तेरी मेरी दास्तान
एपिसोड 7 — पापा का आखिरी खत
आरोही के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे।
उसकी नजरें उस खत की पहली लाइन पर जमी थीं—
“आरोही, अगर तुम ये खत पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी…”
उसके बाद की लाइन पढ़ते ही उसकी सांस अटक गई।
“और जिस परिवार से तुम्हें सबसे ज्यादा नफरत होगी… उसी परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे तुम्हें हर हाल में बचाना होगा।”
आरोही के होंठ कांपने लगे।
“आरव…”
उसके मुंह से बस इतना ही निकला।
मां चुपचाप उसके सामने बैठी थीं।
उनकी आंखों में इतने सालों से छुपा दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
आरोही ने खत को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“मां… पापा ने आरव को बचाने के लिए क्यों कहा?”
मां ने आंखें बंद कर लीं।
“क्योंकि तुम्हारे पापा जानते थे कि जो कुछ होने वाला है, उसमें आरव का कोई दोष नहीं था।”
“लेकिन आपने तो कहा था कि आरव के परिवार की वजह से पापा की मौत हुई।”
“मैंने कहा था… उसके परिवार की वजह से।”
मां की आवाज भर्रा गई।
“आरव की वजह से नहीं।”
आरोही कुछ पल उन्हें देखती रही।
“तो मुझे पूरा सच बताइए।”
मां ने सिर झुका लिया।
“आज नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये खत तुम्हें खुद सब कुछ बताएगा।”
आरोही ने खत की अगली लाइन पढ़ी।
“बेटी, अगर तुम मुझसे प्यार करती हो तो मेरी बात पर भरोसा करना। आरव को अपने दुश्मन की तरह मत देखना। असली दुश्मन वो है, जो हमारे दोनों परिवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रहा है।”
आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।
“असली दुश्मन कौन है?”
मां ने धीमे से कहा,
“हमें नहीं पता।”
आरोही ने तुरंत उनकी तरफ देखा।
“लेकिन पापा को पता था?”
“शायद।”
“फिर उन्होंने नाम क्यों नहीं लिखा?”
मां चुप रहीं।
आरोही ने खत को आगे पढ़ा।
लेकिन अगली लाइन देखकर उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
वहां सिर्फ लिखा था—
“जिस दिन तुम्हें वो पुरानी चाबी मिलेगी, उसी दिन तुम्हें आधा सच पता चल जाएगा।”
आरोही ने तुरंत डिब्बे में रखी चाबी उठाई।
“ये?”
मां ने सिर हिलाया।
“हां।”
“ये किसकी चाबी है?”
“मुझे नहीं पता।”
“आपको नहीं पता?”
“तुम्हारे पापा ने मरने से कुछ दिन पहले मुझे ये दी थी। बस इतना कहा था कि इसे संभालकर रखना।”
आरोही चाबी को ध्यान से देखने लगी।
उस पर बहुत छोटा-सा अक्षर खुदा था M-17
“ये क्या है?”
मां ने कहा,
“मैं नहीं जानती।”
आरोही ने खत को फिर से देखा।
उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके पिता ने जाने से पहले कोई ऐसी चीज छुपाई थी, जो आज उसकी जिंदगी बदलने वाली थी।
उधर आरव अपने कमरे में बैठा था।
उसके सामने वही पुरानी फाइल खुली थी।
कबीर भी उसके सामने बैठा था।
“आरव, हमें ये पता लगाना होगा कि तुम्हारे पिता की कार उस रात वहां क्यों थी।”
आरव ने सिर उठाया।
“और अगर मेरे पिता सच में विनय मेहरा से मिलने गए थे?”
“तो?”
“तो हो सकता है हादसे से पहले दोनों के बीच कोई बातचीत हुई हो।”
कबीर ने कहा,
“लेकिन CCTV फुटेज अधूरी है।”
आरव ने पूछा,
“बाकी फुटेज?”
“गायब।”
“गायब?”
“हां।”
आरव की आंखों में गुस्सा भर आया।
“किसने मिटाई?”
“यही पता करना है।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने अपना फोन उठाया।
आरोही को कॉल किया।
फोन नहीं उठा।
उसने दोबारा कॉल किया।
फिर भी कोई जवाब नहीं।
आरव के मन में बेचैनी होने लगी।
“कुछ हुआ तो नहीं?”
कबीर ने पूछा,
“किसे कॉल कर रहा है?”
“आरोही।”
“शायद सो गई हो।”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं। वो ऐसे फोन नहीं छोड़ती।”
तभी उसका फोन बजा।
आरोही का मैसेज था “कल मिलना है। बहुत जरूरी बात करनी है।”
आरव ने तुरंत जवाब दिया “अभी सब ठीक है?”
कुछ देर बाद जवाब आया “हां। लेकिन कल मुझे तुमसे कुछ पूछना है।”
आरव ने लिखा “जो पूछना है, सामने पूछना।”
आरोही ने सिर्फ इतना लिखा “वादा?”
आरव मुस्कुराया।
“वादा।”
अगली सुबह आरोही ने मां के सामने चाबी रखी।
“मां, मैं इसे लेकर जा रही हूं।”
मां घबरा गईं।
“कहां?”
“मुझे पता करना है कि ये चाबी किसकी है।”
“आरोही, अकेली मत जाना।”
“मैं अकेली नहीं हूं।”
मां समझ गईं।
“आरव?”
आरोही ने धीरे से सिर हिलाया।
मां कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर बोलीं,
“अगर तुम्हारे पापा ने उसे बचाने के लिए कहा था… तो शायद उस पर भरोसा किया जा सकता है।”
आरोही ने मां को गले लगा लिया।
“मैं सच पता करके रहूंगी।”
मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“सावधान रहना।”
दोपहर में आरोही और आरव शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी लाइब्रेरी के बाहर मिले।
आरव ने पूछा,
“तुम मुझे यहां क्यों लाई हो?”
आरोही ने चाबी उसकी तरफ बढ़ा दी।
“ये मेरे पापा की है।”
आरव ने चाबी को देखा।
“M-17।”
“हां।”
“तुम्हें ये कहां मिली?”
“पापा के पुराने सामान में।”
फिर आरोही ने उसे खत दिखाया।
आरव ने खत पढ़ा।
उसके चेहरे पर गंभीरता आ गई।
“तुम्हारे पापा ने मेरे बारे में लिखा है।”
“हां।”
“उन्होंने कहा है कि मुझे बचाना।”
आरोही ने धीरे से कहा,
“इसलिए मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूं।”
“पूछो।”
“क्या तुम्हारे पापा के पास भी ऐसी कोई चाबी थी?”
आरव कुछ सोचने लगा।
फिर अचानक उसकी आंखें फैल गईं।
“रुको।”
“क्या हुआ?”
“मेरे पिता के स्टडी रूम में एक पुरानी अलमारी थी।”
“फिर?”
“उस पर भी एक नंबर लिखा था।”
“क्या?”
आरव ने धीरे से कहा “M-17।”
आरोही की सांस रुक गई।
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।
“इसका मतलब…”
आरव ने कहा,
“दोनों परिवारों के पास एक ही जगह की चाबी थी।”
आरोही ने पूछा,
“कौन-सी जगह?”
आरव ने जवाब दिया,
“मुझे नहीं पता।”
कबीर को फोन किया गया।
कुछ मिनटों में कबीर ने पता लगा लिया कि शहर में एक पुराना रिकॉर्ड रूम था, जिसका सेक्शन M-17 कहलाता था।
वह रिकॉर्ड रूम करीब दस साल से बंद था।
आरोही और आरव तुरंत वहां पहुंच गए।
पुरानी इमारत धूल से भरी हुई थी।
दरवाजे पर जंग लगा ताला था।
आरव ने चाबी ताले में लगाई।
ताला खुल गया।
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें डर नहीं लग रहा?”
आरव मुस्कुराया।
“तुम साथ हो।”
“तो?”
“डरने की जरूरत नहीं।”
दोनों अंदर चले गए।
कमरे में पुराने दस्तावेजों की अलमारियां थीं।
दीवार पर जगह-जगह धूल जमी थी।
एक कोने में लोहे की छोटी अलमारी थी।
उस पर लिखा था M-17
आरोही की धड़कन तेज हो गई।
आरव ने अलमारी खोली।
अंदर एक पुरानी फाइल थी।
फाइल के ऊपर लिखा था “मेहरा- सिंह प्रोजेक्ट।”
आरोही ने फाइल उठा ली।
पहला पन्ना पढ़ते ही उसके चेहरे पर हैरानी छा गई।
“आरव…”
“क्या?”
“ये प्रोजेक्ट जमीन का नहीं था।”
“तो?”
“ये एक कंपनी के बारे में था।”
“कौन सी कंपनी?”
आरोही ने पन्ना पलटा।
अचानक एक नाम सामने आया विक्रम सूद।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
आरव ने फाइल अपने हाथ में ले ली।
“तो विक्रम दोनों परिवारों के बीच था।”
आरोही ने कहा,
“और शायद वही असली दुश्मन है।”
तभी पीछे से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
दोनों तुरंत पलटे।
दरवाजे के पास कोई नहीं था।
आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।
“मेरे पीछे रहो।”
दोनों धीरे-धीरे बाहर आए।
गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था।
आरव ने उसे उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी “बहुत देर कर दी।”
आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।
“कोई हमारे आने का इंतजार कर रहा था।”
आरव ने चारों तरफ देखा।
“हमें यहां से निकलना होगा।”
दोनों तेजी से बाहर आए।
लेकिन जैसे ही वे पार्किंग में पहुंचे, एक बाइक तेज गति से उनकी तरफ आई।
आरव ने तुरंत आरोही को अपनी तरफ खींच लिया।
बाइक उनके पास से गुजर गई।
आरोही डर गई।
“आरव!”
“तुम ठीक हो?”
“हां।”
आरव ने बाइक का नंबर देखने की कोशिश की।
लेकिन बाइक दूर निकल चुकी थी।
शाम को दोनों झील के किनारे पहुंचे।
आज वहां कोई मजाक नहीं था।
दोनों चुप बैठे थे।
आरोही ने धीरे से पूछा,
“क्या तुम्हें लगता है कि विक्रम सूद ने मेरे पापा को मरवाया?”
आरव ने कहा,
“मुझे अब इस पर शक नहीं… भरोसा होने लगा है।”
“लेकिन सबूत?”
“हमें मिलेगा।”
“और अगर वो नहीं मिला?”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“फिर भी मैं तुम्हारा साथ दूंगा।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम मेरे लिए इतना क्यों कर रहे हो?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा,
“क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ दोस्त नहीं हो।”
आरोही की धड़कन तेज हो गई।
“तो?”
आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,
“शायद… मैं तुम्हें खोने से डरने लगा हूं।”
आरोही ने नजरें झुका लीं।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
“और अगर मैं कहूं कि मुझे भी डर लगता है?”
आरव ने पूछा,
“किस बात का?”
“तुम्हें खोने का।”
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
आरव ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।
“तो फिर मत खोना।”
आरोही ने उसकी उंगलियां कसकर पकड़ लीं।
“वादा?”
“वादा।”
लेकिन उसी पल आरोही का फोन बजा।
मां का फोन था।
उसने तुरंत उठाया।
“हां मां?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर मां की कांपती आवाज आई “आरोही… तुम तुरंत घर आओ।”
“क्यों?”
“मुझे अभी तुम्हारे पापा की एक और चीज मिली है।”
आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।
“क्या?”
मां ने बहुत धीमी आवाज में कहा “तुम्हारे पापा की डायरी।”
कॉल कट हो गई।
आरोही ने आरव की तरफ देखा।
“पापा की डायरी मिल गई है।”
आरव ने उसका हाथ थामे रखा।
“चलो।”
दोनों कार की तरफ बढ़े।
लेकिन उन्हें नहीं पता था…
उस डायरी में लिखा सच सिर्फ उनके परिवारों की दुश्मनी का राज नहीं था।
उसमें शायद उस रात की पूरी कहानी लिखी थी…
जिस रात विनय मेहरा की मौत हुई थी।
और सबसे बड़ा सवाल क्या उस रात आरव के पिता सच में वहां मौजूद थे?
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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