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भूत बंगला — पार्ट 5

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 

 

अमन अपनी परछाई को देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

 

उसकी परछाई जमीन पर थी, लेकिन वह अमन जैसी नहीं थी। उसके सिर पर दो लंबे सींग थे और उसकी गर्दन असामान्य रूप से लंबी दिखाई दे रही थी।

 

अमन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

 

“ये… ये मेरी परछाई नहीं है।”

 

समीर उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

 

उसके चेहरे पर अब वह डर नहीं था जो कुछ देर पहले दिखाई दे रहा था।

 

वह बिल्कुल शांत था।

 

“तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

 

अमन ने पूछा, “अगर मैंने कमरा नहीं खोला तो?”

 

समीर की मुस्कान गायब हो गई।

 

“तो तुम्हारे पिता हमेशा के लिए वहीं कैद रहेंगे।”

 

अमन ने बंगले की तरफ देखा।

 

उसके मन में हजारों सवाल घूम रहे थे।

 

अगर उसके पिता सच में इस बंगले में थे, तो इतने सालों से कहाँ थे?

 

और अगर वह जिंदा थे, तो उन्होंने कभी घर लौटने की कोशिश क्यों नहीं की?

 

अचानक पीछे से बच्चे की आवाज आई—

 

“क्योंकि वह जिंदा नहीं हैं।”

 

अमन ने मुड़कर देखा।

 

ठाकुर का बच्चा उसके पीछे खड़ा था।

 

“तुम झूठ बोल रहे हो,” अमन ने कहा।

 

बच्चे ने सिर हिलाया।

 

“तुम्हारे पिता की आत्मा यहाँ है। उनका शरीर बहुत पहले खत्म हो चुका है।”

 

अमन की आँखों में आँसू आ गए।

 

“तो मुझे बंगले में क्यों जाना है?”

 

बच्चे ने कहा—

 

“क्योंकि उनकी आत्मा के पास तुम्हारी आखिरी परछाई है।”

 

उसी समय जंगल में तेज हवा चलने लगी।

 

पेड़ों की शाखाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं।

 

दूर बंगले का दरवाजा अपने आप खुल गया।

 

किर्रर्र…

 

अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

 

अमन ने फैसला कर लिया।

 

“मैं जाऊँगा।”

 

समीर ने कहा, “मैं भी।”

 

दोनों बंगले की तरफ चल पड़े।

 

बंगले के पास पहुँचते ही अमन ने महसूस किया कि हवा बिल्कुल शांत हो गई थी।

 

इतनी शांति थी कि उनके कदमों की आवाज बहुत तेज सुनाई दे रही थी।

 

वे अंदर गए।

 

मुख्य हॉल पहले जैसा नहीं था।

 

दीवारों पर लगी तस्वीरें गायब थीं।

 

उनकी जगह काले पर्दे लगे थे।

 

हॉल के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी थी।

 

घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

 

अचानक घड़ी ने बारह बार घंटी बजाई।

 

टन… टन… टन…

 

हर घंटी के साथ कमरे की एक-एक खिड़की बंद होती गई।

 

बारहवीं घंटी के बाद अंधेरा छा गया।

 

फिर सामने एक दरवाजा दिखाई दिया।

 

उस पर लिखा था—

 

“केवल वही अंदर आए, जिसने अपनी परछाई खोई हो।”

 

अमन ने दरवाजा खोला।

 

अंदर एक लंबा गलियारा था।

 

गलियारे के अंत में एक लाल दरवाजा था।

 

दरवाजे के पीछे से किसी आदमी के रोने की आवाज आ रही थी।

 

“अमन…”

 

अमन वहीं रुक गया।

 

यह आवाज उसके पिता की थी।

 

वही आवाज जो उसने बचपन में सुनी थी।

 

“पापा?”

 

अंदर से जवाब आया—

 

“बेटा… मुझे यहाँ से निकालो।”

 

अमन ने दरवाजा खोल दिया।

 

कमरे के बीच में एक कुर्सी थी।

 

कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

 

उसका चेहरा झुका हुआ था।

 

बाल सफेद हो चुके थे।

 

अमन की सांस रुक गई।

 

“पापा…”

 

आदमी ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

 

चेहरा बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

 

अमन उसके पास दौड़ा।

 

लेकिन समीर ने उसे रोक लिया।

 

“रुको!”

 

अमन चिल्लाया—

 

“ये मेरे पापा हैं!”

 

समीर ने कहा—

 

“पहले उनकी परछाई देखो।”

 

अमन ने जमीन की तरफ देखा।

 

कुर्सी पर बैठे आदमी की कोई परछाई नहीं थी।

 

अचानक आदमी हँसने लगा।

 

उसकी आवाज बदल गई।

 

“तुम्हें अब भी विश्वास नहीं होता?”

 

उसका चेहरा धीरे-धीरे विकृत होने लगा।

 

त्वचा काली पड़ गई।

 

आँखें लाल हो गईं।

 

और उसके पीछे वही काली औरत दिखाई दी।

 

वह औरत आगे बढ़ी।

 

“तुम्हारे पिता ने अपनी परछाई देकर तुम्हें बचाया था।”

 

अमन ने पूछा—

 

“किससे?”

 

औरत ने कहा—

 

“मुझसे नहीं… उससे।”

 

कमरे की दीवार अचानक फट गई।

 

दीवार के पीछे एक विशाल काली आकृति दिखाई दी।

 

उसका शरीर धुएँ से बना था।

 

उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

 

फिर भी वह अमन को देख रही थी।

 

अमन समझ गया।

 

यही वह शक्ति थी जिसे पचास साल पहले ठाकुर ने बंद किया था।

 

काली आकृति ने कहा—

 

“पाँचवीं परछाई पूरी हो चुकी है।”

 

अमन के पैरों के नीचे उसकी सींगों वाली परछाई फैलने लगी।

 

कमरे में रखे सारे आईने टूटने लगे।

 

समीर ने चिल्लाकर कहा—

 

“अमन! अपनी परछाई से मत डरना!”

 

“मैं क्या करूँ?”

 

“उसे स्वीकार मत करना!”

 

अमन ने आँखें बंद कर लीं।

 

उसे अपने पिता की बातें याद आने लगीं।

 

बचपन में पिता अक्सर कहते थे—

 

“डर हमेशा अंधेरे में नहीं होता, बेटा। कभी-कभी डर हमारे अंदर छिपा होता है।”

 

अमन ने आँखें खोलीं।

 

उसने अपनी परछाई की तरफ देखा।

 

वह अब धीरे-धीरे उसके शरीर से अलग हो रही थी।

 

अमन ने जमीन पर हाथ रख दिया।

 

“तू मेरी नहीं है।”

 

परछाई रुक गई।

 

अमन ने जोर से कहा—

 

“मेरी परछाई मेरे डर की नहीं, मेरी पहचान है।”

 

अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

 

काली आकृति पीछे हटने लगी।

 

औरत चीखने लगी।

 

दीवारें कांपने लगीं।

 

फिर एक जोरदार आवाज हुई।

 

धड़ाम!

 

पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

 

अमन ने देखा कि उसके पिता की आत्मा उसके सामने खड़ी थी।

 

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

 

“मुझे तुम पर गर्व है।”

 

अमन रो पड़ा।

 

“पापा, मेरे साथ चलिए।”

 

उसके पिता ने सिर हिलाया।

 

“अब मेरा समय खत्म हो चुका है।”

 

“नहीं!”

 

“बेटा, घर जाना।”

 

उन्होंने हाथ उठाया।

 

अमन की सींगों वाली परछाई अचानक गायब हो गई।

 

उसकी जगह उसकी सामान्य परछाई वापस आ गई।

 

काली आकृति चीखते हुए दीवार के अंदर खिंच गई।

 

बंगला जोर-जोर से हिलने लगा।

 

समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

 

“हमें अभी निकलना होगा!”

 

दोनों बाहर की तरफ भागे।

 

बाहर पहुंचते ही पूरा बंगला पीछे से धूल के बादल में बदलने लगा।

 

ऊपरी मंजिल की खिड़की में वही औरत आखिरी बार दिखाई दी।

 

उसने अमन की तरफ देखा।

 

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

 

उसने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए।

 

फिर बंगला धीरे-धीरे जमीन के अंदर धँस गया।

 

सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुंचे तो जंगल के बीच सिर्फ एक खाली मैदान था।

 

न बंगला।

 

न खंडहर।

 

न कुआँ।

 

बस जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

 

अमन ने तस्वीर उठाई।

 

तस्वीर में ठाकुर का परिवार खड़ा था।

 

उनके पीछे अब कोई काली परछाई नहीं थी।

 

लेकिन तस्वीर के एक कोने में अमन और उसके पिता खड़े थे।

 

अमन ने हैरानी से तस्वीर देखी।

 

“ये कैसे…?”

 

समीर ने कुछ नहीं कहा।

 

अमन ने तस्वीर पलट दी।

 

पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“दरवाजा बंद हो गया है… लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।”

 

अमन ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

 

सूरज निकल चुका था।

 

सब कुछ सामान्य लग रहा था।

 

लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

 

उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

 

समीर की भी।

 

फिर अमन ने धीरे से पूछा—

 

“कबीर कहाँ है?”

 

समीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

 

दूर एक पेड़ के नीचे कबीर खड़ा था।

 

वह मुस्कुरा रहा था।

 

अमन ने राहत की सांस ली और उसकी तरफ बढ़ा।

 

लेकिन जैसे ही कबीर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया…

 

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

 

और उसके पीछे जमीन पर पाँच परछाइयाँ खड़ी थीं।

 

तभी जंगल के अंदर से एक धीमी आवाज गूँजी—

 

“एक बंगला खत्म हुआ है… दूसरा अभी बाकी है।”

 

और उसी क्षण दूर किसी अनजान जगह पर…

 

एक पुराने दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

 

किर्रर्र…

 

समाप्त।

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