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रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 3: टिकट चेकर

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

काली आकृति धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

 

उसके हाथ में पुरानी टिकट पंच करने वाली मशीन थी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

हर कदम के साथ ट्रेन का फर्श कांप रहा था।

 

आरव पीछे हटता गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

आकृति ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसका चेहरा पूरी तरह खाली था। न आँखें, न नाक, न होंठ।

 

लेकिन फिर भी आरव को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रही है।

 

बूढ़े ने आरव के कान में कहा—

 

“अपना टिकट मत देना।”

 

“लेकिन आपने ही कहा था कि टिकट पंच करवाना होगा।”

 

“हाँ… लेकिन उससे नहीं।”

 

आरव ने टिकट अपनी मुट्ठी में कस लिया।

 

काली आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

 

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

 

उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

 

फिर उसके हाथ से एक आवाज निकली—

 

“टिकट।”

 

आरव चुप रहा।

 

आकृति ने फिर कहा—

 

“टिकट।”

 

इस बार उसकी आवाज इतनी भारी थी कि डिब्बे की खिड़कियाँ कांपने लगीं।

 

अचानक पीछे से नैना की आवाज आई—

 

“भैया, उसे टिकट दे दो।”

 

आरव ने पीछे देखा।

 

नैना दरवाजे पर खड़ी थी।

 

लेकिन बूढ़ा जोर से चिल्लाया—

 

“उसकी बात मत सुनना!”

 

नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

 

उसकी आँखें काली हो गईं।

 

“तुम हमेशा मेरी बात नहीं मानते थे, भैया।”

 

आरव की आँखों में डर उतर आया।

 

“तुम नैना नहीं हो।”

 

वह हँसने लगी।

 

“तो पहचान लिया?”

 

उसका शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया।

 

कुछ ही सेकंड बाद वहाँ एक लंबी औरत खड़ी थी।

 

उसने काली साड़ी पहन रखी थी।

 

उसके बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

 

बूढ़े ने कहा—

 

“यही इस ट्रेन की मालकिन है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“इसका नाम क्या है?”

 

बूढ़े ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

 

“निशा।”

 

निशा ने हाथ उठाया।

 

पूरी ट्रेन की लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में सिर्फ उसकी आवाज गूँजी—

 

“तुम्हें लगता है तुम इस ट्रेन से बाहर जा सकते हो?”

 

आरव ने जवाब दिया—

 

“हाँ।”

 

निशा हँसी।

 

“हर यात्री यही सोचता है।”

 

अचानक ट्रेन की दीवारों पर तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

 

आरव ने देखा—अलग-अलग लोग ट्रेन में बैठे थे।

 

कुछ रो रहे थे।

 

कुछ मदद मांग रहे थे।

 

कुछ खिड़की से बाहर देख रहे थे।

 

फिर हर तस्वीर में एक ही चीज हुई।

 

उन सभी लोगों ने धीरे-धीरे अपनी परछाई खो दी।

 

बूढ़े ने कहा—

 

“यह ट्रेन लोगों को नहीं मारती।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो?”

 

“यह उनकी यादें खा जाती है।”

 

“फिर?”

 

“जब उन्हें अपने बारे में कुछ याद नहीं रहता, वे हमेशा के लिए इस ट्रेन के यात्री बन जाते हैं।”

 

आरव ने अपनी जेब टटोली।

 

उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं आ रहा था।

 

उसने आँखें बंद कीं।

 

उसे माँ की आवाज याद थी।

 

लेकिन चेहरा…

 

खाली।

 

“नहीं…”

 

वह घबराकर सिर पकड़कर बैठ गया।

 

“मुझे माँ का चेहरा क्यों याद नहीं आ रहा?”

 

बूढ़े ने कहा—

 

“क्योंकि निशा तुम्हारी यादें ले रही है।”

 

आरव ने टिकट देखा।

 

उस पर लिखा था—

 

“वापसी — एक अवसर।”

 

उसे कुछ याद आया।

 

उसकी माँ ने स्टेशन पर जाते समय कहा था—

 

“बेटा, अगर कभी डर लगे तो अपने बचपन की पहली याद याद करना।”

 

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसे एक छोटा सा घर दिखाई दिया।

 

बारिश हो रही थी।

 

माँ उसे गोद में लेकर खिड़की के पास खड़ी थीं।

 

फिर एक आवाज आई—

 

“आरव, मेरी तरफ देखो।”

 

आरव ने आँखें खोलीं।

 

निशा सामने खड़ी थी।

 

“तुम्हें अपनी यादें चाहिए?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“तो मेरे साथ चलो।”

 

निशा ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर बढ़ गई।

 

बूढ़े ने आरव को रोकने की कोशिश की।

 

“मत जाना!”

 

आरव ने पूछा—

 

“अगर मैं नहीं गया तो?”

 

“तुम्हारी सारी यादें चली जाएंगी।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर वह निशा के पीछे चल पड़ा।

 

आखिरी डिब्बे में पहुंचकर निशा एक पुराने दरवाजे के सामने रुकी।

 

दरवाजे पर लिखा था—

 

“यादों का डिब्बा।”

 

उसने दरवाजा खोला।

 

अंदर सैकड़ों छोटे-छोटे शीशे हवा में तैर रहे थे।

 

हर शीशे के अंदर किसी इंसान की एक याद थी।

 

कहीं कोई बच्चा हँस रहा था।

 

कहीं कोई माँ अपने बेटे को गले लगा रही थी।

 

कहीं कोई बूढ़ा अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर बैठा था।

 

आरव ने एक शीशे में देखा।

 

उसमें उसकी माँ दिखाई दी।

 

“माँ!”

 

वह शीशे की तरफ दौड़ा।

 

लेकिन निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“यह याद तुम्हारी नहीं है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“फिर किसकी है?”

 

निशा ने कहा—

 

“उस आदमी की, जो तुम्हारे पहले इस ट्रेन में आया था।”

 

तभी एक शीशा टूट गया।

 

उसमें से एक बूढ़ी औरत की चीख निकली।

 

निशा ने कहा—

 

“हर यात्री की याद मेरे पास रहती है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम ऐसा क्यों करती हो?”

 

निशा कुछ पल चुप रही।

 

फिर बोली—

 

“क्योंकि मैं भी कभी यात्री थी।”

 

आरव चौंक गया।

 

“क्या?”

 

निशा ने अपनी कहानी बताई।

 

दस साल पहले वह इसी ट्रेन में बैठी थी। उसके साथ उसका छोटा भाई था। ट्रेन में एक हादसा हुआ। उसका भाई मर गया, लेकिन निशा की आत्मा इस ट्रेन से बंध गई।

 

तब से वह दूसरों की यादें चुराकर अपनी यादों को जिंदा रखती रही।

 

आरव ने पूछा—

 

“तो तुम्हें आजाद कैसे किया जा सकता है?”

 

निशा मुस्कुराई।

 

“किसी को अपनी सबसे प्यारी याद खुद छोड़नी होगी।”

 

“कौन-सी याद?”

 

“वही जिसे खोने से तुम्हें सबसे ज्यादा डर लगता है।”

 

आरव समझ गया।

 

उसे अपनी माँ की याद छोड़नी होगी।

 

लेकिन तभी ट्रेन में जोरदार झटका लगा।

 

सारे शीशे टूटने लगे।

 

बूढ़े की आवाज आई—

 

“आरव! जल्दी करो!”

 

निशा ने कहा—

 

“तुम्हारे पास केवल एक मिनट है।”

 

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसने अपनी माँ का चेहरा याद किया।

 

माँ मुस्कुरा रही थीं।

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“माँ… मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

 

उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

 

“लेकिन अगर मेरी याद की वजह से कोई और हमेशा कैद रहेगा… तो मैं इसे छोड़ दूँगा।”

 

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

 

एक चमकता हुआ शीशा उसके सामने आया।

 

उसमें उसकी माँ का चेहरा था।

 

आरव ने उसे छू लिया।

 

शीशा टूट गया।

 

पूरी ट्रेन रोशनी से भर गई।

 

निशा चीखने लगी।

 

और उसी पल ट्रेन की घंटी बजी—

 

टन… टन… टन…

 

लाउडस्पीकर से आवाज आई—

 

“अगला स्टेशन… मृत्यु जंक्शन।”

 

बूढ़े ने घबराकर कहा—

 

“यह स्टेशन आ गया तो सब खत्म!”

 

आरव ने पूछा—

 

“अब क्या होगा?”

 

बूढ़े ने बाहर देखा।

 

“अब हमें ट्रेन के इंजन तक जाना होगा।”

 

“क्यों?”

 

बूढ़े ने कहा—

 

“क्योंकि इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है।”

 

“तो कौन है?”

 

बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

 

“तुम्हारे पिता।”

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