बहन जैसी दिख रही थी, जिसकी मौत दस साल पहले हो चुकी थी।
लड़की ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।
फिर उसके होंठ हिले—
“भैया… मुझे लेने क्यों नहीं आए?”
आरव सीट से उठ गया।
बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत उतरना!”
लेकिन आरव ने उसकी पकड़ छुड़ा दी।
और जैसे ही उसने ट्रेन के दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया…
पूरे डिब्बे में बैठे यात्रियों ने एक साथ उसकी तरफ देखा।
उन सबके चेहरे पर अब मुस्कान थी।
और बूढ़े ने आखिरी बार कहा—
“अब तुम भी उनमें से एक हो।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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