तेरी मेरी दास्तान
एपिसोड 3 — वो लड़की कुछ अलग थी
रात काफी गहरा चुकी थी।
शहर की सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी, लेकिन आरव के कमरे की बालकनी में अभी भी रोशनी जल रही थी।
वह रेलिंग के सहारे खड़ा था।
हाथ में मोबाइल था और स्क्रीन पर वही अनजान नंबर मौजूद था, जिससे कुछ देर पहले उसे धमकी भरी कॉल आई थी।
“तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”
आरव के दिमाग में बार-बार वही आवाज गूंज रही थी।
उसने नंबर पर दोबारा कॉल किया।
फोन बंद था।
आरव ने जबड़े भींच लिए।
“आखिर कौन हो तुम?”
उसने खुद से कहा।
तभी पीछे से कबीर की आवाज आई।
“किससे बात कर रहा है?”
आरव ने पलटकर देखा।
कबीर कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।
“कोई नहीं।”
कबीर उसकी तरफ बढ़ा।
“आरव, मैं तुझे बचपन से जानता हूं। जब तू परेशान होता है ना, तो ‘कोई नहीं’ बोलता है।”
आरव चुप रहा।
कबीर ने उसके हाथ से मोबाइल लिया।
“क्या हुआ?”
आरव ने सारी बात बता दी।
कबीर का चेहरा भी गंभीर हो गया।
“आरोही को जानता है वो?”
“उसने उसका नाम लिया था।”
“फिर मामला साधारण नहीं है।”
आरव ने गहरी सांस ली।
“मुझे भी यही लग रहा है।”
“आरोही के बारे में कुछ पता किया?”
“नहीं।”
“करना चाहिए।”
आरव ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
कबीर ने हैरानी से पूछा,
“क्यों?”
“क्योंकि अगर उसने कुछ छुपाया है तो शायद उसकी कोई वजह होगी।”
कबीर ने उसे देखा।
“तुझे उसकी इतनी चिंता कब से होने लगी?”
आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।
कबीर मुस्कुराया।
“भाई… तू फंस चुका है।”
आरव ने उसे घूरकर देखा।
“बकवास बंद कर।”
“ठीक है।”
कबीर हंसते हुए बोला,
“लेकिन एक बात याद रखना—जिस लड़की के आने से तेरे चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान आई है, उसे खोने की गलती मत करना।”
आरव ने खिड़की से बाहर देखा।
“मैं उसे खोना नहीं चाहता।”
कबीर की मुस्कान गायब हो गई।
आरव खुद अपनी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया।
उसे एहसास हुआ कि उसने पहली बार किसी के लिए ये शब्द कहे थे।
मैं उसे खोना नहीं चाहता।
अगली सुबह।
आरोही ऑफिस पहुंची तो नैना पहले से उसका इंतजार कर रही थी।
जैसे ही आरोही अपनी सीट पर बैठी, नैना उसके पास आ गई।
“तो?”
आरोही ने लैपटॉप खोला।
“तो क्या?”
“कल क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“झील गई थी?”
आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“हां।”
“आरव मिला?”
“हां।”
“फिर?”
“कॉफी पी।”
नैना की आंखें चमक उठीं।
“अकेले?”
“हां।”
“और?”
आरोही ने उसे घूरा।
“और कुछ नहीं।”
नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,
“तुम्हारी आवाज बता रही है कि कुछ तो है।”
“हम दोस्त बन गए।”
“बस?”
“बस।”
“पक्का?”
“हां।”
नैना ने लंबी सांस ली।
“चलो, कम से कम शुरुआत तो हुई।”
आरोही ने भौंहें चढ़ाईं।
“किसकी शुरुआत?”
“दोस्ती की।”
नैना ने आंख मारी।
आरोही हंस पड़ी।
लेकिन उसी समय उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।
उसने स्क्रीन देखी।
Unknown Number:
“आरव से दूर रहो।”
आरोही की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।
उसने मैसेज दोबारा पढ़ा।
नैना ने पूछा,
“क्या हुआ?”
आरोही ने फोन लॉक कर दिया।
“कुछ नहीं।”
“किसका मैसेज था?”
“कोई गलत नंबर होगा।”
नैना ने उसे ध्यान से देखा।
“तू ठीक है?”
आरोही ने सिर हिलाया।
“हां।”
लेकिन उसके दिल में हलचल शुरू हो चुकी थी।
उसे पहली बार डर लगा।
कौन था ये इंसान?
और उसे आरव के बारे में कैसे पता था?
दोपहर के समय आरव की कंपनी में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी।
कांच की बड़ी टेबल के आसपास कई लोग बैठे थे।
आरव अपनी फाइल देख रहा था।
लेकिन उसका ध्यान काम पर नहीं था।
उसके सामने लैपटॉप पर एक ही सवाल घूम रहा था “आरोही को भी धमकी मिली होगी?”
मीटिंग खत्म होते ही उसने अपना फोन उठाया और आरोही को कॉल किया।
फोन बजता रहा।
आरोही ने फोन नहीं उठाया।
आरव ने दोबारा कॉल किया।
फिर भी कोई जवाब नहीं।
उसने मैसेज किया “सब ठीक है?”
कुछ देर बाद जवाब आया “हां।”
आरव ने तुरंत पूछा “पक्का?”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया “हां, पक्का।”
आरव ने फोन नीचे रख दिया।
लेकिन उसका मन नहीं माना।
उसे लग रहा था कि आरोही कुछ छुपा रही है।
शाम को ऑफिस से निकलते समय आरोही पार्किंग में अपनी कार के पास पहुंची।
उसने कार खोली।
तभी पीछे से किसी ने कहा,
“आरोही।”
वह तुरंत पलटी।
एक अनजान आदमी कुछ दूरी पर खड़ा था।
काले कपड़े, काली टोपी और चेहरे पर मास्क।
आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।
“आप कौन हैं?”
वह आदमी कुछ कदम आगे बढ़ा।
“तुम्हें मैसेज मिला था।”
आरोही पीछे हट गई।
“आपने किया था?”
“हां।”
“क्यों?”
“बस इतना समझ लो कि आरव तुम्हारे लिए सही नहीं है।”
आरोही ने हिम्मत जुटाकर पूछा,
“आप आरव को कैसे जानते हैं?”
वह आदमी मुस्कुराया।
“आरव को मैं जितना जानता हूं… उतना शायद तुम कभी नहीं जान पाओगी।”
आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“आप कहना क्या चाहते हैं?”
“उससे दूर रहो।”
“नहीं।”
आदमी चौंका।
आरोही ने पहली बार दृढ़ आवाज में कहा,
“वो मेरा दोस्त है।”
“दोस्त?”
वह आदमी हंसा।
“तुम्हें पता भी है वो कौन है?”
“हां।”
“नहीं। तुम कुछ नहीं जानती।”
वह मुड़ा और वहां से जाने लगा।
आरोही ने पीछे से पूछा,
“रुकिए!”
लेकिन वह बिना रुके आगे बढ़ता गया।
कुछ ही सेकंड में वह पार्किंग से बाहर निकल गया।
आरोही वहीं खड़ी रह गई।
उसने तुरंत आरव को फोन किया।
इस बार आरव ने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया।
“हैलो?”
आरोही की आवाज कांप रही थी।
“आरव…”
आरव तुरंत गंभीर हो गया।
“क्या हुआ?”
“मुझे… अभी किसी ने धमकी दी।”
कुछ सेकंड तक आरव बिल्कुल चुप रहा।
फिर उसकी आवाज आई,
“तुम वहीं हो?”
“हां।”
“मेरी बात ध्यान से सुनो। कार में बैठो और तुरंत घर जाओ।”
“लेकिन—”
“आरोही!”
उसकी आवाज में इतनी चिंता थी कि आरोही चुप हो गई।
“हां।”
“घर पहुंचकर मुझे कॉल करना।”
“ठीक है।”
करीब आधे घंटे बाद आरोही घर पहुंची।
उसने जैसे ही कमरे का दरवाजा बंद किया, फोन पर आरव का कॉल आ गया।
“पहुंच गई?”
“हां।”
“अकेली हो?”
“मां घर पर हैं।”
आरव ने राहत की सांस ली।
“ठीक है।”
आरोही कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“आरव…”
“हम्म?”
“वो आदमी तुम्हारे बारे में कुछ कह रहा था।”
आरव की आंखें बंद हो गईं।
“क्या?”
“उसने कहा कि तुम वो नहीं हो जो मैं समझ रही हूं।”
आरव कुछ नहीं बोला।
“सच क्या है?”
लंबी खामोशी।
आरोही की आवाज थोड़ी कांप गई।
“आरव?”
“हां।”
“क्या तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो?”
आरव ने आंखें खोलकर सामने देखा।
वह जानता था कि एक दिन ये सवाल उससे जरूर पूछा जाएगा।
लेकिन इतनी जल्दी?
“हां।”
आरोही का दिल बैठ गया।
“क्या?”
“मैंने तुमसे कुछ बातें नहीं बताईं।”
“कौन सी?”
“मेरी जिंदगी के बारे में।”
आरोही चुप रही।
आरव ने आगे कहा,
“लेकिन मैं तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहता।”
“तो सच बताओ।”
आरव ने गहरी सांस ली।
“मैं सिर्फ एक साधारण बिजनेसमैन नहीं हूं।”
आरोही ने पूछा,
“फिर?”
“मेरी कंपनी के अलावा… मेरे परिवार का एक बहुत पुराना दुश्मन है।”
“कौन?”
“मुझे नहीं पता।”
“तुम्हें नहीं पता?”
“नहीं।”
“और वो मुझे क्यों धमका रहा है?”
आरव चुप हो गया।
कुछ सेकंड बाद उसने कहा,
“क्योंकि शायद उसे लगता है कि तुम मेरे लिए खास हो।”
आरोही का दिल एक पल को रुक-सा गया।
“मैं… खास?”
आरव ने महसूस किया कि उसके मुंह से क्या निकल गया था।
वह तुरंत बोला,
“मेरा मतलब… दोस्त के तौर पर।”
आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“सिर्फ दोस्त?”
आरव चुप।
आरोही ने पहली बार उसे छेड़ा,
“बोलिए।”
“हां… फिलहाल।”
“फिलहाल?”
“हां।”
आरोही की मुस्कान और गहरी हो गई।
“ठीक है।”
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर आरोही ने धीरे से कहा,
“आरव?”
“हां?”
“मुझे डर लग रहा है।”
आरव का चेहरा नरम पड़ गया।
“डरो मत।”
“लेकिन”
“जब तक मैं हूं, तुम्हें कुछ नहीं होगा।”
आरोही की आंखें नम हो गईं।
“इतना भरोसा है खुद पर?”
आरव ने कहा,
“खुद पर नहीं।”
“तो?”
“तुम पर।”
आरोही कुछ नहीं बोल पाई।
उस रात पहली बार उसे लगा…
कि शायद आरव सिर्फ उसका दोस्त नहीं रहा था।
शायद उसके दिल में उसके लिए कुछ और बनने लगा था।
अगली सुबह आरव अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके टेबल पर एक लिफाफा पड़ा मिला।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर एक फोटो थी।
फोटो देखकर आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
वो उसकी और आरोही की थी।
कल शाम की।
जब दोनों कैफे में बैठे थे।
फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”
आरव की मुट्ठी कस गई।
उसी समय उसका फोन बजा।
कबीर का फोन था।
“आरव, तुरंत मेरे ऑफिस वाले कमरे में आ।”
“क्यों?”
कबीर की आवाज गंभीर थी।
“मुझे आरोही के बारे में कुछ पता चला है।”
आरव के कदम वहीं रुक गए।
“क्या?”
कबीर ने धीमे से कहा “उसका पूरा नाम आरोही शर्मा नहीं है।”
आरव की आंखें सिकुड़ गईं।
“क्या मतलब?”
कबीर बोला,
“उसके बारे में जो जानकारी हमें मिली है… उसके मुताबिक उसकी असली पहचान कुछ और है।”
आरव ने फोटो को फिर से देखा।
उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।
एक तरफ आरोही थी…
दूसरी तरफ उसका रहस्यमयी अतीत।
और अब पहली बार आरव को एहसास हुआ जिस लड़की को वह एक मासूम, शांत और उदास लड़की समझ रहा था… शायद उसकी कहानी भी उतनी ही रहस्यमयी थी जितनी उसकी अपनी।
लेकिन इस राज की सबसे बड़ी कीमत…
शायद दोनों को अपने प्यार से चुकानी थी।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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