आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ही कमरे में मौजूद वह रहस्यमयी औरत गायब हो गई।
उसके हाथ में पकड़ी लाल डायरी फर्श पर पड़ी थी।
आरव ने डायरी उठाई।
उसका पहला पन्ना खाली था।
दूसरा पन्ना भी खाली।
तीसरे पन्ने पर केवल एक तारीख लिखी थी—
17 अगस्त 1986।
उसके नीचे लिखा था—
“जिस दिन पहला झूठ बोला गया, उसी दिन आईना बना।”
आरव ने पन्ना पलटा।
अब उस पर कुछ लिखा हुआ था।
“हर समाज अपने लिए कुछ चेहरे चुनता है। किसी को अच्छा आदमी कहता है, किसी को बुरा। लेकिन असली सच उन चेहरों के पीछे छिपा रहता है।”
आरव की उंगलियाँ काँपने लगीं।
अचानक हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।
ठक…
ठक…
ठक…
कोई दरवाजे के पास आकर रुक गया।
आरव ने टॉर्च जलाई।
दरवाजे पर उसका दोस्त कबीर खड़ा था।
“तू यहाँ क्या कर रहा है?” कबीर ने पूछा।
आरव ने राहत की साँस ली।
“तू मेरा पीछा कर रहा था?”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ। मुझे लगा तू अकेला यहाँ आकर कोई बेवकूफी करेगा।”
दोनों हवेली से बाहर निकल आए।
लेकिन आरव ने लाल डायरी अपने बैग में रख ली।
अगली सुबह उसने डायरी पढ़ना शुरू किया।
डायरी में सूरजपुर के कई लोगों के बारे में लिखा था।
सबसे पहला नाम था—
शंभूनाथ।
शंभूनाथ कस्बे का सबसे बड़ा व्यापारी था। बाहर से वह बहुत धार्मिक और दयालु माना जाता था। मंदिर में रोज पूजा करता और गरीबों को खाना बाँटता।
लेकिन डायरी में लिखा था कि वह मजदूरों को महीनों की मजदूरी नहीं देता था।
आरव ने उसी दिन शंभूनाथ से मिलने का फैसला किया।
शंभूनाथ ने उसे बड़े प्यार से बैठाया।
“बेटा, पत्रकार हो। चाय पियोगे?”
आरव ने पूछा—
“आप अपने मजदूरों को समय पर पैसा क्यों नहीं देते?”
शंभूनाथ का चेहरा बदल गया।
“किसने कहा तुमसे?”
“बस सवाल पूछा है।”
वह हँसने लगा।
“आजकल के पत्रकार भी न… गरीबों के नाम पर कहानी बनाते हैं।”
आरव ने उसे गौर से देखा।
वह आदमी बाहर से जितना शांत था, भीतर से उतना ही बेचैन।
शाम को आरव को अपने कमरे में वही आवाज सुनाई दी—
“पहला चेहरा देख लिया?”
आरव ने पीछे देखा।
कमरे में कोई नहीं था।
उसने आईने के सामने जाकर खुद को देखा।
लेकिन आईने में वह अकेला नहीं था।
उसके पीछे शंभूनाथ खड़ा था।
आरव पलटा।
कमरा खाली था।
फिर आईने की तरफ देखा।
इस बार शंभूनाथ का चेहरा बदल रहा था।
उसकी आँखें लाल हो गईं।
मुँह से खून बहने लगा।
और फिर आईने में लिखा दिखाई दिया—
“झूठ का पहला चेहरा।”
अगली सुबह पूरे कस्बे में खबर फैल गई।
शंभूनाथ रात में अपने घर के कमरे में मृत पाया गया था।
उसके सामने एक बड़ा आईना रखा था।
और आईने पर उंगली से लिखा था—
“मजदूरी का हिसाब बाकी है।”
पुलिस ने इसे हत्या माना।
कस्बे में डर फैल गया।
लोग कहने लगे कि ठाकुर की हवेली का श्राप लौट आया है।
लेकिन आरव को यकीन था कि यह सिर्फ श्राप नहीं था।
किसी को उन लोगों के राज पता थे।
कबीर ने पूछा—
“तू इस मामले से दूर क्यों नहीं हो जाता?”
आरव ने कहा—
“क्योंकि कोई लोगों को मार नहीं रहा… कोई उन्हें उनके किए का हिसाब दिखा रहा है।”
“और अगर अगला नाम तेरा हुआ तो?”
आरव चुप हो गया।
उसी रात उसने लाल डायरी फिर खोली।
एक नया पन्ना अपने आप खुल गया।
उस पर उसका नाम लिखा था।
आरव मिश्रा।
उसके नीचे—
“सच लिखने वाला आदमी भी सच से भागता है।”
आरव का चेहरा पीला पड़ गया।
उसे अपने जीवन की एक घटना याद आई।
तीन साल पहले उसने एक बड़े उद्योगपति के खिलाफ भ्रष्टाचार की खबर लिखी थी।
लेकिन जब उस उद्योगपति ने उसे पैसे देने की पेशकश की थी, आरव ने खबर रोक दी थी।
उसने खुद को समझाया था कि परिवार की जरूरत थी।
मगर वह भी तो एक झूठ था।
वह भी तो बिक गया था।
आईने में उसका चेहरा अचानक बदल गया।
उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।
एक आदमी दिखाई दिया जो नोटों का बंडल हाथ में लिए खड़ा था।
आरव पीछे हट गया।
“नहीं…”
आईने वाला आदमी मुस्कुराया।
“तुम दूसरों का सच लिखते हो… अपना कब लिखोगे?”
आरव ने आईने पर मुक्का मारा।
शीशा नहीं टूटा।
बल्कि उसके अंदर से आवाज आई—
“समाज का सबसे खतरनाक झूठ वह होता है जिसे इंसान खुद से बोलता है।”
अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई।
अंधेरे में लाल डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।
फिर एक नाम पर आकर रुक गए।
हरिदास बाबा।
आरव की धड़कन तेज हो गई।
वही बाबा जिन्होंने उसे हवेली से दूर रहने को कहा था।
अब सवाल यह था—
क्या हरिदास बाबा भी किसी सच को छिपा रहे थे?
आरव को नहीं पता था कि इस सवाल का जवाब उसे सूरजपुर के सबसे पुराने मंदिर में मिलने वाला था।
और वहाँ उसका सामना उस आदमी से होने वाला था, जो पिछले चालीस सालों से आईने का रहस्य छिपाए बैठा था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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