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  • शौर्य की नादानियां

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शौर्य की नादानियां — पार्ट 1: एक नादान लड़का

     

    शहर के किनारे बने एक बड़े से पुराने बंगले में शौर्य अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता था। उम्र उसकी करीब बाईस साल थी, लेकिन हरकतें ऐसी कि घर में कोई उसे गंभीरता से लेता ही नहीं था।

     

    शौर्य दिल का बहुत अच्छा था, बस उसकी एक आदत खराब थी—वह बिना सोचे कोई भी काम कर देता था।

     

    कभी किसी की मदद करने के चक्कर में खुद मुसीबत में फंस जाता, तो कभी दोस्तों के साथ मजाक करते-करते घर में हंगामा खड़ा कर देता।

     

    उस सुबह भी उसकी मां रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    “शौर्य! उठ गया क्या?” मां ने आवाज लगाई।

     

    अंदर से आवाज आई, “हां मां!”

     

    मां ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    “शौर्य!”

     

    मां दौड़कर सीढ़ियों के पास पहुंचीं। शौर्य नीचे खड़ा था और उसके हाथ में टूटा हुआ फूलदान था।

     

    “ये कैसे टूटा?”

     

    शौर्य ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा, “मां, मैंने नहीं तोड़ा।”

     

    “तो फिर?”

     

    “वो खुद गिर गया।”

     

    तभी उसकी छोटी बहन रिया पीछे से बोली, “मां, भैया ने गेंद से निशाना लगाया था।”

     

    शौर्य ने रिया को घूरकर देखा।

     

    “तुम मेरी बहन हो या पड़ोसियों की गवाह?”

     

    रिया हंसने लगी।

     

    मां ने माथा पकड़ लिया।

     

    “तुम दोनों मुझे एक दिन पागल कर दोगे।”

     

    नाश्ते के बाद शौर्य अपने दोस्त कबीर से मिलने निकल गया। रास्ते में उसे एक बुजुर्ग आदमी सड़क किनारे परेशान खड़ा दिखाई दिया।

     

    “बाबा, क्या हुआ?”

     

    बुजुर्ग बोले, “बेटा, मेरी साइकिल की चेन उतर गई है।”

     

    शौर्य तुरंत नीचे बैठ गया।

     

    “अरे इसमें क्या है? मैं ठीक कर देता हूं।”

     

    कबीर बोला, “तू रहने दे। पिछली बार तूने मेरी साइकिल ठीक की थी और उसके बाद वो उल्टी दिशा में चलने लगी थी।”

     

    “चुप कर।”

     

    शौर्य ने बड़ी मेहनत से चेन ठीक की।

     

    बुजुर्ग ने साइकिल चलाई और मुस्कुराते हुए बोले, “बिल्कुल ठीक हो गई।”

     

    शौर्य गर्व से मुस्कुराया।

     

    कबीर ने धीरे से कहा, “आज तो बच गया।”

     

    शौर्य ने उसे कोहनी मारी।

     

    दोनों आगे बढ़े ही थे कि शौर्य की नजर सड़क के दूसरी तरफ खड़ी एक लड़की पर पड़ी। लड़की अपने हाथ में कुछ कागज लिए परेशान दिखाई दे रही थी।

     

    “वो शायद किसी को ढूंढ रही है।”

     

    कबीर बोला, “तुझे हर जगह किसी की मदद करने की पड़ी रहती है।”

     

    “तो?”

     

    “तो एक दिन किसी मुसीबत में फंस जाएगा।”

     

    शौर्य हंस पड़ा।

     

    “मेरी जिंदगी में मुसीबत खुद चलकर आती है।”

     

    वह लड़की के पास पहुंचा।

     

    “आपको किसी मदद की जरूरत है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जी… मेरा नाम अनाया है। मुझे इस इलाके में एक घर ढूंढना है, लेकिन पता समझ नहीं आ रहा।”

     

    शौर्य ने कागज देखा।

     

    “ये तो मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है।”

     

    “सच?”

     

    “हां। चलिए, मैं रास्ता बता देता हूं।”

     

    कबीर पीछे से बोला, “अब तू गाइड भी बनेगा?”

     

    शौर्य ने अनदेखा कर दिया।

     

    रास्ते में अनाया ने बताया कि वह अपने पिता के पुराने दोस्त से मिलने आई थी। उसके पिता कुछ साल पहले गुजर चुके थे और उनके जाने के बाद अनाया को एक पुरानी चिट्ठी मिली थी।

     

    उस चिट्ठी में इसी इलाके के एक पुराने घर का जिक्र था।

     

    शौर्य अचानक गंभीर हो गया।

     

    “कौन सा घर?”

     

    अनाया ने पता दिखाया।

     

    शौर्य का चेहरा बदल गया।

     

    “ये घर…?”

     

    “हां। जानते हो?”

     

    शौर्य कुछ पल चुप रहा।

     

    “वो घर कई सालों से बंद है।”

     

    अनाया ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

     

    “पता नहीं। बचपन से उसे बंद ही देखा है।”

     

    कबीर बोला, “चल वापस चलते हैं।”

     

    लेकिन अनाया की आंखों में सवाल थे।

     

    शौर्य ने कहा, “मैं तुम्हें वहां तक छोड़ देता हूं।”

     

    पुराने घर के सामने पहुंचकर तीनों रुक गए।

     

    बड़ा लोहे का दरवाजा जंग लगा हुआ था। अंदर पेड़ों की सूखी डालियां दिखाई दे रही थीं।

     

    अनाया ने अपनी जेब से वही पुरानी चिट्ठी निकाली।

     

    “यही जगह है।”

     

    शौर्य ने दरवाजा धकेला।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    कबीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “भाई, नादानी मत कर।”

     

    शौर्य मुस्कुराया।

     

    “डर गया?”

     

    “हां।”

     

    “मैं हूं ना।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    घर के अंदर धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। अचानक अनाया की नजर एक तस्वीर पर पड़ी।

     

    वह वहीं रुक गई।

     

    “ये… मेरे पिता हैं।”

     

    शौर्य और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

     

    तस्वीर में अनाया के पिता एक आदमी के साथ खड़े थे।

     

    शौर्य ने तस्वीर में दूसरे आदमी को देखा और चौंक गया।

     

    “इन्हें मैं जानता हूं।”

     

    “कौन हैं?”

     

    शौर्य ने धीरे से कहा, “मेरे पापा।”

     

    अनाया के चेहरे पर हैरानी फैल गई।

     

    “क्या?”

     

    शौर्य भी समझ नहीं पा रहा था कि उसके पिता और अनाया के पिता का इस घर से क्या रिश्ता था।

     

    तभी ऊपर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर बोला, “अब मैं सच में जा रहा हूं।”

     

    शौर्य ने कहा, “रुक।”

     

    तीनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    ऊपर एक कमरा बंद था।

     

    दरवाजे पर वही निशान बना था जो अनाया की चिट्ठी के पीछे बना हुआ था।

     

    अनाया ने कांपते हाथों से चिट्ठी पलटी।

     

    उसके पीछे लिखा था—

     

    “सच जानना हो तो उस कमरे का दरवाजा खोलना।”

     

    शौर्य ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    उसकी नादानियां उसे यहां तक तो ले आई थीं।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि यह नादानी उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज खोलने वाली थी।

     

    और जैसे ही शौर्य ने दरवाजे की कुंडी पकड़ी…

     

    अंदर से किसी ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।

     

    तीनों के चेहरे पर डर छा गया।

  • शरारती सफेद बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और शरारती सफेद बछड़ा

     

    अगली सुबह नंद भवन में सूरज की पहली किरण पड़ते ही कान्हा उठ गए। उन्हें रात से ही उस नन्हे सफेद बछड़े की चिंता थी, जो कल पहली बार उनके पास आया था।

     

    कान्हा आँगन में दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने तुरंत घंटी बजाई।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    फिर उनकी नजर सफेद बछड़े पर गई।

     

    वह थोड़ी दूर खड़ा था और बड़ी-बड़ी आँखों से कान्हा को देख रहा था।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “तुम्हारा नाम क्या रखें?”

     

    बछड़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम बहुत सफेद हो।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसका नाम गोरा रख दो।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “नहीं, चाँद रखो।”

     

    कान्हा ने कुछ देर सोचा।

     

    फिर बोले—

     

    “इसका नाम चंदू होगा।”

     

    सभी दोस्तों को नाम पसंद आ गया।

     

    कान्हा ने चंदू को पुकारा—

     

    “चंदू!”

     

    बछड़ा कान खड़े करके उनकी तरफ देखने लगा।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “इसे अपना नाम पसंद आ गया!”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    सुबह का समय था। नंद भवन में यशोदा मैया रसोई में काम कर रही थीं। उन्होंने बड़े बर्तन में आटा रखा और रोटियाँ बनाने लगीं।

     

    कान्हा कुछ देर तक चंदू और छोटू के साथ खेलते रहे।

     

    लेकिन चंदू बाकी बछड़ों से अलग था।

     

    वह हर चीज को सूँघता, फिर उसे छूने की कोशिश करता।

     

    कभी वह लकड़ी के दरवाजे को नाक से धक्का देता, कभी रस्सी खींचता।

     

    कान्हा उसे देखकर हँसते रहे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो तुमसे भी ज्यादा शरारती है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं, ये तो बहुत सीधा है।”

     

    उसी समय चंदू एक रस्सी के पास गया और उसे खींचने लगा।

     

    रस्सी से बंधी छोटी टोकरी नीचे गिर गई।

     

    धड़ाम!

     

    कान्हा चौंक गए।

     

    फिर हँस पड़े।

     

    “चंदू!”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ऐसा नहीं करते।”

     

    चंदू ने कान हिलाए।

     

    कान्हा बोले—

     

    “समझ गए?”

     

    चंदू फिर रस्सी सूँघने लगा।

     

    कान्हा ने सिर पकड़ लिया।

     

    “तुम तो मेरी बात सुनते ही नहीं।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया रसोई में आटा गूँध रही थीं।

     

    उन्होंने बच्चों की हँसी सुनी तो बाहर देखा।

     

    “कान्हा, अंदर मत आना। मैं काम कर रही हूँ।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं अंदर नहीं आऊँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और चंदू को भी अंदर मत आने देना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    लेकिन जैसे ही यशोदा अंदर गईं, चंदू उनकी ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चंदू, उधर नहीं जाना।”

     

    चंदू ने दो कदम पीछे किए।

     

    फिर अचानक मुड़ा और रसोई की तरफ चल पड़ा।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “अरे! रुको!”

     

    चंदू रसोई के दरवाजे तक पहुँच गया।

     

    कान्हा ने उसे रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन चंदू बहुत तेज था।

     

    वह सीधे अंदर चला गया।

     

    यशोदा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “अरे!”

     

    चंदू आटे के पास पहुँच चुका था।

     

    उसने अपना मुँह आटे वाले बर्तन के पास किया।

     

    कान्हा चिल्लाए—

     

    “चंदू! नहीं!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    चंदू ने बर्तन को हल्का सा धक्का दिया।

     

    बर्तन हिल गया और थोड़ा आटा नीचे गिर गया।

     

    यशोदा ने जल्दी से बर्तन पकड़ लिया।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “मैया, मैंने इसे रोका था।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन ये अंदर आया कैसे?”

     

    कान्हा चुप।

     

    तभी चंदू ने अपनी पूँछ हिलाई और पीछे हटते हुए आटे पर पैर रख दिया।

     

    उसके पैरों के निशान पूरे फर्श पर बन गए।

     

    कान्हा उन्हें देखकर हँस पड़े।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा।

     

    “तुम्हें हँसी आ रही है?”

     

    कान्हा ने हँसी रोकने की कोशिश की।

     

    “थोड़ी।”

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    “अब इसे बाहर ले जाओ।”

     

    कान्हा चंदू को बाहर ले गए।

     

    लेकिन चंदू की शरारत अभी खत्म नहीं हुई थी।

     

    आँगन में रखी एक टोकरी में सूखी घास थी।

     

    चंदू उसमें मुँह डालकर घास खींचने लगा।

     

    कुछ ही पल में पूरी घास बाहर बिखर गई।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, ये तो बिल्कुल तुम्हारी तरह है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरी तरह क्यों?”

     

    “जहाँ देखो वहाँ शरारत।”

     

    कान्हा ने चंदू को देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “लेकिन इसकी शरारतें बहुत मजेदार हैं।”

     

    तभी चंदू ने फिर दौड़ लगा दी।

     

    इस बार वह सीधे आँगन में रखे पानी के बड़े बर्तन की तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे भागे।

     

    “चंदू! वहाँ मत जाना!”

     

    चंदू ने बर्तन को सूँघा।

     

    फिर पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “चलो, इस बार बच गए।”

     

    लेकिन अचानक चंदू ने अपना सिर बर्तन से टकरा दिया।

     

    बर्तन थोड़ा हिला और पानी बाहर छलक गया।

     

    कान्हा के पैर भीग गए।

     

    दोस्त जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अब तो तुमने हद कर दी!”

     

    चंदू मासूम बनकर उन्हें देखने लगा।

     

    कान्हा उसका चेहरा देखकर खुद भी हँस पड़े।

     

    दोपहर में नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने आँगन में बिखरी घास, पानी और आटे के निशान देखे।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज यहाँ क्या हुआ?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपके नए बछड़े ने पूरा घर उलट-पुलट कर दिया।”

     

    नंद बाबा ने चंदू को देखा।

     

    “इतना शरारती?”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “बाबा, ये बहुत अच्छा है। बस इसे सब चीजों को छूने की आदत है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें तो अच्छा दोस्त मिल गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने चंदू के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “लेकिन इसे धीरे-धीरे समझाना होगा कि क्या करना है और क्या नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिखाऊँगा।”

     

    शाम को कान्हा ने एक खेल बनाया।

     

    उन्होंने चंदू के सामने तीन चीजें रखीं—घास, लकड़ी और एक फूल।

     

    फिर बोले—

     

    “चंदू, घास खानी है।”

     

    चंदू ने घास खा ली।

     

    कान्हा खुश हुए।

     

    “बहुत अच्छे!”

     

    फिर उन्होंने लकड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “इसे नहीं खाना।”

     

    चंदू ने लकड़ी सूँघी और आगे बढ़ गया।

     

    कान्हा ने ताली बजाई।

     

    “शाबाश!”

     

    दोस्तों ने कहा—

     

    “देखो, कान्हा इसे पढ़ा रहे हैं।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। इसे भी तो सीखना है।”

     

    कुछ देर बाद चंदू फूल की तरफ बढ़ा।

     

    कान्हा ने उसे रोक दिया।

     

    “ये नहीं। ये खेलने के लिए है।”

     

    चंदू पीछे हट गया।

     

    कान्हा ने खुशी से उसकी गर्दन सहलाई।

     

    “तुम सीख रहे हो!”

     

    यशोदा दूर से यह सब देख रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “देखिए, हमारा कान्हा खुद कितना शरारती है, लेकिन चंदू को समझा रहा है।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “शायद दूसरों को समझाते-समझाते खुद भी बहुत कुछ सीख रहा है।”

     

    रात को कान्हा चंदू के पास बैठे।

     

    उन्होंने उसके गले की छोटी सी घंटी को हाथ से छुआ।

     

    टन…

     

    छोटू भी पास खड़ा था।

     

    उसकी घंटी भी बजने लगी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “अब तो मेरे पास दो घंटियों वाले दोस्त हैं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “और दोनों तुमसे कम शरारती हैं।”

     

    कान्हा ने उसे देखा।

     

    “तुम मुझे शरारती कह रहे हो?”

     

    दोस्त भागने लगा।

     

    कान्हा उसके पीछे दौड़ पड़े।

     

    आँगन में फिर बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कुछ देर बाद यशोदा ने सबको घर बुलाया।

     

    कान्हा जाने से पहले चंदू के पास गए।

     

    “कल फिर मिलेंगे।”

     

    चंदू ने अपनी छोटी घंटी बजाई।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तुमने हाँ कह दिया!”

     

    उस रात कान्हा जल्दी सो गए।

     

    लेकिन अगले दिन एक नई परेशानी उनका इंतजार कर रही थी।

     

    • सुबह जब वे गायों के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू और चंदू दोनों गायों के झुंड से गायब थे।

     

    कान्हा की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “छोटू?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    “चंदू?”

     

    दूर कहीं से एक बहुत हल्की घंटी सुनाई दी—

     

    टन…

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “दोनों शायद जंगल की तरफ चले गए हैं।”

     

    और बिना देर किए कान्हा अपने दोस्तों के साथ उनकी तलाश में निकल पड़े।

     

  • बारिश में खोया छोटू

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    — कान्हा और बारिश में खोया छोटू

     

    अगली सुबह वृंदावन में आसमान पर बादल छाए हुए थे। हवा ठंडी थी और दूर-दूर तक काले बादल दिखाई दे रहे थे।

     

    कान्हा सुबह उठते ही आँगन में आए। उनकी नजर सबसे पहले गायों के पास गई।

     

    वहाँ छोटू भी खड़ा था।

     

    उसके गले में नंद बाबा की दी हुई नई छोटी घंटी थी।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा उसके पास दौड़कर गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़े ने कान्हा की तरफ देखा और धीरे से आवाज की।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “देखो मैया! ये मुझे पहचान गया।”

     

    यशोदा मैया दरवाजे पर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।

     

    “अब तो तुम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई है।”

     

    कान्हा ने छोटू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “हाँ।”

     

    तभी नंद बाबा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “आज बारिश हो सकती है। गायों को बहुत दूर मत ले जाना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ गायों के पीछे-पीछे चल पड़े।

     

    छोटू भी उनके आसपास ही घूम रहा था।

     

    आसमान में बादल और घने होते जा रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज बारिश होगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो क्या हुआ? थोड़ी बारिश में खेलेंगे।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “अगर बाबा ने सुन लिया तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “हम दूर नहीं जाएँगे।”

     

    वे एक खुले मैदान में पहुँचे।

     

    गायें घास खाने लगीं और बच्चे पेड़ के नीचे बैठ गए।

     

    कान्हा ने बांसुरी निकाली।

     

    धीरे-धीरे बांसुरी की धुन हवा में फैलने लगी।

     

    छोटू कान्हा के पास आकर बैठ गया।

     

    कान्हा ने उसके गले की घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    “अच्छी है ना?”

     

    छोटू ने पूँछ हिलाई।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी पहली बूंद उनके हाथ पर गिरी।

     

    फिर दूसरी।

     

    एक दोस्त ने ऊपर देखा।

     

    “बारिश!”

     

    कुछ ही पल में बारिश तेज हो गई।

     

    सभी बच्चे पेड़ के नीचे भागकर खड़े हो गए।

     

    गायें भी एक जगह इकट्ठी होने लगीं।

     

    नंद बाबा ने दूर से आवाज लगाई—

     

    “सब बच्चे पास रहो!”

     

    कान्हा ने जवाब दिया—

     

    “जी बाबा!”

     

    तेज बारिश में कुछ दिखाई देना मुश्किल हो गया।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों को गिनना शुरू किया।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    सभी बच्चे थे।

     

    फिर उन्होंने गायों की तरफ देखा।

     

    कई गायें पास थीं।

     

    लेकिन छोटू दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    कान्हा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “छोटू कहाँ है?”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद गायों के बीच होगा।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “नहीं है।”

     

    उन्होंने ध्यान से सुना।

     

    बारिश की आवाज के बीच कोई घंटी सुनाई नहीं दे रही थी।

     

    कान्हा घबरा गए।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    उन्होंने फिर आवाज लगाई—

     

    “छोटू!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बारिश बहुत तेज है। अभी बाहर मत जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन छोटू अकेला है।”

     

    नंद बाबा भी गायों को एक जगह इकट्ठा कर रहे थे।

     

    कान्हा उनके पास दौड़कर पहुँचे।

     

    “बाबा, छोटू नहीं मिल रहा।”

     

    नंद बाबा ने तुरंत आसपास देखा।

     

    “कहाँ था आखिरी बार?”

     

    “मेरे पास। फिर बारिश शुरू हुई और वो गायों के बीच चला गया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तुम यहाँ रहो। मैं देखता हूँ।”

     

    लेकिन कान्हा बोले—

     

    “मैं भी चलूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “बाबा, वो डर गया होगा।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा को अपने पास रखा।

     

    “ठीक है। लेकिन अकेले नहीं जाना।”

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “तुम सब भी चलोगे?”

     

    सबने सिर हिलाया।

     

    नंद बाबा आगे और बच्चे पीछे चलने लगे।

     

    उन्होंने रास्ते में घंटी की आवाज सुनने की कोशिश की।

     

    लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि कुछ साफ नहीं सुनाई दे रहा था।

     

    कान्हा बार-बार आवाज लगाते—

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं आता।

     

    तभी कान्हा ने हाथ उठाया।

     

    “रुको!”

     

    सब रुक गए।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ पल तक वह चुप रहे।

     

    फिर बहुत हल्की आवाज आई—

     

    टन…

     

    कान्हा की आँखें खुल गईं।

     

    “सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “घंटी!”

     

    उन्होंने आवाज की दिशा में दौड़ना शुरू किया।

     

    नंद बाबा भी उनके पीछे गए।

     

    थोड़ी दूर एक झाड़ी के पीछे छोटू खड़ा था।

     

    उसका एक पैर कीचड़ में फँस गया था।

     

    कान्हा उसे देखकर तुरंत उसके पास बैठ गए।

     

    “छोटू!”

     

    बछड़ा घबराकर आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “डरो मत। मैं आ गया।”

     

    नंद बाबा ने सावधानी से उसका पैर कीचड़ से बाहर निकाला।

     

    छोटू आजाद होते ही कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसे गले से लगा लिया।

     

    “तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे?”

     

    छोटू ने धीरे से आवाज की।

     

    एक दोस्त हँसते हुए बोला—

     

    “लगता है ये भी तुम्हें जवाब दे रहा है।”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    उन्होंने छोटू की घंटी को देखा।

     

    वह कीचड़ से भर गई थी।

     

    कान्हा ने अपने कपड़े के एक साफ हिस्से से घंटी साफ की।

     

    टन…

     

    आवाज फिर सुनाई दी।

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “अब मैं तुम्हें फिर कभी खोने नहीं दूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “कान्हा, किसी की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता। उसके लिए ध्यान रखना पड़ता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं रखूँगा।”

     

    बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी।

     

    सब लोग गायों के साथ वापस चल पड़े।

     

    छोटू इस बार कान्हा के बिल्कुल पास चल रहा था।

     

    हर कुछ कदम बाद उसकी घंटी बजती।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा हर बार पीछे मुड़कर उसे देखते।

     

    नंद बाबा यह देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया दौड़कर बाहर आईं।

     

    “कान्हा! तुम इतने भीग क्यों गए?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, छोटू खो गया था।”

     

    यशोदा ने पहले कान्हा को देखा, फिर छोटू को।

     

    “मिल गया?”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ!”

     

    यशोदा ने राहत की साँस ली।

     

    “मैं तो डर गई थी।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी घंटी सुनाई दी थी।”

     

    उन्होंने घंटी बजाई।

     

    टन…

     

    यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा हुआ इसे घंटी मिल गई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। अब ये खोएगा नहीं।”

     

    यशोदा ने कान्हा के गीले बाल पोंछे।

     

    “लेकिन तुम भी तोगए थे बारिश में।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “छोटू अकेला था।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “दूसरों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अगली बार बाबा के साथ ही जाऊँगा।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “यही समझदारी है।”

     

    उस शाम बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की धूप निकल आई थी।

     

    कान्हा छोटू के पास बैठकर उसकी घंटी सुन रहे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, अब तुम्हें बारिश से डर नहीं लगता?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बारिश से नहीं। बस छोटू खो जाए तो डर लगता है।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में इसकी बहुत चिंता है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “दोस्त की चिंता तो करनी ही चाहिए।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने अपनी बांसुरी उठाई और धीरे-धीरे बजाने लगे।

     

    छोटू उनके पास बैठा रहा।

     

    गायें भी शांत थीं।

     

    वृंदावन की गीली मिट्टी से खुशबू आ रही थी।

     

    यशोदा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।

     

    उनके मन में एक ही बात आई—

     

    उनका नन्हा कान्हा भले ही शरारती हो, लेकिन उसके दिल में अपने हर दोस्त के लिए बहुत गहरा प्यार था।

     

    रात को कान्हा सोने से पहले फिर छोटू की बात करने लगे।

     

    “मैया, कल मैं उसके लिए कुछ अच्छा करूँगा।”

     

    “क्या?”

     

    “उसके लिए फूलों की माला बनाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “क्या छोटू भी मुझे अपना दोस्त मानता होगा?”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “जिसके लिए तुम बारिश में उसे ढूँढ़ने निकल पड़े, वो तुम्हें दोस्त क्यों नहीं मानेगा?”

     

    कान्हा मुस्कुराए और सो गए।

     

    अगली सुबह उन्होंने सच में छोटू के लिए फूलों की एक छोटी माला बनाई।

     

    लेकिन जब वह माला लेकर छोटू के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि छोटू अकेला नहीं था।

     

    उसके पास एक नन्हा सफेद बछड़ा खड़ा था।

     

    और वह बछड़ा कान्हा को देखते ही उनके पास दौड़ पड़ा।

     

    कान्हा हैरान होकर बोले—

     

    “ये कौन है?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराकर बोले—

     

    “छोटू का नया दोस्त।”

     

    कान्हा ने दोनों बछड़ों को देखा और खुशी से बोले—

     

    “अब हमारे पास दो दोस्त हैं!”

     

    लेकिन कान्हा को क्या पता था कि नया बछड़ा इतना शरारती था कि अगले ही दिन वह नंद भवन की रसोई में घुसकर सारा आटा बिखेरने वाला था।

     

    •  
  • कान्हा और बिछड़ा बछड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और बिछड़ा हुआ बछड़ा

     

    अगली सुबह कान्हा सूरज निकलने से पहले ही उठ गए। आज उनके लिए खास दिन था, क्योंकि नंद बाबा ने उन्हें पहली बार गायों के साथ खुले मैदान तक चलने की अनुमति दी थी।

     

    कान्हा उठते ही यशोदा मैया के पास पहुँचे।

     

    “मैया! उठो ना!”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “क्या हुआ कान्हा?”

     

    “आज मैं बाबा के साथ गायों को चराने जाऊँगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मुझे याद है। लेकिन इतनी सुबह से इतनी खुशी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैं गायों की घंटियाँ सुनूँगा, उनके साथ चलूँगा और उनकी देखभाल भी करूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके बाल सँवारे और कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन बाबा की बात मानना। बहुत दूर मत जाना।”

     

    “पक्का!”

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को लेकर घर से निकले। कान्हा उनके साथ थे। उनके पीछे उनके कई दोस्त भी चल पड़े।

     

    रास्ते भर गायों की घंटियाँ बजती रहीं।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा कभी किसी गाय के पास जाते, कभी किसी बछड़े के सिर पर हाथ फेरते।

     

    नंद बाबा उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, आज तो तुम बिल्कुल बड़े ग्वाले जैसे लग रहे हो।”

     

    कान्हा ने गर्व से कहा—

     

    “मैं बड़ा होकर भी गायों की देखभाल करूँगा।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “और माखन?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “माखन भी खाऊँगा।”

     

    सब बच्चे हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे एक बड़े हरे मैदान में पहुँचे। वहाँ घास बहुत अच्छी थी। गायें अलग-अलग जगह फैलकर घास खाने लगीं।

     

    नंद बाबा ने बच्चों से कहा—

     

    “तुम सब यहीं रहना। गायों को बहुत दूर मत जाने देना।”

     

    सभी ने कहा—

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी निकालने लगे।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे धुन बजानी शुरू की।

     

    गायों की घंटियाँ और बांसुरी की आवाज मिलकर बहुत प्यारी लग रही थी।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने बांसुरी रोक दी।

     

    उन्हें लगा जैसे कोई आवाज कर रहा है।

     

    “माँ… माँ…”

     

    कान्हा ने ध्यान से सुना।

     

    आवाज बहुत हल्की थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा—

     

    “तुमने कुछ सुना?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा फिर चुप हो गए।

     

    कुछ पल बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    “माँ…”

     

    कान्हा तुरंत खड़े हो गए।

     

    “कोई बछड़ा अपनी माँ को बुला रहा है।”

     

    वह आवाज की दिशा में चल पड़े।

     

    दो दोस्त उनके साथ हो लिए।

     

    थोड़ी दूर झाड़ियों के पीछे उन्हें एक छोटा सा बछड़ा दिखाई दिया।

     

    वह अकेला खड़ा था और बार-बार अपनी माँ की तरफ देखने की कोशिश कर रहा था।

     

    कान्हा उसके पास बैठ गए।

     

    “तुम यहाँ अकेले कैसे रह गए?”

     

    बछड़ा धीरे से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “डरो मत। हम तुम्हारी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ दूसरी तरफ चली गई होगी।”

     

    कान्हा ने मैदान की तरफ देखा।

     

    बहुत सारी गायें थीं।

     

    “हमें पहचानना होगा कि इसकी माँ कौन है।”

     

    उन्होंने बछड़े को ध्यान से देखा।

     

    उसके गले में कोई घंटी नहीं थी।

     

    कान्हा बोले—

     

    “चलो, इसे धीरे-धीरे गायों के पास ले चलते हैं।”

     

    वे बछड़े को लेकर मैदान की ओर लौटे।

     

    जैसे ही बछड़ा गायों के पास पहुँचा, वह एक दिशा में तेजी से बढ़ने लगा।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “रुको! इसे पता है इसकी माँ कहाँ है।”

     

    बछड़ा एक सफेद गाय के पास पहुँचा।

     

    लेकिन गाय ने उसे देखकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

     

    बछड़ा फिर दूसरी तरफ गया।

     

    कान्हा उसके पीछे चलते रहे।

     

    अचानक वह एक भूरे रंग की गाय के पास जाकर रुक गया।

     

    गाय ने जैसे ही बछड़े को देखा, वह उसकी तरफ बढ़ी।

     

    बछड़ा खुशी से अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    “मिल गई!”

     

    दोस्त खुशी से बोले—

     

    “सच में इसकी माँ मिल गई!”

     

    कान्हा ने गाय के सिर पर हाथ फेरा।

     

    “तुम इसे छोड़कर इतनी दूर क्यों चली गई थीं?”

     

    नंद बाबा भी वहाँ पहुँच गए थे।

     

    उन्होंने पूरा दृश्य देखा।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता चला कि ये अपनी माँ से बिछड़ गया है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसकी आवाज सुनाई दी थी। ये अपनी माँ को बुला रहा था।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से कहा—

     

    “तुमने बहुत अच्छा किया।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “बाबा, अगर कोई छोटा अपने घरवालों से बिछड़ जाए तो उसे ढूँढ़ना चाहिए ना?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “बिल्कुल।”

     

    कान्हा कुछ देर उस बछड़े को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “अब इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “आज से तुम इसकी भी देखभाल करना।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने बछड़े को गले लगाने की कोशिश की।

     

    बछड़ा थोड़ा पीछे हट गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अरे, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

     

    कुछ देर बाद बछड़ा खुद कान्हा के पास आ गया।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “अब डरना नहीं।”

     

    दोपहर को बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे।

     

    कान्हा ने अपनी पोटली खोली।

     

    उसमें यशोदा मैया ने रोटी और थोड़ा मक्खन रखा था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “मुझे भी थोड़ा दो।”

     

    कान्हा ने रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

     

    फिर दूसरे दोस्त को भी दिया।

     

    थोड़ी देर में कान्हा के पास बहुत कम खाना बचा।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम खुद क्या खाओगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मेरे पास अभी भी है।”

     

    उन्होंने आखिरी टुकड़ा उठाया।

     

    तभी वही छोटा बछड़ा उनके पास आ गया।

     

    वह कान्हा को देखने लगा।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें भी चाहिए?”

     

    उन्होंने रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसे नहीं दिया, बल्कि पास की घास की ओर इशारा किया।

     

    “तुम ये खाओ। ये तुम्हारे लिए है।”

     

    बछड़ा घास खाने लगा।

     

    कान्हा उसे देखकर मुस्कुराते रहे।

     

    शाम होने लगी।

     

    नंद बाबा ने गायों को वापस इकट्ठा करना शुरू किया।

     

    सभी बच्चे अपने-अपने दोस्तों के साथ चल पड़े।

     

    लेकिन अचानक कान्हा ने पीछे देखा।

     

    वही छोटा बछड़ा फिर से पीछे रह गया था।

     

    कान्हा दौड़कर उसके पास गए।

     

    “चलो, घर चलते हैं।”

     

    बछड़ा धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा।

     

    रास्ते में उसकी घंटी नहीं बज रही थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा, इसके लिए भी घंटी लगवा दो।”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि अगर ये फिर पीछे रह जाए तो हमें इसकी आवाज सुनाई दे।”

     

    नंद बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “ठीक है। कल इसके लिए एक छोटी घंटी ले आएँगे।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “फिर मैं इसकी घंटी सबसे पहले सुनूँगा।”

     

    शाम को नंद भवन पहुँचते ही यशोदा मैया बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को देखा।

     

    “आज दिन कैसा रहा?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बहुत अच्छा!”

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने बछड़े की पूरी कहानी सुनाई।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    फिर उन्होंने कान्हा को अपने पास बुलाकर कहा—

     

    “तुमने आज बहुत अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, वो बहुत डर गया था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “किसी को डर में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    फिर अचानक बोले—

     

    “मैया, कल उसके लिए घंटी आएगी।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तो अब तुम्हारा एक नया दोस्त भी बन गया।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “हाँ। इसका नाम भी रखेंगे।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्या नाम रखोगे?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “छोटू!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “इतना छोटा नाम?”

     

    “हाँ। क्योंकि वो छोटा है।”

     

    रात को कान्हा सोने गए तो उनकी बातें सिर्फ उसी बछड़े के बारे में थीं।

     

    “मैया, कल मैं छोटू को घास खिलाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसकी घंटी बजाऊँगा।”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसके साथ दौड़ूँगा।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “और फिर कोई शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने तुरंत मासूम चेहरा बनाया।

     

    “नहीं।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारे इस ‘नहीं’ पर मुझे भरोसा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में उनकी आँखें बंद हो गईं।

     

    लेकिन अगले दिन जब छोटू के गले में नई घंटी बाँधी गई, तो कान्हा ने देखा कि घंटी की आवाज बाकी सभी घंटियों से अलग थी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “अब मैं तुम्हें भीड़ में भी पहचान लूँगा।”

     

    छोटू ने अपनी छोटी सी पूँछ हिलाई।

     

    और शायद वह भी समझ गया था कि वृंदावन में उसे एक ऐसा दोस्त मिल गया है जो उसकी छोटी-सी आवाज भी सुन लेता है।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा और छोटू के सामने एक नई मुसीबत आने वाली थी—वृंदावन की तेज बारिश में छोटू अचानक गायों के झुंड से अलग हो जाएगा।

     

    और उसे ढूँढ़ने के लिए कान्हा अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे दोस्तों के साथ निकल पड़ेंगे।

     

     

  • कान्हा और गाय की घंटी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और गाय की नई घंटी

     

    अगली सुबह नंद भवन के आँगन में एक नई आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा ने खेलते-खेलते अपना सिर उठाया।

     

    “ये कैसी आवाज है?”

     

    उनके दोस्त ने कहा—

     

    “चलो देखते हैं।”

     

    सभी बच्चे दौड़कर आँगन में पहुँचे।

     

    वहाँ नंद बाबा एक सुंदर सी गाय के गले में नया घंटी वाला पट्टा बाँध रहे थे। घंटी चमक रही थी और उसके हिलते ही मधुर आवाज निकल रही थी।

     

    कान्हा उस गाय के पास जाकर खड़े हो गए।

     

    उन्होंने घंटी को ध्यान से देखा।

     

    “बाबा, ये नई है?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “हाँ बेटा। आज इसे नई घंटी पहनाई है।”

     

    कान्हा ने घंटी को हल्के से छुआ।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “अब जब ये दूर जाएगी, तो इसकी आवाज से पता चल जाएगा कि ये कहाँ है।”

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “तो अगर मैं भी इसे पहन लूँ तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कहाँ हूँ?”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “तुम्हें घंटी की जरूरत नहीं है। तुम्हारी शरारतों की आवाज दूर से ही सुनाई दे जाती है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने मुँह बना लिया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “अच्छा, नाराज मत हो।”

     

    कान्हा फिर घंटी को देखने लगे।

     

    उसके साथ लाल रंग का सुंदर पट्टा भी लगा था।

     

    उनके मन में तुरंत एक विचार आया।

     

    उन्होंने अपने दोस्त को आँख से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गया कि कुछ होने वाला है।

     

    कान्हा ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर ये घंटी किसी और को पहना दें तो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “किसे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    नंद बाबा गाय को लेकर बाहर चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ पीछे-पीछे चल दिए।

     

    गाय थोड़ी दूर जाकर पेड़ के नीचे घास खाने लगी।

     

    कान्हा उसकी घंटी की आवाज सुनते रहे।

     

    टन… टन…

     

    उन्हें यह आवाज बहुत पसंद आ रही थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम इसे इतना ध्यान से क्यों सुन रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “हम भी ऐसा खेल खेलेंगे।”

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “कैसा?”

     

    “एक बच्चा आँखें बंद करेगा और बाकी घंटी बजाकर अलग-अलग जगह छिपेंगे। उसे आवाज सुनकर सबको ढूँढ़ना होगा।”

     

    सभी बच्चों को खेल पसंद आ गया।

     

    उन्होंने एक छोटी घंटी ली जो घर के पुराने सामान में पड़ी थी।

     

    पहली बारी कान्हा की थी।

     

    उन्होंने आँखों पर कपड़ा बाँध लिया।

     

    दोस्त घंटी बजाते हुए इधर-उधर भागने लगे।

     

    टन… टन… टन…

     

    कान्हा आवाज सुनकर एक तरफ दौड़ते।

     

    लेकिन दोस्त दूसरी तरफ चले जाते।

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम लोग मुझे परेशान कर रहे हो!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    आखिरकार कान्हा ने आवाज का पीछा किया और एक दोस्त को पकड़ लिया।

     

    “पकड़ लिया!”

     

    दोस्त बोला—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम्हारी हँसी से।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कुछ देर तक खेल चलता रहा।

     

    तभी नंद बाबा की गाय वहाँ से निकलकर दूसरी तरफ चली गई।

     

    उसकी घंटी बज रही थी।

     

    कान्हा अचानक चुप हो गए।

     

    “रुको।”

     

    सबने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “गाय कहाँ जा रही है?”

     

    उन्होंने देखा कि गाय रास्ते से हटकर झाड़ियों की तरफ चली गई थी।

     

    कान्हा उसके पीछे गए।

     

    वहाँ एक छोटा बछड़ा खड़ा था, जो अपनी माँ के पीछे जाना चाहता था लेकिन रस्सी के कारण रुक गया था।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अरे, तुम यहाँ हो!”

     

    बछड़ा बेचैनी से आवाज करने लगा।

     

    कान्हा ने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा तुरंत आए।

     

    उन्होंने बछड़े को देखा।

     

    “ये अपनी माँ के पास जाना चाहता है।”

     

    उन्होंने उसे खोल दिया।

     

    बछड़ा दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “घंटी ने हमें इसका रास्ता बता दिया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “देखा? छोटी सी चीज भी कितने काम आती है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    उस दिन से कान्हा को घंटी की आवाज और भी अच्छी लगने लगी।

     

    शाम को वह गाय के पास बैठे रहे।

     

    वह उसे प्यार से सहलाते और घंटी की आवाज सुनते।

     

    यशोदा मैया ने उन्हें देखा।

     

    “कान्हा, आज तुम्हें घंटी से इतनी दोस्ती कैसे हो गई?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, इसकी आवाज से पता चलता है कि गाय कहाँ है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें गायों की बहुत चिंता रहती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “ये हमारे घर का हिस्सा हैं।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    तभी कान्हा ने अचानक कहा—

     

    “मैया, मुझे भी एक घंटी चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैं बाहर जाऊँ तो आपको पता रहे कि मैं कहाँ हूँ।”

     

    यशोदा ने प्यार से कहा—

     

    “तुम्हें घंटी पहनाने की जरूरत नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारी आवाज से ही पहचान लूँगी।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “अगर मैं चुप रहा तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तब तुम्हारे दोस्त तुम्हें ढूँढ़ते हुए जरूर शोर मचाएँगे।”

     

    कान्हा और उनके दोस्त हँसने लगे।

     

    अगले दिन कान्हा ने एक नई शरारत की योजना बनाई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “आज हम सब अपनी-अपनी छोटी घंटियाँ पहनेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “हम देखेंगे कि कौन सबसे ज्यादा देर तक बिना आवाज किए चल सकता है।”

     

    सभी ने घंटियाँ बाँध लीं।

     

    लेकिन जैसे ही वे चलने लगे—

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    सबकी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “कोई भी चुप नहीं चल सकता!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारी वजह से ये खेल भी खराब हो गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “खराब नहीं, मजेदार हो गया।”

     

    सभी बच्चे दौड़ने लगे।

     

    घंटियों की आवाज पूरे रास्ते में गूँजने लगी।

     

    गाँव की गोपियाँ बाहर आ गईं।

     

    एक गोपी ने पूछा—

     

    “ये कैसी बारात निकल रही है?”

     

    दूसरी बोली—

     

    “लगता है कान्हा ने बच्चों को गाय बना दिया है।”

     

    कान्हा जोर से हँसे।

     

    “हम गाय नहीं हैं!”

     

    गोपियाँ भी हँसने लगीं।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने बच्चों की घंटियाँ देखीं।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम घंटी वाला खेल खेल रहे हैं।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, लेकिन किसी की गाय की घंटी मत खोलना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं खोलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “कान्हा, तुमने तो सोचा था गाय की घंटी खुद पहनोगे।”

     

    यशोदा ने सुन लिया।

     

    “क्या कहा?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    दोस्त भाग गया।

     

    यशोदा ने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तुम गाय की घंटी पहनने वाले थे?”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “बस सोच रहा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मेरे कान्हा को हर चीज खुद करके देखनी होती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मुझे सब जानना है।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “जानना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज करने से पहले पूछना भी जरूरी है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    रात को नंद बाबा घर लौटे।

     

    कान्हा उनके पास बैठकर बोले—

     

    “बाबा, आपकी गाय की घंटी बहुत अच्छी है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हें पसंद है?”

     

    “बहुत।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो कल तुम मेरे साथ गायों को चराने चलना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “और मैं उनकी घंटियाँ भी सुनूँगा?”

     

    “जितनी चाहो।”

     

    कान्हा ने नंद बाबा को गले लगा लिया।

     

    उस रात कान्हा बहुत खुश थे।

     

    उन्होंने सोने से पहले यशोदा से कहा—

     

    “मैया, कल मैं बाबा के साथ गायों के पास जाऊँगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “किस बात का?”

     

    “गायों से दूर मत जाना।”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”

     

    • यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    अगली सुबह कान्हा पहली बार नंद बाबा के साथ गायों को लेकर वृंदावन के खुले मैदानों की ओर जाने वाले थे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही कान्हा को एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी जिसने उन्हें चौंका दिया—

     

    एक बहुत छोटा बछड़ा अपनी माँ से अलग होकर अकेला खड़ा था।

     

    कान्हा तुरंत उसकी ओर दौड़ पड़े।

     

    और इस बार उनकी शरारत नहीं, उनकी ममता और समझदारी सबको देखने को मिलने वाली थी।

     

     

  • कान्हा और मिस्री की चोरी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  — कान्हा और मिश्री की मीठी चोरी

     

    वृंदावन में उस सुबह हवा में कुछ अलग ही मिठास थी। नंद भवन की रसोई से मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। यशोदा मैया सुबह से ही एक बड़े बर्तन में दूध उबाल रही थीं। पास में मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े रखे थे।

     

    कान्हा बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, लेकिन जैसे ही मीठी खुशबू उनके पास पहुँची, उन्होंने खेलना बंद कर दिया।

     

    कान्हा ने हवा में साँस लेते हुए कहा—

     

    “कुछ मीठा बन रहा है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मेरी नाक बता रही है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “चलो पता लगाते हैं।”

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे नंद भवन की रसोई के पास पहुँच गए।

     

    खिड़की से झाँककर कान्हा ने देखा कि यशोदा मैया एक बड़ी थाली में मिश्री के टुकड़े रख रही थीं।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “मिश्री!”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “बहुत सारी है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारा कुछ नहीं मतलब हमेशा कुछ होता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उसी समय यशोदा मैया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    खिड़की के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन उन्हें पता था कि कोई न कोई जरूर वहाँ था।

     

    उन्होंने मिश्री की थाली उठाई और उसे ऊँची जगह पर रख दिया।

     

    फिर मन ही मन बोलीं—

     

    “आज देखते हैं कान्हा इसे कैसे लेते हैं।”

     

    यशोदा बाहर चली गईं।

     

    कुछ पल बाद कान्हा धीरे-धीरे अंदर आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मिश्री बहुत ऊँचाई पर रखी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब कैसे लोगे?”

     

    कान्हा ने पास पड़ी लकड़ी उठाई।

     

    “इससे।”

     

    उन्होंने लकड़ी ऊपर की तरफ बढ़ाई।

     

    लेकिन थाली दूर थी।

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    थाली हिली जरूर, लेकिन मिश्री नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये काम नहीं करेगा।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो छोड़ देते हैं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    वहाँ एक छोटी चौकी पड़ी थी।

     

    कान्हा ने उसे खींचकर दीवार के पास रखा।

     

    फिर उसके ऊपर एक और लकड़ी का पटरा रख दिया।

     

    दोस्त घबरा गया।

     

    “कान्हा, गिर जाओगे!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम पकड़कर रखना।”

     

    एक बच्चा चौकी पकड़कर खड़ा हो गया।

     

    कान्हा धीरे-धीरे ऊपर चढ़े।

     

    अब उनका हाथ थाली तक पहुँचने वाला था।

     

    उन्होंने मिश्री का एक टुकड़ा उठाया।

     

    “मिल गई!”

     

    नीचे खड़े बच्चों ने खुशी से हाथ उठाए।

     

    लेकिन तभी बाहर से यशोदा की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    उनके हाथ में मिश्री थी।

     

    दोस्तों ने चौकी छोड़ दी और भागने लगे।

     

    कान्हा जल्दी से नीचे उतरने लगे।

     

    लेकिन उनका पैर चौकी से फिसल गया।

     

    सौभाग्य से वह नीचे रखी नरम चटाई पर गिर गए।

     

    यशोदा अंदर आईं।

     

    उन्होंने देखा कि कान्हा जमीन पर बैठे हैं और उनके हाथ में मिश्री है।

     

    यशोदा ने कमर पर हाथ रखा।

     

    “तो यही हो रहा था?”

     

    कान्हा ने मिश्री पीछे छिपा ली।

     

    “क्या?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाथ पीछे क्यों कर रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “दिखाओ।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    मिश्री का टुकड़ा देखकर यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “तुम्हें इतनी मिश्री चाहिए थी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे नहीं।”

     

    “तो किसे?”

     

    कान्हा ने पीछे खड़े दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “सबको।”

     

    दोस्तों ने सिर हिलाया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “अगर तुम्हें चाहिए थी तो मुझसे माँग लेते।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “आप मना कर देतीं।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप कहतीं कि ज्यादा मीठा मत खाओ।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो तुमने चोरी करना ठीक समझा?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया।

     

    “देखो कान्हा, बिना पूछे किसी की चीज लेना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “अगर मैं माँगता तो देतीं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, लेकिन सबको बराबर देती।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो अब दे दो।”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “पहले वादा करो कि आगे से बिना पूछे नहीं लोगे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वादा।”

     

    यशोदा ने मिश्री की थाली नीचे रख दी।

     

    सभी बच्चों की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने एक-एक करके सबको मिश्री दी।

     

    कान्हा को थोड़ा ज्यादा देने लगीं तो कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। सबको जितनी दी है, मुझे भी उतनी ही दो।”

     

    यशोदा ने प्यार से उनकी तरफ देखा।

     

    “आज तो तुमने बहुत बड़ी बात कह दी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    सब बच्चे मिश्री खाने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, चोरी करने से अच्छा माँग लेना था।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब समझ आ गया।”

     

    दूसरा बच्चा बोला—

     

    “लेकिन चोरी में मजा आता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मिश्री मिलने की खुशी ज्यादा अच्छी है, चोरी की नहीं।”

     

    यशोदा यह सुनकर मुस्कुराईं।

     

    दोपहर को नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने देखा कि आँगन में बच्चे बैठे मिश्री खा रहे हैं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज किस खुशी में मिश्री बाँटी जा रही है?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज फिर एक नया कारनामा किया।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने खुद ही सारी बात बता दी।

     

    “मैंने मिश्री लेने की कोशिश की।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और पकड़े गए?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया ने सबको बराबर मिश्री दी।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो आज तुम्हारी चोरी भी काम की रही।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आप भी उसे बढ़ावा मत दीजिए।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तो बहुत मजा आया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “कल क्या मिलेगा?”

     

    कान्हा ने सोचा।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे यशोदा! तुम्हारे कान्हा ने मेरी मटकी में फूल डाल दिए!”

     

    कान्हा ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत दोस्तों की तरफ देखा।

     

    दोस्तों ने भी उन्हें देखा।

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा धीरे से बोले—

     

    “मैंने तो कुछ नहीं किया।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    “अब तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ कौन मानेगा?”

     

    कान्हा भी हँस पड़े और भागने लगे।

     

    गोपी पीछे से आवाज लगाती रही—

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कान्हा दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ के पीछे छिप गए।

     

    उनके दोस्त भी वहीं आ गए।

     

    एक ने पूछा—

     

    “तुमने सच में मटकी में फूल डाले थे?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो गोपी हमेशा अपनी मटकी को बहुत सुंदर बनाती हैं। मैंने सोचा मटकी के अंदर भी फूल होने चाहिए।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तो ये थी आज की दूसरी शरारत!”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “मैया, मैंने फूल ही तो डाले थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे!”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    फिर बोले—

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, अब उस गोपी से माफी माँगो।”

     

    कान्हा उनके साथ गए।

     

    गोपी अभी भी नाराज थी।

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    गोपी ने उन्हें देखा।

     

    “अच्छा, अब नहीं करोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं।”

     

    गोपी मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या मैं बाहर से फूल लगाऊँ?”

     

    गोपी हँस पड़ी।

     

    “हाँ, वो कर सकते हो।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ठीक है!”

     

    उस दिन कान्हा ने पहली बार समझा कि अपनी खुशी के लिए किसी की चीज से छेड़छाड़ करने से अच्छा है कि उसकी खुशी में शामिल हुआ जाए।

     

    रात को यशोदा ने कान्हा को सुलाते हुए पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

     

    “और?”

     

    “अगर किसी को खुश करना हो तो उसकी अनुमति लेकर करना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर उनके माथे को चूमा।

     

    “मेरा कान्हा सच में समझदार हो रहा है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    कुछ पल बाद धीरे से बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल फिर मिश्री मिलेगी?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “हाँ, लेकिन चोरी नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पक्का।”

     

    बाहर वृंदावन में चाँदनी फैल चुकी थी।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा के सामने मिश्री से भी बड़ी चुनौती आने वाली थी।

     

    नंद बाबा ने अपनी गायों के लिए एक नया घंटी वाला पट्टा बनवाया था।

     

    और कान्हा को देखते ही उसमें कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर उनके मन में फिर एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    •  
  • कान्हा और नन्हीं चिड़िया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  कान्हा और नन्ही चिड़िया

     

    सुबह होते ही कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँच गए। कल उन्होंने तय किया था कि आज वहाँ खूब खेलेंगे, लेकिन जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, कान्हा की नजर घास के बीच किसी छोटी सी चीज पर पड़ी।

     

    उन्होंने कदम रोक दिए।

     

    “रुको!”

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस जगह पहुँचे। वहाँ एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। वह उड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार अपने पंख समेटकर नीचे बैठ जाती।

     

    कान्हा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    चिड़िया ने गर्दन हिलाई।

     

    कान्हा ने उसे हाथ लगाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस ध्यान से देखा।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करें?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    “इसे पानी चाहिए होगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी कटोरी में थोड़ा पानी भरा और चिड़िया के पास रख दिया।

     

    चिड़िया पहले तो पीछे हट गई, लेकिन कुछ देर बाद धीरे-धीरे पानी पीने लगी।

     

    कान्हा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “देखा? इसे प्यास लगी थी।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे घर ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर इसकी माँ इसे ढूँढ़ रही होगी तो?”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    “पहले इसकी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    वे पेड़ों की तरफ देखने लगे।

     

    कान्हा ने चिड़िया की आवाज की नकल की।

     

    “चीं… चीं…”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम चिड़िया की आवाज निकाल रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अगर इससे इसकी माँ आ गई तो?”

     

    उन्होंने फिर आवाज निकाली।

     

    कुछ देर बाद ऊपर पेड़ से एक चिड़िया की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “शायद इसकी माँ है।”

     

    उन्होंने नीचे बैठी चिड़िया को देखा।

     

    वह भी ऊपर की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, यही है।”

     

    लेकिन समस्या यह थी कि छोटी चिड़िया उड़ नहीं पा रही थी।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे पेड़ के नीचे ले चलते हैं।”

     

    सब बच्चे सावधानी से उसके पास बैठ गए।

     

    कान्हा ने पत्तों की मदद से उसके लिए छोटी सी जगह बनाई।

     

    फिर बोले—

     

    “अब इसकी माँ नीचे आएगी।”

     

    कुछ देर बाद ऊपर वाली चिड़िया नीचे की डाल पर आकर बैठ गई।

     

    वह लगातार आवाज कर रही थी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “देखो, इसकी माँ इसे बुला रही है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन ये ऊपर कैसे जाएगी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जब इसके पंख ठीक होंगे, तब उड़ जाएगी। अभी इसे आराम चाहिए।”

     

    कान्हा ने पास की झाड़ियों से कुछ नरम पत्ते लाकर उसके आसपास रख दिए।

     

    फिर वह वहीं बैठ गए।

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “तुम यहीं बैठे रहोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसे डर लग रहा है।”

     

    कुछ देर बाद चिड़िया शांत हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से बांसुरी निकाली।

     

    उन्होंने बहुत धीमी धुन बजानी शुरू की।

     

    आसपास का वातावरण शांत हो गया।

     

    ऊपर बैठी चिड़िया भी कुछ देर चुप रही।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “लगता है इसे तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “शायद।”

     

    कुछ समय बाद छोटी चिड़िया ने अपने पंख हिलाए।

     

    कान्हा तुरंत खुश हो गए।

     

    “देखो! ये कोशिश कर रही है।”

     

    उसने फिर पंख फैलाए, लेकिन इस बार भी उड़ नहीं पाई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कोई बात नहीं। जल्दी नहीं करनी चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हर किसी को ठीक होने में अपना समय लगता है।”

     

    बच्चे चुप हो गए।

     

    दोपहर होने लगी।

     

    यशोदा मैया को चिंता होने लगी कि कान्हा अभी तक घर क्यों नहीं आया।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “आज फिर बहुत देर हो गई।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कान्हा कहीं न कहीं कोई नई कहानी बना रहा होगा।”

     

    उधर कान्हा अभी भी चिड़िया के पास बैठे थे।

     

    तभी एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, अब घर चलें?”

     

    कान्हा ने चिड़िया की तरफ देखा।

     

    “थोड़ी देर और।”

     

    अचानक छोटी चिड़िया ने अपने पंख फैलाए।

     

    वह पहले एक छोटी सी छलांग लगाकर पास की डाल तक पहुँची।

     

    कान्हा खुशी से खड़े हो गए।

     

    “उड़ गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    चिड़िया थोड़ी देर डाल पर बैठी रही।

     

    फिर उसने अपने पंख फैलाए और ऊपर अपनी माँ की तरफ उड़ गई।

     

    ऊपर बैठी बड़ी चिड़िया भी उसके साथ उड़ गई।

     

    कान्हा उन्हें देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुमने इसे बचा लिया।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। इसकी माँ ने इसे बचाया। हमने बस थोड़ा इंतजार किया।”

     

    सभी बच्चे वापस घर की तरफ चल पड़े।

     

    रास्ते में कान्हा अचानक रुक गए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम इसके लिए कुछ लेकर नहीं गए।”

     

    “क्या?”

     

    “इसके लिए दाना।”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “अब तो वो उड़ गई।”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया ने कान्हा को देखते ही पूछा—

     

    “इतनी देर कहाँ थे?”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “मैया, आज हमें एक छोटी चिड़िया मिली थी।”

     

    यशोदा का चेहरा नरम हो गया।

     

    “क्या हुआ था उसे?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ध्यान से सुनती रहीं।

     

    जब कान्हा ने बताया कि वह चिड़िया अपनी माँ के पास उड़ गई, तो यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरे कान्हा ने आज अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, वो बहुत छोटी थी। उसे अकेला देखकर अच्छा नहीं लगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें हर छोटे जीव की चिंता होती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वो बोल नहीं सकते।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “जो बोल नहीं सकता, उसके दर्द को समझना बहुत बड़ी बात है।”

     

    कान्हा माँ की तरफ देखने लगे।

     

    “मैया, अगर किसी को हमारी जरूरत हो और हम मदद न करें तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जहाँ तक हो सके, मदद करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं हमेशा करूँगा।”

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ फिर बाहर बैठे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तुमने कोई शरारत नहीं की।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम पूरा दिन चिड़िया के साथ बैठे रहे।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “हर दिन शरारत करना जरूरी है क्या?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारे लिए तो है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने अचानक मिट्टी से एक छोटी सी चिड़िया बनाई।

     

    उन्होंने उसे अपने सामने रखा।

     

    “देखो, ये हमारी दोस्त है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो मिट्टी की है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन याद तो असली वाली की दिलाएगी।”

     

    शाम की हवा चल रही थी।

     

    दूर आसमान में कई पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।

     

    कान्हा उन्हें देखते हुए मुस्कुराते रहे।

     

    तभी ऊपर से एक छोटी चिड़िया उनके पास से उड़ती हुई गुजरी।

     

    कान्हा ने उसे पहचान लिया।

     

    “देखो!”

     

    दोस्तों ने ऊपर देखा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    चिड़िया एक पल के लिए पास की डाल पर बैठी और फिर उड़ गई।

     

    कान्हा ने हाथ हिलाकर कहा—

     

    “फिर मिलना!”

     

    उस दिन कान्हा ने अपने दोस्तों को एक छोटी सी बात समझाई—

     

    “किसी की मदद करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा पानी, थोड़ा इंतजार और थोड़ा प्यार भी किसी के लिए बहुत होता है।”

     

    सभी बच्चे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे।

     

    लेकिन अगले ही पल कान्हा ने मिट्टी की चिड़िया उठाई और दोस्त के सिर पर रख दी।

     

    “अब तुम चिड़िया बनो!”

     

    दोस्त चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    कान्हा हँसते हुए भागने लगे।

     

    “पकड़ो मुझे!”

     

    सारे बच्चे उनके पीछे दौड़ पड़े।

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा और मुस्कुराईं।

     

    “मेरा कान्हा फिर अपनी शरारत पर लौट आया।”

     

    लेकिन उस दिन की शरारत में भी एक मिठास थी।

     

    क्योंकि कान्हा ने अपने दोस्तों को सिखाया था कि खेल और हँसी के साथ-साथ किसी छोटे और कमजोर जीव के लिए दया रखना भी जरूरी है।

     

    और वृंदावन की उस शाम को कान्हा की बांसुरी की आवाज के साथ पेड़ों पर बैठे पक्षी भी जैसे खुशी से चहक रहे थे।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा को एक नई परेशानी मिलने वाली थी—यशोदा मैया ने घर में बहुत सारी मिश्री बनाई थी, और कान्हा के दोस्तों को इसकी खबर लग चुकी थी।

     

    अब शुरू होने वाली थी मिश्री की सबसे मीठी चोरी!

     

  • कान्हा और जामुन के पेड़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और जामुन के पेड़ की शरारत

     

    वृंदावन की सुबह आज कुछ अलग ही थी। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए पेड़ों की पत्तियों पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। गलियों में मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी और गायें अपने बछड़ों के साथ धीरे-धीरे चरने निकल रही थीं।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ नंद भवन के बाहर बैठे थे। उनके हाथ में छोटी सी लकड़ी थी, जिससे वह मिट्टी पर तरह-तरह की आकृतियाँ बना रहे थे।

     

    तभी एक दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! मैंने कुछ देखा है!”

     

    कान्हा ने लकड़ी छोड़ दी।

     

    “क्या?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “गाँव के बाहर वाले बड़े जामुन के पेड़ पर बहुत सारे जामुन लगे हैं।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। इतने सारे कि पूरा पेड़ काला दिखाई दे रहा है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “लेकिन पेड़ बहुत ऊँचा है। हम जामुन तोड़ नहीं पाएँगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पेड़ कितना भी ऊँचा हो, जामुन नीचे तो आने ही पड़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “चलो, पेड़ के पास।”

     

    सभी बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे उस बड़े जामुन के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    सचमुच पेड़ पर इतने जामुन लगे थे कि उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “वाह!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब बताओ, इन्हें तोड़ेंगे कैसे?”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को देखा।

     

    “पहले मैं चढ़ूँगा।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम गिर गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं गिरूँगा नहीं।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने लगे।

     

    पहली डाल तक पहुँचे।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    दोस्त नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    कान्हा एक मजबूत डाल पर बैठ गए।

     

    उन्होंने जामुन तोड़े और नीचे फेंकने लगे।

     

    “पकड़ो!”

     

    नीचे खड़े बच्चे खुशी से जामुन पकड़ने लगे।

     

    किसी ने अपनी धोती में जामुन बाँध लिए।

     

    किसी ने पत्तों से छोटी टोकरी बना ली।

     

    कान्हा ऊपर से जामुन तोड़ते रहे।

     

    लेकिन तभी एक शरारती दोस्त ने नीचे से कहा—

     

    “कान्हा! सबसे बड़े जामुन तो अपने लिए रख लेना।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं! सब बराबर मिलेंगे।”

     

    उन्होंने एक बड़ा जामुन तोड़ा और नीचे फेंक दिया।

     

    एक बच्चा उसे पकड़ने के लिए दौड़ा।

     

    लेकिन जामुन उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    वह बच्चा बोला—

     

    “मेरा जामुन!”

     

    कान्हा ऊपर से बोले—

     

    “कोई बात नहीं। दूसरा दूँगा।”

     

    उन्होंने उसके लिए एक और जामुन तोड़कर नीचे फेंका।

     

    इस बार बच्चे ने दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मिल गया!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे! तुम लोग वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    बच्चे अचानक शांत हो गए।

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    एक गोपी हाथ में टोकरी लिए उनकी तरफ आ रही थी।

     

    वह बोली—

     

    “ये जामुन का पेड़ किसने तोड़ना शुरू कर दिया?”

     

    कान्हा नीचे उतरते हुए बोले—

     

    “हम तो बस कुछ जामुन ले रहे थे।”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कुछ? तुम्हारे पास तो पूरी टोकरी है!”

     

    कान्हा ने अपनी टोकरी देखी।

     

    वह सच में भर चुकी थी।

     

    उन्होंने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “हम अकेले नहीं खाएँगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    कान्हा ने आसपास के बच्चों की तरफ इशारा किया।

     

    “सबके लिए।”

     

    गोपी का गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पेड़ की डालियाँ मत तोड़ना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं तोड़ेंगे।”

     

    तभी ऊपर बैठे एक बच्चे का पैर फिसला।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    बच्चा डर गया था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “डरो मत। धीरे-धीरे नीचे आओ।”

     

    उन्होंने उसे सुरक्षित नीचे उतारा।

     

    गोपी ने यह देखा तो बोली—

     

    “कान्हा, शरारत करते हो लेकिन अपने दोस्तों का ध्यान भी रखते हो।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “दोस्त हैं तो ध्यान रखना पड़ेगा।”

     

    सभी बच्चे जामुन लेकर बैठ गए।

     

    कान्हा ने एक जामुन उठाया और खाने लगे।

     

    उनके होंठ और जीभ बैंगनी हो गए।

     

    एक दोस्त उन्हें देखकर हँस पड़ा।

     

    “कान्हा! तुम्हारी जीभ देखो!”

     

    कान्हा ने अपनी जीभ बाहर निकाली।

     

    “तुम्हारी भी तो ऐसी ही है।”

     

    सभी बच्चे अपनी-अपनी जीभ देखने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे जामुन लेकर घर की ओर लौटे।

     

    कान्हा ने सोचा कि आज यशोदा मैया को भी जामुन खिलाएँगे।

     

    घर पहुँचते ही उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “मैया!”

     

    यशोदा रसोई से बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा का चेहरा देखा और हैरान रह गईं।

     

    “ये क्या हाल बना रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जामुन खाए हैं।”

     

    यशोदा ने उनके गाल देखे।

     

    “तुम्हारा पूरा मुँह बैंगनी हो गया।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “मैया, आपको भी दूँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “पहले ये बताओ कि जामुन कहाँ से लाए?”

     

    कान्हा ने टोकरी आगे कर दी।

     

    “पेड़ से।”

     

    “किसकी अनुमति से?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा ने समझ लिया।

     

    “फिर से बिना पूछे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम बहुत सारे नहीं तोड़े।”

     

    यशोदा ने टोकरी देखी।

     

    “ये तुम्हारे हिसाब से थोड़े हैं?”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    “हमने सबमें बाँट दिए।”

     

    तभी पीछे से नंद बाबा आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या बाँटा?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपका बेटा आज जामुन का पूरा पेड़ बाँट आया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “किसी को नुकसान तो नहीं हुआ?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बाबा। हमने डालियाँ नहीं तोड़ीं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो ठीक है। लेकिन अगली बार पेड़ से फल लेने से पहले उसके मालिक से पूछ लेना।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    फिर उन्होंने टोकरी से सबसे बड़ा जामुन उठाया और नंद बाबा को दे दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    नंद बाबा ने जामुन लिया।

     

    “मेरे लिए?”

     

    “हाँ।”

     

    फिर कान्हा ने दूसरा जामुन यशोदा को दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मेरे लिए इतना बड़ा?”

     

    “आपको सबसे बड़ा मिलना चाहिए।”

     

    यशोदा ने जामुन खाया और बोलीं—

     

    “बहुत मीठा है।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना!”

     

    उस शाम कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, कल क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    कुछ देर सोचकर बोले—

     

    “कल हम नदी किनारे खेलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “वहाँ क्या करेंगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    सभी बच्चे बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर तुम सब आज ही सोचना शुरू कर दोगे।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    यशोदा दूर से बच्चों की बातें सुन रही थीं।

     

    उन्होंने कान्हा को आवाज लगाई—

     

    “अब घर आ जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आ रहा हूँ मैया।”

     

    वह दोस्तों के साथ अंदर जाने लगे।

     

    लेकिन जाते-जाते उन्होंने पीछे मुड़कर उस जामुन के पेड़ की तरफ देखा।

     

    हवा से उसकी डालियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें लगा जैसे पेड़ भी उनसे कह रहा हो—

     

    “कल फिर आना।”

     

    अगले दिन कान्हा सचमुच यमुना किनारे गए।

     

    लेकिन वहाँ उन्हें एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी, जिसे देखकर उनकी सारी शरारतें कुछ देर के लिए भूल जानी थीं।

     

    यमुना किनारे एक छोटा घायल पक्षी पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे देखा तो तुरंत अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे घर ले चलो।”

     

    और यहीं से शुरू हुई कान्हा की एक ऐसी बाल लीला, जिसमें पहली बार उनके दोस्तों ने देखा कि उनका नटखट कान्हा किसी छोटे से जीव का दर्द देखकर कितना परेशान हो जाता है।

     

  • कान्हा नंद बाबा की पगड़ी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और नंद बाबा की पगड़ी

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी। गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और यशोदा मैया रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    नंद बाबा आज गाँव के कुछ लोगों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपनी सबसे सुंदर पीली पगड़ी निकाली और उसे बड़े ध्यान से सिर पर बाँधा।

     

    कान्हा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा—

     

    “मेरे बाबा आज इतने सुंदर क्यों लग रहे हैं?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “आज उन्हें गाँव की सभा में जाना है।”

     

    कान्हा कुछ देर पगड़ी को देखते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “पगड़ी बहुत सुंदर है।”

     

    दोस्त ने तुरंत कहा—

     

    “कान्हा, इसे हाथ मत लगाना।”

     

    कान्हा ने मासूमियत से पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कुछ किया तो बाबा नाराज होंगे।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं कुछ नहीं करूँगा।”

     

    दोस्त ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन वह कान्हा को नहीं जानता था।

     

    कान्हा ने मन ही मन एक योजना बना ली थी।

     

    नंद बाबा तैयार होकर बाहर जाने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा और कहा—

     

    “आज तो आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा लगना जरूरी है। आज गाँव के बड़े लोग भी आएँगे।”

     

    कान्हा तुरंत उनके पास पहुँचे।

     

    “बाबा!”

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “आपकी पगड़ी मुझे भी पहननी है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अभी नहीं। ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ी है।”

     

    कान्हा ने पगड़ी को देखा।

     

    “मैं छोटी कर लूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “जब तुम बड़े हो जाओगे, तब अपनी पगड़ी पहनना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा बाहर चले गए।

     

    कान्हा कुछ देर उन्हें जाते देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “चलो।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “पगड़ी पहनने।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा दौड़ते हुए बाहर गए।

     

    नंद बाबा कुछ दूर ही गए थे।

     

    कान्हा उनके पीछे भागे।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा हाँफते हुए उनके पास पहुँचे।

     

    “आपकी पगड़ी ठीक नहीं है।”

     

    नंद बाबा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या खराब है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “इसमें मोरपंख नहीं है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    “पगड़ी में मोरपंख क्यों लगाऊँ?”

     

    कान्हा ने अपने सिर की तरफ इशारा किया।

     

    “मेरे सिर पर तो है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “वो तुम्हारे लिए है।”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो एक मेरे बाबा के लिए भी होना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हारा मन बहुत बड़ा है।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपना मोरपंख निकाल लिया।

     

    “ये आप लगा लो।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “नहीं बेटा, ये तुम्हें ही अच्छा लगता है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे अच्छा लगता है कि मेरे बाबा भी सुंदर लगें।”

     

    नंद बाबा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने मोरपंख लिया और अपनी पगड़ी में लगा लिया।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “अब आप बिल्कुल मेरे जैसे लग रहे हो!”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दो आदमी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी में मोरपंख देखा।

     

    एक ने मजाक में कहा—

     

    “अरे नंद जी, आज तो आप कान्हा जैसे बन गए।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लगता है कान्हा ने आपको भी अपनी टोली में शामिल कर लिया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    कान्हा गर्व से बोले—

     

    “ये मेरे बाबा हैं।”

     

    सब मुस्कुराने लगे।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गाँव की सभा में चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ वापस घर आ गए।

     

    लेकिन उनकी नजर अब भी पगड़ी पर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुमने बाबा की पगड़ी में मोरपंख तो लगा दिया, लेकिन अब आगे क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “फिर वही कुछ नहीं!”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “तुम अपने बाबा के पीछे क्यों गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    “सच बताओ।”

     

    “मैंने बाबा की पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा किया।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “आप नाराज नहीं हुईं?”

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा बहुत सुंदर लग रहे थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें अपने बाबा बहुत प्यारे हैं ना?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “बहुत।”

     

    दोपहर तक नंद बाबा वापस लौट आए।

     

    कान्हा दौड़कर उनके पास गए।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपकी पगड़ी में मोरपंख अच्छा लगा?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “सबने देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्या सबने कहा कि आप सुंदर लग रहे हो?”

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “सबने कहा कि मैं आज कान्हा जैसा लग रहा हूँ।”

     

    कान्हा खुशी से हँसने लगे।

     

    “तो फिर रोज लगाना।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “रोज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि नंद बाबा ने कान्हा की नकल करनी शुरू कर दी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कहने दो।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    शाम को नंद बाबा गायों को देखने जा रहे थे।

     

    कान्हा उनके साथ चल दिए।

     

    रास्ते में नंद बाबा ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम मुझे मोरपंख क्यों देना चाहते थे?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि मुझे अच्छा लगता है जब मेरे बाबा खुश होते हैं।”

     

    नंद बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और मुझे खुशी तब होती है जब तुम मेरे साथ होते हो।”

     

    कान्हा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों धीरे-धीरे गायों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    तभी एक गाय कान्हा के पास आ गई।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “बाबा, ये आज उदास लग रही है।”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसका बछड़ा दूसरी तरफ चला गया है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “तो उसे बुला लेते हैं।”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    कुछ ही देर में बछड़ा दौड़ता हुआ आया।

     

    गाय उसे देखते ही शांत हो गई।

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच में सबकी चिंता रहती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सब हमारे अपने हैं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “ये बात हमेशा याद रखना।”

     

    सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

     

    कान्हा और नंद बाबा वापस घर लौट रहे थे।

     

    दरवाजे पर यशोदा उनका इंतजार कर रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी देखी और मुस्कुराईं।

     

    “मोरपंख अभी तक लगा हुआ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “इसे निकालने का मन ही नहीं हुआ।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, अच्छा लगता है।”

     

    यशोदा ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “मेरे दोनों नंदलाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा हँसे।

     

    “एक ही काफी है।”

     

    कान्हा बोला—

     

    “नहीं बाबा, दो होने चाहिए।”

     

    यशोदा ने दोनों को प्यार से देखा।

     

    रात को कान्हा सोने के लिए अपनी माँ के पास गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज मैंने बाबा को सुंदर बनाया।”

     

    “कैसे?”

     

    “उनकी पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और कल?”

     

    कान्हा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कल?”

     

    “हाँ, कल क्या शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारा ये ‘कुछ नहीं’ सुनकर ही मुझे डर लगता है।”

     

    कान्हा माँ की गोद में सिर रखकर मुस्कुराने लगे।

     

    लेकिन अगले दिन उनके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था।

     

    नंद बाबा की पगड़ी के बाद अब उनकी नजर वृंदावन की सबसे ऊँची पेड़ की डाल पर लगे मीठे जामुनों पर थी।

     

    और कान्हा ने तय कर लिया था कि वह अकेले जामुन नहीं खाएँगे…

     

    पूरे ग्वाल-बालों को खिलाएँगे।

     

    लेकिन जामुन तोड़ते समय जो होने वाला था, उसका अंदाजा किसी को नहीं था।

  • कान्हा और दूध मटकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और नंद बाबा की दूध वाली मटकी

     

    अगली सुबह नंद भवन में बहुत हलचल थी। नंद बाबा ने गाँव की गायों से खूब सारा ताजा दूध इकट्ठा करवाया था। आज उन्होंने खुद दूध से दही और माखन बनाने का फैसला किया था।

     

    यशोदा मैया रसोई में थीं और नंद बाबा आँगन में बड़ी-बड़ी मटकियों को एक जगह रखवा रहे थे।

     

    उन्होंने एक बहुत बड़ी मटकी उठाई और यशोदा से कहा—

     

    “यशोदा, इसे संभालकर रखना। इसमें आज का सबसे अच्छा दूध है।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    दरवाजे के पीछे खड़ा कान्हा सब सुन रहा था।

     

    उसकी नजर तुरंत उस बड़ी मटकी पर गई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “देख रहे हो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो बड़ी वाली मटकी।”

     

    “हाँ।”

     

    “बाबा ने कहा है इसमें सबसे अच्छा दूध है।”

     

    दोस्त ने तुरंत समझ लिया।

     

    “तुम फिर कुछ करने वाले हो?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैंने अभी कुछ कहा थोड़ी है।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हारे चेहरे से सब पता चल रहा है।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को देखने बाहर चले गए।

     

    यशोदा भी रसोई के दूसरे काम में लग गईं।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस मटकी के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    फिर अपने दोस्तों को देखा।

     

    “बहुत बड़ी है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे उठाना मुश्किल होगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “उठानी ही क्यों है? बस थोड़ा दूध निकालेंगे।”

     

    उन्होंने एक छोटी कटोरी उठाई।

     

    मटकी का ढक्कन हटाया।

     

    दूध देखकर कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने कटोरी में दूध भरा।

     

    पहला घूँट लिया।

     

    “वाह!”

     

    दोस्तों ने भी दूध माँगा।

     

    कान्हा ने सबको थोड़ा-थोड़ा दूध दिया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बहुत स्वादिष्ट है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, बाबा ने सबसे अच्छा दूध रखा है।”

     

    तभी बाहर से गाय की आवाज आई।

     

    कान्हा तुरंत रुक गए।

     

    “बाबा आ गए?”

     

    सभी बच्चे डर गए।

     

    लेकिन आवाज बाहर की गायों की थी।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “अभी समय है।”

     

    उन्होंने फिर कटोरी भरनी शुरू कर दी।

     

    लेकिन तभी मटकी थोड़ी हिल गई।

     

    “अरे!”

     

    एक दोस्त ने मटकी पकड़ ली।

     

    “संभालो!”

     

    कान्हा ने जल्दी से उसे सीधा किया।

     

    “अगर ये गिर गई तो मैया हमें छोड़ेंगी नहीं।”

     

    सब बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने कहा—

     

    “बस, अब बहुत हुआ।”

     

    उन्होंने ढक्कन वापस रख दिया।

     

    बच्चे वहाँ से निकलने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने जाते-जाते मटकी की तरफ देखा।

     

    “कल फिर आएँगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कल क्यों?”

     

    सभी बच्चे जम गए।

     

    नंद बाबा दरवाजे पर खड़े थे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे पीछे मुड़े।

     

    “बाबा…”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या कर रहे थे?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    एक दोस्त पीछे हटने लगा।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “सब यहीं खड़े रहो।”

     

    कान्हा ने अपनी कटोरी छिपा ली।

     

    नंद बाबा ने देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    “कान्हा, हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    कटोरी में दूध था।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो तुमने दूध चुराया?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बाबा।”

     

    “तो ये क्या है?”

     

    “मैं चख रहा था।”

     

    “किससे पूछकर?”

     

    कान्हा ने कुछ सोचकर कहा—

     

    “गाय से।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “गाय ने अनुमति दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “अच्छा, तो अब गाय से ही पूछना पड़ेगा।”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हारा कान्हा मेरी दूध वाली मटकी तक पहुँच गया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, हमने बहुत थोड़ा सा लिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “थोड़ा?”

     

    उन्होंने मटकी देखी।

     

    “अरे, आधी कटोरी भी कम नहीं है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इतने सारे बच्चे थे ना।”

     

    यशोदा ने बाकी बच्चों को देखा।

     

    सबने सिर झुका लिया।

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “यशोदा, इन्हें डाँटो मत। बच्चों ने दूध ही तो पिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अगर दूध अच्छा है तो बच्चों को मिलना भी चाहिए।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “सुना मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हारे बाबा ने तुम्हें बचा लिया, लेकिन अगली बार पहले पूछना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा ने बच्चों को पास बुलाया।

     

    “चलो, अब सबको मैं खुद दूध पिलाता हूँ।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “बाबा, सच?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने दूध के गिलास भर दिए।

     

    सभी बच्चों ने दूध पिया।

     

    कान्हा ने अपना गिलास खत्म करके कहा—

     

    “बाबा, आज वाला दूध बहुत अच्छा था।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि गायों को आज सुबह बहुत अच्छी घास मिली थी।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या गायें भी खुश थीं?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “हाँ। जानवर खुश रहें तो उनका दूध भी अच्छा होता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो हमें गायों को भी अच्छा खाना देना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बिल्कुल।”

     

    उस दिन से कान्हा ने गायों को चारा देने की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    सुबह होते ही वह गायों के पास जाते।

     

    “आओ, तुम्हारे लिए घास लाया हूँ।”

     

    गायें उनके आसपास इकट्ठी हो जातीं।

     

    एक दिन कान्हा ने एक गाय को चारा देते हुए देखा कि वह कुछ खा नहीं रही।

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा, इसे क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसे भूख नहीं है।”

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “इसे आराम करने दो।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम अब गायों की भाषा भी समझने लगे हो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ये मेरी दोस्त हैं।”

     

    दोपहर को यशोदा ने देखा कि कान्हा बाहर गायों के बीच बैठे हैं।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा, खाना खा लो!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, पहले इन्हें खिला दूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें खुद भी तो खाना है।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “सबके बाद मैं।”

     

    यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    शाम को नंद बाबा ने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “आज से तुम्हें एक काम दूँगा।”

     

    कान्हा ने उत्सुक होकर पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर दिन गायों को चारा खिलाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “मैं जरूर करूँगा।”

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा तो उन्हें अपने बेटे पर गर्व हुआ।

     

    रात को कान्हा माँ की गोद में लेटे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज तुम्हें सबसे ज्यादा खुशी किस बात की हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा ने मुझे गायों की देखभाल का काम दिया।”

     

    “और दूध?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “वो भी अच्छा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें हर चीज में खुशी मिल जाती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मेरे पास आप हो, बाबा हैं, मेरे दोस्त हैं और मेरी गायें भी।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “भगवान तुम्हें हमेशा ऐसा ही रखे।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले ही पल उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल माखन मिलेगा?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम सुधरोगे नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “माखन से दोस्ती थोड़ी छोड़ी जाती है।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    उन्हें पता था कि उनका नन्हा कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करे, उसके मन में प्रेम और अपनापन हमेशा सबसे ऊपर रहेगा।

     

    और अगले दिन कान्हा की नजर इस बार दूध की मटकी पर नहीं, बल्कि नंद बाबा की पगड़ी पर पड़ने वाली थी।