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भूत बंगला — पार्ट 4

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

 

अमन की परछाई जमीन पर नहीं थी।

 

वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके सामने समीर और कबीर खड़े थे, लेकिन दोनों की परछाइयाँ जमीन पर साफ दिखाई दे रही थीं।

 

“मेरी परछाई कहाँ गई?” अमन ने कांपती आवाज में पूछा।

 

समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“यहाँ से निकलो! अभी!”

 

तीनों जंगल की तरफ दौड़ने लगे।

 

पीछे बंगला अंधेरे में खड़ा था। उसकी ऊपरी खिड़की में अब कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अमन को ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार उन्हें देख रहा हो।

 

कुछ दूर जाने के बाद वे एक पुराने कुएँ के पास पहुंचे।

 

कुआँ बहुत पुराना था। उसके चारों ओर टूटी हुई पत्थर की दीवार थी और पास ही एक सूखा पेड़ खड़ा था।

 

कबीर वहीं बैठ गया।

 

“अब हम यहाँ से गाँव तक पहुँच सकते हैं।”

 

अमन ने पूछा, “तुम दोनों मुझे उस राघव के बारे में सच क्यों नहीं बता रहे?”

 

समीर और कबीर एक-दूसरे को देखने लगे।

 

आखिर समीर ने कहा—

 

“क्योंकि हमें खुद नहीं पता कि वह राघव था या नहीं।”

 

“मतलब?”

 

कबीर ने धीरे से कहा—

 

“जब हम जंगल में भाग रहे थे, हमें एक आदमी मिला। उसने कहा कि वह राघव है। उसने हमें बताया कि बंगले से बाहर निकलने का रास्ता कुएँ के पीछे से जाता है।”

 

अमन ने पूछा—

 

“फिर?”

 

“हम उसके साथ यहाँ आए। लेकिन अचानक वह गायब हो गया।”

 

अमन ने कुएँ की तरफ देखा।

 

“और तुमने कहा था कि तुमने राघव को कुएँ के पास देखा था?”

 

कबीर ने सिर हिलाया।

 

“हाँ।”

 

तभी कुएँ के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

तीनों चुप हो गए।

 

आवाज फिर आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

जैसे कोई कुएँ की दीवार के अंदर से दरवाजा खटखटा रहा हो।

 

समीर पीछे हट गया।

 

“यहाँ से चलो।”

 

लेकिन अमन कुएँ के पास चला गया।

 

उसे नीचे से किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।

 

“बचाओ…”

 

अमन ने झुककर कुएँ के अंदर देखा।

 

नीचे बहुत गहरा अंधेरा था।

 

फिर अचानक उसे नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

 

राघव का चेहरा।

 

“अमन!”

 

अमन पीछे हट गया।

 

राघव नीचे से चिल्ला रहा था—

 

“मुझे बाहर निकाल!”

 

कबीर ने कहा, “यह वही चाल है। हमें इसे नहीं सुनना चाहिए।”

 

लेकिन अमन को यकीन था कि आवाज असली थी।

 

“अगर वह सच में राघव हुआ तो?”

 

समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“हम रस्सी ढूँढते हैं।”

 

पास ही एक पुरानी रस्सी पड़ी थी। उन्होंने उसे पेड़ से बांधा और अमन नीचे उतरने लगा।

 

जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

 

कुछ ही देर में उसके पैर जमीन पर पहुंच गए।

 

कुएँ के नीचे पानी नहीं था।

 

बल्कि वहाँ एक संकरी सुरंग थी।

 

सुरंग के अंदर दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

 

अमन ने टॉर्च आगे की।

 

दीवार पर खून से लिखा था—

 

“जो अपनी परछाई खो देता है, वह वापस इंसान नहीं बनता।”

 

अमन का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

तभी सुरंग के अंदर से राघव की आवाज आई—

 

“अमन… जल्दी आ।”

 

अमन आवाज की दिशा में बढ़ गया।

 

कुछ कदम बाद उसे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

 

कमरे के बीच में राघव बैठा था।

 

उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

 

अमन दौड़कर उसके पास पहुंचा।

 

“राघव!”

 

राघव ने सिर उठाया।

 

“अमन… तुम आ गए।”

 

अमन ने रस्सी खोलनी शुरू की।

 

तभी राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको।”

 

“क्या हुआ?”

 

राघव ने बहुत डरते हुए कहा—

 

“पहले मेरी परछाई देखो।”

 

अमन ने टॉर्च नीचे की।

 

राघव की परछाई थी।

 

लेकिन वह राघव की तरफ नहीं, बल्कि उल्टी दिशा में बनी हुई थी।

 

अमन पीछे हट गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

राघव मुस्कुराया।

 

“तुमने देर कर दी।”

 

अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

 

राघव का चेहरा बदलने लगा।

 

कुछ ही सेकंड में उसके चेहरे की जगह एक काली, धुंधली आकृति दिखाई देने लगी।

 

अमन चीखकर पीछे भागा।

 

उसी समय ऊपर से समीर की आवाज आई—

 

“अमन! बाहर आओ!”

 

अमन सुरंग की तरफ दौड़ा।

 

लेकिन तभी उसके सामने वही छोटी उम्र का बच्चा खड़ा हो गया।

 

ठाकुर का बेटा।

 

उसने अमन की तरफ देखते हुए कहा—

 

“तुम्हें अपनी परछाई चाहिए?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

बच्चे ने कहा—

 

“तो मेरे साथ आओ।”

 

“कहाँ?”

 

“जहाँ तुम्हारी परछाई कैद है।”

 

बच्चा सुरंग की दूसरी तरफ चल पड़ा।

 

अमन कुछ पल रुका।

 

फिर उसके पीछे चल दिया।

 

सुरंग अचानक एक बड़े कमरे में खुली।

 

कमरे की दीवारों पर दर्जनों पुराने आईने लगे थे।

 

हर आईने में अलग-अलग लोग दिखाई दे रहे थे।

 

कुछ रो रहे थे।

 

कुछ चीख रहे थे।

 

और कुछ बिल्कुल चुप थे।

 

बच्चे ने एक आईने की तरफ इशारा किया।

 

“वहाँ देखो।”

 

अमन ने आईने में देखा।

 

उसमें उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।

 

लेकिन वह अकेली नहीं थी।

 

उसके पीछे एक काली औरत खड़ी थी।

 

अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

 

कोई नहीं था।

 

फिर आईने में मौजूद औरत ने अपना चेहरा अमन के बिल्कुल पास ला दिया।

 

उसने कहा—

 

“तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत पहले बुलाया था।”

 

अमन की आँखें फैल गईं।

 

“मेरी माँ?”

 

औरत हँसी।

 

“तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पिता की मृत्यु दुर्घटना थी?”

 

अमन कुछ बोल नहीं पाया।

 

उसने बचपन से यही सुना था कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में हुई थी।

 

औरत ने कहा—

 

“तुम्हारे पिता इसी बंगले में आए थे।”

 

अमन ने आईने पर हाथ रख दिया।

 

“झूठ!”

 

औरत ने धीरे से कहा—

 

“उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए अपनी परछाई दे दी थी।”

 

अचानक सारे आईने टूटने लगे।

 

छन्न्न्न!

 

बच्चे ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

 

“भागो!”

 

दोनों सुरंग की ओर दौड़े।

 

पीछे से सैकड़ों आवाजें आने लगीं—

 

“अमन…”

 

“अमन…”

 

“अमन…”

 

जैसे पूरा जंगल उसका नाम पुकार रहा हो।

 

अमन कुएँ की तरफ भागा।

 

ऊपर समीर और कबीर उसे खींचने के लिए तैयार थे।

 

लेकिन जैसे ही अमन ऊपर पहुंचा, उसने देखा कि वहाँ केवल समीर खड़ा था।

 

कबीर गायब था।

 

“कबीर कहाँ है?”

 

समीर ने घबराकर कहा—

 

“वह… अभी यहीं था।”

 

तभी कुएँ के अंदर से कबीर की चीख सुनाई दी—

 

“अमन! मुझे बचाओ!”

 

अमन नीचे देखने ही वाला था कि समीर ने उसे रोक लिया।

 

“मत देखना!”

 

“लेकिन वह नीचे है!”

 

समीर ने कांपते हुए कहा—

 

“नहीं… कबीर नीचे नहीं है।”

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

समीर ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई।

 

उसकी आँखें लाल थीं।

 

और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।

 

“क्योंकि कबीर तो…”

 

वह कुछ कह पाता, उससे पहले जंगल में घंटी बजने लगी।

 

टन… टन… टन…

 

बंगले की दिशा से।

 

अमन ने पीछे देखा।

 

दूर अंधेरे में बंगला दिखाई दे रहा था।

 

उसकी सारी खिड़कियों में अब रोशनी जल चुकी थी।

 

और हर खिड़की में एक-एक इंसाàन खड़ा था।

 

कुल मिलाकर पाँच लोग।

 

तभी समीर ने अमन के कान में फुसफुसाया—

 

“अब तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

 

अमन ने पूछा—

 

“कौन-सा कमरा?”

 

समीर मुस्कुराया।

 

“जिसमें तुम्हारे पिता अभी भी जिंदा हैं।”

 

अमन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

 

और उसी पल उसके पीछे जमीन पर उसकी परछाई वापस दिखाई दी।

 

लेकिन…

 

उसकी परछाई के सिर पर दो सींग थे।

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