दरवाज़ा बंद होते ही आरव और कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा जैसे बाहर से नहीं बल्कि अंदर से बंद था।
कबीर ने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया।
“खुल क्यों नहीं रहा?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र कमरे के बीचोंबीच पड़े लोहे के संदूक पर थी।
वही संदूक जिसका ज़िक्र मृणालिनी की डायरी में था।
संदूक के ऊपर लाल धागा बंधा था।
आरव उसके पास गया।
जैसे ही उसने धागे को छुआ, कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
कबीर चीख पड़ा।
तभी कमरे की दीवार से धीमी आवाज़ आई—
“खोलो…”
आरव पीछे हट गया।
आवाज़ फिर आई—
“संदूक खोलो…”
कबीर बोला, “ये मत करना।”
लेकिन आरव ने संदूक खोल दिया।
अंदर पुराने कागज़, कुछ चाँदी के सिक्के और एक लोहे की चाबी थी।
चाबी के साथ एक छोटा-सा कागज़ था।
उस पर लिखा था—
“नीचे जाओ। जवाब वहीं है।”
फर्श के नीचे से अचानक आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
आरव ने कमरे की फर्श देखी।
एक पत्थर बाकी पत्थरों से अलग था।
दोनों ने मिलकर उसे हटाया।
नीचे सीढ़ियाँ थीं।
सीढ़ियाँ अँधेरे तहखाने में जा रही थीं।
“यह हवेली के नक्शे में नहीं था,” आरव ने कहा।
कबीर ने घबराकर पूछा—
“क्या हमें सच में नीचे जाना चाहिए?”
आरव ने चाबी जेब में रखी।
“अगर मृणालिनी की मौत का सच जानना है, तो हाँ।”
दोनों नीचे उतरने लगे।
जैसे-जैसे वे नीचे जाते, हवा ठंडी होती जाती।
कुछ सीढ़ियाँ नीचे जाने के बाद उन्हें दीवारों पर पुराने चित्र दिखाई दिए।
हर चित्र में रुद्रगढ़ परिवार का एक सदस्य था।
लेकिन हर चित्र में एक बात समान थी।
सबकी आँखें काली कर दी गई थीं।
सबसे आखिरी चित्र में मृणालिनी थी।
उसकी आँखें बाकी चित्रों की तरह काली नहीं थीं।
उसकी आँखों पर लाल रंग लगा था।
चित्र के नीचे लिखा था—
“जिसे बलि दी गई, वही अब रक्षक है।”
कबीर ने कहा—
“आरव, मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”
तभी पीछे से किसी के चलने की आवाज़ आई।
दोनों पलटे।
सीढ़ियाँ खाली थीं।
लेकिन आवाज़ लगातार करीब आ रही थी।
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई लकड़ी की छड़ी लेकर सीढ़ियाँ उतर रहा हो।
कबीर ने फुसफुसाकर कहा—
“हरिदास?”
कोई जवाब नहीं आया।
दोनों नीचे पहुँचे।
वहाँ एक विशाल तहखाना था।
बीच में पत्थर का चबूतरा था।
उस पर पुराने कपड़े, सूखी हुई चूड़ियाँ और एक छोटी-सी चाँदी की पायल रखी थी।
आरव ने पायल उठाई।
उसे छूते ही अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“तुम बहुत देर से आए।”
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
कोई नहीं था।
लेकिन उसके हाथ में पकड़ी पायल अब गर्म हो चुकी थी।
अचानक तहखाने की दीवार पर एक छिपा हुआ दरवाज़ा दिखाई दिया।
आरव ने चाबी लगाई।
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
कमरे में पुराने दस्तावेज़ रखे थे।
आरव ने एक दस्तावेज़ उठाया।
उसमें लिखा था कि 1936 में रुद्रगढ़ परिवार पर आर्थिक संकट था। परिवार के मुखिया राजेंद्र सिंह ने गाँव की जमीन बेचकर हवेली बचाने की कोशिश की थी। लेकिन गाँव वालों ने विरोध किया।
तभी परिवार के तांत्रिक ने एक भयानक उपाय बताया।
उसने कहा कि हवेली के नीचे एक “रक्षक शक्ति” है। अगर परिवार अपनी संतान की बलि देगा तो धन वापस आ जाएगा और परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।
राजेंद्र सिंह ने अपनी बेटी मृणालिनी को चुन लिया।
लेकिन दस्तावेज़ के आखिरी हिस्से में एक रहस्य था।
मृणालिनी की बलि के बाद धन तो आया…
लेकिन परिवार का कोई सदस्य सात दिन से ज्यादा जीवित नहीं रहा।
एक-एक करके सभी की मौत होने लगी।
सिर्फ एक व्यक्ति बचा।
हरिदास।
कबीर ने दस्तावेज़ पढ़कर कहा—
“तो हरिदास ने सब देखा था?”
आरव ने सिर हिलाया।
तभी तहखाने के बाहर से आवाज़ आई—
“नहीं।”
दोनों जम गए।
हरिदास अँधेरे से बाहर आया।
लेकिन इस बार उसका चेहरा वैसा नहीं था।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“मैंने सिर्फ देखा नहीं था,” उसने कहा।
“मैंने ही वह अनुष्ठान कराया था।”
आरव पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
हरिदास हँसा।
“हरिदास तो बहुत पहले मर गया था।”
उसका चेहरा अचानक बदलने लगा।
झुर्रियाँ गायब हुईं।
बाल काले हो गए।
कुछ ही सेकंड में सामने एक जवान आदमी खड़ा था।
आरव ने तस्वीर याद की।
वही चेहरा।
1936 की तस्वीर वाला हरिदास।
उसने कहा—
“मृणालिनी को हमने बलि दी थी, लेकिन उसने मरने से पहले श्राप दे दिया। इस हवेली में जो भी लालच लेकर आएगा, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाएगी।”
कबीर काँप रहा था।
“तो तुम यहाँ क्यों हो?”
जवान हरिदास मुस्कुराया।
“क्योंकि मैं पहला कैदी हूँ।”
तभी तहखाने में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।
“झूठ।”
अँधेरे से मृणालिनी बाहर आई।
उसने हरिदास की ओर देखा।
“पहला कैदी मैं नहीं हूँ।”
हरिदास का चेहरा डर से बदल गया।
मृणालिनी ने आरव की ओर इशारा किया।
“जिसे हवेली ने बुलाया है… वह अगला रक्षक बनेगा।”
आरव पीछे हटते हुए बोला—
“मैं यहाँ से नहीं रुकूँगा।”
मृणालिनी ने शांत स्वर में कहा—
“तुम्हें जाने की अनुमति किसने दी?”
उसी क्षण तहखाने की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अँधेरे में सिर्फ एक आवाज़ सुनाई दी—
“अब असली दरवाज़ा खुलेगा।”
और फर्श अचानक टूट गया।
आरव और कबीर नीचे गिरने लगे।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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