फिर एक दिन सब धूमिल हो जायेगा..जैसे कुछ कहानियां पूरी होने के लिए नहीं,
*बस महसूस करने के लिए लिखी जाती हैं….😐🌻*
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏
फिर एक दिन सब धूमिल हो जायेगा..जैसे कुछ कहानियां पूरी होने के लिए नहीं,
*बस महसूस करने के लिए लिखी जाती हैं….😐🌻*
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏
कभी एक जान होने का दावा करने वाले,
*आज अनजान बनकर महफ़िल से गुज़र गए।*💕💕💕
NSW अनुभवी लेखक -🥇
जो हमसे दूर हुए..
हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏
शाम का वक्त था। हल्की-हल्की ठंडी हवा बह रही थी, और आसमान में ढलता हुआ सूरज जैसे किसी अधूरी कहानी का आख़िरी पन्ना लिख रहा हो। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, उस पुराने पार्क की एक बेंच पर आरव चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी खालीपन था—जैसे बहुत कुछ खो चुका हो, या शायद अभी तक कुछ पाया ही न हो।
आरव हमेशा से ही थोड़ा अलग था। उसे भीड़ में रहना पसंद नहीं था, पर अकेलापन भी उसे खा जाता था। वह अक्सर सोचता था—क्या ज़िंदगी में सच में किसी “एक” इंसान की ज़रूरत होती है? कोई ऐसा, जो सिर्फ तुम्हारा हो… जो बिना कहे सब समझ जाए।
उसी सोच में डूबा हुआ वह आसमान को देख रहा था कि तभी पास से एक मधुर आवाज़ आई—
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”
आरव ने चौंक कर देखा। सामने एक लड़की खड़ी थी—सफेद सूट में, बालों को हल्के से बांधे हुए, और आँखों में एक अजीब-सी चमक। वह मुस्कुरा रही थी।
“हाँ… हाँ, बिल्कुल,” आरव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।
लड़की उसके पास बैठ गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर उसने कहा,
“आप रोज़ यहाँ आते हैं, ना?”
आरव ने हैरानी से पूछा, “आपको कैसे पता?”
“मैं भी रोज़ आती हूँ,” उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “बस… आप शायद ध्यान नहीं देते।”
आरव को थोड़ा अजीब लगा, लेकिन अच्छा भी। “मैं आरव हूँ,” उसने कहा।
“मीरा,” उसने जवाब दिया।
उस दिन के बाद से दोनों की मुलाकातें रोज़ होने लगीं। पहले छोटी-छोटी बातें होती थीं—मौसम, किताबें, पसंद-नापसंद। फिर धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया। अब वे अपने सपनों, डर, और बीते हुए दर्द तक की बातें करने लगे थे।
मीरा बहुत अलग थी। वह हर छोटी चीज़ में खुशी ढूंढ लेती थी—गिरते हुए पत्ते, उड़ते हुए परिंदे, या फिर बारिश की पहली बूंद। आरव को उसके साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा था। उसकी ज़िंदगी में जैसे रंग वापस आने लगे थे।
एक दिन मीरा ने पूछा,
“तुम्हें सबसे ज्यादा किस चीज़ की कमी महसूस होती है?”
आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“एक ऐसा इंसान… जो बिना शर्त प्यार करे। जो मुझे जैसे हूँ वैसे ही अपनाए। बस… एक सनम चाहिए।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में कुछ अलग था उस दिन।
“अगर वो मिल जाए, तो क्या करोगे?” उसने धीरे से पूछा।
“उसे कभी जाने नहीं दूंगा,” आरव ने तुरंत जवाब दिया।
मीरा मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में हल्की-सी उदासी थी।
“हर किसी की किस्मत में वो नहीं होता, आरव।”
दिन बीतते गए। अब आरव को मीरा का इंतज़ार रहने लगा था। अगर वह एक दिन भी नहीं आती, तो उसे बेचैनी होने लगती। उसे एहसास हो रहा था कि वो मीरा से प्यार करने लगा है।
एक शाम, जब हल्की बारिश हो रही थी, आरव ने हिम्मत जुटाई।
“मीरा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
“हम्म?” मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे लगता है… नहीं, मैं यकीन से कह सकता हूँ… कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”
बारिश की बूंदें तेज़ हो गई थीं। मीरा चुप थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं।
“कुछ तो कहो, मीरा…” आरव ने घबराते हुए कहा।
मीरा ने गहरी सांस ली।
“काश… तुम ये बात पहले कहते।”
“क्या मतलब?” आरव का दिल धड़कने लगा।
“मतलब ये कि… अब बहुत देर हो चुकी है,” मीरा की आवाज़ कांप रही थी।
“देर? क्यों? क्या हुआ?” आरव ने बेचैनी से पूछा।
मीरा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और उसे दे दिया।
“ये पढ़ लेना… सब समझ आ जाएगा।”
इतना कहकर वह उठी और धीरे-धीरे बारिश में भीगती हुई वहाँ से चली गई। आरव उसे रोक भी नहीं पाया।
कंपकंपाते हाथों से उसने लिफाफा खोला। उसमें एक चिट्ठी थी—
“प्रिय आरव,
जब तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे होगे, तब शायद मैं तुमसे बहुत दूर जा चुकी होऊँगी।
मुझे तुमसे पहली मुलाकात में ही लग गया था कि तुम वही इंसान हो, जिसकी मुझे तलाश थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक सच्चाई थी, जिसे मैं तुम्हें बताने से डरती रही।
मुझे एक गंभीर बीमारी है… डॉक्टरों ने कहा है कि मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।
मैं नहीं चाहती थी कि तुम मुझसे प्यार करो, क्योंकि मैं तुम्हें अधूरा छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। लेकिन मैं खुद को तुमसे दूर भी नहीं रख पाई।
तुम्हारे साथ बिताया हर पल मेरे लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहा है।
तुम कहते थे ना—‘बस एक सनम चाहिए’?
काश… मैं वही बन पाती, हमेशा के लिए।
लेकिन अब मुझे जाना होगा।
एक वादा करना—मेरे जाने के बाद भी तुम जीना मत छोड़ना। किसी और को अपनी जिंदगी में आने देना। क्योंकि तुम प्यार के लायक हो… पूरा, सच्चा और हमेशा रहने वाला प्यार।
तुम्हारी,
मीरा”
चिट्ठी पढ़ते ही आरव की दुनिया जैसे रुक गई। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह उसी बेंच पर बैठा रहा, घंटों तक… जैसे समय थम गया हो।
अगले दिन वह अस्पतालों में, सड़कों पर, हर जगह मीरा को ढूंढता रहा। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। जैसे वो कभी थी ही नहीं—सिर्फ एक खूबसूरत सपना।
महीने बीत गए। आरव फिर उसी पार्क में जाने लगा, उसी बेंच पर बैठने लगा। लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। उसके चेहरे पर एक दर्द था, लेकिन साथ ही एक सुकून भी—क्योंकि उसने सच्चा प्यार महसूस किया था, भले ही थोड़े समय के लिए।
एक दिन, जब वह बेंच पर बैठा था, एक छोटी-सी लड़की उसके पास आई।
“भैया, ये आपके लिए है,” उसने एक छोटा सा फूल देते हुए कहा।
“किसने भेजा?” आरव ने पूछा।
लड़की ने मुस्कुराकर आसमान की तरफ इशारा किया और दौड़ती हुई चली गई।
आरव ने फूल को देखा और हल्के से मुस्कुरा दिया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं, बल्कि यादों के थे।
उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—
“तुमने कहा था ना, मुझे जीना होगा… मैं जी रहा हूँ, मीरा। लेकिन तुम्हें कभी भूल नहीं पाऊँगा।”
हवा फिर से बहने लगी थी। पेड़ के पत्ते सरसराने लगे थे, जैसे कोई धीमे से गुनगुना रहा हो—
“बस एक सनम चाहिए…”
और उस दिन आरव को समझ आया—
कभी-कभी ज़िंदगी हमें वो नहीं देती जो हम चाहते हैं…
लेकिन वो हमें वो एहसास ज़रूर देती है, जो हमें हमेशा के लिए बदल देता है।
मीरा उसकी ज़िंदगी में आई, थोड़े समय के लिए…
लेकिन उसने उसे सिखा दिया कि सच्चा प्यार वक्त का मोहताज नहीं होता।
आरव अब भी उस पार्क में जाता है। कभी-कभी मुस्कुराता है, कभी आँखें नम हो जाती हैं।
लेकिन अब वह अकेला नहीं है—
क्योंकि उसके दिल में एक कहानी बस गई है…
एक अधूरी, लेकिन बेहद खूबसूरत कहानी—
जिसमें उसे सच में “बस एक सनम” मिला

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

बारिश की हल्की-हल्की बूंदें हवेली की छत पर गिर रही थीं। शाम ढल चुकी थी और आसमान में गहरे बादल किसी अनकहे राज़ को छिपाए बैठे थे। हवेली के बड़े से आँगन में खड़ा आरव दूर आसमान की ओर देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे कोई अधूरी कहानी उसे हर पल पुकार रही हो।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“तुम फिर वही ख्यालों में खो गए?”
आरव ने पलटकर देखा। सामने वही थी—मीरा। वही मासूम चेहरा, लेकिन अब आँखों में एक अजनबीपन था।
“तुम यहाँ क्यों आई हो?” आरव ने थोड़ी सख्ती से पूछा।
मीरा ने हल्की मुस्कान दी, “ये मेरा घर है, भूल गए क्या?”
आरव कुछ कह नहीं पाया। सच ही तो था। ये घर, ये आँगन… सब कभी उनका हुआ करता था।
—
बचपन का रिश्ता
जब मीरा और आरव छोटे थे, तब ही मीरा के बाबा ने आरव से कहा था—
“आरव बेटा, मीरा का हमेशा साथ देना… चाहे जो हो जाए।”
उस दिन आरव ने मासूमियत से सिर हिलाया था—
“मैं हमेशा उसका ख्याल रखूँगा, बाबा।”
तभी से दोनों का रिश्ता तय हो गया था। सब कहते थे—
“ये दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।”
बचपन में मीरा भी यही मानती थी। वह आरव के पीछे-पीछे घूमती रहती थी—
“आरव, तुम मेरे हो… कहीं मत जाना।”
और आरव हँसकर कहता—
“और तुम मेरी हो… हमेशा।”
—
दूरी और बदलता दिल
समय बीता। मीरा पढ़ाई के लिए शहर चली गई। नई दुनिया, नए लोग… और वहीं उसकी मुलाकात हुई कबीर से।
कबीर स्मार्ट था, बातों में जादू था। धीरे-धीरे मीरा को उससे प्यार हो गया।
“आई लव यू, कबीर…” एक दिन उसने कहा।
कबीर मुस्कुराया—
“मैं भी… मीरा।”
लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक सच्चाई छिपी थी, जिसे मीरा समझ नहीं पाई।
—
वापसी और टकराव
कई साल बाद मीरा वापस हवेली आई। आरव वही था—सीधा, सादा, हर वक्त उसकी परवाह करने वाला।
लेकिन अब मीरा बदल चुकी थी।
“तुम हर वक्त मेरे पीछे क्यों रहते हो?” उसने झुंझलाकर कहा।
आरव शांत रहा—
“क्योंकि ये मेरा वादा है।”
“किससे?!” मीरा चिल्लाई।
“तुम्हारे बाबा से… और खुद से भी।”
मीरा हँस पड़ी—
“ये बचपन की बातें हैं, आरव। मैं अब बड़ी हो चुकी हूँ। और… मैं किसी और से प्यार करती हूँ।”
ये सुनकर आरव का दिल जैसे टूट गया, लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—
“अगर वो तुम्हें खुश रखता है… तो मुझे कोई शिकायत नहीं।”
—
सच का सामना
कुछ दिन बाद मीरा ने कबीर को हवेली बुलाया।
“कबीर, हम शादी कब करेंगे?” मीरा ने पूछा।
कबीर ने थोड़ा हिचकते हुए कहा—
“जल्दी… बस कुछ कागज़ी काम बाकी है।”
“कैसा काम?”
कबीर ने सीधा जवाब दिया—
“तुम्हारी प्रॉपर्टी मेरे नाम हो जाए, फिर सब आसान हो जाएगा।”
मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“तो तुम मुझसे नहीं… मेरी दौलत से प्यार करते हो?”
कबीर हँस पड़ा—
“अब समझी?”
मीरा गुस्से में वहाँ से जाने लगी, लेकिन कबीर ने उसे रोक लिया।
“अब तुम कहीं नहीं जाओगी।”
—
कबीर ने मीरा को अपने फार्महाउस में बंद कर दिया। एक अंधेरा कमरा, लोहे की सलाखें… और चारों तरफ खामोशी।
मीरा रोते हुए बोली—
“मुझे जाने दो… प्लीज़…”
कबीर ने ठंडी आवाज़ में कहा—
“जब तक तुम साइन नहीं करोगी, तुम यहीं रहोगी।”
—
उधर हवेली में जब मीरा का पता नहीं चला, तो आरव को कुछ गड़बड़ लगा।
“मीरा खतरे में है…” उसने खुद से कहा।
वह बिना वक्त गंवाए उसे ढूंढने निकल पड़ा। कई घंटों की तलाश के बाद उसे कबीर का ठिकाना मिल गया।
रात का अंधेरा था। आरव चुपचाप फार्महाउस में घुसा। गार्ड्स को चकमा देकर वह उस कमरे तक पहुँचा जहाँ मीरा कैद थी।
“मीरा…” उसने धीरे से पुकारा।
मीरा ने सिर उठाया—
“आरव?!”
उसकी आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।
आरव ने ताला तोड़ा—
“चलो, यहाँ से निकलते हैं।”
—
जैसे ही वे बाहर निकलने लगे, कबीर और उसके आदमी आ गए।
“भाग कहाँ रहे हो?” कबीर ने हँसते हुए कहा।
आरव ने मीरा को पीछे किया—
“तुम मेरे पीछे रहो।”
लड़ाई शुरू हो गई। आरव अकेला था, लेकिन हर वार में उसकी ताकत साफ दिख रही थी।
मीरा डरते हुए बोली—
“आरव… सावधान!”
एक गुंडे ने पीछे से हमला किया, लेकिन आरव ने उसे गिरा दिया।
“मैंने कहा था… मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।”
आखिरकार, आरव ने सबको हरा दिया। कबीर जमीन पर गिरा पड़ा था।
—
असली एहसास
हवेली लौटते समय मीरा चुप थी।
“तुम ठीक हो?” आरव ने पूछा।
मीरा ने धीरे से कहा—
“तुम हमेशा मेरे साथ क्यों रहते हो… जबकि मैं तुम्हें बार-बार दूर करती हूँ?”
आरव मुस्कुराया—
“क्योंकि मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता… चाहे तुम मुझे कितनी भी नफरत करो।”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे—
“मैं गलत थी, आरव… मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं।”
—
प्यार का इज़हार
अगली सुबह, वही आँगन… वही बारिश।
मीरा आरव के पास आई।
“आरव…”
“हाँ?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुमने कहा था ना… ‘तुम मेरी हो’?”
आरव ने हल्की मुस्कान दी—
“वो तो बचपन की बात थी…”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“नहीं… वो आज भी सच है।”
आरव चौंक गया—
“क्या मतलब?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ…”
कुछ पल के लिए समय जैसे थम गया।
“सच?” आरव ने पूछा।
“हाँ… अब समझ आया कि सच्चा प्यार क्या होता है।”
—
अंत
बारिश तेज हो गई। दोनों एक-दूसरे के करीब खड़े थे।
आरव ने धीरे से कहा—
“अब कभी मुझे छोड़कर मत जाना…”
मीरा मुस्कुराई—
“अब कहीं नहीं जाऊँगी… क्योंकि मैं तुम्हारी हूँ।”
आरव ने उसका हाथ थाम लिया—
“और मैं… हमेशा तुम्हारा रहूँगा।”
हवेली के आँगन में उस दिन सिर्फ बारिश नहीं हो रही थी… बल्कि दो दिलों का मिलन भी हो रहा था।
एक अधूरी कहानी आखिरकार पूरी हो गई थी।
“कभी-कभी सच्चा प्यार वही होता है, जो बचपन से हमारे साथ चलता है… बस हमें उसे पहचानने में देर लग जाती है।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।