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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

पढ़ने का समय : 11 मिनट

 

 

एपिसोड 2 — अजनबी से दोस्ती तक

 

सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से होते हुए कमरे में दाखिल हो रही थी।

 

आरोही अभी तक अपने बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी को देख रही थी।

 

रात में उसने जो कुछ लिखा था, वो बार-बार उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।

 

“आज एक अजनबी मिला। नाम आरव।”

 

आरोही ने डायरी बंद की और खुद से बोली,

 

“पता नहीं मैं भी ना… किसी अजनबी के बारे में इतनी क्यों सोच रही हूं?”

 

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

 

“आरोही, उठ गई बेटा?”

 

मां की आवाज सुनकर आरोही ने जल्दी से डायरी तकिए के नीचे रख दी।

 

“हां मां, उठ गई।”

 

दरवाजा खुला और उसकी मां कमरे में आ गईं।

 

“आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?”

 

“जाना है मां।”

 

“तो फिर इतनी देर से यहां बैठी क्या कर रही हो?”

 

आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“कुछ नहीं मां।”

 

मां ने उसे ध्यान से देखा।

 

“कुछ नहीं?”

 

“हां।”

 

“चेहरा तो कुछ और ही बता रहा है।”

 

आरोही का दिल एक पल के लिए धड़क उठा।

 

“मां… आप भी ना!”

 

मां मुस्कुरा दीं।

 

“अच्छा चल, जल्दी तैयार हो जा। नाश्ता लगा दिया है।”

 

मां के जाते ही आरोही ने राहत की सांस ली।

 

उसने फिर तकिए के नीचे से डायरी निकाली।

 

कुछ सेकंड उसे देखा और फिर बैग में रख लिया।

 

पता नहीं क्यों…

 

आज उसे लग रहा था कि शायद वो झील के किनारे फिर जाएगी।

 

लेकिन उसने खुद को समझाया “नहीं! मैं सिर्फ कल की वजह से वहां नहीं जाने वाली।”

 

उधर दूसरी तरफ…

 

आरव अपने कमरे की बालकनी में खड़ा कॉफी पी रहा था।

 

उसके हाथ में मोबाइल था।

 

स्क्रीन पर उसके दोस्त कबीर का नाम चमक रहा था।

 

कबीर ने वीडियो कॉल किया।

 

आरव ने कॉल उठाते ही कहा,

 

“बोल।”

 

दूसरी तरफ से कबीर की आवाज आई,

 

“भाई, आज ऑफिस आ रहा है या फिर अपनी नई मोहब्बत के साथ झील किनारे बैठने का प्लान है?”

 

आरव ने भौंहें चढ़ाईं।

 

“कौन सी मोहब्बत?”

 

कबीर जोर से हंसा।

 

“कल जिस लड़की से तू मिला था।”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“वो मोहब्बत नहीं है।”

 

“अच्छा?”

 

“हां।”

 

“तो फिर उसका नाम याद है?”

 

आरव चुप।

 

कबीर ने तुरंत कहा,

 

“समझ गया।”

 

“क्या समझ गया?”

 

“कुछ नहीं।”

 

“बोल।”

 

“तुझे लड़की पसंद आ गई।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“ऐसा कुछ नहीं है।”

 

“तो उसका नाम बता।”

 

आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

 

“आरोही।”

 

कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

 

फिर बोला,

 

“भाई, तू गया।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“पागल है क्या?”

 

“नहीं। लेकिन तेरे चेहरे पर जो मुस्कान आई है, वो मैंने पिछले कई महीनों से नहीं देखी।”

 

आरव की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।

 

कबीर ने भी उसकी खामोशी महसूस कर ली।

 

“आरव…”

 

“हम्म।”

 

“सब ठीक है?”

 

आरव ने सामने आसमान की तरफ देखा।

 

“हां।”

 

“पक्का?”

 

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

कबीर समझ गया।

 

वो जानता था कि आरव के अतीत में कुछ ऐसा था जिसके बारे में आरव बात नहीं करना चाहता था।

 

इसलिए उसने बात बदल दी।

 

“चल, ऑफिस निकल। आज मीटिंग है।”

 

“हां।”

 

कॉल कट हो गई।

 

आरव ने मोबाइल टेबल पर रखा।

 

फिर कुछ देर बाद खुद से बोला “आरोही…”

 

और उसके चेहरे पर फिर वही हल्की मुस्कान लौट आई।

 

 

दोपहर के करीब आरोही ऑफिस पहुंची।

 

लेकिन आज उसका मन काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

 

कंप्यूटर स्क्रीन पर फाइल खुली थी।

 

लेकिन उसकी नजर बार-बार स्क्रीन से हटकर खिड़की के बाहर चली जाती।

 

उसकी दोस्त नैना काफी देर से उसे देख रही थी।

 

आखिर उसने पूछा,

 

“क्या हुआ?”

 

आरोही ने चौंककर कहा,

 

“क्या?”

 

“तू सुबह से मुस्कुरा रही है।”

 

“मैं?”

 

“हां, तू।”

 

आरोही ने तुरंत अपना चेहरा सामान्य किया।

 

“ऐसा कुछ नहीं है।”

 

नैना उसकी कुर्सी के पास आकर खड़ी हो गई।

 

“कुछ तो हुआ है।”

 

“कुछ नहीं हुआ।”

 

“कल शाम कहां गई थी?”

 

आरोही चुप हो गई।

 

नैना ने आंखें छोटी करते हुए पूछा,

 

“झील के पास?”

 

आरोही ने धीरे से सिर हिला दिया।

 

“हां।”

 

“और?”

 

“कुछ नहीं।”

 

“वहां कोई मिला?”

 

आरोही ने फाइल उठाकर पढ़ने का नाटक किया।

 

“नहीं।”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“झूठ बोलते समय तू बहुत खराब एक्टिंग करती है।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“ठीक है, एक लड़का मिला था।”

 

“ओहो!”

 

नैना की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास बैठे लोग उनकी तरफ देखने लगे।

 

आरोही ने तुरंत कहा,

 

“धीरे बोल!”

 

नैना कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गई।

 

“नाम?”

 

“आरव।”

 

“क्या करता है?”

 

“पता नहीं।”

 

“कहां रहता है?”

 

“पता नहीं।”

 

“नंबर?”

 

आरोही चुप।

 

नैना ने माथे पर हाथ रख लिया।

 

“मतलब तुझे उसका सिर्फ नाम पता है?”

 

“हां।”

 

“और तू उसके बारे में सोच रही है?”

 

आरोही ने तुरंत कहा,

 

“मैं उसके बारे में नहीं सोच रही।”

 

नैना मुस्कुराई।

 

“अच्छा।”

 

“सच में।”

 

“ठीक है। नहीं सोच रही।”

 

कुछ पल बाद नैना ने पूछा,

 

“फिर आज झील के पास जाने का प्लान किसका है?”

 

आरोही ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

 

“किसने कहा मैं जा रही हूं?”

 

“तेरी आंखों ने।”

 

आरोही कुछ नहीं बोली।

 

शाम हुई।

 

ऑफिस से निकलते समय आरोही काफी देर तक अपनी कार के पास खड़ी रही।

 

उसने कार का दरवाजा खोला।

 

फिर बंद कर दिया।

 

उसने खुद से कहा,

 

“घर जाना है।”

 

कुछ सेकंड बाद उसने मोबाइल निकाला।

 

समय देखा।

 

फिर झील की तरफ जाने वाली सड़क को देखा।

 

“बस पांच मिनट।”

 

उसने खुद को समझाया।

 

“मैं सिर्फ झील देखने जा रही हूं।”

 

और फिर कार उसी रास्ते पर चल पड़ी।

 

उधर आरव भी उसी झील के पास पहुंच चुका था।

 

वह खुद से भी यही कह रहा था कि वह वहां सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि उसे शाम का मौसम पसंद है।

 

लेकिन सच कुछ और था।

 

वह किसी का इंतजार कर रहा था।

 

वह लड़की…

 

जिसका नाम कल ही जाना था।

 

आरोही।

 

आरव जेट्टी के पास खड़ा झील को देख रहा था।

 

तभी पीछे से किसी ने कहा,

 

“आप यहां क्या कर रहे हैं?”

 

आरव ने पलटकर देखा।

 

आरोही सामने खड़ी थी।

 

सफेद कुर्ती और हल्के नीले रंग की चुन्नी हवा में लहरा रही थी।

 

आरव के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

 

“मुझे लगा था आप नहीं आएंगी।”

 

आरोही ने तुरंत पूछा,

 

“आप मेरा इंतजार कर रहे थे?”

 

“नहीं।”

 

“तो?”

 

“मैं झील का इंतजार कर रहा था।”

 

आरोही ने आंखें घुमाईं।

 

“बहुत मजाक करते हैं आप।”

 

“आप आई हैं, तो मजाक तो बनता है।”

 

आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

 

“आप रोज यहां आते हैं?”

 

“नहीं।”

 

“तो आज क्यों?”

 

आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“शायद किस्मत ने बुलाया।”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

“आप हर बात में किस्मत को क्यों ले आते हैं?”

 

“क्योंकि कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।”

 

दोनों कुछ देर चुप रहे।

 

फिर आरव ने पूछा,

 

“कॉफी?”

 

आरोही ने उसे देखा।

 

“क्या?”

 

“कॉफी पीएंगी?”

 

“आप हर लड़की को ऐसे कॉफी के लिए बुलाते हैं?”

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा,

 

“नहीं।”

 

“तो मुझे क्यों?”

 

“क्योंकि आप बाकी लड़कियों जैसी नहीं हैं।”

 

आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“ये लाइन आपने कल भी मारी थी।”

 

“काम कर गई थी।”

 

“किसने कहा?”

 

“आप आज फिर यहां आई हैं।”

 

आरोही हंस पड़ी।

 

दोनों झील के पास बने छोटे-से कैफे की तरफ चल पड़े।

 

कैफे बहुत छोटा था।

 

लकड़ी की मेजें थीं और खिड़की से झील का खूबसूरत नजारा दिखाई देता था।

 

दोनों सामने-सामने बैठे।

 

वेटर ने पूछा,

 

“मैडम, क्या लेंगी?”

 

आरोही ने कहा,

 

“कॉफी।”

 

आरव ने कहा,

 

“मेरे लिए भी।”

 

वेटर चला गया।

 

कुछ पल खामोशी रही।

 

फिर आरव ने पूछा,

 

“आप क्या करती हैं?”

 

“एक कंपनी में काम करती हूं।”

 

“मतलब?”

 

“मार्केटिंग।”

 

“अच्छा।”

 

“और आप?”

 

आरव थोड़ा मुस्कुराया।

 

“मैं भी काम करता हूं।”

 

आरोही ने उसे घूरा।

 

“ये कौन सा जवाब है?”

 

“सही जवाब है।”

 

“किस तरह का काम?”

 

आरव ने कहा,

 

“बिजनेस।”

 

“किस चीज का?”

 

“कई चीजों का।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

“आप बहुत रहस्यमयी हैं।”

 

“और आप बहुत सवाल करती हैं।”

 

“क्योंकि मैं अजनबियों पर भरोसा नहीं करती।”

 

आरव गंभीर हो गया।

 

“मत कीजिए।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

“मुझ पर भी भरोसा मत कीजिए।”

 

“क्यों?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

फिर धीमे से बोला,

 

“क्योंकि भरोसा बहुत खूबसूरत चीज है… लेकिन टूट जाए तो इंसान अंदर से बदल जाता है।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में कुछ देखा।

 

शायद दर्द।

 

उसने धीरे से पूछा,

 

“आपका भरोसा टूटा है?”

 

आरव ने नजरें झुका लीं।

 

“कभी।”

 

आरोही ने आगे सवाल नहीं किया।

 

वेटर कॉफी रख गया।

 

दोनों चुपचाप कॉफी पीने लगे।

 

कुछ देर बाद आरोही ने धीरे से कहा,

 

“अगर कभी मन हो तो बता सकते हैं।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

“जिसने आपका भरोसा तोड़ा… उसके बारे में।”

 

आरव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

 

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,

 

“शायद किसी दिन।”

 

आरोही ने सिर हिला दिया।

 

“ठीक है।”

 

उस शाम दोनों ने बहुत सारी बातें कीं।

 

पसंद-नापसंद से लेकर बचपन की यादों तक।

 

आरव को पता चला कि आरोही को बारिश बहुत पसंद थी।

 

आरोही को पता चला कि आरव को पहाड़ पसंद थे।

 

आरोही को किताबें पढ़ना अच्छा लगता था।

 

आरव को रात में लंबी ड्राइव करना।

 

दोनों की पसंद अलग थी।

 

फिर भी बातचीत खत्म नहीं हो रही थी।

 

जब कैफे बंद होने का समय हुआ, तो आरोही उठ खड़ी हुई।

 

“मुझे जाना चाहिए।”

 

आरव भी खड़ा हो गया।

 

“कल मिलें?”

 

आरोही ने कुछ नहीं कहा।

 

“शायद?”

 

आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“आपको ‘शायद’ बहुत पसंद है ना?”

 

“हां।”

 

“तो जवाब भी वही है।”

 

“मतलब?”

 

“शायद।”

 

आरोही वहां से जाने लगी।

 

आरव ने आवाज दी,

 

“आरोही!”

 

वह पलटी।

 

आरव ने कहा,

 

“दोस्ती करेंगे?”

 

आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

 

फिर मुस्कुराकर बोली,

 

“सिर्फ दोस्ती।”

 

आरव ने हाथ आगे बढ़ाया।

 

“सिर्फ दोस्ती।”

 

आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।

 

उस पल दोनों के बीच कुछ नहीं था।

 

न कोई प्यार।

 

न कोई रिश्ता।

 

सिर्फ एक नई दोस्ती की शुरुआत।

 

लेकिन दोनों में से कोई नहीं जानता था…

 

कि यही दोस्ती धीरे-धीरे उनके दिलों की सबसे खूबसूरत जरूरत बनने वाली थी।

 

आरोही ने हाथ पीछे खींच लिया।

 

“अब चलती हूं।”

 

“ठीक है।”

 

वह कार की तरफ चली गई।

 

आरव वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

 

कार दूर निकल गई।

 

आरव ने अपनी हथेली की तरफ देखा।

 

जहां कुछ पल पहले आरोही का हाथ था।

 

उसने मुस्कुराते हुए कहा,

 

“सिर्फ दोस्ती…”

 

फिर धीरे से बोला,

 

“देखते हैं, मैडम… ये दोस्ती कितनी दूर तक जाती है।”

 

कार चलाते हुए आरोही के चेहरे पर मुस्कान थी।

 

उसने रेडियो बंद कर दिया।

 

आज उसे किसी गाने की जरूरत नहीं थी।

 

उसके दिमाग में बस आरव की बातें घूम रही थीं।

 

उसकी मुस्कान…

 

उसकी आंखों में छिपा दर्द…

 

और जाते समय उसका वो सवाल “दोस्ती करेंगे?”

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“हां आरव… दोस्ती।”

 

लेकिन दिल ने चुपके से एक और शब्द जोड़ दिया “शायद…”

 

उसी वक्त आरव के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

 

उसने कार किनारे लगाई और कॉल उठाया।

 

“हैलो?”

 

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

 

फिर एक भारी आवाज आई “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

 

आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

 

“कौन?”

 

“आरोही।”

 

आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

 

“तुम कौन हो?”

 

सामने से सिर्फ इतना कहा गया “अगर तुमने उससे दोस्ती जारी रखी… तो इस बार नुकसान सिर्फ तुम्हारा नहीं होगा।”

 

कॉल कट हो गई।

 

आरव कुछ सेकंड मोबाइल को देखता रहा।

 

फिर उसकी नजर उस सड़क पर चली गई जिस तरफ आरोही की कार गई थी।

 

उसके चेहरे पर पहली बार चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

 

उसे नहीं पता था कि आरोही के अतीत में क्या छिपा था।

 

और उसे ये भी नहीं पता था…

 

कि उनकी नई-नई शुरू हुई दोस्ती के रास्ते में कोई ऐसा इंसान खड़ा था…

 

जो दोनों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था।

 

जारी रहेगा…

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