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मृणालिनी का कमरा (part-2)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था।

 

लकड़ी के पुराने पल्ले की आवाज़ पूरे गलियारे में गूँज रही थी।

 

कrrrr…

 

आरव और कबीर पीछे हट गए।

 

दरवाज़ा पूरी तरह खुला तो अंदर घना अँधेरा दिखाई दिया। आरव ने टॉर्च जलाई, लेकिन रोशनी कुछ ही फीट आगे जाकर जैसे निगल ली गई।

 

“अंदर मत जाना,” कबीर ने कहा।

 

लेकिन आरव के भीतर का जिज्ञासु इंसान डर से ज्यादा ताकतवर था।

 

वह कमरे के अंदर चला गया।

 

कबीर मजबूरी में उसके पीछे आया।

 

कमरा बाकी हवेली से बिल्कुल अलग था। वहाँ धूल तो थी, लेकिन सामान अपनी जगह पर रखा हुआ था। एक पुराना लकड़ी का पलंग, एक मेज, दीवार पर कुछ चित्र और कमरे के कोने में एक छोटी-सी गुड़िया।

 

आरव ने गुड़िया उठाई।

 

उसके कपड़े पुराने थे, लेकिन चेहरे पर धूल नहीं थी।

 

“अजीब है,” आरव ने कहा।

 

तभी कबीर ने दीवार की तरफ इशारा किया।

 

“इधर देख।”

 

दीवार पर दर्जनों तारीखें लिखी थीं।

 

1898…

 

1899…

 

1900…

 

फिर अचानक—

 

1936

 

और उसके बाद कोई तारीख नहीं।

 

आरव ने कैमरा दीवार की ओर किया।

 

“लगता है किसी ने यहाँ साल गिने थे।”

 

कबीर ने पूछा, “किसलिए?”

 

तभी मेज की दराज़ अपने आप खुल गई।

 

दोनों पीछे हट गए।

 

आरव धीरे से मेज के पास गया।

 

दराज़ में एक पुरानी डायरी रखी थी।

 

उसके ऊपर लाल स्याही से लिखा था—

 

“मृणालिनी की डायरी। जिसे पढ़ना नहीं चाहिए।”

 

आरव ने डायरी खोल दी।

 

पहले पन्ने पर लिखा था—

 

“मेरा नाम मृणालिनी है। मैं रुद्रगढ़ की बेटी हूँ। पिता कहते हैं कि यह हवेली हमारे पूर्वजों की शान है। लेकिन मुझे लगता है कि हवेली के अंदर कोई और भी रहता है।”

 

आरव आगे पढ़ता गया।

 

मृणालिनी ने लिखा था कि बचपन से उसे पश्चिमी कमरे से आवाज़ें सुनाई देती थीं। कभी कोई उसे बुलाता था, कभी रोता था। उसके पिता उसे हमेशा उस कमरे से दूर रहने को कहते थे।

 

एक रात उसने देखा कि उसकी माँ आधी रात को पश्चिमी कमरे में गई थी।

 

मृणालिनी उसके पीछे चली गई।

 

कमरे के अंदर उसकी माँ एक पुराने पत्थर के चबूतरे के सामने खड़ी थी।

 

चबूतरे पर एक लोहे का संदूक रखा था।

 

उसकी माँ रो रही थी।

 

मृणालिनी ने पूछा—

 

“माँ, आप यहाँ क्यों आती हैं?”

 

उसकी माँ ने पलटकर कहा—

 

“अगर कभी यह कमरा खुल जाए… तो हवेली छोड़ देना। पीछे मुड़कर मत देखना।”

 

डायरी का अगला पन्ना फटा हुआ था।

 

फिर अगला पन्ना—

 

“आज पिता ने मुझे बताया कि हमारे परिवार ने बहुत बड़ा पाप किया था। उन्होंने कहा कि इस हवेली की जमीन के नीचे एक ऐसी चीज़ दफन है, जिसे बाहर नहीं आना चाहिए।”

 

आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

 

तभी कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।

 

गुड़िया फर्श पर गिर गई।

 

ठक!

 

कबीर ने डरकर पीछे देखा।

 

दरवाज़ा खुला था।

 

लेकिन गलियारे में अब कोई रोशनी नहीं थी।

 

“आरव…”

 

कबीर की आवाज़ काँप रही थी।

 

“क्या?”

 

“दरवाज़े के पास कौन खड़ा है?”

 

आरव ने धीरे से टॉर्च घुमाई।

 

वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

 

सफेद कपड़े।

 

लंबे काले बाल।

 

और झुका हुआ सिर।

 

आरव ने कहा—

 

“मृणालिनी?”

 

बच्ची ने सिर उठाया।

 

उसका चेहरा बहुत पीला था।

 

लेकिन आँखें…

 

आँखें बिल्कुल काली थीं।

 

कबीर चीख पड़ा।

 

बच्ची अचानक पीछे मुड़ी और गलियारे में भाग गई।

 

आरव उसके पीछे दौड़ा।

 

लेकिन गलियारा खाली था।

 

सिर्फ फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।

 

वे निशान सीढ़ियों की ओर जा रहे थे।

 

आरव नीचे पहुँचा तो उसे हरिदास दिखाई दिया।

 

बूढ़ा हवेली के आँगन में खड़ा था।

 

उसने आरव को देखते ही कहा—

 

“तुमने दरवाज़ा खोल दिया।”

 

आरव ने गुस्से में पूछा—

 

“आपको सब पता था?”

 

हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

 

“हाँ।”

 

“मृणालिनी कौन है?”

 

हरिदास कुछ देर चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“मृणालिनी इस हवेली की बेटी थी। लेकिन उसकी मौत अस्सी साल पहले नहीं हुई थी।”

 

आरव चौंका।

 

“तो?”

 

हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

 

“वह मरी थी… लेकिन उसकी आत्मा नहीं।”

 

कबीर ने पूछा, “उसके साथ क्या हुआ था?”

 

हरिदास ने धीमे स्वर में कहा—

 

“1936 में रुद्रगढ़ परिवार ने एक अनुष्ठान किया था। उनका विश्वास था कि हवेली के नीचे दबे खजाने की रक्षा एक अदृश्य शक्ति करती है। उस शक्ति को शांत करने के लिए परिवार ने अपनी ही बेटी को बलि के लिए चुना।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

“मृणालिनी को उसी पश्चिमी कमरे में बंद कर दिया गया था।”

 

आरव ने काँपते हुए पूछा—

 

“फिर?”

 

“तीन दिन बाद दरवाज़ा खोला गया। अंदर लड़की नहीं थी। सिर्फ उसकी चूड़ियाँ थीं… और दीवार पर खून से लिखा था—”

 

हरिदास रुक गया।

 

“क्या लिखा था?”

 

बूढ़े ने आरव की आँखों में देखते हुए कहा—

 

“मैं अकेली नहीं मरूँगी।”

 

उसी समय हवेली की ऊपरी मंज़िल से जोरदार चीख सुनाई दी।

 

तीनों ने ऊपर देखा।

 

पश्चिमी कमरे की खिड़की में वही बच्ची खड़ी थी।

 

उसने हाथ में कुछ पकड़ा हुआ था।

 

आरव ने कैमरे का ज़ूम बढ़ाया।

 

वह एक पुरानी तस्वीर थी।

 

तस्वीर में मृणालिनी खड़ी थी।

 

उसके साथ एक आदमी था।

 

हरिदास का चेहरा देखकर आरव समझ गया कि कुछ बहुत गलत था।

 

क्योंकि तस्वीर में वह आदमी…

 

हरिदास था।

 

लेकिन तस्वीर के नीचे साल लिखा था—

 

1936।

 

आरव ने घबराकर बूढ़े की ओर देखा।

 

“आप… तब भी जिंदा थे?”

 

हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आ गई।

 

और फिर उसने कहा—

 

“मैंने कहा था ना… हवेली कहानी नहीं सुनाती। वह अपने कैदियों की तलाश करती है।”

 

अचानक आरव के पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

हरिदास गायब था।

 

और पश्चिमी कमरे से फिर वही बच्ची की आवाज़ आई—

 

“अब तीसरा कौन होगा?”

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