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  • कान्हा की छोटी कटोरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा की छोटी कटोरी और रहस्यमयी निशान

     

    सुबह की सुनहरी धूप नंद भवन के आँगन में फैल रही थी। कान्हा जल्दी-जल्दी उठकर बाहर आए। उनके मन में सबसे पहले वही छोटी मिट्टी की कटोरी थी, जिसे उन्होंने कुम्हार चाचा के यहाँ अपने हाथों से बनाया था।

     

    कल शाम तक वह कटोरी आँगन के एक कोने में सुरक्षित रखी थी। कान्हा ने सोचा था कि आज उसमें पानी भरकर छोटू और चंदू को पिलाएँगे।

     

    लेकिन आँगन में पहुँचते ही वे रुक गए।

     

    कटोरी वहाँ नहीं थी।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “अरे! मेरी कटोरी कहाँ गई?”

     

    गौरी भी उनके पीछे आ गई थी।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल मैंने इसे यहीं रखा था।”

     

    उन्होंने जमीन पर ध्यान से देखा। थोड़ी दूर मिट्टी में छोटे-छोटे निशान बने थे।

     

    गौरी नीचे बैठ गई।

     

    “देखो!”

     

    कान्हा ने निशानों को देखा।

     

    “ये तो किसी चीज को घसीटकर ले जाने के निशान हैं।”

     

    एक दोस्त भी वहाँ पहुँच गया।

     

    उसने कहा—

     

    “क्या कोई कटोरी चुराकर ले गया?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “पहले ये पता लगाएँगे कि कटोरी यहाँ से कैसे गई। बिना जाने किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे निशानों के पीछे चल पड़े।

     

    निशान आँगन से निकलकर कच्ची गली में जा रहे थे।

     

    कुछ दूर जाकर निशान एक बड़े बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    वहाँ जमीन पर कटोरी का एक छोटा सा मिट्टी का टुकड़ा पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे उठाया।

     

    “ये मेरी कटोरी का हिस्सा है।”

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तो कटोरी टूट गई?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “शायद नहीं। ये सिर्फ किनारे का छोटा टुकड़ा है।”

     

    तभी बरगद के ऊपर से कुछ पत्ते नीचे गिरे।

     

    सभी बच्चों ने ऊपर देखा।

     

    एक बंदर डाल पर बैठा था।

     

    उसके हाथ में कान्हा की कटोरी थी!

     

    वह कटोरी को कभी देखता, कभी अपनी नाक के पास ले जाता।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “अरे! यही ले गया!”

     

    बंदर घबराकर दूसरी डाल पर चला गया।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “शायद इसे भी कटोरी पसंद आ गई।”

     

    बंदर ने कटोरी को ऊपर उठाया।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “भाई, वो मेरी है।”

     

    बंदर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने सोचा कि अगर वे शोर करेंगे तो बंदर कटोरी गिरा सकता है।

     

    उन्होंने सबको शांत रहने का इशारा किया।

     

    फिर पास में पड़े कुछ फल उठाए।

     

    उन्होंने एक फल जमीन पर रखा।

     

    बंदर ने नीचे देखा।

     

    कान्हा ने दूसरा फल थोड़ी दूर रखा।

     

    बंदर की नजर फल पर टिक गई।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें फल चाहिए?”

     

    बंदर धीरे-धीरे नीचे की डाल पर आया।

     

    कान्हा ने फल थोड़ा आगे किया।

     

    बंदर ने कटोरी को पकड़े-पकड़े नीचे झाँका।

     

    कान्हा ने दूसरा फल रख दिया।

     

    बंदर ने आखिरकार कटोरी नीचे रख दी और फल उठा लिया।

     

    कान्हा ने तुरंत कटोरी उठा ली।

     

    उन्होंने देखा कि कटोरी थोड़ी खरोंच गई थी, लेकिन सही सलामत थी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तुमने उससे कटोरी छीनी क्यों नहीं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर मैं उसे डराता तो वह कटोरी गिरा सकता था। समझदारी से काम लेने पर दोनों को अपना सामान मिल गया।”

     

    तभी बंदर पेड़ से नीचे आया और कान्हा की ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने उसे एक और फल दे दिया।

     

    “ये तुम्हारे लिए। लेकिन मेरी कटोरी दोबारा मत ले जाना।”

     

    बंदर ने फल लिया और पेड़ पर वापस चला गया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    वापस लौटते समय कान्हा अपनी कटोरी को बहुत सावधानी से पकड़े हुए थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब इसे कहाँ रखोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जहाँ बंदर न पहुँच सके।”

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “और चंदू?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    चंदू उनकी तरफ आ रहा था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे भी दूर रखना पड़ेगा।”

     

    चंदू ने जैसे उनकी बात सुन ली और मुँह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    सभी हँस पड़े।

     

    घर पहुँचकर कान्हा ने कटोरी यशोदा मैया को दिखाई।

     

    “मैया, मिल गई!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कहाँ थी?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हारी कटोरी तो आज खूब घूम आई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। पहले मेरे पास, फिर बंदर के पास और अब फिर मेरे पास।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अब इसे ठीक जगह रखना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    उन्होंने कटोरी को एक ऊँची शेल्फ पर रख दिया।

     

    फिर छोटू और चंदू को पानी पिलाने के लिए दूसरी कटोरी ले आए।

     

    दोपहर में कान्हा अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।

     

    तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! बरगद के पेड़ के पास फिर वही बंदर आया है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वह किसी चीज से खेल रहा है।”

     

    सभी बच्चे फिर बरगद की ओर गए।

     

    बंदर इस बार अकेला नहीं था। उसके पास दो छोटे बंदर और थे।

     

    कान्हा ने देखा कि उनमें से एक छोटा बंदर कमजोर लग रहा था।

     

    वह बाकी दोनों से अलग बैठा था।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    उन्होंने पास जाने की कोशिश नहीं की।

     

    नंद बाबा को बुलाया गया।

     

    नंद बाबा ने दूर से देखा और कहा—

     

    “शायद इसका पैर थोड़ा परेशान है। हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हम कुछ कर सकते हैं?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “पास में फल रख सकते हैं और जगह शांत छोड़ सकते हैं।”

     

    कान्हा और दोस्तों ने कुछ फल पेड़ के नीचे रख दिए।

     

    फिर सभी पीछे हट गए।

     

    थोड़ी देर बाद छोटे बंदर ने धीरे-धीरे नीचे आकर फल उठाया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब ये ठीक हो जाएगा।”

     

    शाम होने तक बच्चे वहीं नहीं रुके। वे घर लौट आए।

     

    रात में कान्हा आँगन में बैठे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज फिर बंदर से दोस्ती कर ली?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “उसने मेरी कटोरी चुराई थी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर हमने फल देकर कटोरी वापस ले ली।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और बदले में उसे फल भी दे दिया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारा मन भी तुम्हारी कटोरी जैसा है।”

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “जितना बाँटो, उतना ही सुंदर लगता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो कल से मैं अपना मन भी सबके साथ बाँटूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

     

    रात गहरी हो गई।

     

    दूर कहीं गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा सोने ही वाले थे कि बाहर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “कान्हा! जल्दी बाहर आओ!”

     

    कान्हा उठ बैठे।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “आसमान में बहुत सारे रंग दिखाई दे रहे हैं!”

     

    कान्हा तुरंत बाहर आए।

     

    सब बच्चे आँगन से आसमान की ओर देखने लगे।

     

    बादलों के पीछे चाँदनी और तारों की रोशनी मिलकर आसमान को अद्भुत बना रही थी।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “कल हम सब सुबह-सुबह पहाड़ी पर चलेंगे। वहाँ से सूर्योदय देखेंगे।”

     

    दोस्तों ने खुशी से हामी भरी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उस पहाड़ी की राह में एक पुराना रास्ता था, जहाँ एक छोटी सी रहस्यमयी घंटी की आवाज सुनाई देती थी।

     

    कान्हा को अगले दिन उसी आवाज का पीछा करना था।

  • कान्हा और टूटी हुई मटकी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और टूटी हुई मटकी

     

    वृंदावन की उस सुबह सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। गलियों में गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और घरों से ताजे दूध की खुशबू आ रही थी। कान्हा अपने दोस्तों और गौरी के साथ फूलों की मालाएँ बना रहे थे।

     

    तभी गाँव के दूसरी ओर से एक घबराई हुई आवाज सुनाई दी—

     

    “अरे! मेरी मटकी गिर गई!”

     

    कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

     

    “चलो!”

     

    सभी बच्चे दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक गोपी जमीन पर बैठी अपनी टूटी हुई मटकी को देख रही थीं। मटकी का एक हिस्सा टूट गया था और उसमें रखा दूध मिट्टी में फैल गया था।

     

    गोपी बहुत दुखी थीं।

     

    “इतनी मेहनत से दूध निकाला था। सब व्यर्थ हो गया।”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “चाची, आप परेशान मत हो।”

     

    गोपी बोलीं—

     

    “लेकिन अब क्या होगा? मेरे पास दूसरी मटकी भी नहीं है।”

     

    कान्हा ने टूटे हुए बर्तन को देखा।

     

    “इसे अभी जोड़ नहीं सकते, लेकिन दूध को बचाया जा सकता है।”

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “जल्दी से साफ बर्तन लाओ।”

     

    दो बच्चे पास के घर से एक खाली बर्तन ले आए।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जो दूध बचा है, उसे इसमें डाल दो।”

     

    गोपी ने सावधानी से बचा हुआ दूध दूसरे बर्तन में डाल दिया।

     

    काफी दूध मिट्टी में जा चुका था, लेकिन थोड़ा बच गया था।

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कम से कम इतना तो बच गया।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “जो बच गया, उसके लिए खुश होना चाहिए।”

     

    तभी नंद बाबा वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोपी ने पूरी बात बताई।

     

    नंद बाबा ने टूटी मटकी देखी।

     

    “इसे किसने रखा था?”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “मैंने इसे आँगन के किनारे रखा था। शायद बिल्ली के पीछे भागते हुए चंदू ने इसे धक्का दे दिया।”

     

    कान्हा ने तुरंत चंदू की तरफ देखा।

     

    चंदू कुछ दूर खड़ा था।

     

    उसकी छोटी घंटी धीरे-धीरे बज रही थी।

     

    टन…

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “चंदू, क्या तुमने मटकी गिराई?”

     

    चंदू ने सिर झुका लिया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने उन्हें रोक दिया।

     

    “हँसो मत।”

     

    उन्होंने चंदू को समझाया—

     

    “अगर तुम्हें किसी चीज से खेलना हो तो रास्ते से दूर खेलना चाहिए।”

     

    फिर कान्हा गोपी के पास गए।

     

    “चाची, इसे जानबूझकर नहीं गिराया।”

     

    गोपी ने चंदू को देखा।

     

    उनका गुस्सा कम हो गया।

     

    “हाँ, लगता है गलती से हुआ।”

     

    उन्होंने चंदू के सिर पर हाथ फेर दिया।

     

    चंदू ने उनकी हथेली सूँघी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब इसे समझ आ गया होगा।”

     

    गोपी बोलीं—

     

    “लेकिन मेरी मटकी टूट गई।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हम आपके लिए नई मटकी लाएँगे।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, आज ही कुम्हार के घर से एक नई मटकी ले आएँगे।”

     

    गोपी ने राहत की साँस ली।

     

    “धन्यवाद।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन उससे पहले हम यह दूध साफ करेंगे।”

     

    सभी बच्चों ने मिलकर आँगन साफ करना शुरू किया।

     

    किसी ने पानी डाला, किसी ने मिट्टी समतल की और किसी ने टूटे हुए टुकड़े एक तरफ रखे।

     

    गौरी ने कहा—

     

    “इन टुकड़ों का क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने उन्हें देखा।

     

    “फेंकेंगे नहीं।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “कुम्हार चाचा से पूछेंगे। शायद इन्हें देखकर वे समझ सकें कि मटकी कहाँ से कमजोर थी।”

     

    नंद बाबा ने उनकी बात सुनी तो मुस्कुराए।

     

    “बहुत अच्छा विचार है।”

     

    दोपहर में सभी कुम्हार के घर पहुँचे।

     

    कुम्हार चाचा ने टूटी मटकी देखी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मटकी के इस हिस्से में मिट्टी ठीक से नहीं लगी थी। इसलिए चोट लगते ही टूट गई।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या इसे दोबारा बनाया जा सकता है?”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “मिट्टी को फिर से गूँधकर दूसरी चीज बनाई जा सकती है।”

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “तो इसे बेकार नहीं कहना चाहिए।”

     

    कुम्हार मुस्कुराए।

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    उन्होंने बच्चों को चाक पर नई मिट्टी रखकर दिखाई।

     

    चाक घूमने लगा।

     

    घुर्र… घुर्र…

     

    धीरे-धीरे मिट्टी का आकार बदलने लगा।

     

    कान्हा मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे।

     

    “इतनी साधारण मिट्टी से मटकी कैसे बन जाती है?”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “मिट्टी को आकार देने के लिए धैर्य चाहिए। थोड़ा पानी, सही दबाव और लगातार ध्यान।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मतलब जल्दी करेंगे तो मटकी बिगड़ सकती है?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने यह बात ध्यान से याद कर ली।

     

    फिर उन्होंने पूछा—

     

    “क्या मैं भी बना सकता हूँ?”

     

    कुम्हार हँस पड़े।

     

    “क्यों नहीं?”

     

    कान्हा चाक के पास बैठ गए।

     

    उन्होंने मिट्टी को हाथ लगाया।

     

    पहले तो मिट्टी एक तरफ फैल गई।

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    कान्हा बोले—

     

    “हँसो मत! मैं सीख रहा हूँ।”

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    इस बार मिट्टी थोड़ी सी ऊपर उठी।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “देखो!”

     

    लेकिन अगले ही पल आकार फिर बिगड़ गया।

     

    कान्हा खुद हँस पड़े।

     

    “ये मुझसे नाराज है।”

     

    कुम्हार ने कहा—

     

    “मिट्टी नाराज नहीं होती। उसे समय चाहिए।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तो मैं इसे समय दूँगा।”

     

    काफी कोशिश के बाद उन्होंने एक छोटी सी कटोरी बना ली।

     

    वह बिल्कुल गोल नहीं थी।

     

    लेकिन कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने उसे उठाकर कहा—

     

    “ये मेरी है!”

     

    कुम्हार बोले—

     

    “हाँ। इसे सूखने देना। फिर इसे पकाकर मजबूत कर देंगे।”

     

    कान्हा ने कटोरी गोपी को देने की बात कही।

     

    “इसमें आप छोटू और चंदू के लिए पानी रख सकती हैं।”

     

    गोपी की आँखों में खुशी आ गई।

     

    “तुमने इतनी छोटी चीज में भी मेरे लिए खुशी ढूँढ़ ली।”

     

    शाम को सब घर लौटे।

     

    कान्हा ने चंदू को अपनी बनाई हुई कटोरी दिखाई।

     

    “देखो, ये तुम्हारे लिए है। लेकिन इसे गिराना मत!”

     

    चंदू ने कटोरी सूँघी।

     

    कान्हा तुरंत उसे थोड़ा दूर कर बोले—

     

    “पहले सूखने दो!”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    उस रात यशोदा ने कान्हा से पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “टूटी हुई चीज हमेशा बेकार नहीं होती। उसे फिर से काम में लाया जा सकता है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “और?”

     

    “गलती हो जाए तो उसे छिपाना नहीं चाहिए। उसे सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।”

     

    यशोदा ने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “आज तुमने बहुत अच्छी बात सीखी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    बाहर आँगन में छोटू और चंदू की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—

     

    “कल मैं दोनों को नई कटोरी में पानी पिलाऊँगा।”

     

    लेकिन अगले दिन सुबह जब कान्हा आँगन में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि उनकी बनाई हुई कटोरी गायब थी।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “मेरी कटोरी कहाँ गई?”

     

    गौरी ने जमीन पर कुछ छोटे-छोटे मिट्टी के निशान देखे।

     

    “कान्हा, शायद कोई इसे लेकर गया है।”

     

    कान्हा नीचे झुक गए।

     

    निशान आँगन से बाहर जा रहे थे।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “लगता है हमारी अगली खोज शुरू हो गई।”

     

    और वे उन निशानों के पीछे चल पड़े।

  • कान्हा और रास्ता भूली गाय

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और रास्ता भूली गाय

     

    अगली सुबह वृंदावन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात की बारिश के बाद मिट्टी से मीठी खुशबू उठ रही थी। नंद बाबा रोज की तरह गायों को चराने के लिए तैयार कर रहे थे।

     

    कान्हा भी जल्दी उठकर आँगन में पहुँच गए।

     

    छोटू और चंदू उन्हें देखते ही उनके पास आ गए।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम दोनों तो मुझसे पहले ही तैयार हो!”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आज गायों को गाँव के पश्चिम वाले मैदान में ले जाना है। वहाँ घास बहुत हरी है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं भी चलूँ?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना कि कोई गाय बहुत दूर न चली जाए।”

     

    कान्हा ने गंभीर होकर कहा—

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    सभी गायें धीरे-धीरे मैदान की तरफ चल पड़ीं।

     

    कान्हा कभी किसी बछड़े के पास जाते, कभी किसी गाय को रास्ते से भटकने से रोकते।

     

    उनके दोस्त भी मदद कर रहे थे।

     

    दोपहर के करीब नंद बाबा ने गायों को एक जगह इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    उन्होंने एक-एक करके गिनती की।

     

    “एक… दो… तीन…”

     

    फिर अचानक वे रुक गए।

     

    “एक गाय कम है।”

     

    कान्हा तुरंत चौकन्ने हो गए।

     

    “कौन सी?”

     

    नंद बाबा ने चारों तरफ देखा।

     

    “सुरभि नहीं दिखाई दे रही।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “वही सफेद गाय?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    दूर कहीं से बहुत हल्की घंटी की आवाज आ रही थी।

     

    टन…

     

    कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “बाबा! उधर से आवाज आ रही है।”

     

    नंद बाबा ने ध्यान लगाया।

     

    कुछ पल बाद उन्हें भी घंटी सुनाई दी।

     

    “हाँ, आवाज उसी तरफ से है।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस दिशा में चल पड़े।

     

    रास्ता थोड़ा ऊबड़-खाबड़ था।

     

    कुछ दूर जाने पर घंटी की आवाज फिर सुनाई दी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा बोले—

     

    “वह ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी की आवाज तेज हो रही है।”

     

    वे आगे बढ़ते गए।

     

    लेकिन अचानक रास्ता दो दिशाओं में बँट गया।

     

    एक रास्ता नदी की तरफ जाता था और दूसरा घने पेड़ों की तरफ।

     

    घंटी की आवाज दोनों तरफ से आती हुई लग रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब किस तरफ जाएँ?”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    उन्होंने जमीन पर देखा।

     

    मिट्टी पर गाय के खुरों के निशान थे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “इधर।”

     

    सब उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें घास कुचली हुई दिखाई दी।

     

    “गाय यहाँ से गई है।”

     

    तभी फिर आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा दौड़ पड़े।

     

    पेड़ों के बीच एक खुला स्थान था।

     

    वहाँ सुरभि खड़ी थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पास एक छोटा सा बछड़ा भी था।

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा और मुस्कुराए।

     

    “शायद सुरभि ने इसे यहाँ पाया है।”

     

    बछड़ा बहुत छोटा था और अपनी माँ से अलग लग रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे आए?”

     

    बछड़े ने धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “इसकी माँ कहाँ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “शायद हमें इसकी माँ भी ढूँढ़नी होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो आज दो खोज करनी होंगी।”

     

    सब बच्चे हँस पड़े।

     

    लेकिन इस बार कान्हा बहुत ध्यान से बछड़े को देखते रहे।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “पहले इसे सुरभि के साथ सुरक्षित गाँव ले चलते हैं। फिर इसकी माँ ढूँढ़ेंगे।”

     

    नंद बाबा ने सिर हिलाया।

     

    सुरभि आगे चलने लगी और बछड़ा उसके साथ।

     

    कान्हा दोनों के पीछे चलते रहे।

     

    वापस मैदान में पहुँचकर उन्होंने बाकी गायों को देखा।

     

    एक गाय बार-बार बछड़े की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने गौर किया।

     

    “बाबा, ये गाय इसे देख रही है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद इसे पहचानती है।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उस गाय की ओर बढ़ा।

     

    गाय ने उसे सूँघा और उसके पास खड़ी हो गई।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “बाबा! शायद यही इसकी माँ है!”

     

    बछड़ा अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया।

     

    गाय ने उसे प्यार से चाटा।

     

    कान्हा खुशी से ताली बजाने लगे।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त भी खुशी से चिल्लाए।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा कान्हा? कभी-कभी किसी को सही जगह पहुँचाने के लिए बस ध्यान से देखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। अगर हमने ध्यान नहीं दिया होता तो ये दोनों अलग रह जाते।”

     

    शाम को गायों को वापस गाँव लाया गया।

     

    सुरभि भी अपने झुंड के साथ लौट आई।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अब तुम रास्ता नहीं भूलना।”

     

    सुरभि ने जैसे जवाब में सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचकर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तो आज तुमने दो दोस्तों को उनके परिवार से मिलाया।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ मैया।”

     

    फिर छोटू और चंदू आ गए।

     

    कान्हा ने दोनों को देखकर कहा—

     

    “तुम दोनों भी कभी रास्ता मत भूलना।”

     

    चंदू ने कान्हा की धोती को हल्का सा खींचा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा, तुम मुझे ही रास्ता दिखाओगे?”

     

    यशोदा भी हँसने लगीं।

     

    उस रात कान्हा आँगन में बैठे थे। आसमान साफ था और तारों की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या हर किसी का कोई अपना होता है?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। परिवार हो, दोस्त हों या कोई ऐसा जो हमारी चिंता करे—हर किसी को अपनापन चाहिए।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो हमें किसी को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “यही तो सबसे बड़ी बात है।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, कल मैं सब गायों के लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। लेकिन फूल तोड़ते समय पौधे को नुकसान मत पहुँचाना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “गिरे हुए फूल इकट्ठे करेंगे।”

     

    “बहुत अच्छे।”

     

    अगली सुबह कान्हा और उनके दोस्त पेड़ों के नीचे गिरे हुए फूल इकट्ठे करने लगे।

     

    गौरी भी उनके साथ थी।

     

    सब मिलकर फूलों की छोटी-छोटी मालाएँ बनाने लगे।

     

    कान्हा ने एक माला सुरभि के गले में डाली।

     

    फिर दूसरी छोटू के गले में।

     

    चंदू अपनी माला पहनने से पहले ही उसे सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे खाना मत!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दूसरी तरफ से तेज आवाज आई।

     

    “बचाओ! मेरी मटकी गिर गई!”

     

    सभी बच्चे उस तरफ दौड़े।

     

    वहाँ एक गोपी की बड़ी मटकी जमीन पर गिर गई थी और उसके अंदर का दूध बहने लगा था।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “जल्दी से कपड़ा लाओ!”

     

    सभी बच्चे मदद करने लगे।

     

    लेकिन उन्हें पता नहीं था कि उस मटकी के गिरने के पीछे एक छोटी सी गलती थी, जो अगले अध्याय में पूरे गाँव को एक नई सीख देने वाली थी।

  • रहस्मयी फूलों के निशान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    रहस्मयी फूलों का निशान

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में धूप की हल्की किरणें फैल रही थीं। यशोदा मैया रसोई का काम कर रही थीं। तभी उनकी नजर एक मटकी पर पड़ी।

     

    मटकी के ऊपर फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना हुआ था।

     

    यशोदा कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    पास खेल रहे कान्हा ने तुरंत सिर उठाया।

     

    “क्या हुआ मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें बुलाया।

     

    “इधर आओ और देखो।”

     

    कान्हा मटकी के पास पहुँचे। उन्होंने निशान को बहुत ध्यान से देखा।

     

    वह गोल आकार का था और उसके चारों ओर छोटी-छोटी पंखुड़ियाँ लगी थीं।

     

    कान्हा ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा।

     

    “हम्म…”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये किसी ने जानबूझकर बनाया है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”

     

    “क्योंकि पंखुड़ियाँ एक जैसी दूरी पर लगी हैं।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुमने ये कैसे देख लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि मैं ध्यान से देख रहा हूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “बस ध्यान रखना कि किसी की चीज खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम सिर्फ पता लगाएंगे कि इसे किसने बनाया।”

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर निकले।

     

    उन्होंने आँगन में चारों तरफ देखा।

     

    जमीन पर कुछ फूलों की पंखुड़ियाँ पड़ी थीं।

     

    कान्हा ने एक पंखुड़ी उठाई।

     

    “ये वही फूल है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “ये फूल कहाँ मिलता है?”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “यमुना के पास।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तो निशान बनाने वाला शायद वहीं से आया होगा।”

     

    सभी बच्चे यमुना की ओर चल पड़े।

     

    रास्ते में छोटू और चंदू भी उनके पीछे आ गए।

     

    कान्हा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम दोनों फिर आ गए?”

     

    छोटू की घंटी बजी।

     

    टन…

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ठीक है, तुम भी चलो।”

     

    यमुना किनारे पहुँचकर उन्होंने वही फूल देखा।

     

    वहाँ कई पंखुड़ियाँ जमीन पर बिखरी हुई थीं।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    “यहाँ से कोई फूल लेकर गया है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन कौन?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    वे निशान नदी से दूर एक कच्चे रास्ते की ओर जा रहे थे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो।”

     

    सभी उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें एक छोटा सा पेड़ दिखाई दिया। पेड़ के नीचे फूलों की पंखुड़ियों का ढेर था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “यहाँ कोई फूल जमा करता है।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    सभी बच्चे चौंक गए।

     

    एक छोटी लड़की पेड़ के पीछे से बाहर आई।

     

    उसके हाथ में फूलों की टोकरी थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं फूल इकट्ठे करती हूँ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या तुम नंद भवन गई थीं?”

     

    लड़की चुप हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “मटकी पर फूलों का निशान तुमने बनाया था?”

     

    लड़की ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं आपको बुलाना चाहती थी।”

     

    कान्हा हैरान हुए।

     

    “हमें?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन सीधे बुला सकती थीं।”

     

    लड़की ने धीरे से कहा—

     

    “मैं आपको जानती नहीं थी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब जानती हो।”

     

    लड़की भी मुस्कुरा दी।

     

    उसने टोकरी से एक सुंदर फूल निकाला।

     

    “मैं आपको ये देना चाहती थी।”

     

    कान्हा ने फूल लिया।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    फिर लड़की ने बताया कि वह अपनी माँ के साथ गाँव के बाहर रहती है। उसकी माँ बीमार होने के कारण घर से बाहर कम निकल पाती थीं। वह रोज फूल इकट्ठे करके गाँव की गोपियों को देती थी।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो तुमने मटकी पर निशान क्यों बनाया?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं चाहती थी कि आप मुझे पहचान लें।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो पहचान लिया।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हें डर नहीं लगा कि मैया नाराज होंगी?”

     

    लड़की ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे लगा था शायद कोई मुझे समझेगा नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर किसी से बात करनी हो तो छिपकर निशान बनाने की जरूरत नहीं। सीधे आ जाना।”

     

    लड़की ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम इसे भी दोस्त बना लेते हैं।”

     

    सभी बच्चों ने हामी भरी।

     

    तभी चंदू लड़की की फूलों वाली टोकरी के पास गया और उसे सूँघने लगा।

     

    लड़की हँस पड़ी।

     

    “ये भी फूल पसंद करता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे हर चीज पसंद है।”

     

    चंदू ने टोकरी को नाक से हल्का सा धक्का दिया।

     

    फूल थोड़े बिखर गए।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा और उनके दोस्तों ने मिलकर फूल फिर से टोकरी में रख दिए।

     

    लड़की ने कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “दोस्त धन्यवाद नहीं कहते।”

     

    फिर वे सब गाँव की ओर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने लड़की से पूछा—

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “मेरा नाम गौरी है।”

     

    “गौरी, तुम्हें फूल बहुत पसंद हैं?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो कल हमारे साथ फूलों की माला बनाना।”

     

    गौरी ने खुशी से सिर हिलाया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “मिल गया रहस्य?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने गौरी की कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तो तुमने एक नई दोस्त बना ली।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उन्होंने मटकी पर बने फूलों के निशान को साफ कर दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “इसे मिटा क्यों रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब इसकी जरूरत नहीं। गौरी सीधे हमारे घर आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    अगले दिन गौरी सच में नंद भवन आई।

     

    उसने फूलों की बड़ी टोकरी लाई थी।

     

    कान्हा और उसके दोस्तों ने फूलों की माला बनानी शुरू की।

     

    किसी की माला छोटी बनी, किसी की टेढ़ी।

     

    कान्हा की माला में एक फूल बार-बार निकल जाता।

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “कान्हा, तुमसे माला नहीं बन रही।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं तो जानबूझकर इसे ऐसा बना रहा हूँ।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “झूठ!”

     

    सब हँस पड़े।

     

    आखिर में उन्होंने मिलकर एक सुंदर माला बनाई।

     

    कान्हा ने उसे छोटू के गले में डाल दिया।

     

    छोटू की घंटी के साथ फूल भी झूलने लगे।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “देखो, आज छोटू सबसे सुंदर लग रहा है।”

     

    चंदू ने भी आगे आकर माला सूँघी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम्हारे लिए भी बनाएँगे।”

     

    शाम तक पूरा आँगन फूलों की खुशबू से भर गया।

     

    उस दिन कान्हा ने एक छोटी सी बात सीखी—

     

    कभी-कभी कोई अजीब हरकत परेशानी पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि किसी तक पहुँचने की कोशिश में की जाती है। इसलिए किसी बात को समझने से पहले उसके पीछे की वजह जानना जरूरी है।

     

    रात को यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जिसे मदद चाहिए, उसे डरना नहीं चाहिए। और हमें भी किसी को बिना समझे गलत नहीं समझना चाहिए।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार से हाथ रखा।

     

    “बहुत अच्छी बात सीखी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    लेकिन अगली सुबह वृंदावन में एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    नंद बाबा की कुछ गायें चरते-चरते बहुत दूर निकल गई थीं। उनमें से एक छोटी गाय रास्ता भूल गई थी।

     

    कान्हा ने उसकी घंटी की आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत कहा—

     

    “ये आवाज गाँव की तरफ से नहीं आ रही।”

     

    और फिर कान्हा अपने दोस्तों के साथ उस घंटी की आवाज का पीछा करने निकल पड़े।

     

  • कान्हा और यमुना की बहती नाव

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और यमुना की बहती नाव

     

    शाम का समय था। यमुना के किनारे ठंडी हवा चल रही थी। कान्हा अपनी पतंग समेटकर घर लौटने ही वाले थे कि उनका दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! जल्दी चलो!”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “हमारी गेंद नाव में रह गई है और नाव किनारे से छूटकर पानी में चली गई!”

     

    कान्हा ने यमुना की ओर देखा। सचमुच एक छोटी सी नाव धीरे-धीरे पानी के साथ दूर जा रही थी। उसमें बच्चों की लाल गेंद पड़ी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गेंद वापस नहीं मिलेगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गेंद तो मिल सकती है, लेकिन पहले ये देखना होगा कि नाव कहाँ जा रही है।”

     

    सब बच्चे किनारे पर खड़े होकर नाव को देखने लगे।

     

    नाव बहुत दूर नहीं गई थी, लेकिन पानी का बहाव तेज था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हम पानी में नहीं उतरेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तो फिर गेंद कैसे आएगी?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    उन्हें किनारे पर पड़ी एक लंबी बाँस की लकड़ी दिखाई दी।

     

    “इससे कोशिश कर सकते हैं।”

     

    उन्होंने बाँस उठाया, लेकिन नाव अभी भी काफी दूर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये वहाँ तक नहीं पहुँचेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कोई और तरीका सोचते हैं।”

     

    तभी नंद बाबा वहाँ पहुँच गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने सारी बात बताई।

     

    नंद बाबा ने नदी की ओर देखा।

     

    “नाव को पकड़ने की कोशिश मत करना। पानी का बहाव तेज है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, फिर गेंद?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “गेंद से ज्यादा जरूरी तुम सब हो।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ बाबा।”

     

    उन्होंने नाव को ध्यान से देखा।

     

    नाव किनारे से दूर जाकर एक शांत हिस्से की तरफ बढ़ रही थी।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अगर हवा इसी दिशा में रही तो नाव थोड़ी देर में उस दूसरे किनारे के पास जा सकती है।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो हम वहीं से उसे पकड़ सकते हैं!”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन मेरे साथ।”

     

    सभी बच्चे नंद बाबा के साथ सुरक्षित रास्ते से आगे बढ़ने लगे।

     

    कान्हा बार-बार नाव को देखते।

     

    “अभी वहाँ है!”

     

    कुछ देर बाद नाव धीरे-धीरे किनारे की तरफ आने लगी।

     

    नंद बाबा ने एक लंबी रस्सी ली और किनारे पर खड़े होकर उसे नाव की तरफ बढ़ाया।

     

    इस बार नाव पास थी।

     

    उन्होंने सावधानी से रस्सी नाव के अगले हिस्से में अटका दी।

     

    धीरे-धीरे नाव किनारे खिंच आई।

     

    कान्हा ने अंदर झाँका।

     

    “गेंद!”

     

    उन्होंने गेंद उठा ली।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    “मिल गई!”

     

    कान्हा ने गेंद दोस्त को दे दी।

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारी वजह से मिल गई।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “नहीं, बाबा की वजह से।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “और तुम्हारी समझदारी की वजह से भी।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुप थे।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या सोच रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज समझ आया कि हर चीज को पाने के लिए तुरंत दौड़ना जरूरी नहीं। पहले सोचना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बिल्कुल। यही समझदारी है।”

     

    अगले दिन बच्चों ने तय किया कि वे यमुना किनारे खेलेंगे, लेकिन इस बार पानी से थोड़ी दूरी पर।

     

    कान्हा ने गेंद हाथ में ली और कहा—

     

    “आज हम ऐसा खेल खेलेंगे जिसमें कोई पानी के पास नहीं जाएगा।”

     

    सबने हामी भरी।

     

    खेल शुरू हुआ।

     

    कान्हा गेंद एक दोस्त को देते, दोस्त दूसरे को।

     

    कुछ देर बाद गेंद अचानक एक पेड़ के पीछे जा गिरी।

     

    एक बच्चा उसे लेने दौड़ा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! धीरे जाना।”

     

    बच्चा रुक गया।

     

    कान्हा खुद उसके साथ गए।

     

    वहाँ गेंद के पास एक छोटा पक्षी बैठा था।

     

    उसका पंख शायद किसी सूखी टहनी में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से बैठ गए।

     

    “डरो मत।”

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    नंद बाबा ने सावधानी से टहनी हटाई।

     

    पक्षी आजाद होकर उड़ गया।

     

    कान्हा उसे आसमान में जाते हुए देखते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज तो हमारी गेंद से ज्यादा काम पक्षी का हो गया।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “गेंद तो फिर मिल जाती। इसे मदद की जरूरत थी।”

     

    शाम होते-होते सभी बच्चे घर लौटने लगे।

     

    रास्ते में कान्हा ने देखा कि छोटू और चंदू उनके पीछे-पीछे आ रहे हैं।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम दोनों यहाँ कैसे?”

     

    दोनों बछड़ों की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अच्छा! अब तुम भी हमारे साथ खेलना चाहते हो?”

     

    चंदू आगे बढ़ा और कान्हा की गेंद सूँघने लगा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे मत खाना!”

     

    दोस्त जोर से हँसने लगे।

     

    चंदू ने गेंद को नाक से धक्का दिया और गेंद लुढ़कती हुई दूर चली गई।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “अरे चंदू!”

     

    छोटू भी पीछे दौड़ पड़ा।

     

    कुछ ही क्षणों में पूरा रास्ता बच्चों और दोनों बछड़ों की दौड़ से भर गया।

     

    घर पहुँचने पर यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज फिर क्या शरारत हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हमने किसी की गेंद बचाई, एक पक्षी की मदद की और चंदू ने गेंद को फिर भगा दिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो आज का दिन अच्छा रहा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    उस रात कान्हा आँगन में लेटे हुए आसमान के तारों को देख रहे थे।

     

    उन्होंने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, क्या तारे भी कभी रास्ता भूलते हैं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “शायद नहीं। वे अपनी जगह चमकते रहते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “फिर अगर कोई रास्ता भूल जाए तो?”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “उसे रास्ता दिखाने वाला कोई न कोई जरूर मिल जाता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें छोटू, चंदू, अपने दोस्त और आज मिला वह छोटा पक्षी याद आ गया।

     

    उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले दिन सुबह वृंदावन में एक और हलचल मचने वाली थी।

     

    नंद बाबा के आँगन में रखी मटकी पर किसी ने फूलों की पंखुड़ियों से एक अजीब सा निशान बना दिया था।

     

    यशोदा मैया ने उसे देखा तो हैरान रह गईं।

     

    “ये किसने बनाया?”

     

    कान्हा ने निशान देखा।

     

    उनके चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई।

     

    “मैया… मुझे लगता है हमें इसका रहस्य पता लगाना पड़ेगा।”

     

    और इस बार निशान उन्हें वृंदावन की एक ऐसी जगह तक ले जाने वाला था, जहाँ बच्चों ने पहले कभी जाने की हिम्मत नहीं की थी।

  • कान्हा और पेड़ की अटकी पतंग

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और पेड़ पर अटकी पतंग

     

    अगली सुबह कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँचे। आज सबके हाथों में रंग-बिरंगी पतंगें थीं। किसी की पतंग लाल थी, किसी की पीली, तो किसी की नीली।

     

    कान्हा के हाथ में पीले रंग की एक सुंदर पतंग थी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम्हारी पतंग सबसे ऊपर जाएगी?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सबसे ऊपर!”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “पहले उड़ाकर तो देखो।”

     

    कान्हा ने डोर पकड़ी और दोस्त ने पतंग हवा में छोड़ दी।

     

    हवा तेज थी, इसलिए पतंग तुरंत ऊपर उठने लगी।

     

    “छोड़ो!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    पतंग आसमान में ऊपर जाने लगी।

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए—

     

    “उड़ गई!”

     

    कान्हा बहुत खुश थे।

     

    वह कभी पतंग को ऊपर करते, कभी नीचे लाते।

     

    तभी एक तेज हवा का झोंका आया।

     

    पतंग अचानक दूसरी दिशा में मुड़ गई।

     

    कान्हा ने डोर संभालने की कोशिश की।

     

    “अरे! इधर आओ!”

     

    लेकिन पतंग तेजी से एक बड़े पेड़ की तरफ जाने लगी।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “कान्हा! पेड़!”

     

    कान्हा ने डोर खींची।

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    फटाक!

     

    पतंग पेड़ की ऊँची शाखाओं में फँस गई।

     

    सभी बच्चे कुछ पल चुप रहे।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    उनकी प्यारी पतंग एक शाखा पर अटकी हुई थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब गई पतंग।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। मैं इसे वापस लाऊँगा।”

     

    दोस्त ने पेड़ को देखा।

     

    “लेकिन ये बहुत ऊँची है।”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को छुआ।

     

    “इतनी भी ऊँची नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम चढ़ोगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “हाँ।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने ही वाले थे कि पीछे से आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा रुक गए।

     

    वहाँ नंद बाबा खड़े थे।

     

    “क्या करने वाले हो?”

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “मेरी पतंग फँस गई है।”

     

    नंद बाबा ने पेड़ की तरफ देखा।

     

    “पतंग के लिए पेड़ पर मत चढ़ो। गिर सकते हो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “लेकिन बाबा, मेरी पतंग…”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “पतंग फिर मिल जाएगी। तुम्हारी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।”

     

    कान्हा थोड़ा उदास हो गए।

     

    “लेकिन ये मेरी पसंदीदा पतंग है।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “चलो, पहले सोचते हैं कि इसे बिना चढ़े कैसे निकाला जाए।”

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “हम लंबी लकड़ी से इसे नीचे कर सकते हैं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन लकड़ी इतनी लंबी नहीं है।”

     

    तीसरा बोला—

     

    “हम पत्थर फेंककर डोर गिरा सकते हैं।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं! पत्थर से किसी को चोट लग सकती है।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ को ध्यान से देखा।

     

    एक लंबी सूखी डाल नीचे पड़ी थी।

     

    उन्होंने उसे उठाया।

     

    “अगर इसे बाँस के साथ बाँध दें तो शायद ऊपर तक पहुँच जाए।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अच्छा विचार है। लेकिन सावधानी से।”

     

    कुछ बड़े बच्चों ने बाँस और लकड़ी को जोड़ दिया।

     

    कान्हा नीचे खड़े होकर उसे धीरे-धीरे ऊपर करने लगे।

     

    पहली बार लकड़ी पतंग तक नहीं पहुँची।

     

    दूसरी बार भी नहीं।

     

    तीसरी बार लकड़ी पतंग की डोर से टकराई।

     

    छपाक!

     

    पतंग थोड़ा हिली, लेकिन नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा बोले—

     

    “थोड़ा और ऊपर!”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “धीरे!”

     

    कान्हा ने फिर कोशिश की।

     

    इस बार डोर लकड़ी में उलझ गई।

     

    कान्हा ने धीरे से उसे खींचा।

     

    पतंग शाखा से निकलकर नीचे गिरने लगी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

     

    कान्हा ने पतंग पकड़ ली।

     

    लेकिन पतंग का एक कोना फट गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर थोड़ा उदास हुए।

     

    “मेरी पतंग टूट गई।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कोई बात नहीं। इसे ठीक कर लेंगे।”

     

    दूसरे ने कहा—

     

    “हाँ, हमारे पास कागज है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “चलो, घर जाकर इसे ठीक करते हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को सीने से लगा लिया।

     

    “मैं इसे खुद ठीक करूँगा।”

     

    वापस लौटते समय कान्हा चुपचाप चल रहे थे।

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “सोच रहा हूँ, हवा पतंग को इतनी दूर क्यों ले गई?”

     

    दोस्त हँसा।

     

    “क्योंकि हवा को भी शरारत करनी थी।”

     

    कान्हा भी हँस पड़े।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “पतंग की तरह मन भी होता है। कभी-कभी बहुत दूर जाने लगता है। उसे संभालने के लिए समझदारी की डोर चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “और अगर डोर टूट जाए?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो उसे फिर से जोड़ना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जैसे मेरी पतंग की डोर?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    घर पहुँचकर कान्हा सीधे यशोदा मैया के पास गए।

     

    “मैया देखो!”

     

    उन्होंने फटी हुई पतंग दिखाई।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “ये कैसे फटी?”

     

    कान्हा ने पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “अच्छा हुआ तुम पेड़ पर नहीं चढ़े।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “पहले तो मैं चढ़ने वाला था।”

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “लेकिन बाबा ने रोक दिया।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें पता है, छोटी सी लापरवाही से चोट लग सकती थी।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “अब नहीं चढ़ूँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा बच्चा।”

     

    फिर उन्होंने पतंग उठाई।

     

    “इसे हम दोनों मिलकर ठीक करेंगे।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने रंगीन कागज निकाला।

     

    कान्हा ने पतंग का फटा हिस्सा पकड़ा और मैया ने धीरे-धीरे उसे ठीक करना शुरू किया।

     

    कान्हा बहुत ध्यान से देखते रहे।

     

    “मैया, अब ये पहले जैसी हो जाएगी?”

     

    “थोड़ी अलग होगी।”

     

    “तो क्या ये खराब हो गई?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “नहीं। कभी-कभी टूटने के बाद चीजें पहले से भी सुंदर लगती हैं।”

     

    कान्हा ने पतंग को देखा।

     

    उस पर अब नीले रंग का छोटा सा कागज लगा था।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तो ये और अच्छी लग रही है।”

     

    शाम को कान्हा फिर दोस्तों के साथ बाहर गए।

     

    उन्होंने पतंग हाथ में ली।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “आज फिर उड़ाएँगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन आज पेड़ से दूर।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    कान्हा ने पतंग आसमान में छोड़ी।

     

    इस बार हवा शांत थी।

     

    पतंग धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।

     

    कान्हा डोर संभालते हुए बोले—

     

    “धीरे… धीरे…”

     

    पतंग ऊँची जाती गई।

     

    कान्हा के चेहरे पर खुशी थी।

     

    तभी उन्हें कल की बात याद आई।

     

    उन्होंने डोर को थोड़ा ढीला किया।

     

    पतंग हवा के साथ चलने लगी।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम डोर ढीली क्यों कर रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हर चीज को अपनी मर्जी से खींचना जरूरी नहीं। कभी-कभी उसे हवा के साथ चलने देना चाहिए।”

     

    दोस्त उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद पतंग आसमान में बहुत ऊँची दिखाई देने लगी।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखो! मेरी पतंग सबसे ऊपर है!”

     

    सभी बच्चे तालियाँ बजाने लगे।

     

    दूर खड़ी यशोदा मैया उन्हें देख रही थीं।

     

    उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उन्हें लगा जैसे उनका नन्हा कान्हा हर छोटी शरारत से कोई न कोई नई बात सीख रहा है।

     

    रात को कान्हा अपनी पतंग लेकर सोने की जिद करने लगे।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “पतंग लेकर सोओगे तो वो फिर फट जाएगी।”

     

    कान्हा ने तुरंत उसे सुरक्षित जगह रख दिया।

     

    “ठीक है। इसे कल फिर उड़ाएँगे।”

     

    वह सोने लगे।

     

    तभी बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

     

    एक दोस्त घबराया हुआ नंद भवन के आँगन में आया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा उठकर बैठ गए।

     

    “क्या हुआ?”

     

    दोस्त ने हाँफते हुए कहा—

     

    “यमुना किनारे एक छोटी नाव बहकर दूर चली गई है… और उसमें हमारी गेंद पड़ी है!”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “गेंद?”

     

    दोस्त ने सिर हिलाया।

     

    कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

     

    “चलो!”

     

    लेकिन उन्हें क्या पता था कि यमुना किनारे इस बार उनका सामना एक बहुत तेज बहाव से होने वाला था।

  • मक्खन की रहस्यमई चोरी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     — मक्खन की रहस्यमयी चोरी

     

    वृंदावन की उस सुबह नंद भवन के आँगन में बच्चों की टोली जमा थी। कल तक सबकी चर्चा छोटू और चंदू के जंगल में चले जाने की थी, लेकिन आज गाँव में एक नई बात फैल गई थी।

     

    गाँव की कई गोपियाँ परेशान थीं।

     

    उनकी मटकी में रखा मक्खन हर दिन थोड़ा-थोड़ा कम हो रहा था।

     

    सबसे ज्यादा परेशान थीं रोहिणी चाची की पड़ोसन गोपी, जो सुबह-सुबह नंद भवन पहुँच गई थीं।

     

    उन्होंने यशोदा मैया से कहा—

     

    “बहन, समझ नहीं आता मेरे घर से मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुमने किसी को देखा?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। लेकिन आज सुबह मटकी का ढक्कन खुला मिला।”

     

    पास खड़े कान्हा ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्त भी वहीं थे।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कान्हा के कान में कहा—

     

    “मुझे तो पता है मक्खन कौन खाता है।”

     

    कान्हा ने उसे आँख दिखाई।

     

    “चुप!”

     

    गोपी ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्यों कान्हा? तुम्हें कुछ पता है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “मुझे? नहीं।”

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    उन्हें कान्हा का यह चेहरा देखकर समझ आ गया कि उसके मन में जरूर कुछ चल रहा है।

     

    गोपी बोलीं—

     

    “मैं आज पता लगाकर रहूँगी कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “हम भी मदद करेंगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा के दोस्त एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    उन्हें पता था कि अगर कान्हा जाँच में शामिल हुए तो मक्खन की कहानी और भी मजेदार होने वाली है।

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों को लेकर बाहर आए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “सबसे पहले सुराग ढूँढ़ेंगे।”

     

    दूसरे ने पूछा—

     

    “सुराग क्या होता है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “जिससे हमें पता चले कि मक्खन कौन ले जाता है।”

     

    वे उस गोपी के घर पहुँचे।

     

    मटकी वहीं रखी थी।

     

    कान्हा ने जमीन देखी।

     

    उन्हें मिट्टी पर छोटे-छोटे पैरों के निशान दिखाई दिए।

     

    “देखो!”

     

    सभी बच्चे नीचे झुक गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो पैरों के निशान हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “लेकिन ये इंसान के नहीं लग रहे।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो किसके हैं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अभी पता लगाएँगे।”

     

    निशान रसोई से बाहर निकलकर पिछवाड़े की तरफ जा रहे थे।

     

    बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    वहाँ उन्हें कुछ गिरे हुए मक्खन के छोटे-छोटे निशान मिले।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “मक्खन यहाँ तक आया है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसका मतलब चोर मक्खन लेकर इधर गया।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    निशान एक पुराने पेड़ के पास जाकर खत्म हो गए।

     

    कान्हा ने पेड़ के नीचे देखा।

     

    वहाँ एक टूटी हुई पत्तों की टोकरी पड़ी थी।

     

    उसमें मक्खन के कुछ छोटे टुकड़े चिपके हुए थे।

     

    कान्हा ने टोकरी उठाई।

     

    “हमें सुराग मिल गया!”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पता नहीं।”

     

    सभी हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अभी जाँच बाकी है।”

     

    तभी पेड़ के पीछे से हल्की सी आवाज आई।

     

    म्याऊँ…

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शांत!”

     

    उन्होंने पेड़ के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटी सी बिल्ली बैठी थी।

     

    उसके मुँह के पास मक्खन लगा हुआ था।

     

    एक दोस्त खुशी से चिल्लाया—

     

    “चोर मिल गया!”

     

    बिल्ली डरकर भागने लगी।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़े।

     

    “रुको!”

     

    बिल्ली एक झाड़ी के पीछे जाकर छिप गई।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठे।

     

    “डरो मत।”

     

    बिल्ली ने उन्हें देखा।

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    बिल्ली धीरे-धीरे बाहर आई।

     

    कान्हा ने देखा कि उसके पास दो छोटे बच्चे भी थे।

     

    वे बहुत कमजोर लग रहे थे।

     

    कान्हा समझ गए।

     

    “तुम अपने बच्चों के लिए मक्खन ले जा रही थी?”

     

    बिल्ली चुपचाप बैठी रही।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे चोर मत कहो।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “लेकिन ये मक्खन तो ले जा रही थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ, लेकिन शायद इसके बच्चे भूखे थे।”

     

    कान्हा ने बिल्ली के बच्चों को देखा।

     

    फिर गोपी को बुलाया।

     

    गोपी भी वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने बिल्ली को देखा और बोलीं—

     

    “अरे, तो ये मक्खन ले जाती थी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ। लेकिन देखो, इसके बच्चे कितने छोटे हैं।”

     

    गोपी कुछ पल चुप रहीं।

     

    उनका गुस्सा धीरे-धीरे कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेचारी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप रोज थोड़ा सा मक्खन इनके लिए अलग रख सकती हैं?”

     

    गोपी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ। इतना तो कर सकती हूँ।”

     

    बिल्ली जैसे कान्हा की बात समझ रही थी।

     

    उसने धीरे से आवाज की।

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो, धन्यवाद भी बोल रही है।”

     

    सभी बच्चे मुस्कुराने लगे।

     

    गोपी ने कान्हा के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुमने आज मुझे भी एक बात सिखाई।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर गलती के पीछे बुरी नीयत हो, यह जरूरी नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर उनके दोस्तों में से एक ने धीरे से कहा—

     

    “लेकिन कान्हा…”

     

    “क्या?”

     

    “अगर ये मक्खन नहीं ले जाती, तो बाकी मक्खन कहाँ गया?”

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    सभी बच्चों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    गोपी भी सोच में पड़ गईं।

     

    “सच!”

     

    उन्होंने कहा—

     

    “मेरे घर से तो बहुत ज्यादा मक्खन कम हुआ है।”

     

    कान्हा ने जमीन पर फिर निशान देखे।

     

    बिल्ली के पैरों के निशान बहुत छोटे थे।

     

    लेकिन मक्खन की मात्रा ज्यादा थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसने कुछ मक्खन लिया होगा, लेकिन सारा नहीं।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तो दूसरा कौन है?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “हमें दूसरी जगह देखना होगा।”

     

    वे वापस घर की ओर गए।

     

    रास्ते में कान्हा ने एक दीवार पर सफेद सा निशान देखा।

     

    उन्होंने उंगली लगाई।

     

    “ये मक्खन है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मक्खन दीवार पर कैसे आया?”

     

    कान्हा ने निशान को ऊपर तक देखा।

     

    वह दीवार के किनारे से आगे जा रहा था।

     

    वे उसी रास्ते पर चल पड़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक छोटा सा खाली कमरा मिला।

     

    कमरे के दरवाजे के पास मक्खन के निशान थे।

     

    कान्हा ने धीरे से दरवाजा खोला।

     

    अंदर अँधेरा था।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “सब धीरे से चलना।”

     

    अंदर जाकर उन्होंने देखा कि एक कोने में कुछ मिट्टी के छोटे बर्तन रखे थे।

     

    एक बर्तन के अंदर मक्खन था।

     

    दूसरे में दही।

     

    तीसरा खाली था।

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “ये किसका घर है?”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “यह कमरा तो कई दिनों से खाली है।”

     

    तभी अंदर से आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    सब चौंक गए।

     

    एक बच्चा कान्हा के पीछे छिप गया।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “छीं!”

     

    कान्हा ने दरवाजे के पीछे देखा।

     

    वहाँ एक छोटा लड़का बैठा था।

     

    उसके कपड़े पुराने थे और चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    लड़का चुप रहा।

     

    गोपी गुस्से में बोलीं—

     

    “तो मक्खन तुम ले जाते थे?”

     

    लड़के ने सिर झुका लिया।

     

    कान्हा ने उसे डाँटा नहीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “तुम ऐसा क्यों करते थे?”

     

    लड़के की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “मेरी छोटी बहन भूखी रहती है।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने माँगा क्यों नहीं?”

     

    लड़के ने कहा—

     

    “डर लगता था।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने गोपी की तरफ देखा।

     

    “इसे चोरी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।”

     

    गोपी की आँखें भी नम हो गईं।

     

    उन्होंने लड़के से कहा—

     

    “तुम्हें भूख लगे तो मेरे घर आना। लेकिन बिना पूछे चीज मत लेना।”

     

    लड़के ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब हम सब मिलकर तुम्हारी बहन के लिए खाना ले जाएँगे।”

     

    दोस्तों ने भी हामी भर दी।

     

    उस दिन गोपी ने मक्खन, रोटी और दूध दिया।

     

    कान्हा खुद वह खाना लेकर उस लड़के के घर गए।

     

    लड़के की छोटी बहन ने खाना देखा तो उसके चेहरे पर खुशी आ गई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब भूखे नहीं रहना।”

     

    वापस आते समय एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, आज हमने चोर पकड़ा या दोस्त बनाया?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “दोस्त बनाया।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन चोरी तो गलत है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, चोरी गलत है। लेकिन गलती करने वाले को समझाकर सही रास्ता दिखाना भी जरूरी है।”

     

    शाम को यशोदा मैया ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बता दी।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुमने अच्छा किया। लेकिन याद रखना, किसी की मदद करते समय उसकी गलती को सही नहीं मानना चाहिए।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं समझ गया मैया।”

     

    उस रात कान्हा सोने लगे तो बाहर से बिल्ली की आवाज आई—

     

    म्याऊँ…

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब तुम्हें चोरी नहीं करनी पड़ेगी।”

     

    और पास ही रखी छोटी कटोरी में थोड़ा दूध देखकर उन्हें संतोष हुआ।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई शरारत होने वाली थी।

     

    कान्हा के दोस्तों ने तय किया कि इस बार वे यमुना किनारे पतंग उड़ाएँगे।

     

    और कान्हा को क्या पता था कि पतंग उड़ाते-उड़ाते उनकी डोर सीधे एक पेड़ की सबसे ऊँची डाल में फँसने वाली है।

    •  
  • कान्हा और जंगल में खोए दोस्त

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा और जंगल में खोए छोटे दोस्त

     

    सुबह का समय था। वृंदावन की गलियों में अभी पूरी तरह चहल-पहल शुरू भी नहीं हुई थी, लेकिन कान्हा के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    वह गायों के बीच बार-बार छोटू और चंदू को ढूँढ़ रहे थे।

     

    “छोटू!”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू!”

     

    लेकिन दोनों की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

     

    नंद बाबा भी आसपास देखने लगे।

     

    “अभी थोड़ी देर पहले तो दोनों यहीं थे।”

     

    कान्हा ने जमीन की तरफ देखा। मिट्टी पर छोटे-छोटे खुरों के निशान बने थे।

     

    उन्होंने उन निशानों को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, देखो!”

     

    नंद बाबा उनके पास आए।

     

    “ये निशान जंगल की तरफ जा रहे हैं।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “हमें उन्हें ढूँढ़ना होगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ, लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “हम सब साथ चलेंगे।”

     

    नंद बाबा ने कुछ बड़े लड़कों को भी उनके साथ भेज दिया।

     

    कान्हा रास्ते भर छोटे-छोटे निशान देखते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें सच में समझ आ रहा है कि ये किसके निशान हैं?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “छोटू के निशान छोटे हैं और चंदू के थोड़ा गोल।”

     

    दोस्त हैरान होकर बोला—

     

    “तुम्हें ये सब कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्तों को पहचानने के लिए हमेशा नाम की जरूरत नहीं होती।”

     

    सब बच्चे मुस्कुरा दिए।

     

    कुछ दूर जाने पर उन्हें झाड़ियों के पास घास टूटी हुई दिखाई दी।

     

    कान्हा नीचे बैठ गए।

     

    उन्होंने घास को देखा।

     

    “यहाँ दोनों रुके थे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ गए?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    तभी दूर से बहुत हल्की आवाज आई।

     

    टन…

     

    कान्हा खड़े हो गए।

     

    “घंटी!”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद फिर आवाज आई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उस दिशा में दौड़ पड़े।

     

    “छोटू!”

     

    लेकिन वहाँ पहुँचने पर कोई नहीं मिला।

     

    सिर्फ एक पेड़ की शाखा पर घंटी की आवाज जैसी हल्की टकराहट हो रही थी।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद हवा से आवाज आई थी।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मुझे लगा जैसे कोई हिला था।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    जंगल का रास्ता थोड़ा घना हो गया था।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “सब साथ रहना। कोई अकेला आगे मत जाना।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें मिट्टी पर ताजे खुरों के निशान दिखाई दिए।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ये वही हैं!”

     

    वे निशानों के पीछे चलने लगे।

     

    अचानक सामने एक छोटी सी ढलान आई।

     

    नीचे घनी घास थी।

     

    वहीं से आवाज आई—

     

    “माँ…”

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    “ये तो छोटू की आवाज है!”

     

    उन्होंने नीचे देखा।

     

    छोटू एक झाड़ी के पास खड़ा था।

     

    वह सुरक्षित था, लेकिन उसके आगे एक छोटी लकड़ी रास्ते में पड़ी थी और वह आगे नहीं जा पा रहा था।

     

    कान्हा नीचे उतर गए।

     

    “अरे छोटू! तुम यहाँ क्यों आ गए?”

     

    छोटू कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुमने हमें कितना परेशान किया।”

     

    छोटू ने धीरे से घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अब क्या सफाई दे रहे हो?”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    “लेकिन चंदू कहाँ है?”

     

    छोटू की तरफ देखते ही कान्हा समझ गए कि वह किसी दूसरी दिशा में देख रहा है।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्या चंदू उधर गया है?”

     

    छोटू आगे बढ़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही दूरी पर उन्हें एक अजीब सी आवाज सुनाई दी।

     

    “माँ… माँ…”

     

    इस बार आवाज थोड़ी घबराई हुई थी।

     

    कान्हा तेज कदमों से आगे बढ़े।

     

    एक बड़े पेड़ के पीछे चंदू खड़ा था।

     

    उसके सामने जमीन पर गिरी हुई बेलें थीं। शायद वह खेलते-खेलते वहाँ पहुँच गया था और रास्ता उलझा हुआ देखकर रुक गया था।

     

    कान्हा उसके पास पहुँचे।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू कान्हा को देखकर तुरंत उनकी तरफ आया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम भी यहीं थे!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “दोनों हमें बहुत दूर तक ले आए।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “लेकिन मिल तो गए।”

     

    उन्होंने दोनों बछड़ों को अपने पास खड़ा किया।

     

    “अब कोई कहीं नहीं जाएगा।”

     

    दोनों बछड़े जैसे कान्हा की बात समझ गए।

     

    वापस लौटते समय अचानक आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “फिर बारिश आने वाली है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमें जल्दी चलना होगा।”

     

    सब बच्चे और बछड़े तेजी से लौटने लगे।

     

    लेकिन रास्ते में चंदू एक रंग-बिरंगे फूल के पास रुक गया।

     

    उसने फूल सूँघा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चंदू, अभी फूल नहीं। घर चलो।”

     

    चंदू वहीं खड़ा रहा।

     

    कान्हा ने उसका सिर सहलाया।

     

    “अगर हम देर करेंगे तो मैया चिंता करेंगी।”

     

    चंदू ने आखिरकार कदम बढ़ाया।

     

    रास्ते में कान्हा ने छोटू और चंदू को बीच में रखा और दोस्तों को दोनों तरफ चलने को कहा।

     

    कुछ देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं।

     

    लेकिन इस बार सब सुरक्षित थे।

     

    जब वे गाँव पहुँचे तो यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    कान्हा को देखते ही उन्होंने राहत की साँस ली।

     

    “कहाँ चले गए थे तुम लोग?”

     

    कान्हा ने छोटू और चंदू की तरफ इशारा किया।

     

    “ये दोनों जंगल में चले गए थे।”

     

    यशोदा ने दोनों बछड़ों को देखा।

     

    “और तुम इनके पीछे चले गए?”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा ने चिंता से पूछा—

     

    “तुम्हें पता है जंगल कितना बड़ा है?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “पता है मैया।”

     

    यशोदा ने उन्हें अपने पास बुलाया।

     

    “किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन बिना बड़े को बताए ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए। अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस आगे से ध्यान रखना।”

     

    नंद बाबा भी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने छोटू और चंदू को देखकर कहा—

     

    “अब इन्हें कुछ दिन गाँव के पास ही रखना होगा।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, मैं इनकी देखभाल करूँगा।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम करोगे, लेकिन अकेले नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    शाम को बारिश रुक गई।

     

    कान्हा दोनों बछड़ों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    फिर चंदू की।

     

    टन…

     

    दोनों आवाजें अलग थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब मैं दोनों को आँखें बंद करके भी पहचान सकता हूँ।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “अगर दोनों एक साथ भाग गए तो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं दोनों को पकड़ लूँगा।”

     

    दोस्त हँसने लगा।

     

    “तुम्हें अपने ऊपर बहुत भरोसा है।”

     

    कान्हा भी हँसे।

     

    “दोस्तों को छोड़ना नहीं चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने मिट्टी पर दो छोटे-छोटे चित्र बनाए।

     

    एक छोटू का और दूसरा चंदू का।

     

    उन्होंने दोनों चित्रों के ऊपर फूल रख दिए।

     

    यशोदा ने दूर से पूछा—

     

    “ये क्या बना रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अपने दोस्तों का घर।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और इसमें तुम्हारा घर कहाँ है?”

     

    कान्हा ने चित्र के बीच में एक छोटा सा निशान बनाया।

     

    “यहाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं इनके बीच रहूँगा।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    रात को कान्हा सोने गए तो दोनों बछड़ों की घंटियों की आवाज अभी भी बाहर से सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा ने आँखें बंद करते हुए कहा—

     

    “अब तुम दोनों कहीं मत जाना।”

     

    बाहर से जैसे छोटू ने जवाब दिया।

     

    टन…

     

    कान्हा मुस्कुराते हुए सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन वृंदावन में एक नई परेशानी आने वाली थी।

     

    सुबह-सुबह गाँव की एक गोपी दौड़ती हुई नंद भवन पहुँची।

     

    वह बहुत परेशान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “यशोदा! मेरी मटकी से रोज थोड़ा-थोड़ा मक्खन गायब हो रहा है। आज मैंने किसी को घर के पास देखा है।”

     

    कान्हा यह सुन रहे थे।

     

    उनके दोस्तों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “मुझे लगता है हमें पता लगाना चाहिए कि मक्खन कौन ले जा रहा है।”

     

    दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “नहीं। इस बार हम जासूस बनेंगे।”

     

    और इस तरह शुरू होने वाली थी वृंदावन की सबसे मजेदार मक्खन वाली पहेली।

     

     समाप्त। 🌸

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 29

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 29 : अपने ही पिता के खिलाफ

     

    पुराने रेलवे स्टेशन के बाहर दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स एक साथ जल उठीं।

     

    चारों तरफ हथियारबंद लोग खड़े थे।

     

    अंदर खड़े आरव, आरोही और अमन को घेर लिया गया था।

     

    बाहर से आवाज आई—

     

    “आरव! अमन को हमारे हवाले कर दो, वरना दस मिनट में ये पूरा स्टेशन मलबे में बदल जाएगा!”

     

    आरोही ने घबराकर आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन बाहर इतने लोग हैं।”

     

    “हम निकल जाएंगे।”

     

    अमन जमीन पर बैठा हुआ था। उसके कंधे से अभी भी खून बह रहा था।

     

    उसने धीमे से कहा,

     

    “हम नहीं निकल पाएंगे।”

     

    आरव उसकी तरफ गया।

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “क्योंकि बाहर सिर्फ आदमी नहीं हैं।”

     

    “तो?”

     

    “वहां बम भी हैं।”

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    अमन ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मुझे इन लोगों का तरीका पता है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे?”

     

    अमन हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं सालों से इनके बीच रहा हूं।”

     

    आरव ने पलटकर शेखर को देखा।

     

    “पापा…”

     

    शेखर चुप थे।

     

    आरव उनके पास गया।

     

    “आप इन लोगों को जानते हैं?”

     

    शेखर ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “ये आपके आदमी हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों में अविश्वास था।

     

    “तो ये हमें मारने क्यों आए हैं?”

     

    शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरव ने गुस्से में कहा,

     

    “मैंने आपसे पूछा!”

     

    शेखर ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि अब मैं उनके लिए भी खतरा बन चुका हूं।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    “मतलब?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “जिस संगठन को मैंने सालों पहले खत्म करने की कोशिश की थी… वो आज फिर खड़ा हो चुका है।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा,

     

    “कौन-सा संगठन?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “ब्लैक क्राउन।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “एक ऐसा संगठन जो पैसे, राजनीति और अपराध के बीच काम करता है।”

     

    “और इसका मुखिया?”

     

    शेखर ने विराज की तरफ देखा।

     

    लेकिन विराज वहां नहीं था।

     

    “विराज?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “फिर कौन?”

     

    शेखर की आंखों में डर उतर आया।

     

    “जिसका नाम मैंने पच्चीस साल से किसी के सामने नहीं लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नाम बताइए।”

     

    शेखर ने धीरे से कहा—

     

    “सम्राट।”

     

    अमन ने अचानक सिर उठाया।

     

    “सम्राट?”

     

    शेखर ने उसकी तरफ देखा।

     

    अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “तो वो अभी भी जिंदा है?”

     

    आरव ने अमन की तरफ देखा।

     

    “तुम उसे जानते हो?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वही आदमी जिसने मेरी मां की हत्या का आदेश दिया था।”

     

    अमन की मुट्ठियां कस गईं।

     

    “मैंने सालों तक विराज को दोषी समझा।”

     

    “लेकिन असली आदेश सम्राट ने दिया था।”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा,

     

    “तो आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि तुम बदला लेने के पीछे भागते हुए मर जाते।”

     

    अमन हंस पड़ा।

     

    “और अब?”

     

    “अब तुम्हें सच पता है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “अब मैं सम्राट को ढूंढूंगा।”

     

    आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “पहले तुम्हारा इलाज होगा।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में मुझे भाई मानते हो?”

     

    आरव ने बिना सोचे कहा,

     

    “हां।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “तो फिर मुझे बचाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें मरने नहीं दूंगा।”

     

     

    फिर से बाहर से आवाज आई—

     

    “पांच मिनट बाकी हैं!”

     

    कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “हमें कोई रास्ता निकालना होगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “पीछे का रास्ता?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुरानी सुरंग है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कहां जाती है?”

     

    “रेलवे यार्ड तक।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “वह रास्ता बंद है।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “मैं कई बार यहां से भाग चुका हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “तो दूसरा रास्ता?”

     

    अमन ने कुछ पल सोचा।

     

    “एक रास्ता है।”

     

    “कहां?”

     

    “पुराने कंट्रोल रूम के नीचे।”

     

    शेखर अचानक बोले,

     

    “नहीं।”

     

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

     

    “वह रास्ता इस्तेमाल नहीं कर सकते।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि वहां…”

     

    वह रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    “वहां ब्लैक क्राउन का पुराना हथियारघर है।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मतलब?”

     

    “अगर वहां कोई गोली चली…”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “पूरा स्टेशन उड़ सकता है।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    “तो हमें स्टेशन से बाहर नहीं जाना।”

     

    सब उसे देखने लगे।

     

    “हमें उन्हें स्टेशन के अंदर बुलाना होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “तुम पागल हो?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अगर हम बाहर गए तो वे हमें गोली मार देंगे।”

     

    “और अंदर बुलाए तो?”

     

    “तब उनके बम हमारे नियंत्रण में होंगे।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “लेकिन ये बहुत खतरनाक है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं जानता हूं।”

     

    “फिर भी?”

     

    “हां।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो मैं भी साथ हूं।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डालना चाहता।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हें लगता है मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूंगी?”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “हमने तय किया था ना… सच कितना भी खतरनाक हो, साथ जानेंगे।”

     

    आरव ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर ने अपनी बंदूक उठाई।

     

    “मैं बाहर जाऊंगा।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो मुझे अपना आदमी समझते हैं।”

     

    “और?”

     

    “मैं उन्हें गलत दिशा में भेज सकता हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें खुद को खतरे में डालने की जरूरत नहीं।”

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई के लिए इतना तो कर सकता हूं।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम सच में आरव के दोस्त हो?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “भाई से ज्यादा।”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “तो जाओ।”

     

    कबीर बाहर जाने लगा।

     

    आरव ने पीछे से कहा,

     

    “कबीर!”

     

    कबीर रुका।

     

    “वापस आना।”

     

    कबीर ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “जरूर।”

    कबीर ने स्टेशन का दरवाजा खोला और हाथ ऊपर कर दिए।

     

    “गोली मत चलाना!”

     

    बाहर खड़े लोग उसकी तरफ दौड़े।

     

    एक आदमी ने पूछा,

     

    “बाकी लोग कहां हैं?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अंदर।”

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “अमन?”

     

    “वो भी।”

     

    “तुम्हें बाहर क्यों भेजा?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “समझौते के लिए।”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “समझौता अब नहीं होगा।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “अगर तुमने स्टेशन उड़ाया तो आरव भी मरेगा और अमन भी।”

     

    “हमें वही चाहिए।”

     

    कबीर चौंका।

     

    “दोनों?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि दोनों जिंदा रहे तो सम्राट की गद्दी खतरे में है।”

     

    कबीर को पहली बार समझ आया—

     

    सम्राट आरव और अमन दोनों से डरता था।

     

    इधर आरव और आरोही पुराने कंट्रोल रूम की तरफ बढ़ रहे थे।

     

    अमन भी उनके साथ था।

     

    शेखर पीछे से चिल्लाए,

     

    “आरव!”

     

    आरव पलटा।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “अगर तुम वहां जा रहे हो तो ये ले जाओ।”

     

    उन्होंने आरव को एक पुरानी चाबी दी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये क्या है?”

     

    “सम्राट के हथियारघर की चाबी।”

     

    आरव ने हैरानी से कहा,

     

    “आपके पास ये कब से है?”

     

    “पच्चीस साल से।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “आपने इसे कभी इस्तेमाल क्यों नहीं किया?”

     

    शेखर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि एक दिन मेरे बच्चों के खिलाफ यही इस्तेमाल होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब यही हमारी रक्षा करेगा।”

     

    तीनों सुरंग में उतर गए।

     

    अंधेरा बहुत गहरा था।

     

    आरोही आरव का हाथ पकड़े हुए थी।

     

    अमन आगे चल रहा था।

     

    अचानक उसने हाथ उठाकर सबको रोक दिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अमन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    “यहां कैमरा है।”

     

    कबीर की आवाज वायरलेस पर आई—

     

    “आरव, सुन रहे हो?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने बाहर वालों को कुछ देर रोक लिया है।”

     

    “कितना समय?”

     

    “लगभग पांच मिनट।”

     

    “बहुत है।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “हमारे पास सिर्फ दो मिनट हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    अमन ने दीवार के नीचे लगा लाल बल्ब दिखाया।

     

    “ये बम का संकेत है।”

     

    आरोही डर गई।

     

    “कितने बम हैं?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पूरी सुरंग में।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “उन्हें निष्क्रिय कैसे करेंगे?”

     

    अमन ने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लेकिन मेरी मां जानती थी।”

     

     

    अमन ने अपनी जेब से एक छोटा कागज निकाला।

     

    “ये मुझे आज से दस साल पहले मिला था।”

     

    आरव ने उसे लिया।

     

    उस पर एक नक्शा बना था।

     

    नक्शे में सुरंग और एक छोटा कमरा दिखाया गया था।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “यहां!”

     

    “क्या?”

     

    “ये कमरा।”

     

    “हां।”

     

    “इसके नीचे कुछ लिखा है।”

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “जहां पहला सच दफन है, वहीं आखिरी रास्ता खुलेगा।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “पहला सच?”

     

    आरव ने सोचा।

     

    “कमरा नंबर 17?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने अचानक कहा,

     

    “अस्पताल!”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों का जन्म अस्पताल में हुआ था।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “पुराना सिटी अस्पताल…”

     

    आरव ने कहा,

     

    “वही जगह जहां सिया मरी थी।”

     

    अमन ने कहा,

     

    “और जहां हमारे जन्म के रिकॉर्ड बदले गए थे।”

     

    तभी सुरंग में अचानक स्पीकर चालू हो गया।

     

    एक भारी आवाज गूंजी—

     

    “बहुत होशियार हो गए हो तुम लोग।”

     

    आरव रुक गया।

     

    “कौन?”

     

    आवाज आई—

     

    “जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”

     

    आरोही ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “सम्राट?”

     

    आवाज में हंसी थी।

     

    “आखिरकार तुमने मेरा नाम तो लिया।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सामने आओ।”

     

    “इतनी जल्दी क्या है?”

     

    “तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद की।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    आवाज शांत थी।

     

    “तुम्हारी जिंदगी मैंने नहीं… तुम्हारे पिता ने बर्बाद की।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    “हां।”

     

    शेखर की आवाज पीछे से आई—

     

    “सम्राट, चुप हो जाओ।”

     

    सम्राट हंसा।

     

    “शेखर, अब सच छुपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्या सच?”

     

    सम्राट बोला—

     

    “तुम्हारे पिता ने ही सिया को मरने के लिए छोड़ा था।”

     

    अमन का चेहरा बदल गया।

     

    “झूठ!”

     

    सम्राट ने कहा,

     

    “अगर यकीन नहीं है तो पुराने सिटी अस्पताल के तहखाने में जाना।”

     

    “वहां तुम्हें सिया की आखिरी रिकॉर्डिंग मिलेगी।”

     

    अमन कांपने लगा।

     

    “मेरी मां की?”

     

    “हां।”

     

    सम्राट ने कहा—

     

    “और उस रिकॉर्डिंग में सिया ने खुद बताया है कि उसकी मौत के लिए जिम्मेदार कौन था।”

     

    अमन ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में भी बेचैनी थी।

     

    तभी सम्राट की आवाज फिर आई—

     

    “और आरव… उस रिकॉर्डिंग में तुम्हारे बारे में भी एक ऐसा सच है, जिसे सुनने के बाद तुम खुद अपने पिता से नफरत करने लगोगे।”

     

    स्पीकर बंद हो गया।

     

    सुरंग में फिर सन्नाटा छा गया।

     

    अमन ने मुट्ठी कस ली।

     

    “हम अस्पताल जाएंगे।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन पहले ये बम?”

     

    अमन ने लाल बल्ब की तरफ देखा।

     

    “अगर हम दो मिनट में इसे नहीं रोक पाए…”

     

    वह रुक गया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो पुराने रेलवे स्टेशन के साथ हम सब भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।”

     

    और उसी पल…

     

    घड़ी में सिर्फ 01:59 मिनट बाकी थे।

     

    जारी रहेगा…

  • दरवाजे पर कोई है

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दरवाजे पर कोई है

     

    रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर तेज बारिश हो रही थी। बिजली बार-बार चमकती और फिर पूरा घर अंधेरे में डूब जाता।

     

    सिया अपने कमरे में बैठी खिड़की से बारिश देख रही थी। उसके माता-पिता किसी रिश्तेदार के घर गए हुए थे और आज उसे घर में अकेले ही रहना था।

     

    अचानक—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सिया चौंक गई।

     

    उसने घड़ी की तरफ देखा।

     

    ग्यारह बजकर सात मिनट।

     

    इतनी रात को कौन आया होगा?

     

    उसने कुछ देर तक आवाज को नजरअंदाज किया।

     

    फिर वही आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार पहले से थोड़ी तेज।

     

    सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    सिया कुछ पल दरवाजे के पास खड़ी रही।

     

    फिर उसने दोबारा पूछा, “कौन है दरवाजे पर?”

     

    सन्नाटा।

     

    सिर्फ बारिश की आवाज।

     

    सिया ने दरवाजे की झिरी से बाहर देखने की कोशिश की, लेकिन बाहर अंधेरा था।

     

    उसने फोन उठाया और अपने बड़े भाई आरव को कॉल किया।

     

    “भैया…”

     

    “हाँ सिया, क्या हुआ?”

     

    “दरवाजे पर कोई है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    “तुमने दरवाजा तो नहीं खोला?”

     

    “नहीं।”

     

    “अच्छा किया। पहले देखो बाहर कौन है। अगर पहचान में नहीं आता तो दरवाजा मत खोलना।”

     

    सिया ने दरवाजे के पास लगी छोटी सी कैमरा स्क्रीन देखी।

     

    स्क्रीन पर कोई नहीं था।

     

    “भैया, बाहर कोई दिखाई नहीं दे रहा।”

     

    “फिर आवाज कहाँ से आ रही है?”

     

    सिया के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

     

    तभी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज दरवाजे से नहीं, बल्कि घर के पीछे वाले हिस्से से आई।

     

    सिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “भैया… आवाज पीछे से आई है।”

     

    “तुम अपने कमरे में जाओ। दरवाजा बंद करो। मैं अभी पड़ोसी को फोन करता हूँ।”

     

    सिया जल्दी से अपने कमरे में चली गई।

     

    उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई।

     

    कुछ मिनट बीते।

     

    फिर फोन की घंटी बजी।

     

    आरव का कॉल था।

     

    “सिया, पड़ोसी शर्मा अंकल तुम्हारे घर के बाहर पहुँच रहे हैं।”

     

    “ठीक है भैया।”

     

    सिया ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी उसके कमरे की खिड़की पर हल्की-सी दस्तक हुई।

     

    टक… टक…

     

    सिया का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह खिड़की की तरफ देखने लगी।

     

    बाहर बारिश थी।

     

    और शीशे पर किसी की उँगलियों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “भैया…”

     

    उसने फोन कान से लगाया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मेरी खिड़की पर भी किसी ने दस्तक दी है।”

     

    आरव की आवाज गंभीर हो गई।

     

    “खिड़की मत खोलना।”

     

    “मैं नहीं खोल रही।”

     

    तभी बाहर से एक धीमी आवाज आई।

     

    “सिया…”

     

    सिया के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उस आवाज ने उसका नाम लिया था।

     

    “भैया… किसी ने मेरा नाम लिया।”

     

    “किसने?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    फिर वही आवाज आई।

     

    “सिया… दरवाजा खोलो।”

     

    सिया की आँखों में डर भर गया।

     

    लेकिन तभी उसे कुछ अजीब लगा।

     

    वह आवाज बाहर से नहीं, बल्कि घर के अंदर से आती हुई लग रही थी।

     

    सिया धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकली।

     

    “सिया, बाहर मत जाना!” आरव फोन पर चिल्लाया।

     

    लेकिन सिया रुक नहीं सकी।

     

    आवाज उसे नीचे वाले कमरे की तरफ ले जा रही थी।

     

    वहाँ एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी, जिसे उसके पिता हमेशा बंद रखते थे।

     

    अचानक अलमारी के अंदर से आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सिया कुछ कदम पीछे हट गई।

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आवाज अलमारी के अंदर से आ रही है।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “उस अलमारी को मत खोलना।”

     

    सिया ने पूछा, “लेकिन अंदर कोई है तो?”

     

    “शर्मा अंकल आने वाले हैं। उनके आने तक इंतजार करो।”

     

    तभी बाहर मुख्य दरवाजे पर तेज दस्तक हुई।

     

    धड़ाम! धड़ाम!

     

    सिया घबरा गई।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “सिया! दरवाजा खोलो!”

     

    सिया ने आवाज पहचानी।

     

    “शर्मा अंकल?”

     

    “हाँ बेटी, जल्दी दरवाजा खोलो।”

     

    सिया दरवाजे तक पहुँची, लेकिन अचानक उसे कुछ याद आया।

     

    शर्मा अंकल हमेशा उसे “बेटी” कहते थे।

     

    लेकिन इस आवाज में कुछ अजीब था।

     

    “अंकल, आप अपना नाम बताइए।”

     

    बाहर कुछ देर सन्नाटा रहा।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “मैं… शर्मा हूँ।”

     

    सिया और डर गई।

     

    “आपका पहला नाम?”

     

    फिर चुप्पी।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “भैया, ये शर्मा अंकल नहीं हैं।”

     

    आरव ने तुरंत कहा, “दरवाजा बिल्कुल मत खोलना।”

     

    तभी बाहर से आवाज बदल गई।

     

    “सिया… तुम मुझे पहचानती नहीं?”

     

    सिया की आँखें फैल गईं।

     

    यह आवाज उसके पिता जैसी थी।

     

    वही आवाज।

     

    वही बोलने का तरीका।

     

    लेकिन उसके पिता को गुजरे तीन साल हो चुके थे।

     

    सिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “पापा…?”

     

    आरव ने फोन पर कहा, “सिया! उसकी बात मत सुनो।”

     

    बाहर से फिर आवाज आई—

     

    “बेटा, दरवाजा खोलो।”

     

    सिया कुछ पल के लिए भावुक हो गई।

     

    लेकिन तभी उसे पिता की एक बात याद आई।

     

    जब वह छोटी थी, पिता ने उसे समझाया था—

     

    “अगर कभी कोई अजनबी मेरी आवाज निकालकर तुम्हें बुलाए, तो उसकी बात पर विश्वास मत करना। पहले कोई ऐसी बात पूछना जो सिर्फ हम दोनों जानते हों।”

     

    सिया ने दरवाजे की तरफ देखकर पूछा—

     

    “पापा, आपने मुझे मेरी पहली बाँसुरी कब दी थी?”

     

    बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद आवाज आई—

     

    “जब तुम दस साल की थीं।”

     

    सिया की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    गलत जवाब।

     

    उसे बाँसुरी नौ साल की उम्र में मिली थी।

     

    उसे समझ आ गया कि बाहर जो भी था, वह उसके पिता नहीं थे।

     

    तभी दूर से किसी गाड़ी की आवाज सुनाई दी।

     

    शर्मा अंकल सच में आ गए थे।

     

    उन्होंने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “सिया! मैं हूँ, शर्मा अंकल। पुलिस को भी फोन कर दिया है। दरवाजा मत खोलना, हम बाहर हैं।”

     

    कुछ ही देर में पुलिस भी पहुँच गई।

     

    बाहर खड़े व्यक्ति को पकड़ लिया गया।

     

    पूछताछ में पता चला कि वह घर में चोरी करने की कोशिश कर रहा था। उसे घर के बारे में कुछ जानकारी थी और उसने सिया को डराने के लिए अलग-अलग आवाजें निकालने की कोशिश की थी।

     

    सिया ने राहत की साँस ली।

     

    कुछ देर बाद आरव भी घर पहुँच गया।

     

    उसने सिया को गले लगाया।

     

    “तुमने बहुत समझदारी दिखाई।”

     

    सिया ने धीरे से कहा, “भैया… अगर पापा की वो बात मुझे याद नहीं आती तो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “तो शायद आज कहानी कुछ और होती।”

     

    सुबह बारिश रुक चुकी थी।

     

    सूरज की हल्की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं।

     

    सिया ने घर का दरवाजा खोला।

     

    बाहर सब शांत था।

     

    वह कुछ देर दरवाजे को देखती रही।

     

    फिर मुस्कुराकर बोली—

     

    “कल रात दरवाजे पर सच में कोई था…”

     

    आरव ने पूछा, “कौन?”

     

    सिया ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “डर।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    सिया ने आगे कहा—

     

    “लेकिन मैंने दरवाजा नहीं खोला। इसलिए डर अंदर नहीं आ पाया।”

     

    उस दिन के बाद सिया ने एक बात हमेशा याद रखी—

     

    हर दस्तक का जवाब देना जरूरी नहीं होता।

     

    कभी-कभी समझदारी यही होती है कि दरवाजा बंद रखा जाए…

     

    क्योंकि बाहर कौन है, यह जानने से ज्यादा जरूरी है कि अंदर कौन सुरक्षित है।