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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 13

पढ़ने का समय : 10 मिनट

एपिसोड – 13 : वो राज़ जो दस साल से दफन था

 

दरवाजे पर खड़ा वह आदमी लगातार मुस्कुरा रहा था।

 

उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो कुछ देर पहले नंदिनी के लॉकर से मिला था।

 

आरोही की नजर उस लॉकेट पर टिक गई।

 

उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

 

“तुम…?”

 

आरव भी उसे देखकर हैरान था।

 

“तुम यहां कैसे आए?”

 

वो आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।

 

“जिस सच की तलाश में तुम दोनों इतने दिनों से भटक रहे हो, शायद अब वो सच खुद तुम्हारे सामने आ गया है।”

 

कबीर ने तुरंत दरवाजे की तरफ देखा।

 

“तुम अकेले आए हो?”

 

वह आदमी हंस पड़ा।

 

“अगर अकेला होता, तो तुम तीनों इतनी आसानी से मुझसे सवाल नहीं कर रहे होते।”

 

आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।

 

“मेरी मां कहां है?”

 

आदमी का चेहरा गंभीर हो गया।

 

“जिसे तुम मां कहते हो, वो सुरक्षित है।”

 

आरोही ने गुस्से में कहा,

 

“अगर उन्हें कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं।”

 

आदमी ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

 

आरोही ठिठक गई।

 

“तुम नंदिनी को जानते थे?”

 

“बहुत अच्छी तरह।”

 

“तो फिर बताओ, मेरी मां की मौत कैसे हुई?”

 

आदमी ने लॉकेट मेज पर रख दिया।

 

“यही जानने के लिए तो तुम्हें यहां लाया गया है।”

 

आरव ने गुस्से में पूछा,

 

“तुम्हें क्या चाहिए?”

 

“मुझे?”

 

वह हल्का सा मुस्कुराया।

 

“मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ वो चाहिए जो तुम्हारे पिता ने छुपाकर रखा था।”

 

आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

 

“क्या?”

 

“एक फाइल।”

 

“कौन-सी फाइल?”

 

“वही… जिसके अंदर तुम्हारे दोनों परिवारों को खत्म कर देने वाला सच है।”

 

कबीर ने ध्यान से उसे देखा।

 

“तुम्हारा नाम क्या है?”

 

वह कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“अद्वैत।”

 

आरव चौंका।

 

“अद्वैत…?”

 

अद्वैत ने सिर हिलाया।

 

“हां। अद्वैत मल्होत्रा।”

 

आरोही ने तुरंत पूछा,

 

“मल्होत्रा?”

 

“हां।”

 

कबीर ने धीरे से कहा,

 

“समीर मल्होत्रा का बेटा?”

 

अद्वैत मुस्कुराया।

 

“आखिर किसी को याद तो आया।”

 

आरोही पीछे हट गई।

 

“तो तुम समीर के बेटे हो?”

 

“हां।”

 

आरव ने कहा,

 

“लेकिन तुम्हारे पिता तो इस पूरे मामले में शामिल बताए जा रहे हैं।”

 

अद्वैत की आंखों में दर्द उतर आया।

 

“मेरे पिता?”

 

वह हंस पड़ा।

 

“तुम्हें सच में लगता है कि मेरे पिता इस सबके मास्टरमाइंड हैं?”

 

“तो कौन है?”

 

अद्वैत ने जवाब देने के बजाय जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

 

तस्वीर में राजवीर, विनय, नंदिनी और समीर एक साथ खड़े थे।

 

लेकिन पीछे एक छोटा बच्चा भी दिखाई दे रहा था।

 

आरोही ने तस्वीर को गौर से देखा।

 

“ये बच्चा कौन है?”

 

अद्वैत ने कहा,

 

“मैं।”

 

आरव ने तस्वीर उसके हाथ से ली।

 

“लेकिन तुम तो उस समय बहुत छोटे रहे होंगे।”

 

“हां।”

 

“फिर तुम्हें ये सब कैसे पता?”

 

अद्वैत की आवाज धीमी हो गई।

 

“क्योंकि मेरे पिता ने मरने से पहले मुझे सब बता दिया था।”

 

कबीर ने पूछा,

 

“समीर की मौत?”

 

अद्वैत ने सिर हिलाया।

 

“मेरे पिता की मौत भी उसी खेल का हिस्सा थी।”

 

अद्वैत ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया।

 

“दस साल पहले की वो रात सिर्फ तुम्हारे पिता की जिंदगी खत्म होने की रात नहीं थी।”

 

उसने आरोही की तरफ देखा।

 

“उस रात मेरी जिंदगी भी खत्म हो गई थी।”

 

आरोही की आंखें नम हो गईं।

 

“कैसे?”

 

“मेरे पिता ने मुझे घर से बाहर भेज दिया था।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ लोग उन्हें मारने आने वाले हैं।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन लोग?”

 

“वही लोग जो आज भी तुम्हारा पीछा कर रहे हैं।”

 

“विराज?”

 

अद्वैत ने सिर हिलाया।

 

“विराज सिर्फ एक नाम था।”

 

आरव चौंका।

 

“फिर असली आदमी कौन था?”

 

अद्वैत ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“तुम्हारे पिता के सबसे करीब रहने वाला इंसान।”

 

आरव के चेहरे पर तनाव आ गया।

 

“समीर?”

 

“नहीं।”

 

“फिर?”

 

अद्वैत ने जवाब नहीं दिया।

 

आरोही ने बेचैनी से पूछा,

 

“तुम बार-बार यही क्यों कह रहे हो कि समीर दोषी नहीं है?”

 

अद्वैत ने कहा,

 

“क्योंकि मेरे पिता ने आखिरी वक्त में यही कहा था।”

 

उसने जेब से एक छोटी रिकॉर्डिंग डिवाइस निकाली।

 

“उन्होंने अपनी मौत से पहले इसे रिकॉर्ड किया था।”

 

आरव ने तुरंत पूछा,

 

“क्या इसमें उस आदमी का नाम है?”

 

“शायद।”

 

अद्वैत ने रिकॉर्डिंग चला दी।

 

कुछ सेकंड तक सिर्फ सांसों की आवाज सुनाई दी।

 

फिर समीर की आवाज आई “अगर अद्वैत ये रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो समझ लेना कि मैं उसे बचा नहीं पाया।”

 

अद्वैत की आंखें भर आईं।

 

रिकॉर्डिंग आगे चली।

 

“मैंने जो कुछ किया, वो अपने बेटे और नंदिनी की बेटी को बचाने के लिए किया।”

 

आरोही की आंखें फैल गईं।

 

“मेरे लिए?”

 

रिकॉर्डिंग में समीर बोले “लेकिन जिस इंसान ने ये सब शुरू किया है, वो आज भी जिंदा है।”

 

फिर अचानक रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

 

अद्वैत ने सिर झुका लिया।

 

आरव ने पूछा,

 

“आगे की रिकॉर्डिंग?”

 

“नष्ट कर दी गई।”

 

“किसने?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरोही ने अचानक पूछा,

 

“मेरी मां कहां हैं?”

 

अद्वैत ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारी मां सुरक्षित हैं।”

 

“मैं उनसे मिलना चाहती हूं।”

 

“अभी नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि अगर तुम उनसे मिलीं, तो तुम्हारी मां तुम्हें वो सच बता देंगी जिसे सुनने के बाद शायद तुम मुझ पर भी भरोसा नहीं करोगी।”

 

आरोही ने गुस्से में कहा,

 

“मुझे किसी पर भरोसा नहीं करना।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“आरोही।”

 

“नहीं आरव। हर कोई मुझसे कुछ ना कुछ छुपा रहा है।”

 

उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“पहले पापा… फिर मां… अब तुम भी शायद कुछ छुपा रहे हो।”

 

आरव का चेहरा बदल गया।

 

“मैं?”

 

“हां।”

 

“मैंने तुमसे क्या छुपाया?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरव उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

 

“मैंने तुमसे सिर्फ एक बात छुपाई थी।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

आरव ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला।

 

“मुझे ये तीन दिन पहले मिला था।”

 

आरोही ने कागज लिया।

 

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

 

“अगर आरोही को सच्चाई बताओगे, तो उसकी जान चली जाएगी।”

 

आरोही की आंखें भर आईं।

 

“तुमने मुझे ये क्यों नहीं बताया?”

 

“क्योंकि मैं डर गया था।”

 

“तुम?”

 

“हां।”

 

आरव ने पहली बार अपनी कमजोरी स्वीकार की।

 

“मुझे डर था कि तुम्हें खो दूंगा।”

 

आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

 

फिर धीरे से बोली,

 

“मुझे सच से ज्यादा तुम्हारा झूठ डराता है।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“अब कुछ नहीं छुपाऊंगा।”

 

आरोही ने सिर हिला दिया।

 

“वादा?”

 

“वादा।”

 

तभी अद्वैत का फोन बजा।

 

उसने फोन उठाया।

 

दूसरी तरफ से किसी ने कुछ कहा।

 

उसका चेहरा तुरंत बदल गया।

 

“क्या?”

 

कुछ सेकंड बाद उसने फोन काट दिया।

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

अद्वैत ने कहा,

 

“तुम्हारी मां…”

 

आरोही का दिल धड़क उठा।

 

“क्या हुआ मां को?”

 

“उन्हें दूसरी जगह ले जाया गया है।”

 

“कहां?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरोही ने घबराकर कहा,

 

“तुमने कहा था कि वो सुरक्षित हैं।”

 

“थीं।”

 

“अब?”

 

अद्वैत चुप रहा।

 

आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

 

आरव ने कहा,

 

“अभी।”

 

कबीर ने अपना लैपटॉप निकाला।

 

“मैं उनका फोन ट्रैक करने की कोशिश करता हूं।”

 

कुछ मिनट बाद लोकेशन सामने आई।

 

कबीर ने कहा,

 

“पुराना मिल गोदाम।”

 

आरव ने तुरंत कहा,

 

“चलो।”

 

रात के करीब ग्यारह बजे चारों पुराने मिल गोदाम पहुंचे।

 

चारों तरफ अंधेरा था।

 

आरोही की धड़कन तेज थी।

 

आरव ने उसे पीछे रहने को कहा।

 

“तुम मेरे साथ रहोगी।”

 

“हां।”

 

अंदर से आवाजें आ रही थीं।

 

एक आदमी कह रहा था,

 

“फाइल कहां है?”

 

दूसरी आवाज आरोही की मां की थी।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

“झूठ बोल रही हो।”

 

“मुझे सच में नहीं पता।”

 

आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मां!”

 

वह आगे बढ़ने लगी।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“रुको।”

 

लेकिन तभी अंदर से गोली चलने की आवाज आई।

 

धांय!

 

आरोही चीख पड़ी।

 

“मां!”

 

वह आरव का हाथ छुड़ाकर अंदर दौड़ गई।

 

कमरे में उसकी मां जमीन पर बैठी थीं।

 

उनके पास खून था…

 

लेकिन उन्हें गोली नहीं लगी थी।

 

गोली उनके पीछे रखी लकड़ी की मेज में लगी थी।

 

सामने एक आदमी बंदूक लिए खड़ा था।

 

आरव ने उसे देखते ही कहा “समीर!”

 

समीर ने बंदूक नीचे कर दी।

 

उसकी आंखों में थकान थी।

 

“आखिर तुम यहां पहुंच ही गए।”

 

आरोही अपनी मां के पास बैठ गई।

 

“मां!”

 

मां ने उसे गले लगा लिया।

 

“तुम यहां क्यों आई?”

 

“आपको लेने।”

 

समीर ने कहा,

 

“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

 

आरव ने गुस्से में पूछा,

 

“तुमने इन्हें यहां क्यों लाया?”

 

समीर ने कहा,

 

“क्योंकि मुझे इन्हें बचाना था।”

 

आरव ने व्यंग्य से कहा,

 

“बचाना?”

 

“हां।”

 

“तुम पर इतना भरोसा कैसे करें?”

 

समीर ने कुछ पल उसे देखा।

 

फिर अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

 

“क्योंकि मैं तुम्हारे पिता का कातिल नहीं हूं।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“तो कौन है?”

 

समीर ने जवाब देने से पहले चारों तरफ देखा।

 

फिर धीरे से कहा “तुम्हारे पिता को मारने का आदेश… तुम्हारे पिता के अपने ही घर से गया था।”

 

आरव का चेहरा सख्त हो गया।

 

“क्या मतलब?”

 

समीर ने उसकी तरफ देखा।

 

“जिसे तुम अपने परिवार का हिस्सा समझते हो… वही असली गद्दार है।”

 

आरोही ने मां की तरफ देखा।

 

मां की आंखों में डर था।

 

समीर ने कहा,

 

“और वो इंसान आज भी तुम्हारे बहुत करीब है।”

 

तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।

 

सबने पलटकर देखा।

 

अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

 

उसका चेहरा रोशनी में आया।

 

आरव उसे देखते ही स्तब्ध रह गया।

 

आरोही के मुंह से चीख निकल गई “चाचा!”

 

वह आदमी मुस्कुराया।

 

“बहुत साल हो गए, बच्चों।”

 

आरव ने अविश्वास से कहा,

 

“आप?”

 

समीर ने धीरे से कहा “यही है वो आदमी… जिसने दस साल पहले सब कुछ शुरू किया था।”

 

आरोही के चाचा की मुस्कान और गहरी हो गई।

 

“अब तुम दोनों बड़े हो गए हो।”

 

उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

 

“और अब वक्त आ गया है कि तुम्हें पता चले… तुम्हारे पिता की मौत क्यों हुई थी।”

 

आरव उसकी तरफ बढ़ा।

 

“अगर तुम्हें लगता है कि हम डर जाएंगे, तो तुम गलत हो।”

 

चाचा ने कहा,

 

“डरना तुम्हें नहीं चाहिए, आरव।”

 

फिर उसने आरोही की तरफ देखा।

 

“क्योंकि असली खतरा तुम्हारी जिंदगी में नहीं… तुम्हारे खून में है।”

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“मेरे खून में?”

 

चाचा मुस्कुराया।

 

“हां।”

 

उसने कागज आरोही की तरफ बढ़ाया।

 

“इसे पढ़ो।”

 

आरोही ने कांपते हाथों से कागज लिया।

 

पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें फैल गईं।

 

उस पर लिखा था “आरोही मेहरा, असल में विनय मेहरा की बेटी नहीं है।”

 

आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

और उसी पल…

 

उनकी पूरी कहानी का सबसे बड़ा राज उनके सामने खड़ा था।

 

जारी रहेगा…

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