अगली रात दोनों दोस्त टॉर्च लेकर पुराने मकान के सामने खड़े थे।
आसमान में बादल थे। हवा ठंडी थी और पेड़ों की शाखाएँ लगातार खिड़कियों से टकरा रही थीं।
कबीर ने कहा, “अगर कुछ भी अजीब लगे तो हम तुरंत वापस चले जाएँगे।”
आरव ने सिर हिलाया।
दरवाज़ा पहले से खुला था।
दोनों अंदर गए।
अंदर वही सन्नाटा था।
लेकिन इस बार दीवारों पर लगी तस्वीरें अलग लग रही थीं।
कबीर ने टॉर्च एक तस्वीर पर डाली।
वह साया की तस्वीर थी।
फिर उसने दूसरी तस्वीर देखी।
उसमें साया अपने पति के साथ खड़ी थी।
लेकिन तस्वीर में पति का चेहरा काले धब्बे से ढका हुआ था।
“ये किसने किया होगा?” कबीर ने पूछा।
आरव ने डायरी का नक्शा निकाला।
“नीचे जाना है।”
दोनों फर्श के एक पुराने हिस्से तक पहुँचे। नक्शे में बने निशान से जगह मिलती थी।
कबीर ने लकड़ी हटाई।
नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
जैसे ही वे नीचे उतरे, हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।
कमरे के अंदर पुरानी वस्तुएँ पड़ी थीं।
बीच में एक लोहे का संदूक था।
आरव ने उसे खोला।
अंदर कई पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक लाल कपड़े में बंधी डायरी थी।
कबीर ने डायरी खोली।
उसमें साया की लिखावट थी।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“जिस रात मैं यह लिख रही हूँ, मुझे पता है कि शायद मैं सुबह तक जीवित न रहूँ।”
दोनों ध्यान से पढ़ने लगे।
साया ने लिखा था कि उसका पति उसे उस पुराने कमरे में ले गया था। उसने बताया था कि वर्षों पहले उनके परिवार ने धन और शक्ति पाने के लिए एक तांत्रिक से अनुष्ठान करवाया था।
लेकिन अनुष्ठान के दौरान एक आत्मा को बुलाया गया और फिर उसे वापस भेजने का तरीका पूरा नहीं किया गया।
उस आत्मा को “काला साया” कहा जाता था।
वह आत्मा किसी एक व्यक्ति की नहीं थी।
वह उन लोगों के डर, लालच और हिंसा से बनी एक भयावह शक्ति थी, जो वर्षों से उस मकान में मरते रहे थे।
साया के पति ने उस आत्मा का इस्तेमाल लोगों को डराने और जमीन हड़पने के लिए किया था।
लेकिन साया को सब पता चल गया।
उसने विरोध किया।
उस रात उसके पति ने उसे इसी कमरे में बंद कर दिया।
डायरी के अगले पन्ने पर शब्द काँपती हुई लिखावट में थे—
“मैंने दरवाज़े के पीछे उसे देखा। वह इंसान नहीं था। सिर्फ़ काली परछाईं थी। उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसका नाम भूल गई तो वह मुझे हमेशा के लिए अपने साथ बाँध लेगी।”
फिर लिखा था—
“मैंने आखिरी कोशिश की। मैंने उसकी परछाईं को शीशे में बंद कर दिया। लेकिन मुझे अपनी जान देनी पड़ी।”
आरव ने काँपते हुए पूछा, “तो साया मर गई थी?”
कबीर ने अगला पन्ना पढ़ा।
“हाँ।”
कमरे में अचानक किसी के चलने की आवाज़ आई।
छन…
छन…
छन…
दोनों पीछे मुड़े।
दरवाज़े पर साया खड़ी थी।
इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।
वह डरावनी कम और दुखी ज़्यादा लग रही थी।
उसकी आँखों से काले आँसू बह रहे थे।
उसने धीरे से कहा—
“मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया क्योंकि मेरा सच किसी ने नहीं सुना।”
आरव ने पूछा, “तुम्हें मुक्ति क्यों नहीं मिली?”
साया ने कमरे के एक कोने की तरफ़ देखा।
वहाँ एक टूटा हुआ आईना रखा था।
“काला साया अभी भी उस आईने में कैद है।”
कबीर ने आईना उठाया।
उसमें दोनों की परछाईं दिखाई दी।
लेकिन उनके बीच एक तीसरी परछाईं भी थी।
लंबी।
टेढ़ी।
और बिना चेहरे की।
अचानक आईना काँपने लगा।
कमरे की सारी बत्तियाँ, जो बंद थीं, एक साथ जल उठीं।
तीसरी परछाईं आईने से बाहर निकलने लगी।
कबीर ने आईना छोड़ दिया।
शीशा टूट गया।
और कमरे में काला धुआँ फैल गया।
धुएँ के बीच एक आवाज़ गूँजी—
“तुमने मुझे फिर जगा दिया…”
आरव ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।
वहाँ एक तरीका लिखा था।
काले साये को मुक्त करने के लिए उस कमरे में रखे पुराने दीपक को जलाना था, साया का असली नाम लेना था और उसके साथ हुए अपराध का सच गाँव के सामने बताना था।
लेकिन एक शर्त थी।
जिस व्यक्ति ने सच पढ़ा है, उसे उस आत्मा का डर स्वीकार करना होगा।
आरव ने दीपक उठाया।
उसने माचिस जलाई।
दीपक जलते ही काला धुआँ पीछे हट गया।
साया की आत्मा कुछ पल के लिए शांत हो गई।
उसने आरव से कहा—
“सच बाहर लाओ… तभी मैं जा पाऊँगी।”
फिर वह गायब हो गई।
कमरे में सिर्फ़ टूटा हुआ आईना पड़ा था।
लेकिन आईने के टुकड़े में अब भी वह काली परछाईं दिखाई दे रही थी।
और उसकी आँखें आरव को घूर रही थीं।
अब आखिरी काम बाकी था।
उन्हें सुबह होते ही पूरे गाँव के सामने साया की कहानी बतानी थी।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि काला साया उन्हें इतनी आसानी से जाने देगा या नहीं।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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