शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन शाम ढलते ही यह जगह किसी अंधेरी दुनिया में बदल जाती थी। कस्बे के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “आईने वाली हवेली” कहते थे।
हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी ऊँची दीवारों पर काई जम चुकी थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लगी लोहे की जंजीर हमेशा हवा के साथ खड़खड़ाती रहती थी।
लोग कहते थे कि उस हवेली में एक बहुत बड़ा आईना था।
ऐसा आईना, जिसमें इंसान अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना असली चेहरा देखता था।
कस्बे के बुजुर्गों का कहना था कि कई साल पहले हवेली का मालिक ठाकुर रघुवीर सिंह था। वह पूरे इलाके में बहुत सम्मानित आदमी माना जाता था। मंदिर में सबसे बड़ा दान वही देता था, गरीबों के सामने खुद को उनका मसीहा बताता था और हर साल बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाएँ करवाता था।
लेकिन उसकी हवेली के अंदर कुछ और ही कहानी थी।
कहा जाता था कि ठाकुर गरीब किसानों की जमीन हड़पता था। जो उसके खिलाफ आवाज उठाता, उसे धमकाया जाता। मगर बाहर की दुनिया में ठाकुर को लोग “धर्मात्मा” कहते थे।
एक रात ठाकुर ने उसी रहस्यमयी आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।
आईने में उसका चेहरा नहीं था।
वहाँ एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसके हाथ खून से सने थे।
ठाकुर घबरा गया।
उसने आईना तोड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी आईने के अंदर से किसी औरत की आवाज आई—
“दुनिया से झूठ बोल सकते हो ठाकुर… अपने आप से नहीं।”
अगली सुबह ठाकुर अपनी हवेली के अंदर मृत मिला।
उसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कोई भयानक चीज देखी हो।
तब से हवेली बंद कर दी गई।
लेकिन असली कहानी वर्षों बाद शुरू हुई।
सूरजपुर में रहने वाला आरव शहर से अपने कस्बे वापस आया था। वह पत्रकार था और समाज में फैले अंधविश्वास और अपराध पर लिखता था।
उसे अपने दादा की पुरानी डायरी मिली थी।
डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“जिस दिन समाज अपने चेहरे से पर्दा हटाएगा, आईना फिर जाग जाएगा।”
आरव ने उस लाइन को कई बार पढ़ा।
उसे लगा कि शायद उसके दादा भी उसी हवेली की कहानी से परिचित थे।
अगले दिन उसने कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, हरिदास बाबा, से इस बारे में पूछा।
बाबा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“उस हवेली का नाम दोबारा मत लेना।”
“क्यों?” आरव ने पूछा।
“क्योंकि वहाँ आईना है।”
आरव हँस पड़ा।
“आईना तो हर घर में होता है बाबा।”
हरिदास बाबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“हर आईना चेहरा दिखाता है बेटा… लेकिन वह आईना नीयत दिखाता है।”
आरव चुप हो गया।
बाबा ने आगे कहा—
“वह आईना किसी बुरे आदमी को नहीं मारता। वह सिर्फ उसे उसका सच दिखाता है। डर इस बात का है कि इंसान अपना सच देखकर क्या करता है।”
उस रात आरव ने तय किया कि वह हवेली जाएगा।
रात के करीब ग्यारह बजे वह टॉर्च लेकर हवेली के सामने पहुँचा।
हवा बहुत तेज थी।
दरवाजा बिना छुए ही धीरे-धीरे खुल गया।
चर्ररर…
आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।
अंदर धूल और सड़ांध की गंध थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। हर चित्र में ठाकुर परिवार के लोग मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन अजीब बात यह थी कि जैसे-जैसे आरव आगे बढ़ता, उसे लगता कि उन चित्रों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।
वह एक बड़े कमरे में पहुँचा।
कमरे के बीचोंबीच एक विशाल आईना कपड़े से ढका हुआ था।
आरव ने धीरे से कपड़ा हटाया।
आईना काला था।
उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।
फिर अचानक आईने की सतह पर हल्की-सी लहर उठी।
और उसके सामने उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।
लेकिन वह मुस्कुरा नहीं रहा था।
आईने वाला आरव उसे घूर रहा था।
फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।
आरव ने हाथ नहीं उठाया था।
आईने के अंदर का आरव मुस्कुराया और उसके होंठ हिले—
“तुम सच जानना चाहते हो?”
कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
टॉर्च बुझ गई।
और अंधेरे में एक फुसफुसाहट गूँजी—
“तो पहले अपना सच देखो…”
आरव ने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाजे पर कोई खड़ा था।
एक औरत।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लाल डायरी थी।
और वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।
आरव पीछे हटने लगा।
तभी औरत ने कहा—
“यह आईना समाज का है… और इसमें हर किसी का चेहरा है।”
अचानक आईने में कई चेहरे दिखाई देने लगे।
पुलिस वाले।
नेता।
पुजारी।
व्यापारी।
शिक्षक।
गरीब।
अमीर।
और उन सबके चेहरों के पीछे एक दूसरा चेहरा छिपा था।
एक ऐसा चेहरा जो दुनिया से छिपाया गया था।
आरव की साँस रुक गई।
उसे समझ आ गया—
यह सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं थी।
यह पूरे समाज का आईना था।
और आईना अब जाग चुका था।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
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