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  • भाग 4: श्राप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव और कबीर फर्श टूटने के बाद एक गहरे गड्ढे में जा गिरे।

     

    कुछ क्षण तक दोनों को कुछ समझ नहीं आया।

     

    आरव ने उठने की कोशिश की तो उसके हाथ में पत्थर की नुकीली चीज़ चुभ गई।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    वह एक विशाल भूमिगत कक्ष में था।

     

    कबीर कुछ दूरी पर गिरा पड़ा था।

     

    “कबीर!”

     

    “मैं ठीक हूँ,” उसने कराहते हुए कहा।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    जहाँ से वे गिरे थे, वहाँ अब सिर्फ काला अँधेरा था।

     

    कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी सामने दीवार पर एक अजीब आकृति चमकी।

     

    वह वही निशान था जो मृणालिनी की डायरी के आखिरी पन्ने पर बना था।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दीवार पर कई नाम लिखे थे।

     

    रुद्रगढ़ परिवार के लोगों के नाम।

     

    हर नाम के सामने एक तारीख थी।

     

    और सबसे नीचे नया नाम लिखा था—

     

    आरव।

     

    उसके सामने तारीख थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “किसी ने आज ही लिखा है।”

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों पलटे।

     

    मृणालिनी वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    उसके चेहरे पर उदासी थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम हमें मारना चाहती हो?”

     

    मृणालिनी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो फिर हमें यहाँ क्यों लाया?”

     

    मृणालिनी ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    “क्योंकि जो चीज़ इस हवेली में कैद है, वह अब जाग चुकी है।”

     

    अचानक जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से धूल गिरने लगी।

     

    दूर से किसी के भारी कदमों की आवाज़ आई।

     

    धम… धम… धम…

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “वह आ रहा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने भगवान समझकर बुलाया था।”

     

    कक्ष के दूसरे छोर पर एक विशाल दरवाज़ा था।

     

    उसके पीछे से काली धुंध बाहर आने लगी।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “लालच का रूप।”

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर कोई इंसान नहीं था।

     

    सिर्फ एक विशाल काली परछाईं।

     

    उसके भीतर कई चेहरे दिखाई दे रहे थे।

     

    बूढ़े।

     

    बच्चे।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    जिन्होंने कभी इस हवेली में प्रवेश किया था।

     

    काली परछाईं ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    तभी मृणालिनी उसके सामने आ गई।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    परछाईं से भारी आवाज़ निकली—

     

    “तुमने मुझे अस्सी वर्ष कैद रखा।”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुमने मेरे परिवार को खा लिया।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “तुम्हारे परिवार ने खुद को मुझे सौंपा था।”

     

    आरव समझ गया कि असली श्राप मृणालिनी नहीं थी।

     

    असली श्राप वह शक्ति थी, जिसे रुद्रगढ़ परिवार ने लालच के कारण बुलाया था।

     

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

     

    “मृणालिनी,” आरव ने पूछा, “तुम हमें बचाकर खुद क्यों नहीं निकल जाती?”

     

    मृणालिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि मैं इस हवेली से बंधी हूँ। मेरी आत्मा तभी मुक्त होगी जब कोई जीवित इंसान इस श्राप को तोड़ेगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “धरोहर को नष्ट करके नहीं।”

     

    उसने एक पत्थर की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “सच को बाहर लाकर।”

     

    आरव ने तुरंत समझ लिया।

     

    उसे परिवार के अपराध का सच दुनिया के सामने लाना होगा।

     

    उसने अपने कैमरे की ओर देखा।

     

    कैमरा अभी भी उसके बैग में था।

     

    लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता नहीं था।

     

    तभी कबीर ने देखा कि कमरे के एक कोने में लोहे की सीढ़ी लगी है।

     

    “उधर!”

     

    दोनों सीढ़ी की ओर भागे।

     

    काली परछाईं उनके पीछे बढ़ने लगी।

     

    मृणालिनी उसे रोक रही थी।

     

    “जल्दी करो!”

     

    आरव और कबीर ऊपर चढ़ने लगे।

     

    सीढ़ी उन्हें एक पुराने भंडारघर में ले आई।

     

    आरव ने बैग उठाया।

     

    कैमरा सुरक्षित था।

     

    उसने तुरंत रिकॉर्डिंग शुरू की।

     

    “अगर यह वीडियो किसी को मिले, तो रुद्रगढ़ हवेली के बारे में सच्चाई—”

     

    अचानक पीछे से हरिदास की आवाज़ आई।

     

    “तुम सच बाहर नहीं ले जा सकते।”

     

    आरव पलटा।

     

    हरिदास हाथ में पुरानी तलवार लिए खड़ा था।

     

    उसके पीछे मृणालिनी थी।

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यह हवेली सिर्फ रहस्य नहीं छिपाती। यह हमारे पाप छिपाती है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब ये पाप नहीं छिपेंगे।”

     

    हरिदास ने तलवार उठाई।

     

    तभी मृणालिनी ने उसे रोक लिया।

     

    “बस।”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “अस्सी साल से तुम इसी डर में जी रहे हो कि सच बाहर आ जाएगा। लेकिन सच से डरने वाला ही असली कैदी होता है।”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    उसने तलवार नीचे कर दी।

     

    और उसी क्षण पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    काली धुंध पूरे गलियारे में फैल गई।

     

    मृणालिनी ने आरव से कहा—

     

    “अब आखिरी काम बाकी है।”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली के मुख्य आँगन में जाओ। वहाँ जो पत्थर का स्तंभ है, उसके नीचे मेरे पिता की आखिरी निशानी है। उसे बाहर निकालो।”

     

    आरव और कबीर नीचे भागे।

     

    आँगन में पहुँचकर उन्होंने पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक पुराना लोहे का बक्सा था।

     

    बक्से के अंदर एक पत्र था।

     

    पत्र पढ़ते ही आरव की आँखें फैल गईं।

     

    वह पत्र राजेंद्र सिंह का था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मैंने अपनी बेटी को बलि दी, लेकिन असली बलि उस रात नहीं हुई। मैंने अपनी आत्मा उसी दिन खो दी थी।”

     

    आरव ने पत्र कैमरे के सामने पढ़ना शुरू किया।

     

    जैसे ही उसने आखिरी शब्द पढ़े—

     

    पूरी हवेली में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

     

    “अब सच पूरा हुआ।”

     

    मृणालिनी आँगन के बीच खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा अब शांत था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर उसके पीछे खड़ी काली परछाईं चीखने लगी।

     

    हवेली की दीवारें टूटने लगीं।

     

    और अगली सुबह…

     

    रुद्रगढ़ हवेली का पश्चिमी हिस्सा पूरी तरह गिर चुका था।

     

    लेकिन मलबे के बीच एक चीज़ बिल्कुल सही सलामत थी—

     

    मृणालिनी की तस्वीर।

     

    आरव ने सोचा कि श्राप खत्म हो चुका है।

     

    लेकिन जब उसने तस्वीर कैमरे में देखी…

     

    तो मृणालिनी के पास एक नया चेहरा खड़ा था।

     

    वह चेहरा…

     

    कबीर का था।

  • भाग 3: तहखाने का रहस्य

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    दरवाज़ा बंद होते ही आरव और कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा जैसे बाहर से नहीं बल्कि अंदर से बंद था।

     

    कबीर ने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया।

     

    “खुल क्यों नहीं रहा?”

     

    आरव ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नज़र कमरे के बीचोंबीच पड़े लोहे के संदूक पर थी।

     

    वही संदूक जिसका ज़िक्र मृणालिनी की डायरी में था।

     

    संदूक के ऊपर लाल धागा बंधा था।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    जैसे ही उसने धागे को छुआ, कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    तभी कमरे की दीवार से धीमी आवाज़ आई—

     

    “खोलो…”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “संदूक खोलो…”

     

    कबीर बोला, “ये मत करना।”

     

    लेकिन आरव ने संदूक खोल दिया।

     

    अंदर पुराने कागज़, कुछ चाँदी के सिक्के और एक लोहे की चाबी थी।

     

    चाबी के साथ एक छोटा-सा कागज़ था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “नीचे जाओ। जवाब वहीं है।”

     

    फर्श के नीचे से अचानक आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने कमरे की फर्श देखी।

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से अलग था।

     

    दोनों ने मिलकर उसे हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियाँ अँधेरे तहखाने में जा रही थीं।

     

    “यह हवेली के नक्शे में नहीं था,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “क्या हमें सच में नीचे जाना चाहिए?”

     

    आरव ने चाबी जेब में रखी।

     

    “अगर मृणालिनी की मौत का सच जानना है, तो हाँ।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे नीचे जाते, हवा ठंडी होती जाती।

     

    कुछ सीढ़ियाँ नीचे जाने के बाद उन्हें दीवारों पर पुराने चित्र दिखाई दिए।

     

    हर चित्र में रुद्रगढ़ परिवार का एक सदस्य था।

     

    लेकिन हर चित्र में एक बात समान थी।

     

    सबकी आँखें काली कर दी गई थीं।

     

    सबसे आखिरी चित्र में मृणालिनी थी।

     

    उसकी आँखें बाकी चित्रों की तरह काली नहीं थीं।

     

    उसकी आँखों पर लाल रंग लगा था।

     

    चित्र के नीचे लिखा था—

     

    “जिसे बलि दी गई, वही अब रक्षक है।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “आरव, मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    दोनों पलटे।

     

    सीढ़ियाँ खाली थीं।

     

    लेकिन आवाज़ लगातार करीब आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई लकड़ी की छड़ी लेकर सीढ़ियाँ उतर रहा हो।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “हरिदास?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    दोनों नीचे पहुँचे।

     

    वहाँ एक विशाल तहखाना था।

     

    बीच में पत्थर का चबूतरा था।

     

    उस पर पुराने कपड़े, सूखी हुई चूड़ियाँ और एक छोटी-सी चाँदी की पायल रखी थी।

     

    आरव ने पायल उठाई।

     

    उसे छूते ही अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुम बहुत देर से आए।”

     

    आरव ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में पकड़ी पायल अब गर्म हो चुकी थी।

     

    अचानक तहखाने की दीवार पर एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    आरव ने चाबी लगाई।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे में पुराने दस्तावेज़ रखे थे।

     

    आरव ने एक दस्तावेज़ उठाया।

     

    उसमें लिखा था कि 1936 में रुद्रगढ़ परिवार पर आर्थिक संकट था। परिवार के मुखिया राजेंद्र सिंह ने गाँव की जमीन बेचकर हवेली बचाने की कोशिश की थी। लेकिन गाँव वालों ने विरोध किया।

     

    तभी परिवार के तांत्रिक ने एक भयानक उपाय बताया।

     

    उसने कहा कि हवेली के नीचे एक “रक्षक शक्ति” है। अगर परिवार अपनी संतान की बलि देगा तो धन वापस आ जाएगा और परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।

     

    राजेंद्र सिंह ने अपनी बेटी मृणालिनी को चुन लिया।

     

    लेकिन दस्तावेज़ के आखिरी हिस्से में एक रहस्य था।

     

    मृणालिनी की बलि के बाद धन तो आया…

     

    लेकिन परिवार का कोई सदस्य सात दिन से ज्यादा जीवित नहीं रहा।

     

    एक-एक करके सभी की मौत होने लगी।

     

    सिर्फ एक व्यक्ति बचा।

     

    हरिदास।

     

    कबीर ने दस्तावेज़ पढ़कर कहा—

     

    “तो हरिदास ने सब देखा था?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    तभी तहखाने के बाहर से आवाज़ आई—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों जम गए।

     

    हरिदास अँधेरे से बाहर आया।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा वैसा नहीं था।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    “मैंने सिर्फ देखा नहीं था,” उसने कहा।

     

    “मैंने ही वह अनुष्ठान कराया था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    हरिदास हँसा।

     

    “हरिदास तो बहुत पहले मर गया था।”

     

    उसका चेहरा अचानक बदलने लगा।

     

    झुर्रियाँ गायब हुईं।

     

    बाल काले हो गए।

     

    कुछ ही सेकंड में सामने एक जवान आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने तस्वीर याद की।

     

    वही चेहरा।

     

    1936 की तस्वीर वाला हरिदास।

     

    उसने कहा—

     

    “मृणालिनी को हमने बलि दी थी, लेकिन उसने मरने से पहले श्राप दे दिया। इस हवेली में जो भी लालच लेकर आएगा, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाएगी।”

     

    कबीर काँप रहा था।

     

    “तो तुम यहाँ क्यों हो?”

     

    जवान हरिदास मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं पहला कैदी हूँ।”

     

    तभी तहखाने में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

     

    “झूठ।”

     

    अँधेरे से मृणालिनी बाहर आई।

     

    उसने हरिदास की ओर देखा।

     

    “पहला कैदी मैं नहीं हूँ।”

     

    हरिदास का चेहरा डर से बदल गया।

     

    मृणालिनी ने आरव की ओर इशारा किया।

     

    “जिसे हवेली ने बुलाया है… वह अगला रक्षक बनेगा।”

     

    आरव पीछे हटते हुए बोला—

     

    “मैं यहाँ से नहीं रुकूँगा।”

     

    मृणालिनी ने शांत स्वर में कहा—

     

    “तुम्हें जाने की अनुमति किसने दी?”

     

    उसी क्षण तहखाने की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    अँधेरे में सिर्फ एक आवाज़ सुनाई दी—

     

    “अब असली दरवाज़ा खुलेगा।”

     

    और फर्श अचानक टूट गया।

     

    आरव और कबीर नीचे गिरने लगे।

  • मृणालिनी का कमरा (part-2)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था।

     

    लकड़ी के पुराने पल्ले की आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज रही थी।

     

    कrrrr…

     

    आरव और कबीर पीछे हट गए।

     

    दरवाज़ा पूरी तरह खुला तो अंदर घना अँधेरा दिखाई दिया। आरव ने टॉर्च जलाई, लेकिन रोशनी कुछ ही फीट आगे जाकर जैसे निगल ली गई।

     

    “अंदर मत जाना,” कबीर ने कहा।

     

    लेकिन आरव के भीतर का जिज्ञासु इंसान डर से ज्यादा ताकतवर था।

     

    वह कमरे के अंदर चला गया।

     

    कबीर मजबूरी में उसके पीछे आया।

     

    कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था। वहाँ धूल तो थी, लेकिन सामान अपनी जगह पर रखा हुआ था। एक पुराना लकड़ी का पलंग, एक मेज, दीवार पर कुछ चित्र और कमरे के कोने में एक छोटी-सी गुड़िया।

     

    आरव ने गुड़िया उठाई।

     

    उसके कपड़े पुराने थे, लेकिन चेहरे पर धूल नहीं थी।

     

    “अजीब है,” आरव ने कहा।

     

    तभी कबीर ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “इधर देख।”

     

    दीवार पर दर्जनों तारीखें लिखी थीं।

     

    1898…

     

    1899…

     

    1900…

     

    फिर अचानक—

     

    1936

     

    और उसके बाद कोई तारीख नहीं।

     

    आरव ने कैमरा दीवार की ओर किया।

     

    “लगता है किसी ने यहाँ साल गिने थे।”

     

    कबीर ने पूछा, “किसलिए?”

     

    तभी मेज की दराज़ अपने आप खुल गई।

     

    दोनों पीछे हट गए।

     

    आरव धीरे से मेज के पास गया।

     

    दराज़ में एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    उसके ऊपर लाल स्याही से लिखा था—

     

    “मृणालिनी की डायरी। जिसे पढ़ना नहीं चाहिए।”

     

    आरव ने डायरी खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम मृणालिनी है। मैं रुद्रगढ़ की बेटी हूँ। पिता कहते हैं कि यह हवेली हमारे पूर्वजों की शान है। लेकिन मुझे लगता है कि हवेली के अंदर कोई और भी रहता है।”

     

    आरव आगे पढ़ता गया।

     

    मृणालिनी ने लिखा था कि बचपन से उसे पश्चिमी कमरे से आवाज़ें सुनाई देती थीं। कभी कोई उसे बुलाता था, कभी रोता था। उसके पिता उसे हमेशा उस कमरे से दूर रहने को कहते थे।

     

    एक रात उसने देखा कि उसकी माँ आधी रात को पश्चिमी कमरे में गई थी।

     

    मृणालिनी उसके पीछे चली गई।

     

    कमरे के अंदर उसकी माँ एक पुराने पत्थर के चबूतरे के सामने खड़ी थी।

     

    चबूतरे पर एक लोहे का संदूक रखा था।

     

    उसकी माँ रो रही थी।

     

    मृणालिनी ने पूछा—

     

    “माँ, आप यहाँ क्यों आती हैं?”

     

    उसकी माँ ने पलटकर कहा—

     

    “अगर कभी यह कमरा खुल जाए… तो हवेली छोड़ देना। पीछे मुड़कर मत देखना।”

     

    डायरी का अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर अगला पन्ना—

     

    “आज पिता ने मुझे बताया कि हमारे परिवार ने बहुत बड़ा पाप किया था। उन्होंने कहा कि इस हवेली की जमीन के नीचे एक ऐसी चीज़ दफन है, जिसे बाहर नहीं आना चाहिए।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    तभी कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।

     

    गुड़िया फर्श पर गिर गई।

     

    ठक!

     

    कबीर ने डरकर पीछे देखा।

     

    दरवाज़ा खुला था।

     

    लेकिन गलियारे में अब कोई रोशनी नहीं थी।

     

    “आरव…”

     

    कबीर की आवाज़ काँप रही थी।

     

    “क्या?”

     

    “दरवाज़े के पास कौन खड़ा है?”

     

    आरव ने धीरे से टॉर्च घुमाई।

     

    वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    और झुका हुआ सिर।

     

    आरव ने कहा—

     

    “मृणालिनी?”

     

    बच्ची ने सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा बहुत पीला था।

     

    लेकिन आँखें…

     

    आँखें बिल्कुल काली थीं।

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    बच्ची अचानक पीछे मुड़ी और गलियारे में भाग गई।

     

    आरव उसके पीछे दौड़ा।

     

    लेकिन गलियारा खाली था।

     

    सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान सीढ़ियों की ओर जा रहे थे।

     

    आरव नीचे पहुँचा तो उसे हरिदास दिखाई दिया।

     

    बूढ़ा हवेली के आँगन में खड़ा था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आपको सब पता था?”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “मृणालिनी कौन है?”

     

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “मृणालिनी इस हवेली की बेटी थी। लेकिन उसकी मौत अस्सी साल पहले नहीं हुई थी।”

     

    आरव चौंका।

     

    “तो?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “वह मरी थी… लेकिन उसकी आत्मा नहीं।”

     

    कबीर ने पूछा, “उसके साथ क्या हुआ था?”

     

    हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

     

    “1936 में रुद्रगढ़ परिवार ने एक अनुष्ठान किया था। उनका विश्वास था कि हवेली के नीचे दबे खजाने की रक्षा एक अदृश्य शक्ति करती है। उस शक्ति को शांत करने के लिए परिवार ने अपनी ही बेटी को बलि के लिए चुना।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    “मृणालिनी को उसी पश्चिमी कमरे में बंद कर दिया गया था।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “तीन दिन बाद दरवाज़ा खोला गया। अंदर लड़की नहीं थी। सिर्फ उसकी चूड़ियाँ थीं… और दीवार पर खून से लिखा था—”

     

    हरिदास रुक गया।

     

    “क्या लिखा था?”

     

    बूढ़े ने आरव की आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “मैं अकेली नहीं मरूँगी।”

     

    उसी समय हवेली की ऊपरी मंज़िल से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पश्चिमी कमरे की खिड़की में वही बच्ची खड़ी थी।

     

    उसने हाथ में कुछ पकड़ा हुआ था।

     

    आरव ने कैमरे का ज़ूम बढ़ाया।

     

    वह एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मृणालिनी खड़ी थी।

     

    उसके साथ एक आदमी था।

     

    हरिदास का चेहरा देखकर आरव समझ गया कि कुछ बहुत गलत था।

     

    क्योंकि तस्वीर में वह आदमी…

     

    हरिदास था।

     

    लेकिन तस्वीर के नीचे साल लिखा था—

     

    1936।

     

    आरव ने घबराकर बूढ़े की ओर देखा।

     

    “आप… तब भी जिंदा थे?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई।

     

    और फिर उसने कहा—

     

    “मैंने कहा था ना… हवेली कहानी नहीं सुनाती। वह अपने कैदियों की तलाश करती है।”

     

    अचानक आरव के पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    हरिदास गायब था।

     

    और पश्चिमी कमरे से फिर वही बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “अब तीसरा कौन होगा?”

  • बंद दरवाज़ा (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरुआ के बाहर, घने पीपल और बरगद के पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। गाँव वाले उसे रुद्रगढ़ हवेली कहते थे। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी वह हवेली अब खंडहर में बदल चुकी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी, छत का एक हिस्सा टूट चुका था और लकड़ी के दरवाज़े इतने पुराने हो चुके थे कि हवा चलने पर अपने आप कराहने लगते थे।

     

    लेकिन हवेली की सबसे डरावनी बात उसका उजाड़ होना नहीं था।

     

    उसका सबसे डरावना रहस्य था—पश्चिमी कमरे का बंद दरवाज़ा।

     

    कहा जाता था कि उस कमरे को पिछले अस्सी वर्षों से किसी ने नहीं खोला था।

     

    गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि आधी रात के बाद उस कमरे के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी। कभी-कभी खिड़की पर किसी बूढ़ी औरत की परछाईं दिखाई देती थी। और जो भी उस कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करता, वह अगले दिन गाँव छोड़कर चला जाता।

     

    इन बातों को सुनकर शहर में रहने वाला आरव हमेशा हँसता था।

     

    आरव पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाता था। जब उसके दादा की मृत्यु के बाद उसे पता चला कि रुद्रगढ़ हवेली उसकी पुश्तैनी संपत्ति है, तो उसने फैसला किया कि वह गाँव जाकर हवेली की हालत देखेगा।

     

    उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी आया।

     

    शाम के करीब चार बजे दोनों हवेली के सामने खड़े थे।

     

    “यार, तू सच में यहाँ रात बिताने वाला है?” कबीर ने टूटी हुई दीवार को देखते हुए पूछा।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “यही तो मज़ा है। ऐसी जगहों की कहानी रिकॉर्ड करनी चाहिए।”

     

    तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज़ आई।

     

    “कहानी रिकॉर्ड करने आए हो… या अपनी कहानी लिखवाने?”

     

    दोनों ने पलटकर देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी हाथ में लकड़ी की छड़ी लिए खड़ा था। उसका नाम हरिदास था। गाँव में लोग उसे हवेली का आखिरी रखवाला कहते थे।

     

    आरव ने नमस्ते की।

     

    “आपको हमारे आने का पता था?”

     

    हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “जिसे हवेली बुलाती है, उसके आने का पता सबको चल जाता है।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “बाबा, आप भी गाँव वालों की तरह डरावनी बातें करते हैं?”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    “डरावनी बातें मैं नहीं करता बेटा। हवेली करती है।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसी गंभीरता थी कि कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    हरिदास ने उन्हें हवेली की चाबी दी।

     

    “ऊपर के कमरों में जा सकते हो। आँगन देख सकते हो। पुराने कागज़ भी मिल जाएँगे। लेकिन पश्चिमी हिस्से में मत जाना।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा, “क्यों?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा—

     

    “क्योंकि वहाँ जो बंद है… वह दरवाज़ा नहीं है।”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    आरव और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब था उसका?” कबीर ने पूछा।

     

    “बूढ़े लोग रहस्य बनाए बिना नहीं रह सकते,” आरव ने कहा।

     

    दोनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के भीतर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ तस्वीरों में रुद्रगढ़ परिवार के लोग दिखाई दे रहे थे। एक तस्वीर में लगभग दस साल की लड़की खड़ी थी।

     

    उसकी आँखें बेहद अजीब थीं।

     

    ऐसा लगता था जैसे वह तस्वीर से बाहर निकलकर उन्हें देख रही हो।

     

    आरव ने कैमरा निकाला और तस्वीर रिकॉर्ड करने लगा।

     

    तभी कबीर ने कहा—

     

    “आरव… ये लड़की कौन है?”

     

    तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “मृणालिनी देवी — 1891”

     

    आरव ने मोबाइल से फोटो खींची।

     

    “शायद हवेली के मालिक की बेटी थी।”

     

    दोनों आगे बढ़ गए।

     

    रात होने लगी।

     

    करीब साढ़े दस बजे वे नीचे वाले बड़े कमरे में बैठे खाना खा रहे थे। अचानक ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने चौंककर आरव को देखा।

     

    “ऊपर कोई है?”

     

    आरव ने टॉर्च उठाई।

     

    दोनों सीढ़ियों से ऊपर गए।

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यही पश्चिमी कमरा होगा।”

     

    तभी अंदर से बहुत हल्की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    किसी ने दरवाज़े पर तीन बार दस्तक दी।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “चल वापस चलते हैं।”

     

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

     

    फिर अंदर से आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    दोनों के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “इसने तेरा नाम कैसे लिया?”

     

    आरव के हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई।

     

    अंदर से फिर वही आवाज़ आई।

     

    इस बार थोड़ी स्पष्ट—

     

    “आरव… दरवाज़ा खोलो…”

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    उसने जंजीर को छुआ।

     

    तभी अचानक पीछे से किसी के भागने की आवाज़ आई।

     

    दोनों पलटे।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान गलियारे से आते हुए सीधे बंद दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    और फिर…

     

    दरवाज़े के नीचे से एक कागज़ बाहर सरक आया।

     

    आरव ने काँपते हाथों से कागज़ उठाया।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम धरोहर समझ रहे हो, वह असल में कैद है।”

     

    आरव ने कागज़ को देखा।

     

    और उसी क्षण पश्चिमी कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा। अभी।”

     

    लेकिन आरव की नज़र दरवाज़े पर थी।

     

    क्योंकि जंजीर अपने आप धीरे-धीरे खुल रही थी।

     

    छन्न…

     

    और दरवाज़ा…

     

    अंदर की तरफ खुलने लगा।

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 13

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 13

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 13 : वो राज़ जो दस साल से दफन था

     

    दरवाजे पर खड़ा वह आदमी लगातार मुस्कुरा रहा था।

     

    उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो कुछ देर पहले नंदिनी के लॉकर से मिला था।

     

    आरोही की नजर उस लॉकेट पर टिक गई।

     

    उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

     

    “तुम…?”

     

    आरव भी उसे देखकर हैरान था।

     

    “तुम यहां कैसे आए?”

     

    वो आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

     

    “जिस सच की तलाश में तुम दोनों इतने दिनों से भटक रहे हो, शायद अब वो सच खुद तुम्हारे सामने आ गया है।”

     

    कबीर ने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “तुम अकेले आए हो?”

     

    वह आदमी हंस पड़ा।

     

    “अगर अकेला होता, तो तुम तीनों इतनी आसानी से मुझसे सवाल नहीं कर रहे होते।”

     

    आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

     

    “मेरी मां कहां है?”

     

    आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “जिसे तुम मां कहते हो, वो सुरक्षित है।”

     

    आरोही ने गुस्से में कहा,

     

    “अगर उन्हें कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं।”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

     

    आरोही ठिठक गई।

     

    “तुम नंदिनी को जानते थे?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    “तो फिर बताओ, मेरी मां की मौत कैसे हुई?”

     

    आदमी ने लॉकेट मेज पर रख दिया।

     

    “यही जानने के लिए तो तुम्हें यहां लाया गया है।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    “मुझे?”

     

    वह हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ वो चाहिए जो तुम्हारे पिता ने छुपाकर रखा था।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या?”

     

    “एक फाइल।”

     

    “कौन-सी फाइल?”

     

    “वही… जिसके अंदर तुम्हारे दोनों परिवारों को खत्म कर देने वाला सच है।”

     

    कबीर ने ध्यान से उसे देखा।

     

    “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    वह कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “अद्वैत।”

     

    आरव चौंका।

     

    “अद्वैत…?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “हां। अद्वैत मल्होत्रा।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “मल्होत्रा?”

     

    “हां।”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “समीर मल्होत्रा का बेटा?”

     

    अद्वैत मुस्कुराया।

     

    “आखिर किसी को याद तो आया।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “तो तुम समीर के बेटे हो?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “लेकिन तुम्हारे पिता तो इस पूरे मामले में शामिल बताए जा रहे हैं।”

     

    अद्वैत की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “मेरे पिता?”

     

    वह हंस पड़ा।

     

    “तुम्हें सच में लगता है कि मेरे पिता इस सबके मास्टरमाइंड हैं?”

     

    “तो कौन है?”

     

    अद्वैत ने जवाब देने के बजाय जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में राजवीर, विनय, नंदिनी और समीर एक साथ खड़े थे।

     

    लेकिन पीछे एक छोटा बच्चा भी दिखाई दे रहा था।

     

    आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये बच्चा कौन है?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “मैं।”

     

    आरव ने तस्वीर उसके हाथ से ली।

     

    “लेकिन तुम तो उस समय बहुत छोटे रहे होंगे।”

     

    “हां।”

     

    “फिर तुम्हें ये सब कैसे पता?”

     

    अद्वैत की आवाज धीमी हो गई।

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने मरने से पहले मुझे सब बता दिया था।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “समीर की मौत?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “मेरे पिता की मौत भी उसी खेल का हिस्सा थी।”

     

    अद्वैत ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया।

     

    “दस साल पहले की वो रात सिर्फ तुम्हारे पिता की जिंदगी खत्म होने की रात नहीं थी।”

     

    उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “उस रात मेरी जिंदगी भी खत्म हो गई थी।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “कैसे?”

     

    “मेरे पिता ने मुझे घर से बाहर भेज दिया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ लोग उन्हें मारने आने वाले हैं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन लोग?”

     

    “वही लोग जो आज भी तुम्हारा पीछा कर रहे हैं।”

     

    “विराज?”

     

    अद्वैत ने सिर हिलाया।

     

    “विराज सिर्फ एक नाम था।”

     

    आरव चौंका।

     

    “फिर असली आदमी कौन था?”

     

    अद्वैत ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “तुम्हारे पिता के सबसे करीब रहने वाला इंसान।”

     

    आरव के चेहरे पर तनाव आ गया।

     

    “समीर?”

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    अद्वैत ने जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही ने बेचैनी से पूछा,

     

    “तुम बार-बार यही क्यों कह रहे हो कि समीर दोषी नहीं है?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “क्योंकि मेरे पिता ने आखिरी वक्त में यही कहा था।”

     

    उसने जेब से एक छोटी रिकॉर्डिंग डिवाइस निकाली।

     

    “उन्होंने अपनी मौत से पहले इसे रिकॉर्ड किया था।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा,

     

    “क्या इसमें उस आदमी का नाम है?”

     

    “शायद।”

     

    अद्वैत ने रिकॉर्डिंग चला दी।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ सांसों की आवाज सुनाई दी।

     

    फिर समीर की आवाज आई “अगर अद्वैत ये रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो समझ लेना कि मैं उसे बचा नहीं पाया।”

     

    अद्वैत की आंखें भर आईं।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    “मैंने जो कुछ किया, वो अपने बेटे और नंदिनी की बेटी को बचाने के लिए किया।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “मेरे लिए?”

     

    रिकॉर्डिंग में समीर बोले “लेकिन जिस इंसान ने ये सब शुरू किया है, वो आज भी जिंदा है।”

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    अद्वैत ने सिर झुका लिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आगे की रिकॉर्डिंग?”

     

    “नष्ट कर दी गई।”

     

    “किसने?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही ने अचानक पूछा,

     

    “मेरी मां कहां हैं?”

     

    अद्वैत ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां सुरक्षित हैं।”

     

    “मैं उनसे मिलना चाहती हूं।”

     

    “अभी नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम उनसे मिलीं, तो तुम्हारी मां तुम्हें वो सच बता देंगी जिसे सुनने के बाद शायद तुम मुझ पर भी भरोसा नहीं करोगी।”

     

    आरोही ने गुस्से में कहा,

     

    “मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरोही।”

     

    “नहीं आरव। हर कोई मुझसे कुछ ना कुछ छुपा रहा है।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “पहले पापा… फिर मां… अब तुम भी शायद कुछ छुपा रहे हो।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “मैं?”

     

    “हां।”

     

    “मैंने तुमसे क्या छुपाया?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    “मैंने तुमसे सिर्फ एक बात छुपाई थी।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    आरव ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला।

     

    “मुझे ये तीन दिन पहले मिला था।”

     

    आरोही ने कागज लिया।

     

    उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “अगर आरोही को सच्चाई बताओगे, तो उसकी जान चली जाएगी।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुमने मुझे ये क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    “तुम?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पहली बार अपनी कमजोरी स्वीकार की।

     

    “मुझे डर था कि तुम्हें खो दूंगा।”

     

    आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर धीरे से बोली,

     

    “मुझे सच से ज्यादा तुम्हारा झूठ डराता है।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कुछ नहीं छुपाऊंगा।”

     

    आरोही ने सिर हिला दिया।

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    तभी अद्वैत का फोन बजा।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से किसी ने कुछ कहा।

     

    उसका चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    कुछ सेकंड बाद उसने फोन काट दिया।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    अद्वैत ने कहा,

     

    “तुम्हारी मां…”

     

    आरोही का दिल धड़क उठा।

     

    “क्या हुआ मां को?”

     

    “उन्हें दूसरी जगह ले जाया गया है।”

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “तुमने कहा था कि वो सुरक्षित हैं।”

     

    “थीं।”

     

    “अब?”

     

    अद्वैत चुप रहा।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अभी।”

     

    कबीर ने अपना लैपटॉप निकाला।

     

    “मैं उनका फोन ट्रैक करने की कोशिश करता हूं।”

     

    कुछ मिनट बाद लोकेशन सामने आई।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पुराना मिल गोदाम।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “चलो।”

     

    रात के करीब ग्यारह बजे चारों पुराने मिल गोदाम पहुंचे।

     

    चारों तरफ अंधेरा था।

     

    आरोही की धड़कन तेज थी।

     

    आरव ने उसे पीछे रहने को कहा।

     

    “तुम मेरे साथ रहोगी।”

     

    “हां।”

     

    अंदर से आवाजें आ रही थीं।

     

    एक आदमी कह रहा था,

     

    “फाइल कहां है?”

     

    दूसरी आवाज आरोही की मां की थी।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “झूठ बोल रही हो।”

     

    “मुझे सच में नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मां!”

     

    वह आगे बढ़ने लगी।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    लेकिन तभी अंदर से गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    “मां!”

     

    वह आरव का हाथ छुड़ाकर अंदर दौड़ गई।

     

    कमरे में उसकी मां जमीन पर बैठी थीं।

     

    उनके पास खून था…

     

    लेकिन उन्हें गोली नहीं लगी थी।

     

    गोली उनके पीछे रखी लकड़ी की मेज में लगी थी।

     

    सामने एक आदमी बंदूक लिए खड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा “समीर!”

     

    समीर ने बंदूक नीचे कर दी।

     

    उसकी आंखों में थकान थी।

     

    “आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।”

     

    आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

     

    “मां!”

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम यहां क्यों आई?”

     

    “आपको लेने।”

     

    समीर ने कहा,

     

    “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा,

     

    “तुमने इन्हें यहां क्यों लाया?”

     

    समीर ने कहा,

     

    “क्योंकि मुझे इन्हें बचाना था।”

     

    आरव ने व्यंग्य से कहा,

     

    “बचाना?”

     

    “हां।”

     

    “तुम पर इतना भरोसा कैसे करें?”

     

    समीर ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारे पिता का कातिल नहीं हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो कौन है?”

     

    समीर ने जवाब देने से पहले चारों तरफ देखा।

     

    फिर धीरे से कहा “तुम्हारे पिता को मारने का आदेश… तुम्हारे पिता के अपने ही घर से गया था।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जिसे तुम अपने परिवार का हिस्सा समझते हो… वही असली गद्दार है।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    मां की आंखों में डर था।

     

    समीर ने कहा,

     

    “और वो इंसान आज भी तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।

     

    सबने पलटकर देखा।

     

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

     

    उसका चेहरा रोशनी में आया।

     

    आरव उसे देखते ही स्तब्ध रह गया।

     

    आरोही के मुंह से चीख निकल गई “चाचा!”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “बहुत साल हो गए, बच्चों।”

     

    आरव ने अविश्वास से कहा,

     

    “आप?”

     

    समीर ने धीरे से कहा “यही है वो आदमी… जिसने दस साल पहले सब कुछ शुरू किया था।”

     

    आरोही के चाचा की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “अब तुम दोनों बड़े हो गए हो।”

     

    उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “और अब वक्त आ गया है कि तुम्हें पता चले… तुम्हारे पिता की मौत क्यों हुई थी।”

     

    आरव उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “अगर तुम्हें लगता है कि हम डर जाएंगे, तो तुम गलत हो।”

     

    चाचा ने कहा,

     

    “डरना तुम्हें नहीं चाहिए, आरव।”

     

    फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

     

    “क्योंकि असली खतरा तुम्हारी जिंदगी में नहीं… तुम्हारे खून में है।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे खून में?”

     

    चाचा मुस्कुराया।

     

    “हां।”

     

    उसने कागज आरोही की तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे पढ़ो।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं।

     

    उस पर लिखा था “आरोही मेहरा, असल में विनय मेहरा की बेटी नहीं है।”

     

    आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    और उसी पल…

     

    उनकी पूरी कहानी का सबसे बड़ा राज उनके सामने खड़ा था।

     

    जारी रहेगा…

  • ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 12

    ”तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 12

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एपिसोड – 12 : अपनों के बीच छिपा गद्दार

     

    नंदिनी के पत्र में लिखा नाम देखकर आरव और आरोही दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं।

     

    कुछ पल तक किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि उन्होंने जो पढ़ा था, वो सच हो सकता है।

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “नहीं… ये नहीं हो सकता।”

     

    आरव ने पत्र दोबारा पढ़ा।

     

    उसमें साफ लिखा था “जिस इंसान पर तुम्हारे पिता और राजवीर ने सबसे ज्यादा भरोसा किया, वही इस पूरे खेल का असली हिस्सा है।”

     

    और नीचे एक नाम था “समीर मल्होत्रा।”

     

    आरव ने तुरंत सिर उठाया।

     

    “समीर अंकल?”

     

    आरोही ने उसे देखा।

     

    “वो तो पापा के सबसे करीबी दोस्त थे।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “और राजवीर सर के बिजनेस पार्टनर भी।”

     

    आरव ने पत्र को मुट्ठी में कस लिया।

     

    “इसका मतलब ये हो ही नहीं सकता।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “मेरे पापा उन्हें अपने भाई जैसा मानते थे।”

     

    कबीर ने गंभीर आवाज में कहा,

     

    “हो सकता है नंदिनी जी ने भी यही समझा हो कि वो भरोसे के लायक हैं। लेकिन हमें बिना जांचे किसी को दोषी नहीं मानना चाहिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सही कह रहे हो।”

     

    आरोही ने पत्र वापस बॉक्स में रख दिया।

     

    तभी उसकी नजर बॉक्स में पड़े छोटे से लॉकेट पर गई।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    “ये मां का है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    “बचपन से मैंने मां के पुराने सामान में ऐसा ही लॉकेट देखा था।”

     

    उसने लॉकेट खोला।

     

    अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर देखकर आरोही की सांस अटक गई।

     

    उसमें नंदिनी और समीर साथ खड़े थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे एक तारीख लिखी थी “उस रात से एक दिन पहले।”

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    “उस रात से एक दिन पहले… यानी पापा की मौत से ठीक एक दिन पहले।”

     

    कबीर ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “इस तस्वीर के पीछे कुछ और लिखा है।”

     

    बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था “अगर समीर ने धोखा दिया, तो M-17 के नीचे जाना।”

     

    तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “हमें वापस वहीं जाना होगा।”

     

    शाम होते-होते तीनों फिर उसी पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंच गए।

     

    हरिशंकर भी उनके साथ थे।

     

    आरव ने उनसे पूछा,

     

    “आपको M-17 के नीचे किसी रास्ते के बारे में पता है?”

     

    हरिशंकर कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “हां।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “आपने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि वहां जाना खतरे से खाली नहीं है।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “अब पीछे हटने का वक्त नहीं है।”

     

    हरिशंकर उन्हें कमरे के पीछे बने एक पुराने गलियारे में ले गए।

     

    कुछ दूर चलने के बाद फर्श पर लोहे की एक प्लेट दिखाई दी।

     

    हरिशंकर ने उसे हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियां थीं।

     

    आरोही ने डरते हुए आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हमें नीचे जाना चाहिए?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “अगर तुम नहीं जाना चाहती तो हम वापस जा सकते हैं।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां। मैं अपने पापा के लिए सच जानना चाहती हूं।”

     

    आरव ने उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।

     

    “तो चलो।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    कबीर पीछे था।

     

    हरिशंकर सबसे अंत में।

     

    नीचे एक पुराना कमरा था।

     

    दीवारों पर धूल जमी थी।

     

    बीच में लोहे की अलमारी थी।

     

    आरव ने उस पर हाथ रखा।

     

    “ये वही जगह है?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “हां।”

     

    “यहां क्या रखा था?”

     

    “तुम्हारे पिता और विनय साहब ने कई दस्तावेज यहां छुपाए थे।”

     

    आरव ने अलमारी खोली।

     

    अंदर कई फाइलें थीं।

     

    एक फाइल पर लिखा था “समीर मल्होत्रा।”

     

    आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    आरव ने फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर बैंक लेन-देन की जानकारी थी।

     

    दूसरे पन्ने पर कंपनी के कागजात।

     

    तीसरे पन्ने पर कुछ हस्ताक्षर।

     

    कबीर ने कहा,

     

    “ये देखो।”

     

    एक दस्तावेज में समीर ने करोड़ों रुपये की रकम एक विदेशी खाते में ट्रांसफर की थी।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो ये सच है।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    कबीर ने अगला पन्ना निकाला।

     

    उसमें लिखा था “समीर ने विक्रम के साथ मिलकर कंपनी के पैसे बाहर भेजे।”

     

    आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

     

    “पापा को ये सब पता चल गया था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “और शायद इसी वजह से उन्हें मार दिया गया।”

     

    तभी हरिशंकर ने कहा,

     

    “नहीं।”

     

    सबने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या मतलब?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “विनय साहब की मौत के समय समीर वहां नहीं था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आपने देखा था?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर?”

     

    हरिशंकर ने एक और फाइल निकाली।

     

    उस पर लिखा था “असली हत्यारा।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “इसमें क्या है?”

     

    हरिशंकर ने फाइल खोलने से पहले कहा,

     

    “इसे पढ़ने के बाद तुम्हें अपनी मां पर भी शक हो सकता है।”

     

    आरोही ने दृढ़ आवाज में कहा,

     

    “अब मुझे किसी से डर नहीं लगता।”

     

    फाइल खुली।

     

    अंदर एक तस्वीर थी।

     

    एक अस्पताल की।

     

    तस्वीर में नंदिनी किसी आदमी से बात कर रही थीं।

     

    आरव ने तस्वीर गौर से देखी।

     

    “ये आदमी कौन है?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वही जो उस रात अस्पताल में आया था।”

     

    कबीर ने तस्वीर को बड़ा किया।

     

    अचानक उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।

     

    “मैं इसे जानता हूं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    “ये आदमी… समीर का भाई है।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन नंदिनी मां की मौत तो विराज के आदमियों ने करवाई थी!”

     

    हरिशंकर ने सिर हिलाया।

     

    “यही बात झूठ थी।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “किसने झूठ बोला?”

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “विनय ने?”

     

    “हां।”

     

    आरोही को जैसे झटका लगा।

     

    “पापा ने मां की मौत का सच क्यों छुपाया?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “क्योंकि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्हें जहर दिया गया था।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “किसने?”

     

    हरिशंकर चुप रहे।

     

    आरव ने कहा,

     

    “बोलिए।”

     

    उन्होंने धीरे से कहा “समीर मल्होत्रा ने।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो पापा ने उसे पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया?”

     

    हरिशंकर ने जवाब दिया,

     

    “क्योंकि समीर के पास तुम्हारी जान से जुड़ा राज था।”

     

    “कैसा राज?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वो जानता था कि तुम नंदिनी की बेटी हो।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “इसमें क्या बड़ी बात थी?”

     

    “बड़ी बात ये थी कि नंदिनी ने मरने से पहले समीर के खिलाफ सबूत तैयार कर लिए थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वो सबूत कहां हैं?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता के पास।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन वो सबूत तो…”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता की मौत के बाद गायब हो गए।”

     

    उधर उसी समय…

     

    आरोही की मां अपने कमरे में अकेली बैठी थीं।

     

    उनके हाथ में एक पुराना फोन था।

     

    उन्होंने किसी नंबर पर कॉल किया।

     

    “हमें सब पता चल चुका है।”

     

    दूसरी तरफ से आवाज आई “उन्हें कितना पता है?”

     

    मां ने कहा,

     

    “समीर का नाम।”

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आवाज आई “तो अब समय आ गया है।”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “नहीं। आरोही को कुछ नहीं होना चाहिए।”

     

    दूसरी तरफ से हंसी सुनाई दी।

     

    “अगर तुमने हमारा साथ नहीं दिया तो सबसे पहले उसी को नुकसान होगा।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं तुम्हारा काम करूंगी।”

     

    “याद रखना… एक गलती और तुम्हारी बेटी खत्म।”

     

    फोन कट गया।

     

    मां ने फोन नीचे रखा।

     

    उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मुझे माफ करना बेटी।”

     

     

    आरव, आरोही और कबीर बाहर निकले।

     

    आरोही बहुत शांत थी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “जो कुछ भी जान रही हूं… उससे मुझे लगता है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”

     

    आरव ने कार रोक दी।

     

    “मेरी तरफ देखो।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी जिंदगी झूठ नहीं थी।”

     

    “कैसे?”

     

    “तुम्हारी मां ने तुम्हें पाला। उन्होंने तुम्हें प्यार किया। तुम्हारे पापा ने तुम्हें बचाया। और तुमने मुझे बचपन से लेकर आज तक जो प्यार दिया… वो सच है।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “और तुम?”

     

    “मैं?”

     

    “तुम्हारा मेरे लिए क्या है?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसके करीब आकर बोला,

     

    “तुम मेरी वो कहानी हो जिसे मैं खत्म नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम्हें जितने भी जवाब चाहिए, हम मिलकर ढूंढेंगे।”

     

    आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    कुछ पल के लिए दोनों दुनिया की सारी परेशानियां भूल गए।

     

    लेकिन तभी…

     

    कबीर ने पीछे से आवाज लगाई “आरव!”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    कबीर सड़क के किनारे खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुराना लिफाफा था।

     

    “ये मुझे कार के नीचे मिला।”

     

    आरव ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक छोटी पर्ची थी।

     

    उस पर लिखा था “समीर असली गद्दार नहीं है।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “क्या?”

     

    नीचे लिखा था “समीर सिर्फ आदेश मान रहा था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “तो आदेश कौन दे रहा था?”

     

    आरव ने पर्ची पलटी।

     

    पीछे सिर्फ एक शब्द लिखा था “N.”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “N… यानी?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा,

     

    “नंदिनी?”

     

    आरोही ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    लेकिन तभी उसकी मां का फोन आया।

     

    आरोही ने फोन उठाया।

     

    “हैलो मां?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई “आरोही… घर मत आना।”

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “मां? क्या हुआ?”

     

    “वो लोग घर पर हैं।”

     

    “कौन?”

     

    मां की आवाज कांप रही थी।

     

    “समीर… और उसके साथ कोई और भी है।”

     

    फोन अचानक कट गया।

     

    आरव ने तुरंत कार स्टार्ट की।

     

    “हम घर जा रहे हैं।”

     

    आरोही ने घबराकर कहा,

     

    “मां ने मना किया है।”

     

    “इसीलिए जाना जरूरी है।”

     

     

    जब आरव, आरोही और कबीर घर पहुंचे, दरवाजा खुला था।

     

    अंदर सामान बिखरा हुआ था।

     

    आरोही ने चीखकर कहा,

     

    “मां!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह पूरे घर में दौड़ने लगी।

     

    “मां!”

     

    आरव ने हर कमरे में देखा।

     

    मां कहीं नहीं थीं।

     

    टेबल पर सिर्फ एक फोन पड़ा था।

     

    आरोही ने फोन उठाया।

     

    उसमें एक वीडियो था।

     

    वीडियो चलाया गया।

     

    स्क्रीन पर उसकी मां बैठी थीं।

     

    उनके पीछे दो लोग खड़े थे।

     

    एक था समीर।

     

    और दूसरा…

     

    चेहरा देखते ही आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    आरोही के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा।

     

    “ये…”

     

    आरव ने स्क्रीन को देखते हुए कहा,

     

    “ये तो…”

     

    वीडियो में मां रोते हुए बोल रही थीं “आरोही, अगर तुम ये वीडियो देख रही हो, तो समझ लेना कि मैं तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे सामने सबसे बड़ा झूठ बोलती रही।”

     

    फिर उन्होंने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उनकी आंखों में डर था।

     

    “समीर गद्दार नहीं है।”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    मां ने आगे कहा—

     

    “असल गद्दार वो है, जिस पर तुम दोनों सबसे ज्यादा भरोसा करते हो।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव भी उसे देख रहा था।

     

    दोनों के मन में एक ही सवाल था आखिर वो कौन है?

     

    तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।

     

    “बहुत जल्दी सच तक पहुंच गए तुम दोनों।”

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने उसे पहचानते ही कहा “तुम!”

     

    वो आदमी मुस्कुराया।

     

    “हां… मैं।”

     

    और उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो नंदिनी के लॉकर से मिला था।

     

    “अब तुम्हें पता चलेगा कि नंदिनी की मौत के पीछे असली वजह क्या थी।”

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 11

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 11

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    एपिसोड – 11 : जिसे मां समझती रही

     

    हरिशंकर के मुंह से निकले शब्दों ने आरोही की पूरी दुनिया हिला दी थी।

     

    “जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”

     

    आरोही कुछ पल तक उन्हें देखती रही।

     

    उसके कानों में जैसे बाकी सारी आवाजें बंद हो गई थीं।

     

    “आप… क्या कह रहे हैं?”

     

    हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैं जानता हूं ये सुनना तुम्हारे लिए आसान नहीं है।”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “वो मेरी मां हैं। उन्होंने मुझे पाला है। बचपन से मेरे साथ रही हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि वो मेरी मां नहीं हैं?”

     

    हरिशंकर ने गहरी सांस ली।

     

    “मैंने ये नहीं कहा कि उन्होंने तुम्हें प्यार नहीं किया। मैंने सिर्फ इतना कहा है कि वो तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं हैं।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “नहीं…”

     

    आरव तुरंत उसके पास आया।

     

    “आरोही, शांत हो जाओ।”

     

    “नहीं आरव।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मेरी जिंदगी में और कितना झूठ है?”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “जब तक पूरा सच सामने नहीं आता, किसी बात पर भरोसा मत करो।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन अगर ये सच हुआ तो?”

     

    आरव ने बिना झिझक कहा,

     

    “तो भी मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू और तेज बहने लगे।

     

    “तुम हर बार मेरे साथ रहने की बात क्यों करते हो?”

     

    आरव ने धीमे से कहा,

     

    “क्योंकि जब तुम टूटती हो… तो मुझे भी दर्द होता है।”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    उसने बस अपना सिर आरव के कंधे पर रख दिया।

     

    कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

     

    लेकिन हरिशंकर उन्हें देखकर बेचैन थे।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “हमें यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विराज के लोग हमें ढूंढ रहे होंगे।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “पहले सुरक्षित जगह चलते हैं।”

     

    तीनों एक पुराने मंदिर के पीछे बने छोटे से कमरे में पहुंचे।

     

    हरिशंकर ने दरवाजा बंद किया।

     

    आरोही अब भी खामोश थी।

     

    कुछ देर बाद उसने पूछा,

     

    “हरिशंकर जी… आपको कैसे पता कि मेरी मां मेरी असली मां नहीं हैं?”

     

    हरिशंकर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय मैं अस्पताल में था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “आप वहां क्यों थे?”

     

    “तुम्हारे पिता के साथ।”

     

    “पापा के साथ?”

     

    “हां।”

     

    उन्होंने आगे कहा,

     

    “उस रात तुम्हारे पिता बहुत परेशान थे। तुम्हारा जन्म हुआ था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद अस्पताल में एक ऐसी घटना हुई, जिसके बाद तुम्हारी जिंदगी बदल गई।”

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “क्या हुआ था?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “तुम्हारी जन्म देने वाली मां…”

     

    वह रुक गए।

     

    “क्या हुआ था उन्हें?”

     

    “उनकी मौत हो गई थी।”

     

    आरोही जैसे पत्थर की हो गई।

     

    “मेरी… मां मर गई थीं?”

     

    “हां।”

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो फिर जिन्हें मैं मां कहती हूं…”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “वो तुम्हारी मां की सबसे करीबी दोस्त थीं।”

     

    आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

     

    “पापा ने मुझे उनसे क्यों रखा?”

     

    “क्योंकि उस समय तुम्हारी जान खतरे में थी।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किससे?”

     

    हरिशंकर ने जवाब दिया,

     

    “विराज से।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    हरिशंकर आगे बोले,

     

    “विराज को पता था कि तुम्हारे पिता के पास उसके खिलाफ सबूत हैं। उसे डर था कि अगर विनय की बेटी बड़ी होकर सच जान गई, तो वो सब कुछ उजागर कर देगी।”

     

    आरोही ने आंसू पोंछे।

     

    “लेकिन मेरी मां…”

     

    “तुम्हारे पिता ने उन्हें कहा था कि वो तुम्हें अपनी बेटी बनाकर रखें।”

     

    “और उन्होंने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उन्हें डर था कि विराज तुम्हें ढूंढ लेगा।”

     

    आरोही ने धीमे से पूछा,

     

    “क्या मेरे पिता ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था?”

     

    “हां।”

     

    हरिशंकर ने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “ये तुम्हारे पिता का लिखा हुआ बयान है।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी आरोही को बचाने के लिए उसे सच्चाई से दूर रखना। जिस औरत को वो मां कहेगी, वो मेरी बेटी को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करेगी। लेकिन उसे सच तब तक मत बताना जब तक विराज का खतरा खत्म न हो जाए।”

     

    आरोही ने कागज सीने से लगा लिया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहते रहे।

     

    “तो मां ने मुझसे झूठ बोला… लेकिन मुझे बचाने के लिए।”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “शायद।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब मुझे उनसे सच सुनना है।”

     

     

    रात होते-होते आरोही और आरव उसके घर पहुंचे।

     

    मां दरवाजे के पास बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उनके चेहरे पर डर और राहत दोनों दिखाई दिए।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    वह सीधे उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।

     

    “मां।”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “हां बेटी।”

     

    “मुझसे एक बात सच-सच कहिए।”

     

    मां ने नजरें झुका लीं।

     

    “क्या?”

     

    “क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूं?”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    मां की आंखों से आंसू गिर पड़े।

     

    उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरोही की आवाज टूट गई।

     

    “बस एक बार कह दीजिए कि ये झूठ है।”

     

    मां ने सिर उठाया।

     

    “नहीं बेटी… ये झूठ नहीं है।”

     

    आरोही जैसे अंदर से टूट गई।

     

    “तो आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    मां उसके पास आईं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे वचन दिया था।”

     

    “किस बात का?”

     

    “तुम्हें जिंदा रखने का।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “क्या मेरी असली मां…”

     

    मां ने रोते हुए कहा,

     

    “तुम्हारी जन्म देने वाली मां का नाम नंदिनी था।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “नंदिनी?”

     

    “हां।”

     

    “वो कैसी थीं?”

     

    मां मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं,

     

    “बहुत खूबसूरत थीं। लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “उनकी मौत कैसे हुई?”

     

    मां चुप हो गईं।

     

    आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, मुझे सच चाहिए।”

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “नंदिनी की मौत… अस्पताल में नहीं हुई थी।”

     

    आरोही ठिठक गई।

     

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे जन्म के बाद उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाया गया था।”

     

    “किसने?”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “विराज के आदमियों ने।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    “और फिर?”

     

    “वो कभी वापस नहीं आईं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तो पापा ने क्या किया?”

     

    “उन्होंने विराज के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए।”

     

    “और उसी वजह से पापा की मौत हुई?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव अब तक खामोश खड़ा था।

     

    उसने पूछा,

     

    “मेरे पिता को ये सब पता था?”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “फिर उन्होंने हमें क्यों अलग किया?”

     

    “क्योंकि विराज को पता चल चुका था कि तुम दोनों के परिवारों के बीच पुराना रिश्ता है।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन-सा रिश्ता?”

     

    मां ने कहा,

     

    “तुम्हारे पिता और राजवीर ने तय किया था कि जब तुम दोनों बड़े हो जाओगे…”

     

    वह रुक गईं।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “तुम दोनों की शादी करेंगे।”

     

    आरोही और आरव दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखों में आंसू थे।

     

    “तुम दोनों बचपन से एक-दूसरे के लिए तय थे।”

     

    आरोही ने आरव की तरफ देखा।

     

    आरव भी उसे देख रहा था।

     

    उसके चेहरे पर हैरानी के साथ एक हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “तो बचपन में तुमने सच में कहा था कि मैं तुम्हें भूलूं नहीं।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू के बीच मुस्कान आ गई।

     

    “मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है।”

     

    “तुमने लाल पतंग उड़ाई थी।”

     

    आरोही हंसते हुए रो पड़ी।

     

    “और तुमने मेरी पतंग काट दी थी।”

     

    आरव भी हंस पड़ा।

     

    “मुझे क्या पता था कि वही लड़की एक दिन मेरी जिंदगी बन जाएगी।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    मां उन्हें देख रही थीं।

     

    उनकी आंखों में खुशी थी।

     

    लेकिन उसी खुशी के पीछे डर भी था।

     

    मां ने कहा,

     

    “लेकिन एक बात और है।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “अब क्या?”

     

    मां ने कहा,

     

    “विराज सिर्फ तुम्हारे परिवार के पीछे नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तो?”

     

    “वो राजवीर के परिवार को भी खत्म करना चाहता था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि राजवीर के पास भी उसके खिलाफ सबूत थे।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “वो सबूत कहां हैं?”

     

    मां ने कुछ पल चुप रहकर कहा,

     

    “तुम्हारे पिता ने उन्हें कहीं छुपाया था।”

     

    “कहां?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    तभी आरव का फोन बजा।

     

    कबीर का कॉल था।

     

    “आरव, मुझे एक जरूरी जानकारी मिली है।”

     

    “क्या?”

     

    “मैंने विराज के पुराने रिकॉर्ड खंगाले हैं।”

     

    “और?”

     

    “उसके नाम से एक बैंक लॉकर था।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं।

     

    “कहां?”

     

    “शहर के पुराने बैंक में।”

     

    “उसमें क्या है?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पता नहीं। लेकिन लॉकर दस साल से बंद है।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसके नाम पर?”

     

    कबीर कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला “नंदिनी मेहरा।”

     

    आरोही के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    “नंदिनी… मेरी असली मां?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हमें उस लॉकर तक पहुंचना होगा।”

     

     

    रात करीब बारह बजे।

     

    सभी सोने की तैयारी कर रहे थे।

     

    तभी घर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    आरव तुरंत खिड़की के पास गया।

     

    बाहर एक काली कार खड़ी थी।

     

    उसकी खिड़की के पीछे कोई बैठा था।

     

    आरव ने कहा,

     

    “सब लोग पीछे हटो।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    कुछ सेकंड बाद कार वहां से चली गई।

     

    आरव बाहर जाने ही वाला था कि उसके फोन पर मैसेज आया।

     

    “नंदिनी का लॉकर मत खोलना।”

     

    आरव ने स्क्रीन आरोही को दिखाई।

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “उसे कैसे पता कि हम लॉकर के बारे में जानते हैं?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि कोई हमें लगातार देख रहा है।”

     

    तभी दूसरा मैसेज आया—

     

    “अगर लॉकर खोला, तो तुम्हारी मां अगली होंगी।”

     

    आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने मां की तरफ देखा।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डरो मत।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “मैं नहीं डर रही।”

     

    “झूठ।”

     

    “हां… डर रही हूं।”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “लेकिन अब तुम अकेली नहीं हो।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “अगर मुझे कुछ हो गया तो?”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “ऐसा मत कहना।”

     

    “लेकिन—”

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    आरव ने धीरे से उसके आंसू पोंछे।

     

    “हम सच तक जाएंगे।”

     

    “साथ?”

     

    “साथ।”

     

    अगली सुबह आरव, आरोही और कबीर पुराने बैंक पहुंचे।

     

    कबीर ने सारे दस्तावेज तैयार कर लिए थे।

     

    बैंक मैनेजर ने रिकॉर्ड देखकर कहा,

     

    “लॉकर नंबर 317।”

     

    आरोही ने कांपते हाथों से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

     

    तीनों लॉकर रूम में पहुंचे।

     

    लोहे का छोटा दरवाजा खोला गया।

     

    अंदर एक पुराना लकड़ी का बॉक्स रखा था।

     

    आरोही ने उसे उठाया।

     

    बॉक्स पर सिर्फ एक शब्द लिखा था “आरोही।”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी मां ने मेरे लिए रखा था।”

     

    उसने बॉक्स खोला।

     

    अंदर कुछ तस्वीरें थीं।

     

    एक लाल रंग की छोटी चूड़ी।

     

    एक पुराना लॉकेट।

     

    और एक पत्र।

     

    आरोही ने पत्र खोला।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें भर आईं “मेरी प्यारी बेटी आरोही, अगर तुम ये पत्र पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूं।”

     

    उसने कांपते हुए आगे पढ़ा “लेकिन तुम्हें एक बात जाननी होगी। तुम्हारे पिता की मौत का बदला लेने वाला इंसान विराज नहीं है।”

     

    आरव ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या?”

     

    आरोही ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    उसकी सांस रुक गई।

     

    पत्र में लिखा था “विराज सिर्फ एक मोहरा था। असली खेल किसी और ने शुरू किया था।”

     

    आरोही ने आखिरी लाइन पढ़ी “और वो इंसान… हमारे परिवार का ही है।”

     

    आरोही ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    आरव उसे देख रहा था।

     

    कबीर स्तब्ध खड़ा था।

     

    तीनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    लेकिन पत्र के नीचे एक नाम लिखा था।

     

    नाम देखते ही आरोही के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने धीरे से कहा “मां…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने पत्र उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    आरव ने नाम पढ़ा।

     

    उसका चेहरा भी बदल गया।

     

    क्योंकि पत्र में जिस इंसान का नाम था…

     

    वो वही व्यक्ति था, जिस पर दोनों परिवार पिछले दस सालों से सबसे ज्यादा भरोसा करते आए थे।

     

    और अब…

     

    उनकी पूरी कहानी एक ऐसे विश्वासघात की तरफ बढ़ रही थी, जहां दुश्मन बाहर नहीं… उनके अपने बीच छिपा था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 10

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 10

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    एपिसोड – 10 : मौत के बाद भी जिंदा था वो

     

    “असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”

     

    आरोही की मां के मुंह से निकले ये शब्द सुनकर कमरे में जैसे समय थम गया।

     

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    कुछ सेकंड तक किसी के मुंह से कोई आवाज नहीं निकली।

     

    आखिर आरव ने पूछा,

     

    “लेकिन… अगर विक्रम सूद मर चुका है, तो इतने सालों से हमें धमकाने वाला कौन है?”

     

    आरोही की मां ने कांपती आवाज में कहा,

     

    “यही तो मैं नहीं जानती।”

     

    “आपने उसकी मौत देखी थी?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आपको कैसे पता कि वो मर चुका है?”

     

    मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे उसकी मौत की खबर दी थी।”

     

    आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    “कब?”

     

    “तुम्हारे पापा की मौत से ठीक दो दिन पहले।”

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “तो फिर पापा की मौत से दो दिन पहले ही विक्रम मर चुका था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर मेरे पापा को किससे खतरा था?”

     

    मां ने धीरे से कहा,

     

    “उस आदमी से… जो विक्रम के नाम का इस्तेमाल कर रहा था।”

     

    आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।

     

    “क्या आपके पास कोई सबूत है?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा,

     

    “हां।”

     

    “कहां?”

     

    “तुम्हारे पापा ने मुझे एक तस्वीर दी थी।”

     

    उन्होंने अलमारी खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।

     

    आरव ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    उसमें तीन लोग खड़े थे।

     

    राजवीर सिंह।

     

    विनय मेहरा।

     

    और विक्रम सूद।

     

    लेकिन पीछे एक चौथा आदमी भी दिखाई दे रहा था।

     

    उसका चेहरा आधा छाया में था।

     

    आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    आरव ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी “28 मार्च, रात 10:15।”

     

    आरव अचानक ठिठक गया।

     

    “ये वही रात है… जिस रात पापा की मौत हुई थी।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा,

     

    “इस तस्वीर को स्कैन करना होगा। शायद बैकग्राउंड से कुछ पता चले।”

     

    लेकिन तभी आरोही की नजर तस्वीर के कोने में लिखे एक छोटे-से नंबर पर पड़ी।

     

    “17-B”

     

    वह बोली,

     

    “ये नंबर… M-17 से जुड़ा हो सकता है।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    “हो सकता है।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हमें पुराने रिकॉर्ड रूम में फिर जाना होगा।”

     

    आरोही ने मां की तरफ देखा।

     

    “मां, आप हमारे साथ चलेंगी?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वहां जाने का मतलब है कि दस साल पुरानी वो रात फिर से सामने आएगी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद अब उसे सामने आना ही होगा।”

     

    मां ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आरव, तुम्हारे पिता ने तुम दोनों को बचाने के लिए बहुत कुछ छुपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “लेकिन कुछ राज ऐसे हैं जिन्हें जानने के बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रहती।”

     

    आरोही ने मां का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम सच से भागते-भागते थक चुके हैं।”

     

    मां ने उसकी आंखों में देखा।

     

    फिर धीरे से बोलीं,

     

    “जाओ।”

     

    “लेकिन सावधान रहना।”

     

    कुछ घंटों बाद आरव, आरोही और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंचे।

     

    इस बार आरव ने तस्वीर अपने साथ रखी थी।

     

    उन्होंने उस जगह को दोबारा खंगालना शुरू किया।

     

    कबीर ने दीवार पर लगे पुराने नंबर देखे।

     

    “17-B…”

     

    वह धीरे-धीरे दीवार के पास गया।

     

    एक जगह पर लकड़ी का पैनल लगा था।

     

    उसने उसे हटाया।

     

    पीछे एक छोटा दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये यहां पहले नहीं था।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “क्योंकि इसे छुपाया गया था।”

     

    दरवाजे पर छोटा-सा ताला लगा था।

     

    आरव ने M-17 वाली चाबी लगाई।

     

    ताला खुल गया।

     

    अंदर एक बहुत छोटा कमरा था।

     

    कमरे में सिर्फ एक टेबल, एक कुर्सी और पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    टेबल पर एक कागज पड़ा था।

     

    आरव ने उठाया।

     

    उस पर लिखा था “अगर तुम यहां तक पहुंच चुके हो, तो अब तुम्हें सच जानने से कोई नहीं रोक सकता।”

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मैं हूं।”

     

    “तुम हर बार यही कहते हो।”

     

    “और हर बार रहूंगा।”

     

    आरोही की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई।

     

    कबीर ने टेप रिकॉर्डर उठाया।

     

    “इसमें शायद रिकॉर्डिंग है।”

     

    उसने प्ले बटन दबाया।

     

    कुछ सेकंड शोर हुआ।

     

    फिर विनय मेहरा की आवाज सुनाई दी।

     

    “अगर ये रिकॉर्डिंग मेरे परिवार तक पहुंची है, तो शायद मैं जिंदा नहीं हूं।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “पापा…”

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    “राजवीर मेरा दुश्मन नहीं था। वो मेरा सबसे भरोसेमंद दोस्त था। हमने साथ मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत जमा किए थे।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो विक्रम…”

     

    रिकॉर्डिंग में विनय की आवाज आई “लेकिन विक्रम अकेला नहीं था।”

     

    कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    “क्या?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “आगे चलाओ।”

     

    रिकॉर्डिंग फिर शुरू हुई।

     

    “विक्रम के पीछे कोई और था। ऐसा आदमी जिसके पास हमारी कंपनी, हमारे परिवार और हमारी निजी जिंदगी की पूरी जानकारी थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    रिकॉर्डिंग में विनय बोले “उसका नाम…”

     

    अचानक आवाज में तेज शोर आया।

     

    फिर रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    कबीर ने कई बार कोशिश की।

     

    लेकिन टेप आगे नहीं चला।

     

    “यही हिस्सा खराब है।”

     

    आरव ने गुस्से में टेबल पर हाथ मारा।

     

    “हर बार नाम आने से पहले रिकॉर्डिंग क्यों रुक जाती है?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि शायद कोई नहीं चाहता कि हमें उसका नाम पता चले।”

     

    कबीर ने कमरे की तलाशी जारी रखी।

     

    कुछ देर बाद उसने टेबल की दराज खोली।

     

    अंदर एक पुराना मोबाइल फोन पड़ा था।

     

    “ये देखो।”

     

    आरव ने फोन उठाया।

     

    फोन बंद था।

     

    कबीर ने उसे चार्जर से जोड़ा।

     

    कुछ मिनट बाद स्क्रीन जल उठी।

     

    पासवर्ड मांगा गया।

     

    आरोही ने कहा,

     

    “शायद पापा का जन्मदिन?”

     

    आरव ने तारीख डाली।

     

    फोन खुल गया।

     

    अंदर सिर्फ तीन वीडियो थे।

     

    पहला वीडियो विनय मेहरा का था।

     

    दूसरा राजवीर सिंह का।

     

    और तीसरा…

     

    किसी अनजान आदमी का।

     

    आरव ने तीसरा वीडियो खोला।

     

    स्क्रीन पर एक आदमी बैठा था।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था।

     

    उसने कहा “तुम दोनों के पिता बहुत ज्यादा सच जान चुके हैं।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    वीडियो में आदमी आगे बोला “अगर उन्होंने अपना मुंह बंद नहीं किया, तो दोनों परिवारों का अंत कर दिया जाएगा।”

     

    फिर उसने कैमरे की तरफ देखा।

     

    उसका चेहरा कुछ सेकंड के लिए रोशनी में आया।

     

    आरोही ने स्क्रीन को गौर से देखा।

     

    उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “मैं इसे जानती हूं।”

     

    आरव और कबीर दोनों उसकी तरफ देखने लगे।

     

    “कौन है?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “ये आदमी…”

     

    उसने स्क्रीन की तरफ उंगली की।

     

    “मैंने इसे अपनी मां के साथ देखा है।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “कहां?”

     

    “लगभग दो महीने पहले।”

     

    “कहां?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हमारे पुराने घर के बाहर।”

     

    आरव ने तुरंत आरोही की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी मां ने कहा था कि उन्हें उस आदमी के बारे में कुछ नहीं पता।”

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “शायद मां मुझसे कुछ छुपा रही हैं।”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “हमें अभी उनके बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “सही।”

     

    तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    कदम धीरे-धीरे कमरे के करीब आ रहे थे।

     

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

     

    आरव ने इशारे से दोनों को पीछे रहने को कहा।

     

    दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे हिली।

     

    फिर दरवाजा खुला।

     

    सामने…

     

    एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा “तुम राजवीर के बेटे हो?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आप कौन हैं?”

     

    बुजुर्ग ने दरवाजा बंद किया।

     

    “मेरा नाम हरिशंकर है।”

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आप यहां क्या कर रहे हैं?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “मैं इस रिकॉर्ड रूम का पुराना चौकीदार हूं।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “आपको इस कमरे के बारे में पता था?”

     

    “हां।”

     

    “फिर आपने पहले क्यों नहीं बताया?”

     

    हरिशंकर ने गहरी सांस ली।

     

    “क्योंकि मुझे डर था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “किससे?”

     

    हरिशंकर ने सीधे उसकी तरफ देखा।

     

    “उस आदमी से… जिसने तुम्हारे पिता को मरवाया।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “आप उसे जानते हैं?”

     

    “हां।”

     

    “कौन है?”

     

    हरिशंकर कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक बाहर गोली चलने की आवाज आई।

     

    धांय!

     

    आरोही चीख पड़ी।

     

    आरव ने तुरंत उसे अपनी तरफ खींच लिया।

     

    कबीर ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    हरिशंकर घबराकर बोले,

     

    “वो आ गया।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “कौन?”

     

    हरिशंकर की आंखों में डर था।

     

    उन्होंने फुसफुसाकर कहा “विक्रम नहीं…”

     

    “तो कौन?”

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा “विक्रम का मालिक।”

     

     

    बाहर कदमों की आवाज आने लगी।

     

    कबीर ने खिड़की देखी।

     

    “हमें यहां से निकलना होगा।”

     

    हरिशंकर ने कमरे की पिछली दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “वहां एक रास्ता है।”

     

    आरव ने दीवार का पैनल हटाया।

     

    पीछे एक संकरा रास्ता था।

     

    “पहले आरोही।”

     

    आरोही अंदर जाने लगी।

     

    तभी बाहर से दरवाजे पर जोरदार चोट हुई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने दरवाजा संभाल लिया।

     

    “जाओ!”

     

    कबीर और हरिशंकर अंदर चले गए।

     

    आरव भी अंदर जाने ही वाला था कि दरवाजा टूट गया।

     

    एक आदमी अंदर घुसा।

     

    उसके हाथ में बंदूक थी।

     

    आरव उससे भिड़ गया।

     

    दोनों के बीच हाथापाई होने लगी।

     

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “आरव!”

     

    आरव ने चिल्लाकर कहा,

     

    “भागो!”

     

    आरोही वहीं रुक गई।

     

    लेकिन तभी उस आदमी ने आरव को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया।

     

    बंदूक उसकी तरफ उठी।

     

    आरोही ने बिना सोचे पास पड़ी लोहे की छड़ उठाई और उस आदमी पर हमला कर दिया।

     

    बंदूक नीचे गिर गई।

     

    आरव ने तुरंत उसे पकड़ लिया।

     

    “आरोही, तुम ठीक हो?”

     

    “हां।”

     

    “तुमने ऐसा क्यों किया?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि मैंने कहा था ना… तुम्हें खोने से डरती हूं।”

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “चलो।”

     

    दोनों सुरंग में भागने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे सुरंग से बाहर निकले।

     

    हरिशंकर भी उनके साथ थे।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “अब बताइए। आप किसे जानते हैं?”

     

    हरिशंकर ने पीछे देखा।

     

    फिर धीमी आवाज में कहा “वो आदमी विक्रम सूद नहीं था।”

     

    “कौन था?”

     

    “विक्रम का छोटा भाई।”

     

    आरव और आरोही चौंक गए।

     

    “विक्रम का भाई?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “हां। उसका नाम था… विराज सूद।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “लेकिन उसने विक्रम का नाम क्यों इस्तेमाल किया?”

     

    हरिशंकर ने कहा,

     

    “क्योंकि असली विक्रम की मौत के बाद सारी संपत्ति और कंपनी पर विराज का कब्जा हो गया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “और हमारे परिवार?”

     

    हरिशंकर की आवाज भारी हो गई।

     

    “विराज ने राजवीर और विनय के बीच गलतफहमियां पैदा कीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उन दोनों के पास उसके खिलाफ सबूत था।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “और पापा?”

     

    हरिशंकर ने नजरें झुका लीं।

     

    “विनय ने मरने से पहले मुझे एक चीज दी थी।”

     

    “क्या?”

     

    उन्होंने जेब से एक छोटा लिफाफा निकाला।

     

    “ये।”

     

    आरोही ने लिफाफा लिया।

     

    उस पर लिखा था “मेरी बेटी के लिए।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर सिर्फ एक पन्ना था।

     

    उस पर लिखा था “बेटी, जिस दिन तुम्हें ये खत मिलेगा, उस दिन तुम आरव से मिल चुकी होगी। उस पर भरोसा करना। लेकिन उसके करीब आने वाले हर इंसान पर भरोसा मत करना।”

     

    आरोही ने आगे पढ़ा।

     

    अगली लाइन ने उसकी सांस रोक दी “क्योंकि तुम्हारे सबसे करीब रहने वाला कोई व्यक्ति ही हमारे खिलाफ है।”

     

    आरोही ने तुरंत आरव की तरफ देखा।

     

    आरव की आंखों में भी चिंता थी।

     

    कौन?

     

    कौन था वो इंसान…

     

    जो उनके सबसे करीब रहकर दस साल से उन्हें धोखा दे रहा था?

     

    तभी हरिशंकर ने कांपती आवाज में कहा “मैं जानता हूं वो कौन है।”

     

    आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ मुड़े।

     

    हरिशंकर ने धीरे से कहा “वो तुम्हारी मां के बहुत करीब है।”

     

    आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मेरी मां?”

     

    हरिशंकर ने सिर हिलाया।

     

    “हां… लेकिन वो तुम्हारी मां नहीं है।”

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    हरिशंकर ने कहा “जिस औरत को तुम अपनी मां समझती हो… उसके बारे में तुम्हें बहुत बड़ा सच नहीं बताया गया।”

     

    आरोही के हाथ से खत नीचे गिर गया।

     

    और पहली बार…

     

    उसे अपनी पूरी जिंदगी पर शक होने लगा।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 9

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 9

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    एपिसोड – 9 : एक धोखा, जिसने सब बदल दिया

     

    कमरे में फिर से रोशनी जल चुकी थी, लेकिन आरव और आरोही के चेहरों पर अंधेरा छाया हुआ था।

     

    टेबल पर रखा वह कागज अब भी उनके सामने था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।

     

    उसने धीरे से आरव की तरफ देखा।

     

    “आरव… इसमें लिखा है कि मेरे पापा ने तुम्हारे पापा को धोखा दिया था।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    कबीर ने कागज हाथ में लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।

     

    “ये वही लिखावट है?”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    “जिसने पहले तुम्हें धमकी दी थी, उस कागज पर भी ऐसी ही स्याही थी।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो?”

     

    “मतलब ये हो सकता है कि जो हमें यहां तक लेकर आया है, वो चाहता है कि हम एक-दूसरे पर शक करें।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “लेकिन अगर इसमें कुछ सच्चाई हुई तो?”

     

    आरव उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है?”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “तुम पर है।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन अपने पापा पर नहीं।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “मैं भी अपने पिता के हर फैसले पर आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकता।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तो हम क्या करें?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “सच ढूंढें।”

     

    “और अगर सच हमारे खिलाफ हुआ?”

     

    आरव उसके करीब आया।

     

    “तो भी साथ रहेंगे।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “वादा?”

     

    आरव ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “वादा।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही घंटों में उनका यह भरोसा एक ऐसे सच के सामने आने वाला था, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कबीर ने लैपटॉप दोबारा खोला।

     

    “वीडियो अधूरा है, लेकिन शायद उसमें बाकी डेटा छुपा हुआ हो।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “तुम कर सकते हो?”

     

    “कोशिश कर सकता हूं।”

     

    कबीर ने कुछ देर तक कंप्यूटर पर काम किया।

     

    स्क्रीन पर कई फाइलें खुलीं।

     

    एक फोल्डर का नाम देखकर उसकी आंखें ठहर गईं।

     

    “R-27”

     

    “ये क्या है?” आरोही ने पूछा।

     

    कबीर ने फोल्डर खोला।

     

    अंदर कई स्कैन किए हुए दस्तावेज थे।

     

    पहले दस्तावेज पर लिखा था “राजवीर सिंह – व्यक्तिगत गारंटी।”

     

    आरव ने दस्तावेज अपने हाथ में लिया।

     

    “ये मेरे पिता के हस्ताक्षर हैं।”

     

    कबीर ने दूसरा दस्तावेज खोला।

     

    उसमें लिखा था कि राजवीर सिंह ने विनय मेहरा की कंपनी को आर्थिक संकट से बचाने के लिए करोड़ों रुपये की निजी गारंटी दी थी।

     

    आरोही की आंखें फैल गईं।

     

    “तो मेरे पापा की कंपनी डूब रही थी?”

     

    “हां,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने तीसरा दस्तावेज खोला।

     

    “लेकिन ये देखो।”

     

    उसमें लिखा था कि कुछ दिनों बाद वही रकम किसी तीसरे खाते में ट्रांसफर हुई थी।

     

    कबीर ने खाता नंबर देखा।

     

    “ये खाता किसका है?”

     

    आरव ने पूछा।

     

    कबीर ने कुछ सेकंड में जानकारी निकाली।

     

    उसके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    “विक्रम सूद।”

     

    आरोही ने गहरी सांस ली।

     

    “तो उसने पैसे चुराए।”

     

    “और शायद दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया,” आरव ने कहा।

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन अभी एक बात समझ नहीं आ रही।”

     

    “क्या?”

     

    “अगर राजवीर तुम्हारे पिता की मदद कर रहे थे, तो फिर दोनों परिवारों में दुश्मनी कैसे हुई?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “शायद हमें उसी का जवाब इस पेन ड्राइव में मिलेगा।”

     

    कबीर ने एक और फाइल खोली।

     

    उसमें एक ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।

     

    रिकॉर्डिंग का नाम था “28 March – 11:42 PM”

     

    आरोही की सांस रुक गई।

     

    “ये उसी रात की है?”

     

    कबीर ने प्ले दबाया।

     

    पहले कुछ सेकंड सिर्फ हवा की आवाज सुनाई दी।

     

    फिर दो पुरुषों की आवाजें सुनाई दीं।

     

    पहली आवाज विनय मेहरा की थी।

     

    “राजवीर, तुम यहां क्यों आए हो?”

     

    दूसरी आवाज राजवीर की थी।

     

    “तुम्हें बचाने।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    आरव बिल्कुल स्थिर बैठा था।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    विनय की आवाज आई “बहुत देर हो चुकी है। विक्रम सब कुछ जान चुका है।”

     

    राजवीर ने कहा “हमें पुलिस के पास जाना होगा।”

     

    विनय ने जवाब दिया “नहीं। अगर पुलिस के पास गए तो सिर्फ हम नहीं, हमारे परिवार भी खतरे में आ जाएंगे।”

     

    फिर अचानक किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    रिकॉर्डिंग में शोर होने लगा।

     

    और उसके बाद…

     

    एक तीसरी आवाज सुनाई दी।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “ये कौन है?”

     

    कबीर ने रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “चलाओ।”

     

    रिकॉर्डिंग दोबारा शुरू हुई।

     

    तीसरी आवाज साफ सुनाई दी “तुम दोनों को लगता है कि तुम मुझे रोक सकते हो?”

     

    आरोही के चेहरे से खून उतर गया।

     

    “विक्रम…”

     

    लेकिन रिकॉर्डिंग में अगली आवाज ने सबको चौंका दिया।

     

    वो आवाज विक्रम की नहीं थी।

     

    वो किसी और की थी।

     

    “विक्रम, इन्हें जाने दो।”

     

    कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग रोक दी।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “ये कौन था?”

     

    कबीर ने कहा,

     

    “पता नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से से कहा,

     

    “आवाज पहचानो।”

     

    कबीर ने फिर से रिकॉर्डिंग चलाई।

     

    तीसरी आवाज दोबारा सुनाई दी।

     

    आरोही अचानक उठ खड़ी हुई।

     

    उसके चेहरे पर डर था।

     

    “मैं इस आवाज को जानती हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसकी है?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “मेरी मां की।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरोही को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।

     

    “नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “शांत हो जाओ।”

     

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

     

    “हमें पहले पूरी रिकॉर्डिंग सुननी होगी।”

     

    कबीर ने आवाज तेज की।

     

    रिकॉर्डिंग आगे चली।

     

    आरोही की मां की आवाज सुनाई दी “विनय, तुम्हें अभी यहां से जाना होगा।”

     

    विनय ने कहा “लेकिन राजवीर?”

     

    “उसे मैं संभाल लूंगी।”

     

    राजवीर की आवाज आई “तुम पर भरोसा कैसे करूं?”

     

    आरोही की मां ने कहा “क्योंकि मैं आरोही की मां हूं।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

     

    आरोही ने लैपटॉप बंद कर दिया।

     

    “बस!”

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    “मां यहां क्यों थीं?”

     

    आरव ने उसे संभालते हुए कहा,

     

    “हमें उनसे पूछना होगा।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    घर में इंतजार करता सच

     

    दोनों तुरंत आरोही के घर पहुंचे।

     

    मां ड्राइंग रूम में बैठी थीं।

     

    आरोही को देखते ही उन्होंने पूछा,

     

    “तुम दोनों इतनी जल्दी कैसे आ गए?”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    उसने मोबाइल पर रिकॉर्डिंग चला दी।

     

    कमरे में उसकी मां की पुरानी आवाज गूंजने लगी।

     

    रिकॉर्डिंग खत्म हुई।

     

    मां का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    उन्होंने धीरे से पूछा,

     

    “तुम्हें ये कहां मिली?”

     

    आरोही की आंखों में दर्द था।

     

    “पापा की डायरी और पेन ड्राइव में।”

     

    मां ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैं चाहती थी कि ये सच कभी तुम्हारे सामने न आए।”

     

    आरोही की आवाज टूट गई।

     

    “तो आप उस रात वहां थीं?”

     

    मां ने सिर झुका लिया।

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    मां की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “क्योंकि तुम्हारे पापा ने मुझे बुलाया था।”

     

    आरव ने पूछा,

     

    “किसलिए?”

     

    “उन्होंने कहा था कि उन्हें खतरा है।”

     

    “किससे?”

     

    मां ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा “विक्रम से।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “तो आपने उन्हें बचाने की कोशिश की थी?”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “फिर पापा की मौत कैसे हुई?”

     

    मां की आंखों में डर उतर आया।

     

    “मैं वहां से चली गई थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विक्रम ने मुझे धमकी दी थी।”

     

    आरोही ने रोते हुए कहा,

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    “क्योंकि उसने कहा था कि अगर मैंने मुंह खोला तो तुम्हें भी मार देगा।”

     

    आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

     

    “आपने इतने साल अकेले ये सब सहा?”

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम मेरी आखिरी उम्मीद थीं।”

     

    आरव चुपचाप दोनों को देख रहा था।

     

    तभी मां ने अचानक आरव की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मरने से पहले मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरव आगे बढ़ा।

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखें नम थीं।

     

    “उन्होंने कहा था…”

     

    वह रुक गईं।

     

    “क्या कहा था?”

     

    “अगर कभी आरव और आरोही एक-दूसरे के करीब आएं… तो उन्हें अलग मत करना।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    मां ने धीरे से कहा “क्योंकि तुम दोनों का मिलना शायद कोई संयोग नहीं था।”

     

    एक पुराना रिश्ता

     

    आरोही ने हैरानी से पूछा,

     

    “इसका क्या मतलब है?”

     

    मां ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने पूछा,

     

    “क्या हमारे परिवार के बीच पहले से कोई रिश्ता था?”

     

    मां की आंखें झुक गईं।

     

    “हां।”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कैसा रिश्ता?”

     

    मां ने अलमारी से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में दो छोटे बच्चे थे।

     

    एक लड़का…

     

    और एक छोटी लड़की।

     

    आरोही ने तस्वीर हाथ में ली।

     

    उसने लड़की को देखा।

     

    फिर लड़के को।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “ये… मैं हूं।”

     

    आरव ने तस्वीर ली।

     

    “और ये… मैं?”

     

    मां ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “लेकिन हम बचपन में मिले थे?”

     

    मां ने कहा,

     

    “हां। तुम्हारे पिता और आरव के पिता बहुत करीबी दोस्त थे। तुम दोनों बचपन में कई बार साथ खेले हो।”

     

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    उसे अचानक कुछ धुंधली यादें आने लगीं।

     

    एक छोटी लड़की…

     

    दो चोटी…

     

    उसके हाथ में लाल रंग की पतंग…

     

    और उसकी आवाज “तुम बड़े होकर मुझे भूल मत जाना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मुझे याद आ रहा है…”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे भी।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके बीच जो रिश्ता आज बना था…

     

    क्या वो वास्तव में आज से शुरू हुआ था?

     

    या उनकी कहानी बहुत पहले लिखी जा चुकी थी?

     

    लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था

     

    मां ने अचानक कहा,

     

    “एक बात और है।”

     

    आरव और आरोही दोनों उनकी तरफ देखने लगे।

     

    “क्या?”

     

    मां ने कहा,

     

    “तुम्हारे पापा की मौत के बाद राजवीर ने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “मुझे?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विक्रम तुम्हें भी खत्म करना चाहता था।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।

     

    “तो मेरे पिता ने क्या किया?”

     

    मां ने कहा,

     

    “उन्होंने तुम्हें और आरोही को अलग-अलग शहरों में भेज दिया।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    “इसलिए मुझे अपने बचपन की बहुत-सी बातें याद नहीं हैं?”

     

    “हां।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू थे।

     

    “तो इतने सालों से हम एक-दूसरे से दूर क्यों थे?”

     

    मां ने जवाब दिया,

     

    “तुम दोनों को बचाने के लिए।”

     

    कमरे में खामोशी छा गई।

     

    आरव ने धीरे से आरोही की तरफ देखा।

     

    “तो हमारी कहानी…”

     

    आरोही ने उसकी बात पूरी की “शायद आज से नहीं शुरू हुई थी।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “बहुत पहले शुरू हो गई थी।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन तभी…

     

    मां का फोन बजा।

     

    उन्होंने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।

     

    फिर एक भारी आवाज आई “तुमने उन्हें सच बता दिया?”

     

    मां के हाथ कांपने लगे।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आवाज हंसी।

     

    “जिसे तुम दस साल से मरा हुआ समझ रही हो।”

     

    मां की आंखें फैल गईं।

     

    फोन उनके हाथ से लगभग गिर गया।

     

    आरोही ने घबराकर पूछा,

     

    “मां, कौन था?”

     

    मां ने कांपते हुए आरव और आरोही की तरफ देखा।

     

    उनके होंठों से सिर्फ एक नाम निकला “विक्रम…”

     

    आरव के चेहरे पर गुस्सा आ गया।

     

    “लेकिन विक्रम तो जिंदा है!”

     

    मां ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    मां की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “जिस विक्रम को तुम जानते हो… वो असली विक्रम नहीं है।”

     

    आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।

     

    मां ने कांपती आवाज में कहा “असली विक्रम सूद की मौत दस साल पहले ही हो चुकी थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    अगर ये सच था…

     

    तो पिछले दस सालों से उनके परिवारों को कौन चला रहा था?

     

    कौन था वो आदमी जो विक्रम के नाम पर सबको धमका रहा था?

     

    और सबसे बड़ा सवाल विनय मेहरा की मौत की असली साजिश आखिर किसने रची थी?

     

    जारी रहेगा…

  • महादेव का रूद्र अवतार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जब कैलाश पर गूंजा रुद्र का डमरू

     

    हिमालय की ऊंची चोटियों पर उस दिन सब कुछ शांत था। कैलाश पर बर्फ की सफेद चादर बिछी हुई थी। भगवान शिव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती उनके पास बैठी थीं। नंदी कुछ दूर शांत भाव से पहरा दे रहे थे।

     

    लेकिन अचानक…

     

    डम… डम… डम…

     

    महादेव का डमरू अपने आप बज उठा।

     

    माता पार्वती ने चौंककर महादेव की ओर देखा।

     

    “स्वामी… आपने डमरू बजाया?”

     

    महादेव ने धीरे से आंखें खोलीं।

     

    “नहीं देवी।”

     

    पार्वती जी के चेहरे पर चिंता आ गई।

     

    “फिर यह अपने आप कैसे बज रहा है?”

     

    महादेव कुछ पल शांत रहे। उनकी आंखों में अचानक गंभीरता उतर आई।

     

    “कहीं न कहीं धरती पर अधर्म अपनी सीमा पार कर चुका है।”

     

    नंदी ने भी सिर उठाकर कैलाश की ओर देखा।

     

    उसी समय आकाश में काले बादल घिरने लगे। बर्फीली हवा अचानक तेज हो गई। कैलाश के आसपास घूमने वाले पक्षी घबराकर दूर उड़ गए।

     

    महादेव ने अपनी आंखें बंद कीं और ध्यान लगाया।

     

    उन्हें एक छोटा-सा गांव दिखाई दिया।

     

    गांव का नाम था देवगिरि।

     

    वहां लोग बहुत परेशान थे। गांव के पास रहने वाला एक शक्तिशाली राजा, वज्रसेन, आसपास के गांवों पर जबरन कर लगाता था। जो गरीब किसान कर नहीं दे पाते, उनसे उनकी जमीन छीन ली जाती।

     

    लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि वज्रसेन को भगवान शिव के मंदिर से नफरत थी।

     

    गांव के बीचोंबीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। वहां रहने वाले बूढ़े पुजारी हरिदास रोज सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे।

     

    वज्रसेन कई बार उन्हें मंदिर बंद करने की धमकी दे चुका था।

     

    एक दिन वह अपने सैनिकों के साथ मंदिर पहुंचा।

     

    “पुजारी!” उसने गुस्से में कहा, “मैंने कहा था यह मंदिर बंद कर दो।”

     

    हरिदास ने शांत स्वर में कहा, “राजन, मंदिर किसी राजा का नहीं होता। यह भोलेनाथ का घर है।”

     

    वज्रसेन हंस पड़ा।

     

    “भोलेनाथ? अगर तुम्हारा शिव सच में है, तो उसे बुलाओ।”

     

    हरिदास ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “महादेव को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती राजन। सच्ची पुकार उन तक खुद पहुंच जाती है।”

     

    वज्रसेन ने गुस्से में मंदिर का दीपक बुझा दिया।

     

    “आज से यहां पूजा बंद!”

     

    इतना कहकर वह चला गया।

     

    उस रात पूरा गांव डरा हुआ था।

     

    लेकिन हरिदास मंदिर में अकेले बैठे रहे। उन्होंने शिवलिंग के सामने दीपक जलाया और आंखों में आंसू लेकर बोले,

     

    “भोलेनाथ… मैं आपसे अपने लिए कुछ नहीं मांगता। बस इस गांव के लोगों की रक्षा कर लेना।”

     

    पास ही एक छोटा बच्चा बैठा था। उसका नाम था गोपाल।

     

    गोपाल ने पूछा, “बाबा, क्या महादेव हमारी मदद करेंगे?”

     

    हरिदास मुस्कुराए।

     

    “बेटा, जब भक्त सच्चे मन से पुकारता है, तो महादेव देर कर सकते हैं… लेकिन अंधेर नहीं करते।”

     

    उधर कैलाश पर अचानक फिर डमरू बजा।

     

    डम… डम… डम…

     

    इस बार उसकी आवाज पहले से ज्यादा तेज थी।

     

    माता पार्वती ने महादेव को देखा।

     

    “स्वामी, क्या समय आ गया है?”

     

    महादेव ने धीरे से कहा,

     

    “अभी नहीं देवी… लेकिन बहुत जल्द।”

     

    अगली सुबह वज्रसेन ने गांव वालों को अपने महल में बुलाया।

     

    उसने घोषणा की,

     

    “आज से इस गांव की सारी जमीन मेरी होगी। जो मेरा आदेश नहीं मानेगा, उसे गांव छोड़ना पड़ेगा।”

     

    लोग डर गए।

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    “राजा जी, ये जमीन हमारे खेत हैं। इन्हें हमसे मत छीनिए।”

     

    वज्रसेन ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तू मुझे सिखाएगा?”

     

    हरिदास तुरंत गोपाल के आगे आ गए।

     

    “राजन, बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए।”

     

    वज्रसेन ने सैनिकों को आदेश दिया,

     

    “कल सुबह मंदिर भी गिरा देना।”

     

    यह सुनते ही गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    हरिदास की आंखों में आंसू आ गए।

     

    रात होते ही पूरा गांव मंदिर में इकट्ठा हुआ।

     

    हरिदास ने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा,

     

    “हे महादेव, आज आपकी परीक्षा नहीं है। आज हमारी भक्ति की परीक्षा है। अगर हमने कभी सच्चे मन से आपका नाम लिया है, तो आज अपने भक्तों की लाज रख लेना।”

     

    सबने एक साथ आवाज लगाई—

     

    “हर हर महादेव!”

     

    तभी मंदिर के अंदर रखा दीपक अचानक बहुत तेज जलने लगा।

     

    शिवलिंग पर चढ़ा जल अपने आप कांपने लगा।

     

    और उसी क्षण…

     

    दूर कैलाश पर महादेव खड़े हो गए।

     

    उनके चेहरे पर अब वह शांत मुस्कान नहीं थी।

     

    उनकी आंखों में अग्नि जैसी चमक थी।

     

    माता पार्वती ने उन्हें देखा।

     

    “स्वामी…”

     

    महादेव ने कुछ नहीं कहा।

     

    उन्होंने अपना डमरू उठाया।

     

    डम!

     

    एक ही आवाज से कैलाश की चोटियां गूंज उठीं।

     

    डम! डम! डम!

     

    आकाश में बिजली चमकने लगी।

     

    महादेव के शरीर से एक दिव्य तेज निकलने लगा। उनकी जटाएं खुल गईं। उनके मस्तक पर तीसरा नेत्र चमक उठा।

     

    यह भोलेनाथ का शांत रूप नहीं था।

     

    यह था—

     

    रुद्र।

     

    देवगिरि गांव में अचानक तेज हवा चलने लगी।

     

    वज्रसेन अपने महल में बैठा था। तभी उसके सामने रखा दीपक अपने आप बुझ गया।

     

    उसने सैनिकों को बुलाया।

     

    “कौन है बाहर?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर उसे दूर से डमरू की आवाज सुनाई दी।

     

    डम… डम… डम…

     

    वज्रसेन घबरा गया।

     

    “यह आवाज… यहां कैसे?”

     

    अचानक महल के दरवाजे खुल गए।

     

    सामने एक विशाल तेजस्वी साधु खड़ा था।

     

    शरीर पर भस्म, जटाएं खुली हुईं और आंखों में ऐसा तेज कि वज्रसेन की आवाज तक कांपने लगी।

     

    साधु ने कहा,

     

    “वज्रसेन।”

     

    राजा पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    साधु ने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा,

     

    “जिसे तूने बार-बार पुकारा था।”

     

    वज्रसेन को मंदिर की अपनी बात याद आ गई।

     

    “नहीं… यह नहीं हो सकता।”

     

    साधु आगे बढ़े।

     

    “तूने शक्ति को अपना अधिकार समझ लिया। तूने गरीबों से उनकी जमीन छीनी। भक्तों को डराया। मंदिर का दीपक बुझाया।”

     

    वज्रसेन कांपने लगा।

     

    “मुझे क्षमा कर दो!”

     

    साधु की आंखों में अग्नि और तेज हो गया।

     

    “क्षमा मांगने से पहले अपने कर्मों का भार समझ।”

     

    तभी आकाश में जोरदार गर्जना हुई।

     

    साधु का स्वर गूंजा—

     

    “मैं रुद्र हूं!”

     

    पूरा महल कांप उठा।

     

    वज्रसेन घुटनों के बल गिर गया।

     

    रुद्र ने अपनी दृष्टि उठाई।

     

    “शक्ति का अर्थ दूसरों को डराना नहीं होता। शक्ति का अर्थ कमजोर की रक्षा करना होता है।”

     

    वज्रसेन ने सिर झुका दिया।

     

    “मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है।”

     

    “तो उसका प्रायश्चित भी बड़ा होगा।”

     

    रुद्र ने आदेश दिया कि जिन लोगों की जमीन छीनी गई है, वह उन्हें वापस की जाए। मंदिर को पहले से भी बड़ा बनाया जाए और गरीबों से लिया गया धन लौटा दिया जाए।

     

    वज्रसेन ने सब कुछ स्वीकार कर लिया।

     

    सुबह गांव वालों ने देखा कि मंदिर के सामने वही साधु खड़े हैं।

     

    गोपाल दौड़कर उनके पास गया।

     

    “बाबा, आप कौन हैं?”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “जिसे तुम रातभर बुला रहे थे।”

     

    गोपाल ने उनके पैरों को छूना चाहा।

     

    लेकिन अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

     

    सिर्फ मंदिर के सामने एक छोटा-सा डमरू पड़ा था।

     

    हरिदास ने उसे उठाया और उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उन्होंने आकाश की ओर देखकर कहा,

     

    “भोलेनाथ… आपने फिर अपने भक्तों की लाज रख ली।”

     

    उसी समय दूर कैलाश पर महादेव फिर अपने शांत स्वरूप में बैठे थे।

     

    माता पार्वती मुस्कुराईं।

     

    “स्वामी, आपका क्रोध भी अंत में किसी की रक्षा ही करता है।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “देवी, रुद्र का क्रोध विनाश के लिए नहीं… अधर्म के अंत के लिए होता है।”

     

    नंदी ने प्रसन्न होकर सिर झुका दिया।

     

    और उसी क्षण कैलाश की चोटियों पर एक बार फिर डमरू की मधुर आवाज गूंजी—

     

    डम… डम… डम…

     

    जैसे स्वयं कैलाश कह रहा हो—

     

    जहां सच्ची भक्ति होगी, वहां महादेव की कृपा जरूर होगी।