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बंद दरवाज़ा (part-1)

पढ़ने का समय : 5 मिनट

 

 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव बरुआ के बाहर, घने पीपल और बरगद के पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। गाँव वाले उसे रुद्रगढ़ हवेली कहते थे। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी वह हवेली अब खंडहर में बदल चुकी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी, छत का एक हिस्सा टूट चुका था और लकड़ी के दरवाज़े इतने पुराने हो चुके थे कि हवा चलने पर अपने आप कराहने लगते थे।

 

लेकिन हवेली की सबसे डरावनी बात उसका उजाड़ होना नहीं था।

 

उसका सबसे डरावना रहस्य था—पश्चिमी कमरे का बंद दरवाज़ा।

 

कहा जाता था कि उस कमरे को पिछले अस्सी वर्षों से किसी ने नहीं खोला था।

 

गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि आधी रात के बाद उस कमरे के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी। कभी-कभी खिड़की पर किसी बूढ़ी औरत की परछाईं दिखाई देती थी। और जो भी उस कमरे का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करता, वह अगले दिन गाँव छोड़कर चला जाता।

 

इन बातों को सुनकर शहर में रहने वाला आरव हमेशा हँसता था।

 

आरव पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक धरोहरों पर डॉक्यूमेंट्री बनाता था। जब उसके दादा की मृत्यु के बाद उसे पता चला कि रुद्रगढ़ हवेली उसकी पुश्तैनी संपत्ति है, तो उसने फैसला किया कि वह गाँव जाकर हवेली की हालत देखेगा।

 

उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी आया।

 

शाम के करीब चार बजे दोनों हवेली के सामने खड़े थे।

 

“यार, तू सच में यहाँ रात बिताने वाला है?” कबीर ने टूटी हुई दीवार को देखते हुए पूछा।

 

आरव मुस्कुराया।

 

“यही तो मज़ा है। ऐसी जगहों की कहानी रिकॉर्ड करनी चाहिए।”

 

तभी पीछे से एक बूढ़ी आवाज़ आई।

 

“कहानी रिकॉर्ड करने आए हो… या अपनी कहानी लिखवाने?”

 

दोनों ने पलटकर देखा।

 

एक बूढ़ा आदमी हाथ में लकड़ी की छड़ी लिए खड़ा था। उसका नाम हरिदास था। गाँव में लोग उसे हवेली का आखिरी रखवाला कहते थे।

 

आरव ने नमस्ते की।

 

“आपको हमारे आने का पता था?”

 

हरिदास ने हवेली की तरफ देखा।

 

“जिसे हवेली बुलाती है, उसके आने का पता सबको चल जाता है।”

 

कबीर हँस पड़ा।

 

“बाबा, आप भी गाँव वालों की तरह डरावनी बातें करते हैं?”

 

हरिदास ने उसकी ओर देखा।

 

“डरावनी बातें मैं नहीं करता बेटा। हवेली करती है।”

 

उसकी आवाज़ में ऐसी गंभीरता थी कि कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

 

हरिदास ने उन्हें हवेली की चाबी दी।

 

“ऊपर के कमरों में जा सकते हो। आँगन देख सकते हो। पुराने कागज़ भी मिल जाएँगे। लेकिन पश्चिमी हिस्से में मत जाना।”

 

आरव ने तुरंत पूछा, “क्यों?”

 

बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा—

 

“क्योंकि वहाँ जो बंद है… वह दरवाज़ा नहीं है।”

 

इतना कहकर वह चला गया।

 

आरव और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

 

“क्या मतलब था उसका?” कबीर ने पूछा।

 

“बूढ़े लोग रहस्य बनाए बिना नहीं रह सकते,” आरव ने कहा।

 

दोनों अंदर चले गए।

 

हवेली के भीतर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ तस्वीरों में रुद्रगढ़ परिवार के लोग दिखाई दे रहे थे। एक तस्वीर में लगभग दस साल की लड़की खड़ी थी।

 

उसकी आँखें बेहद अजीब थीं।

 

ऐसा लगता था जैसे वह तस्वीर से बाहर निकलकर उन्हें देख रही हो।

 

आरव ने कैमरा निकाला और तस्वीर रिकॉर्ड करने लगा।

 

तभी कबीर ने कहा—

 

“आरव… ये लड़की कौन है?”

 

तस्वीर के नीचे लिखा था—

 

“मृणालिनी देवी — 1891”

 

आरव ने मोबाइल से फोटो खींची।

 

“शायद हवेली के मालिक की बेटी थी।”

 

दोनों आगे बढ़ गए।

 

रात होने लगी।

 

करीब साढ़े दस बजे वे नीचे वाले बड़े कमरे में बैठे खाना खा रहे थे। अचानक ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

 

धड़ाम!

 

कबीर ने चौंककर आरव को देखा।

 

“ऊपर कोई है?”

 

आरव ने टॉर्च उठाई।

 

दोनों सीढ़ियों से ऊपर गए।

 

ऊपर पहुँचते ही उन्हें लंबा गलियारा दिखाई दिया।

 

गलियारे के अंत में एक बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा था।

 

दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

 

आरव रुक गया।

 

“यही पश्चिमी कमरा होगा।”

 

तभी अंदर से बहुत हल्की आवाज़ आई।

 

टक… टक… टक…

 

किसी ने दरवाज़े पर तीन बार दस्तक दी।

 

कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

 

“चल वापस चलते हैं।”

 

आरव ने कुछ नहीं कहा।

 

फिर अंदर से आवाज़ आई—

 

“आरव…”

 

दोनों के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

 

कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

 

“इसने तेरा नाम कैसे लिया?”

 

आरव के हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई।

 

अंदर से फिर वही आवाज़ आई।

 

इस बार थोड़ी स्पष्ट—

 

“आरव… दरवाज़ा खोलो…”

 

आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

 

उसने जंजीर को छुआ।

 

तभी अचानक पीछे से किसी के भागने की आवाज़ आई।

 

दोनों पलटे।

 

गलियारा खाली था।

 

लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

 

वे निशान गलियारे से आते हुए सीधे बंद दरवाज़े तक जा रहे थे।

 

और फिर…

 

दरवाज़े के नीचे से एक कागज़ बाहर सरक आया।

 

आरव ने काँपते हाथों से कागज़ उठाया।

 

उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“जिसे तुम धरोहर समझ रहे हो, वह असल में कैद है।”

 

आरव ने कागज़ को देखा।

 

और उसी क्षण पश्चिमी कमरे के अंदर से एक बच्ची के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

 

कबीर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“हमें यहाँ से जाना होगा। अभी।”

 

लेकिन आरव की नज़र दरवाज़े पर थी।

 

क्योंकि जंजीर अपने आप धीरे-धीरे खुल रही थी।

 

छन्न…

 

और दरवाज़ा…

 

अंदर की तरफ खुलने लगा।

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