एपिसोड – 12 : अपनों के बीच छिपा गद्दार
नंदिनी के पत्र में लिखा नाम देखकर आरव और आरोही दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ गईं।
कुछ पल तक किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि उन्होंने जो पढ़ा था, वो सच हो सकता है।
आरोही की उंगलियां कांप रही थीं।
उसने धीरे से कहा,
“नहीं… ये नहीं हो सकता।”
आरव ने पत्र दोबारा पढ़ा।
उसमें साफ लिखा था “जिस इंसान पर तुम्हारे पिता और राजवीर ने सबसे ज्यादा भरोसा किया, वही इस पूरे खेल का असली हिस्सा है।”
और नीचे एक नाम था “समीर मल्होत्रा।”
आरव ने तुरंत सिर उठाया।
“समीर अंकल?”
आरोही ने उसे देखा।
“वो तो पापा के सबसे करीबी दोस्त थे।”
कबीर ने कहा,
“और राजवीर सर के बिजनेस पार्टनर भी।”
आरव ने पत्र को मुट्ठी में कस लिया।
“इसका मतलब ये हो ही नहीं सकता।”
आरोही की आंखों में आंसू थे।
“मेरे पापा उन्हें अपने भाई जैसा मानते थे।”
कबीर ने गंभीर आवाज में कहा,
“हो सकता है नंदिनी जी ने भी यही समझा हो कि वो भरोसे के लायक हैं। लेकिन हमें बिना जांचे किसी को दोषी नहीं मानना चाहिए।”
आरव ने सिर हिलाया।
“सही कह रहे हो।”
आरोही ने पत्र वापस बॉक्स में रख दिया।
तभी उसकी नजर बॉक्स में पड़े छोटे से लॉकेट पर गई।
उसने उसे उठाया।
“ये मां का है।”
आरव ने पूछा,
“तुम्हें कैसे पता?”
“बचपन से मैंने मां के पुराने सामान में ऐसा ही लॉकेट देखा था।”
उसने लॉकेट खोला।
अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।
तस्वीर देखकर आरोही की सांस अटक गई।
उसमें नंदिनी और समीर साथ खड़े थे।
लेकिन तस्वीर के पीछे एक तारीख लिखी थी “उस रात से एक दिन पहले।”
आरव ने तस्वीर हाथ में ली।
“उस रात से एक दिन पहले… यानी पापा की मौत से ठीक एक दिन पहले।”
कबीर ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
“इस तस्वीर के पीछे कुछ और लिखा है।”
बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था “अगर समीर ने धोखा दिया, तो M-17 के नीचे जाना।”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने तुरंत कहा,
“हमें वापस वहीं जाना होगा।”
शाम होते-होते तीनों फिर उसी पुराने रिकॉर्ड रूम में पहुंच गए।
हरिशंकर भी उनके साथ थे।
आरव ने उनसे पूछा,
“आपको M-17 के नीचे किसी रास्ते के बारे में पता है?”
हरिशंकर कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“हां।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“आपने हमें पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि वहां जाना खतरे से खाली नहीं है।”
आरव ने कहा,
“अब पीछे हटने का वक्त नहीं है।”
हरिशंकर उन्हें कमरे के पीछे बने एक पुराने गलियारे में ले गए।
कुछ दूर चलने के बाद फर्श पर लोहे की एक प्लेट दिखाई दी।
हरिशंकर ने उसे हटाया।
नीचे सीढ़ियां थीं।
आरोही ने डरते हुए आरव का हाथ पकड़ लिया।
“क्या हमें नीचे जाना चाहिए?”
आरव ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा,
“अगर तुम नहीं जाना चाहती तो हम वापस जा सकते हैं।”
आरोही ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“पक्का?”
“हां। मैं अपने पापा के लिए सच जानना चाहती हूं।”
आरव ने उसका हाथ और मजबूती से पकड़ लिया।
“तो चलो।”
दोनों नीचे उतरने लगे।
कबीर पीछे था।
हरिशंकर सबसे अंत में।
नीचे एक पुराना कमरा था।
दीवारों पर धूल जमी थी।
बीच में लोहे की अलमारी थी।
आरव ने उस पर हाथ रखा।
“ये वही जगह है?”
हरिशंकर ने कहा,
“हां।”
“यहां क्या रखा था?”
“तुम्हारे पिता और विनय साहब ने कई दस्तावेज यहां छुपाए थे।”
आरव ने अलमारी खोली।
अंदर कई फाइलें थीं।
एक फाइल पर लिखा था “समीर मल्होत्रा।”
आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।
आरव ने फाइल खोली।
पहले पन्ने पर बैंक लेन-देन की जानकारी थी।
दूसरे पन्ने पर कंपनी के कागजात।
तीसरे पन्ने पर कुछ हस्ताक्षर।
कबीर ने कहा,
“ये देखो।”
एक दस्तावेज में समीर ने करोड़ों रुपये की रकम एक विदेशी खाते में ट्रांसफर की थी।
आरव की आंखें फैल गईं।
“तो ये सच है।”
आरोही ने धीरे से कहा,
“लेकिन क्यों?”
कबीर ने अगला पन्ना निकाला।
उसमें लिखा था “समीर ने विक्रम के साथ मिलकर कंपनी के पैसे बाहर भेजे।”
आरोही ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
“पापा को ये सब पता चल गया था।”
आरव ने कहा,
“और शायद इसी वजह से उन्हें मार दिया गया।”
तभी हरिशंकर ने कहा,
“नहीं।”
सबने उनकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
हरिशंकर ने कहा,
“विनय साहब की मौत के समय समीर वहां नहीं था।”
आरव चौंक गया।
“आपने देखा था?”
“हां।”
“तो फिर?”
हरिशंकर ने एक और फाइल निकाली।
उस पर लिखा था “असली हत्यारा।”
आरोही की सांस रुक गई।
“इसमें क्या है?”
हरिशंकर ने फाइल खोलने से पहले कहा,
“इसे पढ़ने के बाद तुम्हें अपनी मां पर भी शक हो सकता है।”
आरोही ने दृढ़ आवाज में कहा,
“अब मुझे किसी से डर नहीं लगता।”
फाइल खुली।
अंदर एक तस्वीर थी।
एक अस्पताल की।
तस्वीर में नंदिनी किसी आदमी से बात कर रही थीं।
आरव ने तस्वीर गौर से देखी।
“ये आदमी कौन है?”
हरिशंकर ने कहा,
“वही जो उस रात अस्पताल में आया था।”
कबीर ने तस्वीर को बड़ा किया।
अचानक उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।
“मैं इसे जानता हूं।”
आरव ने पूछा,
“कौन?”
“ये आदमी… समीर का भाई है।”
आरोही ने तुरंत कहा,
“लेकिन नंदिनी मां की मौत तो विराज के आदमियों ने करवाई थी!”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“यही बात झूठ थी।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“किसने झूठ बोला?”
हरिशंकर ने धीरे से कहा,
“तुम्हारे पिता ने।”
आरव ने हैरानी से पूछा,
“विनय ने?”
“हां।”
आरोही को जैसे झटका लगा।
“पापा ने मां की मौत का सच क्यों छुपाया?”
हरिशंकर ने कहा,
“क्योंकि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।”
“फिर?”
“उन्हें जहर दिया गया था।”
आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।
“किसने?”
हरिशंकर चुप रहे।
आरव ने कहा,
“बोलिए।”
उन्होंने धीरे से कहा “समीर मल्होत्रा ने।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
“तो पापा ने उसे पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया?”
हरिशंकर ने जवाब दिया,
“क्योंकि समीर के पास तुम्हारी जान से जुड़ा राज था।”
“कैसा राज?”
हरिशंकर ने कहा,
“वो जानता था कि तुम नंदिनी की बेटी हो।”
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“इसमें क्या बड़ी बात थी?”
“बड़ी बात ये थी कि नंदिनी ने मरने से पहले समीर के खिलाफ सबूत तैयार कर लिए थे।”
आरव ने पूछा,
“वो सबूत कहां हैं?”
हरिशंकर ने कहा,
“तुम्हारे पिता के पास।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“लेकिन वो सबूत तो…”
हरिशंकर ने कहा,
“तुम्हारे पिता की मौत के बाद गायब हो गए।”
उधर उसी समय…
आरोही की मां अपने कमरे में अकेली बैठी थीं।
उनके हाथ में एक पुराना फोन था।
उन्होंने किसी नंबर पर कॉल किया।
“हमें सब पता चल चुका है।”
दूसरी तरफ से आवाज आई “उन्हें कितना पता है?”
मां ने कहा,
“समीर का नाम।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर आवाज आई “तो अब समय आ गया है।”
मां की आंखों में डर उतर आया।
“नहीं। आरोही को कुछ नहीं होना चाहिए।”
दूसरी तरफ से हंसी सुनाई दी।
“अगर तुमने हमारा साथ नहीं दिया तो सबसे पहले उसी को नुकसान होगा।”
मां ने आंखें बंद कर लीं।
“मैं तुम्हारा काम करूंगी।”
“याद रखना… एक गलती और तुम्हारी बेटी खत्म।”
फोन कट गया।
मां ने फोन नीचे रखा।
उनकी आंखों से आंसू निकल आए।
“मुझे माफ करना बेटी।”
आरव, आरोही और कबीर बाहर निकले।
आरोही बहुत शांत थी।
आरव ने पूछा,
“तुम ठीक हो?”
“नहीं।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“जो कुछ भी जान रही हूं… उससे मुझे लगता है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”
आरव ने कार रोक दी।
“मेरी तरफ देखो।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी जिंदगी झूठ नहीं थी।”
“कैसे?”
“तुम्हारी मां ने तुम्हें पाला। उन्होंने तुम्हें प्यार किया। तुम्हारे पापा ने तुम्हें बचाया। और तुमने मुझे बचपन से लेकर आज तक जो प्यार दिया… वो सच है।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“और तुम?”
“मैं?”
“तुम्हारा मेरे लिए क्या है?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर उसके करीब आकर बोला,
“तुम मेरी वो कहानी हो जिसे मैं खत्म नहीं होने दूंगा।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें जितने भी जवाब चाहिए, हम मिलकर ढूंढेंगे।”
आरोही ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।
कुछ पल के लिए दोनों दुनिया की सारी परेशानियां भूल गए।
लेकिन तभी…
कबीर ने पीछे से आवाज लगाई “आरव!”
दोनों ने पीछे देखा।
कबीर सड़क के किनारे खड़ा था।
उसके हाथ में एक पुराना लिफाफा था।
“ये मुझे कार के नीचे मिला।”
आरव ने लिफाफा खोला।
अंदर एक छोटी पर्ची थी।
उस पर लिखा था “समीर असली गद्दार नहीं है।”
आरव का चेहरा बदल गया।
“क्या?”
नीचे लिखा था “समीर सिर्फ आदेश मान रहा था।”
आरोही ने पूछा,
“तो आदेश कौन दे रहा था?”
आरव ने पर्ची पलटी।
पीछे सिर्फ एक शब्द लिखा था “N.”
आरोही की आंखें फैल गईं।
“N… यानी?”
कबीर ने धीरे से कहा,
“नंदिनी?”
आरोही ने तुरंत सिर हिलाया।
“नहीं।”
लेकिन तभी उसकी मां का फोन आया।
आरोही ने फोन उठाया।
“हैलो मां?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर एक धीमी आवाज आई “आरोही… घर मत आना।”
आरोही घबरा गई।
“मां? क्या हुआ?”
“वो लोग घर पर हैं।”
“कौन?”
मां की आवाज कांप रही थी।
“समीर… और उसके साथ कोई और भी है।”
फोन अचानक कट गया।
आरव ने तुरंत कार स्टार्ट की।
“हम घर जा रहे हैं।”
आरोही ने घबराकर कहा,
“मां ने मना किया है।”
“इसीलिए जाना जरूरी है।”
जब आरव, आरोही और कबीर घर पहुंचे, दरवाजा खुला था।
अंदर सामान बिखरा हुआ था।
आरोही ने चीखकर कहा,
“मां!”
कोई जवाब नहीं आया।
वह पूरे घर में दौड़ने लगी।
“मां!”
आरव ने हर कमरे में देखा।
मां कहीं नहीं थीं।
टेबल पर सिर्फ एक फोन पड़ा था।
आरोही ने फोन उठाया।
उसमें एक वीडियो था।
वीडियो चलाया गया।
स्क्रीन पर उसकी मां बैठी थीं।
उनके पीछे दो लोग खड़े थे।
एक था समीर।
और दूसरा…
चेहरा देखते ही आरव और आरोही दोनों स्तब्ध रह गए।
आरोही के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा।
“ये…”
आरव ने स्क्रीन को देखते हुए कहा,
“ये तो…”
वीडियो में मां रोते हुए बोल रही थीं “आरोही, अगर तुम ये वीडियो देख रही हो, तो समझ लेना कि मैं तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारे सामने सबसे बड़ा झूठ बोलती रही।”
फिर उन्होंने कैमरे की तरफ देखा।
उनकी आंखों में डर था।
“समीर गद्दार नहीं है।”
आरोही की सांस रुक गई।
मां ने आगे कहा—
“असल गद्दार वो है, जिस पर तुम दोनों सबसे ज्यादा भरोसा करते हो।”
वीडियो अचानक बंद हो गया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरोही ने आरव की तरफ देखा।
आरव भी उसे देख रहा था।
दोनों के मन में एक ही सवाल था आखिर वो कौन है?
तभी पीछे से किसी ने ताली बजाई।
“बहुत जल्दी सच तक पहुंच गए तुम दोनों।”
तीनों ने पलटकर देखा।
दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।
आरव ने उसे पहचानते ही कहा “तुम!”
वो आदमी मुस्कुराया।
“हां… मैं।”
और उसके हाथ में वही पुराना लॉकेट था, जो नंदिनी के लॉकर से मिला था।
“अब तुम्हें पता चलेगा कि नंदिनी की मौत के पीछे असली वजह क्या थी।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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