आरव ट्रेन के दरवाजे पर खड़ा था।बाहर प्लेटफॉर्म पर उसकी छोटी बहन नैना खड़ी थी।
वही चेहरा।
वही मासूम आँखें।
वही सफेद फ्रॉक, जो उसने अपनी आखिरी तस्वीर में पहनी थी।
आरव की आँखों में आँसू आ गए।
“नैना…”
लड़की ने मुस्कुराकर हाथ आगे बढ़ाया।
“भैया… नीचे आओ।”
आरव एक कदम आगे बढ़ाने ही वाला था कि पीछे से बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत जाओ!”
आरव ने झुंझलाकर कहा—
“ये मेरी बहन है!”
बूढ़ा बोला—
“तुम्हारी बहन दस साल पहले मर चुकी है।”
“मुझे पता है!”
“तो फिर समझो… जो सामने खड़ी है, वह तुम्हारी बहन नहीं है।”
आरव ने फिर बाहर देखा।
नैना अब भी मुस्कुरा रही थी।
लेकिन इस बार उसकी मुस्कान कुछ ज्यादा चौड़ी थी।
बहुत ज्यादा।
उसके होंठ धीरे-धीरे कानों तक फैलने लगे।
आरव पीछे हट गया।
तभी स्टेशन की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं।
अंधेरे में सिर्फ नैना की आँखें चमक रही थीं।
और फिर उसकी आवाज आई—
“भैया… तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”
अचानक ट्रेन का दरवाजा बंद हो गया।
धड़ाम!
आरव पीछे गिर पड़ा।
ट्रेन फिर चलने लगी।
कुछ ही सेकंड बाद भैरव घाट स्टेशन अंधेरे में गायब हो गया।
आरव हांफ रहा था।
उसने बूढ़े की तरफ देखा।
“वह क्या था?”
बूढ़े ने कहा—
“इस ट्रेन का पहला जाल।”
“पहला?”
बूढ़े ने सिर झुका लिया।
“हाँ। अभी चार जाल और आएंगे।”
आरव की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
“ये ट्रेन है क्या?”
बूढ़े ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
“यह ट्रेन उन लोगों को लेकर चलती है जिनका समय पूरा हो चुका है।”
आरव ने कहा—
“लेकिन मैं जिंदा हूँ!”
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।
“अभी।”
यह शब्द सुनकर आरव चुप हो गया।
तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
फिर अचानक पूरी ट्रेन अंधेरे में डूब गई।
अंधेरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।
“माँ…”
फिर दूसरी आवाज।
“मुझे घर जाना है…”
फिर तीसरी।
“कोई दरवाजा खोलो…”
आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
डिब्बा खाली था।
जहाँ कुछ सेकंड पहले बीस यात्री बैठे थे, वहाँ अब कोई नहीं था।
सिर्फ बूढ़ा आदमी अपनी सीट पर बैठा था।
आरव ने घबराकर पूछा—
“बाकी लोग कहाँ गए?”
बूढ़े ने कहा—
“अपने-अपने स्टेशन पर।”
“लेकिन ट्रेन तो रुकी ही नहीं!”
बूढ़े ने जवाब दिया—
“यह ट्रेन हर यात्री के लिए अलग-अलग रुकती है।”
आरव कुछ समझ नहीं पाया।
तभी उसके सामने वाली सीट पर एक छोटा सा बैग दिखाई दिया।
बैग देखकर उसकी आँखें फैल गईं।
वह बैग बिल्कुल वैसा ही था जैसा नैना स्कूल जाते समय इस्तेमाल करती थी।
आरव ने उसे उठाया।
बैग के अंदर एक पुरानी कॉपी थी।
कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“आरव भैया के लिए।”
उसके हाथ कांपने लगे।
उसने पन्ना खोला।
अंदर बच्चे जैसी लिखावट में लिखा था—
“भैया, अगर कभी रात की ट्रेन में बैठना पड़े तो खिड़की से बाहर मत देखना।”
आरव ने दूसरा पन्ना पलटा।
“अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर बुलाए तो जवाब मत देना।”
तीसरा पन्ना—
“और अगर तुम्हें मैं दिखाई दूँ… तो मेरे पास मत आना।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने बूढ़े की तरफ देखा।
“ये कॉपी यहाँ कैसे आई?”
बूढ़े ने कहा—
“क्योंकि जिसने तुम्हें बुलाया है, वह तुम्हें बहुत अच्छी तरह जानती है।”
“कौन?”
बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।
तभी ट्रेन की खिड़की पर किसी ने बाहर से हाथ रखा।
ठक… ठक… ठक…
आरव ने खिड़की की तरफ देखा।
बाहर अंधेरा था।
फिर वही हाथ दोबारा दिखाई दिया।
इस बार वह हाथ कांच पर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकने लगा।
आरव ने पीछे हटकर बूढ़े को देखा।
बूढ़ा आँखें बंद करके बैठा था।
“मत देखो,” उसने कहा।
लेकिन आरव खुद को रोक नहीं पाया।
उसने खिड़की में देखा।
बाहर एक लड़की ट्रेन के साथ-साथ चल रही थी।
वह नैना थी।
आरव के चेहरे से खून उतर गया।
ट्रेन बहुत तेज चल रही थी।
फिर भी नैना उसी गति से उसके साथ दौड़ रही थी।
उसने खिड़की पर उंगली से कुछ लिखा।
“भैया, अगला स्टेशन तुम्हारा है।”
अचानक ट्रेन के अंदर घोषणा हुई—
“अगला स्टेशन… आरवपुर।”
आरव चौंक गया।
“आरवपुर?”
बूढ़े ने आँखें खोल दीं।
उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।
“यह स्टेशन नहीं आना चाहिए था।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे नाम का कोई स्टेशन इस लाइन पर नहीं है।”
ट्रेन की रफ्तार अचानक बढ़ गई।
खिड़की के बाहर अंधेरा गायब हो गया।
अब दोनों तरफ पुराने मकान दिखाई दे रहे थे।
हर मकान के बाहर एक ही आदमी खड़ा था।
आरव ने गौर से देखा।
वह आदमी…
आरव खुद था।
सड़क के किनारे।
छतों पर।
खिड़कियों में।
हर जगह उसके जैसे चेहरे दिखाई दे रहे थे।
सभी उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।
आरव ने घबराकर खिड़की से पीछे हटते हुए पूछा—
“ये सब क्या है?”
बूढ़े ने कहा—
“तुम्हारे अलग-अलग अंत।”
“क्या?”
“इस ट्रेन में हर यात्री को उसकी मौत के अलग-अलग रूप दिखाए जाते हैं।”
आरव की सांसें तेज हो गईं।
“तो मेरा अंत क्या है?”
बूढ़े ने धीरे से कहा—
“यह अभी तय नहीं हुआ।”
“किसने तय करना है?”
बूढ़े ने सामने के दरवाजे की तरफ देखा।
“तुमने।”
अचानक ट्रेन रुक गई।
इस बार कोई स्टेशन नहीं था।
सिर्फ एक लंबा, सुनसान पुल।
दरवाजा खुल गया।
बाहर घना कोहरा था।
और कोहरे के बीच नैना खड़ी थी।
लेकिन अब उसके हाथ में लाल रंग का एक टिकट था।
उसने टिकट हवा में उठाया।
“भैया…”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
नैना बोली—
“अगर तुम मुझे बचाना चाहते हो, तो ट्रेन से उतर जाओ।”
आरव दरवाजे की तरफ बढ़ा।
बूढ़ा चिल्लाया—
“रुको!”
लेकिन तभी नैना की आवाज बदल गई।
अब वह बच्ची की आवाज नहीं थी।
वह एक भारी, डरावनी आवाज थी—
“क्योंकि तुम्हारे बिना मैं इस ट्रेन से कभी बाहर नहीं निकल सकती।”
आरव जम गया।
उसी पल बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुराना टिकट निकाला।
उस टिकट पर तारीख देखकर आरव की आँखें फैल गईं।
वह तारीख थी—
14 अगस्त 2016।
बूढ़े ने कहा—
“यह मेरी आखिरी यात्रा थी।”
आरव ने पूछा—
“तो आप अभी तक…?”
बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।
उसका चेहरा धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा।
“मैं दस साल से इसी ट्रेन में हूँ।”
आरव चीख पड़ा।
“आप… मर चुके हैं?”
बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ।”
फिर उसने आरव को एक टिकट दिया।
“लेकिन तुम अभी मरना नहीं चाहते… इसलिए इसे संभालकर रखना।”
आरव ने टिकट लिया।
उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
“वापसी।”
तभी ट्रेन के बाहर से हजारों लोगों के चीखने की आवाज आने लगी।
पुल के नीचे से काले हाथ ऊपर उठने लगे।
नैना पीछे हट गई।
बूढ़े ने कहा—
“जल्दी करो, आरव!”
“क्या?”
“अगले स्टेशन से पहले उस टिकट को पंच करवाना होगा।”
“कौन करेगा?”
बूढ़े ने ट्रेन के सबसे आगे की तरफ इशारा किया।
“जिसका चेहरा इस ट्रेन में किसी ने कभी नहीं देखा।”
और उसी क्षण ट्रेन के आखिरी डिब्बे से एक भारी कदमों की आवाज आने लगी।
ठक…
ठक…
ठक…
कोई धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रहा था।
आरव ने अंधेरे गलियारे की तरफ देखा।
एक लंबी काली आकृति दिखाई दी।
उसका चेहरा बिल्कुल नहीं था।
लेकिन उसके हाथ में एक टिकट पंच करने वाली मशीन थी।
और वह धीरे-धीरे बोल रही थी—
“अगला यात्री… आरव।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
प्रातिक्रिया दे