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पापों का शहर ( भाग 2 )

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

अर्जुन देर तक सड़क के किनारे खड़ा उस काले निशान को देखता रहा।

 

जिस आदमी की कुछ मिनट पहले मौत हुई थी, उसका शरीर पुलिस ले जा चुकी थी। लेकिन जमीन पर बची राख अभी भी धुआँ दे रही थी।

 

अर्जुन ने झुककर राख को छूना चाहा।

 

“मत छूना।”

 

पीछे से गोविंद की आवाज आई।

 

अर्जुन ने हाथ रोक लिया।

 

“क्यों?”

 

गोविंद ने कहा—

 

“क्योंकि कालपुर में जो राख छोड़कर मरता है, उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।”

 

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

 

“आप आखिर जानते कितना हैं?”

 

गोविंद कुछ देर चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“जितना जानता हूँ, उतना किसी को नहीं जानना चाहिए।”

 

“फिर मुझे बताइए।”

 

“तुम यहाँ से चले जाओ।”

 

“मैं नहीं जाऊँगा।”

 

गोविंद ने गहरी साँस ली।

 

“ठीक है। लेकिन जो देखोगे, उसके बाद शायद तुम खुद जाना चाहोगे।”

 

दोनों होटल के अंदर लौट आए।

 

गोविंद ने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक पुराना लोहे का संदूक खोला।

 

उसमें कई तस्वीरें थीं।

 

हर तस्वीर में एक आदमी या औरत था।

 

कुछ तस्वीरों पर लाल निशान लगा था।

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“ये लोग कौन हैं?”

 

गोविंद बोला—

 

“कालपुर के लोग।”

 

“और ये लाल निशान?”

 

“उनका पाप।”

 

अर्जुन ने एक तस्वीर उठाई।

 

एक आदमी बहुत सम्मानित नेता जैसा दिख रहा था।

 

उसके नीचे लिखा था—

 

“रघुवीर चौहान — झूठ।”

 

दूसरी तस्वीर पर लिखा था—

 

“सावित्री देवी — लालच।”

 

तीसरी पर—

 

“इंस्पेक्टर नरेश — रिश्वत।”

 

अर्जुन की नजर चौथी तस्वीर पर जाकर रुक गई।

 

उसमें एक लड़की थी।

 

लगभग पच्चीस साल की।

 

चेहरा बेहद शांत।

 

नीचे नाम लिखा था—

 

“मीरा — सच।”

 

अर्जुन ने चौंककर पूछा—

 

“यह लड़की कौन है?”

 

गोविंद ने तुरंत तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

 

“इसके बारे में मत पूछो।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि कालपुर की कहानी की शुरुआत इसी से हुई थी।”

 

अर्जुन ने जोर देकर पूछा—

 

“क्या हुआ था इसके साथ?”

 

गोविंद की आँखें भर आईं।

 

“पंद्रह साल पहले मीरा इस शहर में आई थी। वह यहाँ के लोगों के पापों का रिकॉर्ड रखती थी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उसका पिता इस शहर के बड़े लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रहा था।”

 

“फिर?”

 

“एक रात उसका पिता गायब हो गया।”

 

“और मीरा?”

 

“उसने खोज जारी रखी।”

 

गोविंद कुछ पल रुका।

 

“लेकिन एक रात वह भी गायब हो गई।”

 

अर्जुन ने पूछा—

 

“क्या वह भी मर गई?”

 

गोविंद ने सिर हिलाया।

 

“लोग कहते हैं, हाँ।”

 

“लेकिन?”

 

“मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

 

कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

 

तभी होटल के बाहर घड़ी की आवाज आई।

 

टन…

 

अर्जुन ने घड़ी देखी।

 

रात के बारह बजने वाले थे।

 

गोविंद ने तुरंत खिड़की बंद कर दी।

 

“आज बाहर मत जाना।”

 

“क्यों?”

 

“आज दूसरा पाप जागेगा।”

 

घड़ी ने बारह बजाए।

 

टन…

 

पहली घंटी।

 

टन…

 

दूसरी।

 

टन…

 

अर्जुन गिनता रहा।

 

बारहवीं घंटी के बाद सब शांत हो गया।

 

फिर—

 

टन…

 

तेरहवीं घंटी।

 

होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

इस बार आवाज होटल के नीचे से आई।

 

किसी महिला की चीख।

 

“बचाओ!”

 

अर्जुन ने दरवाजा खोला।

 

गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मत जाओ।”

 

“वहाँ कोई है।”

 

“वह कोई इंसान नहीं है।”

 

लेकिन अर्जुन हाथ छुड़ाकर सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

 

होटल का तहखाना वर्षों से बंद था।

 

फिर भी उसका दरवाजा खुला हुआ था।

 

अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

 

दीवारों पर काले हाथों के निशान बने थे।

 

अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी आगे की।

 

एक कमरे के बीचोंबीच एक औरत बैठी थी।

 

वह लगातार रो रही थी।

 

“आप ठीक हैं?”

 

औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

 

उसका चेहरा देखकर अर्जुन पीछे हट गया।

 

उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।

 

वह मुस्कुराई।

 

“तुम मुझे बचाने आए हो?”

 

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

 

औरत ने पूछा—

 

“क्या तुमने कभी किसी निर्दोष को दोषी बनाया है?”

 

अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

उसके सामने दीवार पर दृश्य उभरने लगे।

 

एक अदालत।

 

एक निर्दोष आदमी।

 

और अर्जुन की पुरानी रिपोर्ट।

 

उसकी रिपोर्ट के कारण उस आदमी को जेल हुई थी।

 

अर्जुन ने तब कभी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि वह वास्तव में दोषी था या नहीं।

 

क्योंकि उसे खबर चाहिए थी।

 

सच नहीं।

 

उसने आँखें बंद कर लीं।

 

“मैं गलत था।”

 

औरत की मुस्कान गायब हो गई।

 

“सच बोलना आसान है।”

 

“लेकिन क्या तुम उसका परिणाम सहोगे?”

 

अचानक तहखाने की दीवार पर एक नाम उभरा—

 

“अर्जुन मिश्रा।”

 

और उसके नीचे—

 

“पाप — सच बेचने का।”

 

अर्जुन का शरीर काँपने लगा।

 

तभी गोविंद नीचे पहुँचा।

 

उसने अर्जुन को खींचकर पीछे किया।

 

“इसे मत देखो!”

 

लेकिन देर हो चुकी थी।

 

औरत गायब हो चुकी थी।

 

कमरे के बीच सिर्फ एक पुरानी कुर्सी थी।

 

कुर्सी पर वही लाल डायरी रखी थी।

 

अर्जुन ने डायरी खोली।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“कालपुर में सात पाप हैं।”

 

दूसरे पन्ने पर—

 

“पहला पाप — लालच।”

 

तीसरे पर—

 

“दूसरा पाप — झूठ।”

 

चौथे पन्ने पर—

 

“तीसरा पाप — विश्वासघात।”

 

और आखिरी पन्ने पर—

 

“सातवाँ पाप तुम्हारा है।”

 

अर्जुन ने घबराकर डायरी बंद कर दी।

 

गोविंद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

 

“क्या हुआ?”

 

गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

 

“आप जानते हैं मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

 

बूढ़े ने धीरे से कहा—

 

“हाँ।”

 

“क्या?”

 

गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।

 

“तुम्हारा सातवाँ पाप वह है जिसकी वजह से मीरा गायब हुई थी।”

 

अर्जुन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

 

“मैं मीरा को जानता तक नहीं था।”

 

गोविंद ने कहा—

 

“तुम नहीं जानते।”

 

“लेकिन तुम्हारा परिवार जानता था।”

 

अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

 

गोविंद ने संदूक से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

 

उसके बगल में एक आदमी था।

 

अर्जुन की साँस रुक गई।

 

वह आदमी उसके पिता थे।

 

और तस्वीर के पीछे लिखा था—

 

“जिस सच को तुम्हारे पिता ने दफनाया था, वही अब तुम्हें खोज रहा है।”

 

अचानक होटल के बाहर से जोरदार चीख सुनाई दी।

 

फिर वही तेरहवीं घंटी।

 

गोविंद ने काँपते हुए कहा—

 

“अब तीसरा पाप जाग गया है।”

 

अर्जुन ने खिड़की की तरफ देखा।

 

पूरे शहर की सड़क पर लोग खड़े थे।

 

लेकिन उनके चेहरे नहीं थे।

 

सिर्फ काली, खाली जगह।

 

और उन सबके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

 

मीरा।

 

वह सीधे अर्जुन को देख रही थी।

 

फिर उसने अपने होंठ हिलाए—

 

“अपने पिता से पूछो… मैं मरी कैसे थी।”

 

अचानक सारे चेहरे गायब हो गए।

 

सड़क खाली थी।

 

लेकिन अर्जुन के हाथ में अब एक पुरानी चाबी थी।

 

चाबी पर लिखा था—

 

“कमरा नंबर 13।”

 

और होटल में कमरा नंबर 13 था ही नहीं।

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