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पापों का शहर (part -1)

पढ़ने का समय : 4 मिनट

 

 

शहर का नाम था कालपुर।नक्शे पर वह एक छोटा-सा शहर था, लेकिन आसपास के गाँवों में उसके बारे में अजीब-अजीब बातें कही जाती थीं। लोग कहते थे कि कालपुर में रात होने के बाद कोई अकेला बाहर नहीं निकलता।

 

क्योंकि वहाँ रात सिर्फ अँधेरा लेकर नहीं आती थी।

 

वह इंसान के पापों को जगा देती थी।

 

शहर के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी लगी थी। वह घड़ी दिन में ठीक चलती थी, लेकिन रात के बारह बजते ही उसकी सुइयाँ रुक जाती थीं।

 

ठीक बारह बजे।

 

और उसी समय पूरे शहर में एक घंटी बजती थी।

 

टन… टन… टन…

 

कहा जाता था कि घंटी की तेरहवीं आवाज सुनने वाला व्यक्ति अपने जीवन का सबसे बड़ा पाप देख लेता था।

 

इसी शहर में एक रात अर्जुन पहुँचा।

 

अर्जुन पेशे से पत्रकार था। उसे कालपुर में हो रही रहस्यमयी घटनाओं की खबर मिली थी। पिछले छह महीनों में शहर से सात लोग गायब हो चुके थे।

 

अजीब बात यह थी कि उनके घरों के दरवाजे अंदर से बंद मिले थे।

 

किसी घर में चोरी नहीं हुई।

 

किसी घर में संघर्ष के निशान नहीं थे।

 

बस एक चीज हर जगह मिली—

 

काली राख।

 

अर्जुन ने शहर के पुराने होटल में कमरा लिया।

 

होटल का मालिक एक बूढ़ा आदमी था, जिसका नाम गोविंद था।

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“यहाँ लोग गायब क्यों हो रहे हैं?”

 

गोविंद ने उसकी तरफ देखा और धीमे से बोला—

 

“आप बाहर से आए हैं, इसलिए आपको अभी कुछ पता नहीं।”

 

“क्या?”

 

“कालपुर में लोग नहीं गायब होते।”

 

“फिर?”

 

“उनके पाप उन्हें ले जाते हैं।”

 

अर्जुन हँस पड़ा।

 

“मैं भूत-प्रेत की कहानियों पर विश्वास नहीं करता।”

 

गोविंद ने कहा—

 

“कल रात बारह बजे तक कर लीजिएगा।”

 

अर्जुन ने बात को मजाक समझकर छोड़ दिया।

 

रात करीब ग्यारह बजे वह अपने कमरे में बैठकर पुराने दस्तावेज पढ़ रहा था।

 

बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।

 

अचानक दूर से घड़ी की घंटी सुनाई दी।

 

टन…

 

अर्जुन ने घड़ी देखी।

 

12:00 बजे थे।

 

टन…

 

दूसरी घंटी।

 

टन…

 

तीसरी।

 

वह गिनने लगा।

 

आठ…

 

नौ…

 

दस…

 

ग्यारह…

 

बारह…

 

फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

 

अर्जुन ने सोचा कि अब सब खत्म।

 

लेकिन तभी—

 

टन…

 

तेरहवीं घंटी।

 

कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

 

अर्जुन की साँस से धुआँ निकलने लगा।

 

उसके सामने रखा लैपटॉप अपने आप बंद हो गया।

 

फिर कमरे के कोने में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

 

“मुझे बचाओ…”

 

अर्जुन धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा।

 

वहाँ कोई नहीं था।

 

लेकिन दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

 

परछाईं धीरे-धीरे एक आदमी का आकार लेने लगी।

 

अर्जुन पीछे हट गया।

 

तभी परछाईं ने कहा—

 

“तुम सच खोजने आए हो?”

 

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

 

“कौन हो?”

 

परछाईं ने जवाब दिया—

 

“सच से ज्यादा डरावनी चीज यहाँ कुछ नहीं।”

 

अचानक कमरे की दीवार पर कई दृश्य दिखाई देने लगे।

 

एक आदमी पैसे चुरा रहा था।

 

एक महिला किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगा रही थी।

 

एक पुलिस वाला रिश्वत ले रहा था।

 

एक डॉक्टर किसी गरीब मरीज को पैसे के लिए मना कर रहा था।

 

और फिर…

 

अर्जुन ने खुद को देखा।

 

तीन साल पहले की एक घटना।

 

उसके हाथ में एक फाइल थी।

 

उसने एक अपराधी के खिलाफ सबूत छिपा दिए थे।

 

क्योंकि उस अपराधी ने उसे पैसे दिए थे।

 

अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।

 

“नहीं…”

 

परछाईं हँसी।

 

“हर आदमी दूसरों के पाप गिनता है।”

 

“लेकिन अपने?”

 

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

 

जब उसने आँखें खोलीं, कमरा सामान्य था।

 

सुबह होते ही वह होटल से बाहर निकला।

 

लेकिन बाहर का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए।

 

सड़क के बीचोंबीच एक आदमी खड़ा था।

 

वही आदमी जिसे अर्जुन ने रात को दीवार पर देखा था।

 

लेकिन अब वह आदमी असली था।

 

लोग उसके चारों तरफ खड़े थे।

 

अचानक वह आदमी चीखने लगा—

 

“मैंने नहीं किया!”

 

फिर उसके मुँह से खून निकलने लगा।

 

वह जमीन पर गिर पड़ा।

 

लोग पीछे हट गए।

 

और जहाँ वह गिरा था, वहाँ राख का एक काला निशान रह गया।

 

गोविंद अर्जुन के पास आया।

 

“अब समझे?”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“यह कौन था?”

 

गोविंद ने कहा—

 

“शहर का सबसे बड़ा साहूकार।”

 

“उसने क्या किया?”

 

गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

 

“गरीबों की जमीन हड़पता था।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“उसे किसने मारा?”

 

गोविंद ने घड़ी की तरफ देखा।

 

“किसी ने नहीं।”

 

“फिर?”

 

बूढ़े ने धीमे से कहा—

 

“कालपुर ने।”

 

अर्जुन के हाथ में पकड़ी फाइल जमीन पर गिर गई।

 

और उसी समय उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“अभी छह पाप बाकी हैं।”

 

अर्जुन ने पलटकर देखा।

 

वहाँ कोई नहीं था।

 

लेकिन सड़क की दीवार पर काले अक्षरों में लिखा था—

 

“पापों का शहर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

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