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टैग: प्यार#दर्द#रोमेंस

  • Epi – 4 king ki जुनून इश्क

    Epi – 4 king ki जुनून इश्क

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एपिसोड 4 जबरदस्ती की शादी

     

    शादी की तैयारी शुरू करो आदर्श की बात सुनकर तृप्ति वहीं खड़ी रह गई उसके चेहरे पर गुस्सा और हैरानी दोनों साफ दिखाई दे रहे थे आदर्श के आदमी ने सिर झुकाकर कहा

    जी सर वह तुरंत कमरे से बाहर चला गया तृप्ति कुछ पल तक दरवाजे की तरफ देखती रही

     

    फिर अचानक आदर्श की तरफ मुड़ी आपने ये क्या कर दिया

    आदर्श ने शांत आवाज में कहा जो जरूरी था जरूरी था

    तृप्ति गुस्से में बोली किसने कहा आपको कि मेरी शादी करवाना जरूरी है आदर्श ने उसकी तरफ देखा मैंने कहा

     

    तृप्ति को उसकी बात पर और गुस्सा आ गया आप कौन होते हैं मेरी जिंदगी का फैसला लेने वाले आदर्श उसके पास आया

    अब तुम्हारी जिंदगी सिर्फ तुम्हारी नहीं है तृप्ति ने हैरानी से पूछा मतलब आदर्श ने बिना किसी भाव के कहा अब तुम मेरी पत्नी हो तृप्ति की आंखों में आंसू आ गए मैं आपकी पत्नी नहीं हूं

     

    आदर्श ने कहा कुछ देर बाद होगी नहीं होगी तृप्ति ने गुस्से में कहा मैं आपसे शादी नहीं करूंगी आदर्श कुछ पल उसे देखता रहा फिर बोला तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है

    तृप्ति ने अपने आंसू पोंछे आपने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी

     

    आदर्श के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया तृप्ति ने आगे कहा मैं अपने घर से इसलिए भागी थी क्योंकि मुझे शादी नहीं करनी थी मैं पढ़ना चाहती थी अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती थी लेकिन यहां आकर भी मुझे वही करना पड़ रहा है जिससे मैं बचकर भागी थी आदर्श ने कहा

    अगर तुम मेरे साथ शादी करोगी तो कोई तुम्हें परेशान नहीं करेगा तृप्ति ने गुस्से में कहा मुझे आपकी सुरक्षा नहीं चाहिए मुझे अपनी आजादी चाहिए

     

    आदर्श ने कुछ नहीं कहा तृप्ति ने अपनी किताब उठाई और उसे अपने सीने से लगा लिया मुझे सिर्फ पढ़ाई करनी है क्या इतनी सी बात समझ नहीं आती आपको आदर्श ने पहली बार उसकी किताब की तरफ ध्यान से देखा तुम्हें पढ़ाई इतनी पसंद है तृप्ति ने तुरंत कहा हां बहुत ज्यादा मैं अपनी जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं

     

    मैं किसी की पत्नी बनकर पूरी जिंदगी नहीं बिताना चाहती

    आदर्श ने शांत आवाज में कहा शादी के बाद भी पढ़ सकती हो तृप्ति ने उसे घूरकर देखा आपको लगता है शादी के बाद सब कुछ इतना आसान होता है आदर्श ने कहा मेरे साथ होगा

    तृप्ति कुछ पल उसे देखती रही फिर बोली आपको अपने ऊपर बहुत भरोसा है

     

    आदर्श ने कहा है तभी बाहर से आवाज आई सर सब तैयारी हो गई है आदर्श ने दरवाजे की तरफ देखा ठीक है तृप्ति घबराकर बोली इतनी जल्दी आदर्श ने कहा विराज को एक घंटे का समय मिला है

     

    उसके पास अब बहुत कम वक्त है तृप्ति ने कहा लेकिन मैं तैयार नहीं हूं आदर्श ने उसकी तरफ देखा तुम दुल्हन की पोशाक में पहले से हो तृप्ति ने अपने लाल जोड़े की तरफ देखा उसकी आंखों में फिर उदासी उतर आई यह जोड़ा मैंने अपनी शादी के लिए नहीं पहना था मैंने तो सोचा था इसे पहनकर अपनी शादी से भाग जाऊंगी

     

    आदर्श ने कहा अब यही तुम्हारी शादी की पोशाक है तृप्ति ने गुस्से में कहा आप बहुत बुरे हैं आदर्श बिना कुछ बोले कमरे से बाहर चला गया

     

    तृप्ति कुछ पल वहीं खड़ी रही फिर उसने अपने आंसू पोंछे

    नहीं मैं हार नहीं मानूंगी वह अपने मन में बोली मैं किसी भी हालत में इस शादी को रोकूंगी तृप्ति कमरे से बाहर निकलने लगी लेकिन दरवाजे के बाहर दो आदमी खड़े थे उन्हें देखकर वह रुक गई मैं बाहर जाऊंगी एक आदमी ने सिर झुकाकर कहा

     

    माफ कीजिए मैडम आपको बाहर जाने की इजाजत नहीं है

    तृप्ति ने गुस्से में कहा मैं कोई कैदी हूं क्या आदमी चुप रहा

    तृप्ति ने दूसरी तरफ जाने की कोशिश की लेकिन वहां भी आदर्श के आदमी खड़े थे तृप्ति समझ गई कि उसे चारों तरफ से घेर लिया गया है वह वापस कमरे में आ गई कुछ देर बाद दरवाजा खुला एक महिला अंदर आई उसके हाथ में कुछ सामान था उसने तृप्ति से कहा मैडम आपको तैयार करना है

     

    तृप्ति ने कहा मुझे कुछ तैयार नहीं होना महिला ने कहा

    सर का आदेश है तृप्ति ने गुस्से में कहा सबको बस उसी का आदेश सुनाई देता है मेरी बात किसी को नहीं सुनाई देती

    महिला चुपचाप खड़ी रही तृप्ति ने कुछ पल उसे देखा

    फिर वह कुर्सी पर जाकर बैठ गई महिला ने उसके बाल ठीक किए

     

    उसके सिर पर दुपट्टा रखा और उसके हाथों में चूड़ियां पहनाने लगी तृप्ति की आंखों से लगातार आंसू निकल रहे थे

    वह अपने हाथों को देख रही थी कुछ घंटे पहले इन्हीं हाथों में उसने किताब पकड़ी थी और अब इन्हीं हाथों में शादी की चूड़ियां थीं

     

    उसे अपनी मां की याद आ गई पापा की याद आ गई

    अपना घर याद आ गया लेकिन फिर उसे याद आया कि उसी घर में उसकी शादी उसकी मर्जी के खिलाफ कराई जा रही थी तभी बाहर से आदर्श की आवाज आई तैयार हो गई

    महिला ने कहा जी सर आदर्श कमरे के अंदर आया

     

    तृप्ति ने उसकी तरफ देखा उसकी आंखें लाल थीं आदर्श कुछ पल उसे देखता रहा लाल जोड़े में तृप्ति बहुत खूबसूरत लग रही थी लेकिन उसके चेहरे की उदासी साफ दिखाई दे रही थी

     

    आदर्श ने कहा चलो तृप्ति ने कोई जवाब नहीं दिया आदर्श ने फिर कहा तृप्ति वह धीरे से उठी लेकिन आगे बढ़ने की बजाय वहीं खड़ी रही मैं आखिरी बार पूछ रही हूं क्या आप ये शादी रोक सकते हैं आदर्श ने कहा नहीं तृप्ति की आंखों से फिर आंसू निकल आए तो याद रखिएगा मैंने ये शादी अपनी मर्जी से नहीं की

     

    आदर्श ने उसकी तरफ देखते हुए कहा मुझे पता है तृप्ति ने कहा और मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी आदर्श ने कुछ नहीं कहा दोनों कमरे से बाहर निकल गए घर का पूरा हॉल फूलों से सजाया गया था बीच में शादी का मंडप तैयार था

    आदर्श के परिवार के कुछ लोग भी वहां मौजूद थे सभी की नजरें तृप्ति पर थीं

     

    तृप्ति को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी सपने में चल रही हो लेकिन ये सपना नहीं था ये उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला था आदर्श मंडप के पास जाकर बैठ गया तृप्ति भी उसके सामने बैठ गई पंडित ने मंत्र पढ़ना शुरू किया तृप्ति बार बार आदर्श की तरफ देख रही थी

     

    आदर्श का चेहरा बिल्कुल शांत था जैसे उसके लिए ये सिर्फ एक फैसला हो लेकिन तृप्ति के लिए उसकी पूरी जिंदगी बदल रही थी पंडित ने कहा वर वधू एक दूसरे को माला पहनाएं तृप्ति ने माला उठाई उसके हाथ कांप रहे थे

     

    वह आदर्श की तरफ देखने लगी आदर्श ने उसकी तरफ देखा

    तृप्ति ने धीरे से माला उसके गले में डाल दी फिर आदर्श ने माला उठाई तृप्ति पीछे हटना चाहती थी लेकिन आदर्श ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा अब पीछे मत हटो तृप्ति ने गुस्से से उसकी तरफ देखा

     

    आदर्श ने उसके गले में माला डाल दी पंडित ने विवाह की रस्में आगे बढ़ाईं कुछ देर बाद आदर्श ने तृप्ति की मांग में सिंदूर भर दिया तृप्ति की आंखों से आंसू बहने लगे फिर आदर्श ने उसके गले में मंगलसूत्र पहना दिया पंडित ने कहा

    अब से आप दोनों पति पत्नी हैं तृप्ति ने अपनी आंखें बंद कर लीं

     

    उसके मन में सिर्फ एक बात चल रही थी उसकी जिंदगी बदल चुकी थी आदर्श ने उसकी तरफ देखा फिर शांत आवाज में कहा अब तुम मेरी पत्नी हो तृप्ति ने आंखें खोलकर उसे देखा और गुस्से में बोली हां लेकिन याद रखिएगा ये शादी मेरी मर्जी से नहीं हुई है आदर्श ने कहा

    मुझे पता है

     

    तृप्ति ने अपने आंसू पोंछे और कहा मैंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ खो दिया है लेकिन मैं अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ूंगी आदर्श ने उसकी तरफ देखा मैं तुम्हें पढ़ने से नहीं रोकूंगा तृप्ति कुछ पल चुप रही फिर बोली और मैं आपको अपना पति कभी नहीं मानूंगी आदर्श की आंखों में हल्की सी चमक आई समय के साथ सब बदल जाता है तृप्ति ने तुरंत कहा

    मेरे मामले में नहीं बदलेगा आदर्श कुछ नहीं बोला तभी उसके फोन पर कॉल आया उसने फोन उठाया दूसरी तरफ से उसके आदमी ने कहा सर विराज राणा को शादी की खबर मिल गई है आदर्श ने पूछा उसने क्या कहा आदमी ने धीमी आवाज में कहा

     

    उसने कहा है कि अब वह सिर्फ तृप्ति को नहीं बल्कि आपकी पूरी सल्तनत को खत्म करेगा आदर्श की आंखों में खतरनाक चमक आ गई उसने फोन काट दिया तृप्ति ने घबराकर पूछा

    क्या हुआ आदर्श ने उसकी तरफ देखा अब असली खेल शुरू होगा तृप्ति कुछ समझ पाती उससे पहले बाहर अचानक गोलियों की आवाज गूंज उठी और पूरी हवेली में अफरा तफरी मच गई

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

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    Lakshmi Kumari

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  • Epi – 2 king ka junoon इश्क

    Epi – 2 king ka junoon इश्क

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एपिसोड – 2 किंग के घर में घुसपैठ

     

    दोनों की नजरें एक-दूसरे से टकरा रही थीं नीचे खड़ी तृप्ति की सांसें तेज चल रही थीं। उसके बाल बिखर चुके थे और भारी लहंगा संभालते-संभालते उसकी हालत खराब हो चुकी थी।

     

    वहीं ऊपर बालकनी में खड़ा आदर्श बिल्कुल शांत था काले रंग की शर्ट की आस्तीन उसकी कोहनी तक मुड़ी हुई थी। चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। उसकी आंखें बस सामने खड़ी उस लड़की को देख रही थीं तृप्ति कुछ सेकंड तक उसे देखती रही फिर धीरे से खुद से बोली ये कौन है?”

     

    आदर्श ने नीचे खड़े अपने गार्ड की तरफ देखा ये लड़की यहां कैसे आई उसकी आवाज बहुत शांत थी, लेकिन उसमें ऐसा रौब था कि गार्ड तुरंत सीधा खड़ा हो गया।

     

    “सर हमें नहीं पता। ये अचानक गेट के अंदर भागती हुई आई तभी बाहर से उन आदमियों की आवाज सुनाई दी जो तृप्ति का पीछा कर रहे थे लड़की अंदर गई है तृप्ति की आंखें डर से बड़ी हो गईं उसने पीछे देखा दो आदमी गेट के बाहर खड़े थे तृप्ति तुरंत पलटकर ऊपर आदर्श की तरफ देखने लगी आदर्श अब भी उसे ही देख रहा था।

     

    तृप्ति ने बिना सोचे अपने दोनों हाथ जोड़ दिए प्लीज मुझे बचा लीजिए आदर्श की भौंहें हल्की सी ऊपर उठीं क्यों तृप्ति ने घबराकर कहा क्योंकि वो लोग मुझे पकड़ने आए हैं आदर्श कुछ नहीं बोला।

     

    तृप्ति ने जल्दी से अपनी बात आगे बढ़ाई। देखिए, मैं आपको परेशान नहीं करूंगी। बस थोड़ी देर के लिए छुपा लीजिए। उसके बाद मैं चली जाऊंगी आदर्श की नजर उसके शादी के जोड़े पर गई तुम दुल्हन हो तृप्ति ने अपने लहंगे की तरफ देखा।

     

    हां फिर कुछ सोचकर बोली मतलब थी आदर्श की आंखें सिकुड़ गईं मतलब तृप्ति ने परेशान होकर कहा शादी होने वाली थी मेरी। और और मैं भाग गई।”

     

    आदर्श पहली बार कुछ सेकंड के लिए चुप हो गया उसे समझ नहीं आया कि उसके घर के अंदर घुस आई यह लड़की आखिर चाहती क्या है।

     

    तृप्ति ने उसे चुप देखकर कहा आप ऐसे मुझे देख क्यों रहे हैं? मैंने चोरी नहीं की है आदर्श ने ठंडी आवाज में पूछा तो मेरे घर में घुसा क्या है तृप्ति के पास इसका कोई जवाब नहीं था वह कुछ पल चुप रही।

     

    फिर धीरे से बोली वो गलती हो गई आदर्श ने नीचे अपने गार्ड की तरफ देखा इसे बाहर निकालो तृप्ति की आंखें फैल गईं क्या गार्ड उसकी तरफ बढ़ने लगे।

     

    तृप्ति तुरंत पीछे हट गई नहीं नहीं प्लीज वह जल्दी से आदर्श की तरफ देखने लगी आप मुझे बाहर निकाल देंगे तो वो लोग मुझे पकड़ लेंगे आदर्श की आवाज पहले जैसी ही ठंडी थी वो तुम्हारी समस्या है।”

     

    तृप्ति हाथ जोर कर बोली “लेकिन अभी मैं आपके घर में हूं आदर्श शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा यही तुम्हारी सबसे बड़ी गलती है तृप्ति कुछ पल उसे देखती रही। फिर बुदबुदाइ इतना बड़ा घर है, एक लड़की को थोड़ी देर छुपाने से क्या हो जाएगा आदर्श ने उसकी बात सुन ली।

     

    “क्या कहा तृप्ति तुरंत मुस्कुरा दी मैंने कहा आपका घर बहुत अच्छा है आदर्श उसे घूरने लगा तृप्ति ने नजरें झुका लीं उसी समय बाहर खड़े दोनों आदमी गेट पर पहुंच गए।

     

    “लड़की अंदर आई है। हमें उसे लेकर जाना है गार्ड ने उन्हें रोक दिया यह प्राइवेट प्रॉपर्टी है। बिना अनुमति अंदर नहीं आ सकते वह आदमी अकड़कर बोला तुम जानते नहीं हो हम किसके आदमी हैं।”

     

    तभी ऊपर से आदर्श की आवाज आई उन्हें अंदर आने दो गार्ड तुरंत पीछे हट गए दोनों आदमी अंदर आए और पूरे घर में नजर दौड़ाने लगे।

     

    तृप्ति घबरा गई वह इधर-उधर देखने लगी उसे कहीं छुपने की जगह नहीं मिल रही थी तभी आदर्श सीढ़ियों से नीचे आने लगा उसके हर कदम के साथ घर का माहौल और शांत होता जा रहा था।

     

    दोनों आदमी जैसे ही आदर्श के सामने पहुंचे, उनकी आंखों में अचानक डर दिखाई देने लगा उन्होंने आदर्श को पहचान लिया था उनमें से एक ने तुरंत अपना सिर झुका लिया सर हमें पता नहीं था कि ये आपका घर है

     

    आदर्श ने बिना कोई भाव दिखाए पूछा किसे ढूंढ रहे हो, गुंडे डरते हुए कहा एक लड़की को आदर्श संत आवाज में पूछा कौन सी लड़की वह आदमी कुछ बोलने ही वाला था कि उसकी नजर पीछे खड़ी तृप्ति पर चली गई उसका चेहरा खिल उठा यही है वह तृप्ति की तरफ बढ़ने लगा लेकिन अगले ही पल आदर्श ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    घर में सन्नाटा छा गया आदर्श ने उसकी कलाई इतनी मजबूती से पकड़ी कि वह आदमी दर्द से कराह उठा मेरे घर में घुसकर… मेरी इजाजत के बिना किसी को हाथ लगाने की हिम्मत कैसे हुई?”

     

    वह आदमी डरते हुए बोला सर, हम बस अपना काम “बाहर” आदर्श ने सिर्फ एक शब्द कहा गार्ड तुरंत आगे आए और दोनों आदमियों को बाहर ले जाने लगे तृप्ति वहीं खड़ी आदर्श को देख रही थी।

     

    उसकी आंखों में अब डर के साथ-साथ हैरानी भी थी आपने मुझे बचा लिया आदर्श ने उसकी तरफ देखा मैंने तुम्हें नहीं बचाया तृप्ति का चेहरा उतर गया फिर?”

     

    “मैंने उन्हें अपने घर में तमाशा करने से रोका है। तृप्ति कुछ सेकंड उसे देखती रही फिर धीरे से मुस्कुराई मतलब बचाया तो है आदर्श ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह ऊपर जाने लगा तृप्ति उसके पीछे चल पड़ी सुनिए आदर्श रुक गया क्या मुझे थोड़ी देर यहां रहने देंगे नहीं थोड़ी देर मतलब बस आज की रात नहीं कुछ घंटे नहीं एक घंटा आदर्श ने पलटकर उसे देखा तृप्ति चुप हो गई फिर धीरे से बोली आधा घंटा आदर्श ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    उसे पहली बार लगा कि इस लड़की को चुप करवाना शायद उसके किसी दुश्मन को हराने से भी ज्यादा मुश्किल होगा।

    तुम्हारा नाम क्या है तृप्ति पूरा नाम तृप्ति शर्मा आदर्श कुछ पल उसे देखता रहा और तुम मेरे घर तक पहुंची कैसे?”

     

    तृप्ति ने पूरी कहानी बतानी शुरू कर दी आज मेरी शादी थी। मुझे शादी नहीं करनी थी। मैं पढ़ना चाहती हूं। लेकिन मेरे पापा ने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए मैं घर से भाग गई आदर्श चुपचाप सुनता रहा।

     

    तृप्ति ने आगे कहा फिर कुछ लोग मेरे पीछे पड़ गए। मुझे लगा वो मेरे घरवालों के लोग हैं, लेकिन वो किसी विराज राणा का नाम ले रहे थे। आदर्श का चेहरा अचानक बदल गया उसकी आंखों में एक पल के लिए कठोरता आ गई विराज राणा तृप्ति ने सिर हिलाया हां। वही शायद जिससे मेरी शादी होनी थी आदर्श कुछ सेकंड तक शांत रहा फिर उसने पूछा तुम्हें पता है विराज राणा कौन है

     

    तृप्ति ने मासूमियत से सिर हिलाया नहीं आदर्श ने उसे गौर से देखा तुम्हें अंदाजा भी नहीं कि तुम किस मुसीबत से भागकर यहां आई हो तृप्ति ने धीरे से कहा तो अब क्या करूं आदर्श कुछ बोलता, उससे पहले बाहर से उसका एक आदमी तेजी से अंदर आया। सर

     

    आदर्श ने उसकी तरफ देखा क्या हुआ बाहर विराज राणा के आदमी अभी भी मौजूद हैं तृप्ति की सांस रुक गई आदर्श का चेहरा बिल्कुल शांत था

     

    वह कुछ पल सोचता रहा फिर उसने तृप्ति की तरफ देखा आज रात तुम कहीं नहीं जाओगी। तृप्ति ने राहत की सांस ली लेकिन अगले ही पल आदर्श की अगली बात सुनकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई तुम मेरे कमरे में रहोगी तृप्ति की आंखें पूरी तरह फैल गईं क्या आदर्श बिना कोई जवाब दिए अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

     

    तृप्ति उसके पीछे खड़ी उसे देखती रही। फिर खुद से बोली हे भगवान शादी से भागी थी और अब पता नहीं किस मुसीबत में फंस गई लेकिन तृप्ति को अभी यह नहीं पता था कि जिस आदमी के कमरे में वह आज मजबूरी में जाने वाली थी वही आदमी अगले कुछ घंटों में उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाला था।

     

    क्या करेगा आदर्श तृप्ति के साथ, क्या वो तृप्ति की मदद के नाम पर कुछ और करना चाहता है। चलिए आगे जानते हैं। 

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    Lakshmi Kumari

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  • Epi – 1 King ka junoon इश्क

    Epi – 1 King ka junoon इश्क

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

     

    एपिसोड – 1 शादी से फरार

     

    शर्मा हवेली आज दुल्हन की तरह सजी हुई थी। पूरे घर में रोशनी लगी हुई थी। आंगन में फूलों से सजावट की गई थी और घर के बाहर मेहमानों की गाड़ियां लगातार आ-जा रही थीं। घर के अंदर हर तरफ शादी की तैयारियां चल रही थीं।

    लेकिन उसी घर के एक कमरे में बैठी तृप्ति शर्मा का चेहरा बिल्कुल उतरा हुआ था।

     

    तृप्ति लाल रंग के भारी लहंगे में दुल्हन बनी हुई शीशे के सामने बैठी थी। उसके बालों में गजरा लगा हुआ था, माथे पर बड़ी सी बिंदी और मांग में सिंदूर की जगह अभी सिर्फ लाल रंग की मांग थी।

     

    उसने अपने चेहरे को शीशे में देखा और फिर धीरे से अपना सिर पकड़ लिया। तृप्ति बड़बड़ाते हुए कहती है, “हे भगवान! ये क्या हो रहा है मेरे साथ? अभी मेरी जिंदगी शुरू भी नहीं हुई और मेरे पापा ने उसे खत्म करने का पूरा इंतजाम कर दिया।”

     

    वह कुछ पल चुप रहती है फिर शीशे में खुद को देखते हुए कहती है, “तृप्ति शर्मा, तू आज से पढ़ाई करेगी या किसी ऐसे आदमी की पत्नी बनेगी जिसका नाम सुनकर लोग डरते हैं?”

     

    तभी कमरे का दरवाजा खुलता है। तृप्ति की मां अंदर आती हैं। वह तृप्ति को देखकर हल्की सी मुस्कुराती हैं और उसके पास आकर बैठ जाती हैं। “बहुत खूबसूरत लग रही है मेरी बेटी।” तृप्ति तुरंत अपनी मां की तरफ देखती है। “मां, आपको सच में लगता है कि मैं खूबसूरत लग रही हूं?”

     

    मा ने कहा “हां बेटा तू खूबसूरत है तभी तो बोल रही हूं”

    तृप्ति उदास हो गई वो धीरे से कहती है “मुझे तो लग रहा है मैं ऐसी लग रही हूं जैसे किसी ने मुझे लाल रंग के पर्दे में लपेट दिया हो।”

     

    उसकी मां उसकी बात सुनकर हंस देती हैं। लेकिन अगले ही पल तृप्ति का चेहरा फिर गंभीर हो जाता है। “मां, आखिरी बार पूछ रही हूं… क्या आप पापा को रोक नहीं सकतीं?”

     

    उसकी मां चुप हो जाती हैं। तृप्ति की आंखों में बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। “मैं शादी नहीं करना चाहती मां। मुझे पढ़ना है। मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है। मैं अपनी जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं।”

     

    उसकी मां धीरे से उसका हाथ पकड़ती हैं। “बेटा, तेरे पापा ने सब सोच-समझकर फैसला किया है।” तृप्ति हाथ छुड़ाते हुए कहा “लेकिन मेरी जिंदगी के बारे में फैसला करने से पहले मुझसे तो पूछ लेते।”

     

    तृप्ति की आवाज थोड़ी ऊंची हो जाती है। “मुझे उस आदमी के बारे में कुछ नहीं पता। मैंने उसे ठीक से देखा तक नहीं है। सिर्फ इसलिए शादी कर लूं क्योंकि पापा ने रिश्ता तय कर दिया?”

     

    उसकी मां कुछ बोलतीं, उससे पहले बाहर से किसी के आने की आवाज आती है। तृप्ति तुरंत चुप हो जाती है। दरवाजा खुलता है और उसके पिता नीरज जी अंदर आते हैं। तृप्ति उन्हें देखते ही मुंह दूसरी तरफ कर लेती है। उसके पिता उसके पास आकर कहते हैं, “तृप्ति, मेहमान आने शुरू हो गए हैं। कुछ देर में बारात भी पहुंचने वाली है। अब कोई तमाशा मत करना।”

     

    तृप्ति तुरंत उनकी तरफ मुड़ती है। “पापा, मैं तमाशा नहीं कर रही हूं। मैं सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में बोल रही हूं।”

     

    नीरज जी उसकी बात सुनकर कहते हैं “और मैं तुम्हारा पिता हूं। मुझे पता है तुम्हारे लिए क्या सही है।”

     

    तृप्ति की आंखों में आंसू आ जाते हैं। “नहीं पापा आपको पता है कि आपके लिए क्या सही है। मेरे लिए क्या सही है, मेरी जिंदगी का फैसला मुझे करने दीजिए।”

     

    उसके नीरज जी गुस्से में उसकी तरफ देखते हैं। “बहुत हो गया। आज तुम्हारी शादी है और आज के बाद तुम्हें अपने पति के घर जाना है।” तृप्ति कुछ पल उन्हें देखती रहती है।

    फिर धीरे से पूछती है, “अगर मैं शादी नहीं करना चाहूं तो?”

     

    कमरे में अचानक खामोशी छा जाती है। नीरज जी सख्त आवाज में कहते हैं, “तुम्हें शादी करनी ही होगी।” इतना कहकर वह कमरे से बाहर चले जाते हैं। दरवाजा बंद होते ही तृप्ति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।

     

    उसकी मां उसे समझाने की कोशिश करती हैं, लेकिन तृप्ति कुछ नहीं बोलती। कुछ देर बाद उसकी मां भी बाहर चली जाती हैं। कमरे में अब सिर्फ तृप्ति थी। तृप्ति कुछ देर तक दरवाजे को देखती रहती है। फिर अचानक उसकी नजर खिड़की पर जाती है।

     

    उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आती है। “शादी नहीं करनी मुझे ?” वह धीरे से कहती है। “लेकिन आप मेरी शादी करवाना चाहते हैं ना पापा तो ठीक है पापा… देखते हैं किसकी शादी करवाते हैं आप।

     

    तृप्ति जल्दी से अपनी अलमारी खोलती है। वह अपना छोटा सा बैग निकालती है और उसमें कुछ कपड़े, पैसे और अपनी जरूरी किताबें रखने लगती है। फिर वह अपनी सबसे पसंदीदा किताब हाथ में लेकर उसे बैग में रखने लगती है।

     

    कुछ देर बाद तृप्ति अपनी शादी का भारी लहंगा थोड़ा संभालती है और खिड़की से नीचे देखती है। नीचे कोई नहीं था। वह धीरे-धीरे खिड़की से बाहर निकलती है और एक पाइप के सहारे नीचे उतरने लगती है। कुछ ही देर में वह घर के पीछे पहुंच जाती है।

     

    तृप्ति अपने लहंगे को संभालते हुए दौड़ने लगती है। कुछ दूर जाकर वह रुकती है और पीछे मुड़कर अपने घर को देखती है। उसकी आंखों में आंसू थे। “माफ करना मां।” वह धीरे से कहती है। “लेकिन मैं अपनी जिंदगी किसी ऐसे इंसान के साथ नहीं बिताना चाहती जिसे मैंने देखा तक नहीं है।”

     

    फिर वह तेजी से वहां से निकल जाती है। उसे नहीं पता था कि उसकी यह छोटी सी भागने की कोशिश उसे ऐसी जगह पहुंचाने वाली थी जहां उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी। दूसरी तरफ शर्मा हवेली में कुछ देर बाद तृप्ति की मां उसे बुलाने के लिए कमरे में आती हैं। कमरा खाली देखकर उनके होश उड़ जाते हैं। “तृप्ति?” वह पूरे कमरे में देखती हैं। “तृप्ति!” तभी उनकी नजर खुली हुई खिड़की पर जाती है।

     

    वह घबराकर बाहर देखती हैं। कुछ ही मिनटों में पूरे घर में हड़कंप मच जाता है। तृप्ति के पिता को जैसे ही पता चलता है कि तृप्ति घर से भाग गई है, उनका चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। वह तुरंत फोन निकालते हैं।

     

    लेकिन उसी समय एक और फोन बजता है। फोन के दूसरी तरफ से एक आदमी की आवाज आती है। “तृप्ति घर से भाग गई है।” कुछ सेकंड की खामोशी के बाद दूसरी तरफ से भारी आवाज आती है। “क्या कहा?”

     

    ” फोन पर बात करने वाला आदमी आदिल विराज राणा का खास आदमी था “तृप्ति शादी से पहले ही घर से भाग गई।

     

     

    विराज राणा। एशिया की अंधेरी दुनिया का जाना-पहचाना नाम। जिसके नाम से बड़े-बड़े लोग डरते थे। विराज ने तृप्ति से शादी करने का फैसला किया था और आज उसी से शादी थी। लेकिन तृप्ति उसके घर पहुंचने से पहले ही गायब हो चुकी थी।

     

    विराज कुर्सी पर बैठा हुआ था। उसके सामने शराब का गिलास रखा था, लेकिन इस समय उसका पूरा ध्यान फोन पर था। वह धीमी आवाज में पूछता है, “कहां गई है?”

     

    आदिल कहता है “पता नहीं सर। उसके घरवालों को भी नहीं पता।” विराज की आंखों में गुस्सा उतर आता है। “मुझे लड़की चाहिए।”

     

    आदिल कॉल पर कहता है “जी सर।”

     

    “और याद रखना… वो जितनी जल्दी मिल जाए, उतना अच्छा है।” विराज बोल कर कॉल कट कर देता है।

     

    विराज अपने सामने बैठे आदमी की तरफ देखता है।

    “मेरे आदमी पूरे शहर में भेजो।”

     

    उसका असिस्टेंट विक्रम कहता है “सर, अगर वो शहर से बाहर चली गई तो?” विराज हल्का सा मुस्कुराता है। “वो ज्यादा दूर नहीं जा सकती।”

     

    फिर उसकी आवाज सख्त हो जाती है। “लेकिन अगर किसी ने उसे मुझसे पहले ढूंढ लिया… तो उसे जिंदा मत छोड़ना।”

    उधर तृप्ति को कुछ भी पता नहीं था कि उसके पीछे कितने लोग लग चुके हैं।

     

    वह अपनी भारी शादी की ड्रेस संभालते हुए सड़क पर भाग रही थी। कुछ दूर जाकर उसे एक सुनसान सड़क दिखाई दी।

    वह थककर वहां खड़ी हो गई। “हे भगवान… शादी से भागना इतना मुश्किल होता है, ये आज पता चला।”

     

    वह हांफते हुए कहती है। तभी दूर से एक काली गाड़ी तेजी से उसकी तरफ आती दिखाई देती है। तृप्ति पहले तो सामान्य समझकर खड़ी रहती है। लेकिन जैसे ही गाड़ी उसके पास आकर रुकती है, उसके अंदर डर की लहर दौड़ जाती है।

     

    गाड़ी से दो आदमी नीचे उतरते हैं। एक आदमी तृप्ति की तरफ देखकर कहता है, “यही है।” तृप्ति का चेहरा सफेद पड़ जाता है।ब“कौन…?”

     

    वह पीछे हटती है। दूसरा आदमी आगे बढ़ता है। “चलो हमारे साथ।” तृप्ति तुरंत समझ जाती है कि ये लोग उसके घर से नहीं आए हैं। वह पीछे मुड़कर दौड़ पड़ती है। “अरे पकड़ो इसे!”

     

    दोनों आदमी उसके पीछे भागते हैं। तृप्ति अपनी पूरी ताकत से दौड़ रही थी। भारी लहंगा उसके पैरों में बार-बार फंस रहा था। वह पीछे मुड़कर देखती है।

     

    दोनों आदमी उसके बिल्कुल पीछे थे। “हे भगवान! आज तो शादी से बचने के चक्कर में जान से ही जाऊंगी!” वह दौड़ते हुए चिल्लाती है।

     

    सामने सड़क दो हिस्सों में बंट रही थी। तृप्ति बिना सोचे दाईं तरफ मुड़ जाती है। कुछ दूर जाने के बाद उसे सामने एक बहुत बड़ा काला गेट दिखाई देता है। गेट के दोनों तरफ हथियार लिए सिक्योरिटी गार्ड खड़े थे।

     

    तृप्ति एक पल के लिए रुकती है। फिर पीछे देखती है। वे आदमी अब भी उसका पीछा कर रहे थे। तृप्ति बिना कुछ सोचे उस बड़े गेट की तरफ भागती है। “बचाओ!” वह चिल्लाती हुई गेट के अंदर घुस जाती है।

     

    गार्ड उसे रोकने के लिए आगे बढ़ते हैं। तृप्ति हाथ जोड़कर कहती है, “प्लीज मुझे मत रोकिए! मेरे पीछे बहुत बुरे लोग पड़े हैं।” गार्ड एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं।

     

    तभी ऊपर खड़ी बालकनी में एक आदमी आकर रुकता है।

     

    काले कपड़े, गंभीर चेहरा और आंखों में ऐसी खामोशी कि सामने वाला खुद डर जाए। वह नीचे खड़ी दुल्हन को देखता है। उसकी नजर तृप्ति पर टिक जाती है। और उसी पल तृप्ति की नजर भी ऊपर उठती है। दोनों की पहली नजर एक-दूसरे से मिलती है।

    तृप्ति को नहीं पता था कि वह किसके घर में घुस चुकी है।

    लेकिन जिस आदमी के सामने पूरी दुनिया सिर झुकाती थी…

    उसकी जिंदगी में आज पहली बार कोई लड़की खुद भागकर उसके घर आई थी। और वो लड़की थी तृप्ति शर्मा।

     

    दोस्तो आपको क्या लगता है तृप्ति किसके घर घुस गई है क्या वो विराज के घर घुस गई है जिसे शादी करने से बचने के लिए भागी थी या कोई और है चलिए जानते हैं आगे।

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    श्री कृष्ण लीला प्रतियोगिता

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग = 1 “जिस दिन नंदलाल ने गोकुल में कदम रखा”

    🌸 एक ऐसी शुरुआत, जहाँ जन्म लेता है सिर्फ़ एक बालक नहीं… बल्कि पूरी दुनिया का विश्वास! 🌸

    गोकुल की उस सुबह में कुछ अलग ही बात थी। सूरज रोज़ की तरह ही निकला था, यमुना की लहरें भी रोज़ की तरह ही बह रही थीं, गायों की घंटियाँ भी वही मधुर संगीत सुना रही थीं, लेकिन फिर भी वातावरण में एक अनजानी-सी खुशी तैर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी बहुत बड़े उत्सव की तैयारी कर रही हो। पेड़ों पर बैठे पक्षी बिना किसी कारण चहचहा रहे थे, फूल अपनी खुशबू पहले से कहीं अधिक बिखेर रहे थे और यमुना का जल भी जैसे आज कुछ ज्यादा ही शांत था। किसी को पता नहीं था कि आज से संसार की एक ऐसी कथा शुरू होने वाली है। जिसे युगों-युगों तक प्रेम, भक्ति और धर्म के नाम से याद किया जाएगा। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के जीवन की सबसे कठिन रात चल रही थी। कंस का अत्याचार अपनी सीमा पार कर चुका था। देवकी की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक अद्भुत विश्वास भी था। उन्हें पता था कि उनके गर्भ में पल रहा बालक साधारण नहीं है। वही बालक कंस के अत्याचार का अंत करने वाला था। आधी रात का समय हुआ। चारों ओर घना अंधकार था। अचानक जेल की कोठरी दिव्य प्रकाश से भर उठी। देवकी और वसुदेव ने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान श्रीहरि का दिव्य रूप प्रकट हुआ है। उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जिसे देखकर भय भी जैसे अपना रास्ता भूल जाए। भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे उन्हें लेकर गोकुल जाएँ और वहाँ नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस लौट आएँ। वसुदेव ने अपने नवजात पुत्र को टोकरी में रखा और जैसे ही जेल से बाहर निकलने का प्रयास किया, चमत्कार होने लगे। जिन दरवाजों पर भारी पहरे थे, वे अपने आप खुलते चले गए। पहरेदार गहरी नींद में सो गए। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय भी उस बालक के मार्ग में झुक गया हो। वसुदेव अपने सिर पर नन्हे कृष्ण को लेकर यमुना की ओर बढ़े। उस रात बारिश बहुत तेज़ थी। बादल गरज रहे थे और बिजली आकाश को चीर रही थी। वसुदेव के कदम डगमगा रहे थे, लेकिन उनके मन में केवल एक ही बात थी।

     

    “मुझे अपने लाल को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।” जैसे ही वे यमुना के पास पहुँचे, नदी उफान पर थी। वसुदेव ने कृष्ण को और मजबूती से थाम लिया और धीरे-धीरे पानी में उतर गए। तभी एक अद्भुत दृश्य हुआ। शेषनाग ने अपना विशाल फन फैलाकर बाल कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। बारिश की बूंदें कृष्ण तक पहुँचने से पहले ही उस दिव्य छत्र पर गिरने लगीं। यमुना भी जैसे अपने आराध्य को पहचान गई। उसका जल धीरे-धीरे शांत होने लगा। वसुदेव आगे बढ़ते गए और अंततः गोकुल पहुँच गए। वहाँ नंद बाबा के घर सब लोग गहरी नींद में थे। वसुदेव ने चुपचाप कृष्ण को यशोदा माता के पास सुलाया और वहाँ जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर वापस मथुरा लौट गए। किसी को पता तक नहीं चला कि उसी रात गोकुल की धरती पर स्वयं प्रेम ने जन्म लिया है। सुबह होते ही गोकुल में अचानक शंख, नगाड़े और ढोल बजने लगे। नंद बाबा के घर पुत्र जन्म की खबर फैल चुकी थी। “नंद के घर आनंद भयो!” की आवाज़ हर गली में गूँज उठी। गोपियाँ अपने घरों से दौड़ती हुई नंद भवन की ओर आने लगीं। किसी के हाथ में दही था।

     

     

    किसी के हाथ में मक्खन, कोई फूल लेकर आई थी तो कोई बालक के लिए नए वस्त्र। यशोदा मैया अपने लाल को गोद में लेकर बस निहारती ही रह गईं। उनके लिए संसार में उस समय सबसे सुंदर कोई था तो वह उनका नन्हा कान्हा था। बाल कृष्ण की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। यशोदा ने प्यार से उनके माथे को चूमा और कहा, “मेरे लाल, तू हमेशा ऐसे ही मुस्कुराता रहना।” उन्हें क्या पता था कि जिस बालक को वे अपना बेटा समझकर गोद में झुला रही हैं, वही आने वाले समय में लाखों दिलों का सहारा बनने वाला है। गोकुल में उत्सव शुरू हो गया। नंद बाबा ने पूरे गाँव में मिठाइयाँ बँटवाईं। गोप-ग्वाल बालक नाचने लगे। गोपियाँ गीत गाने लगीं। हर तरफ़ रंग, फूल और खुशियाँ थीं। लेकिन इसी खुशी के बीच मथुरा में कंस को जैसे किसी अनहोनी का एहसास हो गया। उसे खबर मिली कि देवकी के घर आठवीं संतान का जन्म हो चुका है। कंस तुरंत जेल की ओर दौड़ा। उसके चेहरे पर क्रोध था। उसने नवजात कन्या को देखा और उसे समाप्त करने के लिए उसे ऊपर उठाया। लेकिन तभी वह कन्या उसके हाथों से छूटकर आकाश में दिव्य रूप में प्रकट हो गई। उसने कंस को चेतावनी दी कि “जिससे तू डरता है, वह जन्म ले चुका है और वह तेरे अंत का कारण बनेगा।” कंस के चेहरे का रंग उड़ गया। अब उसका डर और भी बढ़ गया। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे गोकुल और आसपास के सभी गाँवों में जन्मे नवजात बालकों पर नज़र रखें। उधर गोकुल में कृष्ण की बाल लीलाएँ शुरू हो चुकी थीं। कोई उन्हें नंदलाल कहता। 

     

    कोई कान्हा, कोई माखनचोर, तो कोई लड्डू गोपाल। यशोदा मैया का पूरा संसार ही अपने कान्हा के इर्द-गिर्द घूमने लगा। कृष्ण धीरे-धीरे बड़े होने लगे। उनकी शरारतें पूरे गोकुल में प्रसिद्ध होने लगीं। कभी वे किसी के घर से माखन चुरा लेते, कभी गोपियों की मटकी छिपा देते, कभी ग्वाल-बालों के साथ मिलकर ऐसी शरारत करते कि पूरा गाँव हँसने लगता। एक दिन कई गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास पहुँचीं। “मैया! आपका कान्हा हमारे घर से माखन चुरा ले जाता है।” यशोदा ने कृष्ण को देखा और पूछा, “कान्हा, तूने माखन चुराया?” कृष्ण ने मासूमियत से सिर हिलाया, “नहीं मैया!” एक गोपी तुरंत बोली, “मैया, इसके मुँह पर माखन लगा है!” कृष्ण ने तुरंत अपना मुँह पोंछा और बोले, “मैया, ये तो बिल्ली ने लगाया होगा!” यह सुनते ही सब गोपियाँ हँस पड़ीं। यशोदा भी अपनी हँसी रोक नहीं पाईं। लेकिन कान्हा की शरारत यहीं नहीं रुकी। अगले दिन उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर टंगी थी। ग्वाल-बाल एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते गए और सबसे ऊपर कृष्ण जा पहुँचे। उन्होंने मटकी उतारी और सबको माखन बाँट दिया। कुछ माखन बंदरों को भी खिला दिया। तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

     

    “कान्हा!” कृष्ण ने पलटकर देखा। सामने यशोदा मैया खड़ी थीं। सब ग्वाल-बाल भाग गए, लेकिन कृष्ण वहीं खड़े रहे। यशोदा ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोलीं, “आज तो तुझे पकड़ ही लिया।” कृष्ण ने मासूम बनकर कहा, “मैया, मैंने क्या किया?” यशोदा बोलीं, “माखन चोरी!” कृष्ण मुस्कुराकर बोले, “मैया, माखन तो आपका है, मैं भी तो आपका हूँ… फिर चोरी कैसी?” यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने दिखावे के लिए डाँटते हुए कहा, “बहुत बातें बनाने लगे हो!” कृष्ण की आँखों में शरारत चमकी। वह भागने लगे और यशोदा उनके पीछे दौड़ पड़ीं। पूरा गोकुल इस दृश्य को देखकर मुस्कुराने लगा। लेकिन कृष्ण की हर लीला के पीछे कोई न कोई गहरा रहस्य छिपा था। वे सिर्फ़ माखन नहीं चुराते थे, वे तो अपने भक्तों के हृदय चुरा लेते थे। उनका बचपन जितना मासूम था, उतना ही अद्भुत भी। गोकुल के लोगों को अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि उनके बीच पल रहा यह नन्हा बालक आगे चलकर कितनी बड़ी-बड़ी लीलाएँ करने वाला है। एक दिन गोकुल के बच्चों ने कृष्ण से शिकायत की कि उन्होंने मिट्टी खाई है। वे दौड़कर यशोदा मैया के पास गए और बोले, “मैया! कान्हा ने मिट्टी खाई है।” यशोदा ने कृष्ण से पूछा, “क्या तूने मिट्टी खाई?” कृष्ण ने तुरंत कहा, “नहीं मैया, मैंने कुछ नहीं खाया।” लेकिन बच्चों ने ज़ोर देकर कहा, “हमने अपनी आँखों से देखा है!” यशोदा ने कहा, “कान्हा, मुँह खोल!” कृष्ण ने धीरे से अपना मुँह खोला। और तभी यशोदा मैया स्तब्ध रह गईं। उन्हें कृष्ण के मुँह में मिट्टी नहीं, बल्कि पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। आकाश, चंद्रमा, सूर्य, पर्वत, नदियाँ, धरती—सब कुछ उसी छोटे-से मुँह में दिखाई दे रहा था। यशोदा की आँखें आश्चर्य से भर गईं। एक पल के लिए उन्हें लगा कि उनका कान्हा कोई साधारण बालक नहीं है। लेकिन अगले ही क्षण ममता ने उनके सारे विचारों पर पर्दा डाल दिया। उन्होंने कृष्ण को अपने सीने से लगा लिया। कृष्ण ने अपनी नन्ही बाहों से माँ को पकड़ लिया। उस क्षण भगवान और भक्त के बीच का सबसे सुंदर रिश्ता दिखाई दे रहा था। जहाँ भगवान स्वयं माँ के प्रेम के आगे बालक बन जाते हैं। उधर कंस को लगातार कृष्ण के जीवित होने की चिंता सताने लगी थी। उसने कई असुरों को गोकुल भेजना शुरू किया। उसका उद्देश्य केवल एक था। कृष्ण को किसी भी तरह समाप्त करना। लेकिन हर बार कृष्ण अपनी बाल लीला से उस संकट को टाल देते। गोकुल वालों को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि उनके कान्हा में कोई दिव्य शक्ति है। फिर भी उनके लिए वह भगवान से पहले उनका अपना था। नंद का लाल, यशोदा का कान्हा, ग्वाल-बालों का मित्र और गोपियों की आँखों का तारा। शाम होते ही जब कृष्ण गायों के साथ लौटते, तो पूरा गोकुल उनकी बाँसुरी की धुन सुनने के लिए जैसे ठहर जाता। उनकी बाँसुरी की आवाज़ में ऐसा आकर्षण था कि पशु-पक्षी तक शांत हो जाते। यमुना की लहरें धीरे-धीरे बहने लगतीं और पेड़ भी जैसे उस संगीत को सुनने के लिए झुक जाते। लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। गोकुल की गलियों में अभी बहुत-सी लीलाएँ बाकी थीं। कंस की साजिशें बढ़ने वाली थीं। कृष्ण के सामने नए-नए संकट आने वाले थे।

     

     

    पूतना का आगमन होने वाला था, शकटासुर और तृणावर्त जैसे असुरों का सामना होने वाला था, और फिर एक दिन पूरा गोकुल उस लीला का साक्षी बनने वाला था जिसने कृष्ण को केवल नंदलाल नहीं, बल्कि गोकुल का रक्षक बना दिया। उस रात यशोदा मैया ने कान्हा को अपने पास सुलाया। कृष्ण गहरी नींद में मुस्कुरा रहे थे। यशोदा ने उनके बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से कहा, “मेरे लाल, तुझे किसी की नज़र न लगे।” कृष्ण ने आँखें बंद किए हुए ही जैसे मुस्कुराकर माँ को जवाब दिया। बाहर चाँदनी गोकुल पर बिखरी थी और दूर कहीं बाँसुरी की बहुत हल्की धुन सुनाई दे रही थी। किसी को पता नहीं था कि आने वाली सुबह गोकुल के लिए एक नई परीक्षा लेकर आने वाली है। क्योंकि अब कंस का पहला बड़ा दूत गोकुल की ओर बढ़ चुका था… और उसका निशाना था—नन्हा कान्हा। 🦚💙✨

     

     

    • श्वेता अग्रवाल ✍️💐
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    Sweta Agrawal

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?

    स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।

    वो चेहरा…

    जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

    जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।

    उसके नाना।

    लेकिन आज वो सामने थे।

    जिंदा।

    और किसी अनजान जगह पर कैद।

    नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

    “पापा…”

    स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।

    फिर धीरे से कहा—

    “नैना… मेरी बच्ची।”

    नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।

    “आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”

    वो कुछ पल चुप रहे।

    फिर बोले—

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”

    आरव आगे बढ़ा।

    “नाना… आपको किसने कैद किया है?”

    स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।

    “अभी इतनी जल्दी क्यों?”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “विक्रम!”

    “उन्हें छोड़ दो।”

    विक्रम ने कहा—

    “तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”

    “तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन-सा राज?”

    विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—

    “तुम्हारे जन्म का।”


    नाना ने बताई सच्चाई

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “नाना, क्या ये सच कह रहा है?”

    नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

    “हां।”

    तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।

    नाना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”

    “लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”

    विहान ने पूछा—

    “किसका?”

    “विक्रम का।”

    विक्रम हंसा।

    “अधूरी कहानी मत सुनाओ।”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”

    विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।


    पच्चीस साल पुराना राज

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    “विक्रम को इसका पता चल गया।”

    “उसने पहले समर को निशाना बनाया।”

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

    “मेरे पापा…”

    नाना ने कहा—

    “समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”

    “लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”

    आरोही ने पूछा—

    “तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।


    अभय की बारी

    नाना आगे बोले—

    “जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा…”

    अभय ने कहा—

    “मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”

    आरव की आवाज भर्रा गई।

    “आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

    “मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”

    “मुझे आपकी जरूरत थी।”

    अभय की आंखें भर आईं।

    “मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

    फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।

    अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।


    नाना की असली योजना

    अमन ने पूछा—

    “अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”

    नाना मुस्कुराए।

    “क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”

    “इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”

    विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

    “और ये तीसरी चाबी?”

    नाना ने कहा—

    “हां।”

    “तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”

    आरव ने पूछा—

    “कहां का?”

    नाना ने कहा—

    “पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”

    देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—

    “वही तहखाना?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “हां, देवेंद्र।”

    देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।

    आरव ने पूछा—

    “आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”

    नाना ने कहा—

    “वो कभी बंद नहीं हुई।”

    “वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”


    विक्रम क्यों डरा हुआ था?

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”

    विक्रम ने तुरंत कहा—

    “क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

    नाना ने कहा—

    “बिल्कुल।”

    “वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”

    “नाम।”

    “हिसाब।”

    “कागजात।”

    “और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”

    अमन ने कहा—

    “तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”

    नाना ने कहा—

    “अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”


    विक्रम का आखिरी दांव

    विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।

    “तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”

    “लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”

    नैना ने गुस्से में कहा—

    “उन्हें छोड़ दो।”

    “तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”

    विक्रम हंसा।

    “मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”

    “मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”

    नैना चौंक गईं।

    “आरव?”

    विक्रम ने कहा—

    “हां।”

    “क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “मैं?”

    नाना ने आंखें बंद कर लीं।

    “मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।


    आरव की विरासत

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “मेरे खून का?”

    “हां।”

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने कहा—

    “लेकिन हम तीनों भाई हैं।”

    “हां।”

    “तो सिर्फ मैं क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”

    “तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”

    “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”

    “तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”

    अमन ने कहा—

    “तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

    नाना मुस्कुराए।

    “यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”


    आरोही का सच

    अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।

    “और तुम।”

    आरोही चौंक गई।

    “जी?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”

    “उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”

    आरव ने चौंककर पूछा—

    “तो?”

    “वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

    “और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”

    “तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

    नाना ने मुस्कुराकर कहा—

    “शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “मैं भी नहीं।”


    तहखाने का रास्ता

    नाना ने कहा—

    “अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”

    “पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”

    “उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”

    “वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”

    आरव ने पूछा—

    “और तीन चाबियां?”

    “पहली चाबी तुम्हारे पास।”

    “दूसरी अमन के पास।”

    “तीसरी आरोही के लॉकेट में।”

    विहान चौंका।

    “लेकिन मेरी चाबी?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”

    “वो उस दरवाजे का कोड है।”

    विहान ने अपने लॉकेट को देखा।

    उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।

    1-7-2-5

    देवेंद्र ने कहा—

    “ये वही नंबर है!”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”


    नाना की आखिरी चेतावनी

    नाना ने गंभीर होकर कहा—

    “लेकिन ध्यान रखना।”

    “तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”

    “वहां एक इंसान भी है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने कहा—

    “वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”

    नैना चौंक गईं।

    “पापा!”

    “आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन है वो?”

    नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “तुम उसे जानते हो।”

    “बहुत करीब से।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने सिर्फ इतना कहा—

    “देवेंद्र।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।

    देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।

    नैना ने अविश्वास से कहा—

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

    आरव ने बंदूक निकाल ली।

    “पापा के दोस्त…”

    “क्या आप गद्दार हैं?”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”

    अभय भी चौंक गया।

    “देवेंद्र?”

    नाना ने कहा—

    “उसने मुझे धोखा दिया था।”

    देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—

    “मैंने धोखा नहीं दिया था।”

    “मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”

    आरव ने पूछा—

    “किसे?”

    देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।

    नैना की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र ने कहा—

    “नैना को।”

    नैना स्तब्ध रह गईं।

    और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

    विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—

    “अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

    स्क्रीन काली हो गई।

    आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।

    उसे पहली बार लगा—

    शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 51 : पुरानी हवेली का बंद कमरा

     

    पुरानी हवेली के सामने खड़ी काली गाड़ी का इंजन बंद हो चुका था।

     

    चारों तरफ अंधेरा था।

     

    हवा इतनी तेज चल रही थी कि हवेली की टूटी खिड़कियां बार-बार आपस में टकरा रही थीं।

     

    आरव ने हवेली के खुले दरवाजे को देखा।

     

    अंदर से विक्रम की आवाज अब भी गूंज रही थी—

     

    “आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”

     

    आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “इस हवेली में कदम रखने के बाद वापस निकलना आसान नहीं होगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अंदर आरोही है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकता।”

     

    शेखर ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “इसीलिए विक्रम ने उसे चुना है।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    उसने अपनी मुट्ठी बांधी और हवेली के अंदर चला गया।

     

     

    —

     

    हवेली के अंदर

     

    हवेली के अंदर कदम रखते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    “शेखर?”

     

    शेखर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    “ये लॉक हो गया है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम फंस गए।”

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    तभी सामने की दीवार पर लगी सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    सामने एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी पर आरोही बैठी थी।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “आरोही!”

     

    आरोही ने सिर उठाया।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ना चाहता था, लेकिन शेखर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    “क्यों?”

     

    “कुछ गड़बड़ है।”

     

    आरोही ने जोर से कहा—

     

    “आरव, पास मत आना!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    “आरोही?”

     

    उसने कांपती आवाज में कहा—

     

    “फर्श के नीचे कुछ है।”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फर्श पर छोटे-छोटे लाल निशान बने थे।

     

    शेखर ने तुरंत कहा—

     

    “पीछे हटो!”

     

    अगले ही पल फर्श के कुछ हिस्से से बिजली की चिंगारी निकली।

     

    अगर आरव एक कदम और आगे बढ़ता…

     

    तो शायद वह बच नहीं पाता।

     

     

    —

     

    विक्रम सामने आया

     

    ऊपर की बालकनी से तालियों की आवाज आई।

     

    ताली… ताली… ताली…

     

    विक्रम धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “शाबाश, शेखर।”

     

    शेखर ने बंदूक निकाल ली।

     

    “खेल खत्म हो चुका है, विक्रम।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी खुद को हीरो समझते हो?”

     

    “बीस साल तक मेरे साथ रहकर मेरे खिलाफ सबूत जमा करते रहे।”

     

    “लेकिन आखिर में यहां आए किसके साथ?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “आरव के साथ।”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आरोही को क्यों उठाया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें यहां लाने का यही एक तरीका था।”

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    विक्रम धीरे-धीरे आरव के पास आया।

     

    “तुम्हारे पास जो चाबी है।”

     

    आरव ने अपनी जेब पर हाथ रखा।

     

    “ये?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं नहीं दूं?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “तो आरोही मरेगी।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “उसे हाथ भी मत लगाना।”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हें अपनी कमजोरी का पता भी नहीं है, आरव।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    आरोही ने आंखों से इशारा किया—

     

    “चाबी मत देना।”

     

    आरव समझ गया।

     

     

    —

     

    आरोही का इशारा

     

    विक्रम ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “क्या कहा उसने?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    विक्रम आरोही के पास गया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारा हीरो तुम्हें बचा लेगा?”

     

    आरोही ने बिना डरे कहा—

     

    “मुझे अपने आरव पर पूरा भरोसा है।”

     

    विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “प्यार।”

     

    “यही सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “प्यार इंसान को कमजोर नहीं… मजबूत बनाता है।”

     

    विक्रम ने उसे घूरा।

     

    आरव की आंखों में गर्व था।

     

     

    —

     

    छुपा हुआ संदेश

     

    अचानक शेखर ने आरव के कान में धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी मां ने जो लॉकेट दिया था, उसमें सिर्फ चिप नहीं थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और क्या?”

     

    “एक ट्रैकिंग डिवाइस।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “नैना को पता है कि हम यहां हैं।”

     

    आरव ने तुरंत अपना फोन निकाला।

     

    सिग्नल नहीं था।

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “फोन से नहीं।”

     

    उसने आरव की घड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “उसमें।”

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    उसकी स्क्रीन पर एक छोटा लाल निशान चमक रहा था।

     

    LOCATION SHARED.

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “मां हमें ढूंढ रही हैं।”

     

     

    —

     

    विक्रम की असली मांग

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “चाबी दो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “पहले आरोही को छोड़ो।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है मैं इतना मूर्ख हूं?”

     

    “चाबी पहले।”

     

    आरव ने चाबी निकाल ली।

     

    विक्रम की नजर चाबी पर टिक गई।

     

    लेकिन तभी शेखर ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    विक्रम पीछे हट गया।

     

    आरव दौड़कर आरोही के पास पहुंचा।

     

    उसने उसके हाथ खोले।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत डर गई थी?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तुम आ गए थे ना।”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन तभी…

     

    धांय!

     

    एक गोली दीवार से टकराई।

     

    विक्रम वहां नहीं था।

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “वो भाग गया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उसे जाने दो।”

     

    शेखर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि अब हमें पता है वो क्या चाहता है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने चाबी अपनी जेब से निकाली।

     

    “ये।”

     

     

    —

     

    लेकिन चाबी नकली थी

     

    विक्रम की आवाज अचानक पूरे कमरे में गूंजी—

     

    “आरव…”

     

    “तुमने मुझे जो चाबी दी थी…”

     

    “वो नकली थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    विक्रम सामने नहीं था।

     

    लेकिन उसकी आवाज चारों तरफ से आ रही थी।

     

    “तुम बहुत चालाक हो गए हो।”

     

    “लेकिन तुम्हें अभी ये नहीं पता कि असली चाबी किसके पास है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    “तुम्हारे लॉकेट में।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना लॉकेट पकड़ लिया।

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लॉकेट में सिर्फ सबूत नहीं छुपाया था।”

     

    “उन्होंने असली चाबी छुपाई थी।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तो इसी वजह से उसने आरोही को अगवा किया था।”

     

    विक्रम की आवाज आई—

     

    “बिल्कुल।”

     

     

    —

     

    लॉकेट का दूसरा राज

     

    आरव ने आरोही का लॉकेट देखा।

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर लगी छोटी सी धातु की प्लेट हटाने पर एक बेहद छोटी चाबी दिखाई दी।

     

    अमन की कही बात आरव को याद आई—

     

    “तीनों के पास अलग-अलग चाबी है।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “तो हमारे पास तीन चाबियां थीं।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “और अब ये तीनों मिलकर कुछ खोलेंगी।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “एक ऐसी जगह… जहां तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    सबने पीछे देखा।

     

    दरवाजे पर नैना खड़ी थीं।

     

    उनके साथ देवेंद्र, माधवी, अमन और विहान भी थे।

     

    आरोही की आंखों में खुशी आ गई।

     

    “मां…”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हम तुम्हें लेने आए हैं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपको पता था हम यहां हैं?”

     

    नैना मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारी घड़ी ने सब बता दिया।”

     

     

    —

     

    विक्रम फिर सामने आया

     

    अचानक हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरा छा गया।

     

    फिर विक्रम की आवाज आई—

     

    “तुम सब यहां आ गए।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “अब तुम्हारा खेल खत्म।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “नैना… तुम्हें लगता है कि पच्चीस साल पहले मैं हार गया था?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम सिर्फ भागी थीं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “लेकिन इस बार मैं नहीं भागूंगी।”

     

    अचानक सामने स्क्रीन जल उठी।

     

    उस पर एक लाइव वीडियो चल रहा था।

     

    वीडियो में राजवीर जेल के कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    देवेंद्र भी स्तब्ध रह गया।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “मां?”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये आदमी… तुम्हारे नाना हैं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने स्क्रीन को देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा था नाना की मौत हो चुकी है।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हमें भी यही लगता था।”

     

    स्क्रीन पर वो आदमी धीरे-धीरे कैमरे की तरफ मुड़ा।

     

    उसके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी।

     

    और उसने कहा—

     

    “मेरे बच्चों… बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे ढूंढने में।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    विहान पीछे हट गया।

     

    अमन ने अविश्वास से कहा—

     

    “तो इतने सालों से हमारे नाना जिंदा थे?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर स्क्रीन पर विक्रम दिखाई दिया।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “अब तुम्हें चुनना होगा—तुम अपने नाना को बचाओगे या इस हवेली के अंदर छिपा वो सच खोजोगे, जिसके लिए तुम तीनों पैदा हुए थे।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    उसकी नजर पहले अपनी मां पर गई…

     

    फिर आरोही पर…

     

    और आखिर में स्क्रीन पर मौजूद अपने नाना पर।

     

    उसे पहली बार समझ आया—

     

    ये लड़ाई सिर्फ उसके परिवार की नहीं थी।

     

    इसके पीछे एक ऐसा राज था…

     

    जो उसकी और आरोही की पूरी जिंदगी बदल सकता था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 48 : अभय का नाम सुनकर क्यों कांप गया देवेंद्र?

    देवेंद्र के हाथ से फोन लगभग छूट ही गया।

    स्क्रीन पर सिर्फ एक नाम था—

    “अभय।”

    आरव ने फोन को दोबारा देखा।

    “अभय…?”

    उसकी आवाज में हैरानी थी।

    विहान भी तुरंत आरव के पास आ गया।

    “अभय कौन?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा… अभय तो मेरे पिता थे।”

    देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।

    “हां।”

    “तो फिर इस मैसेज का मतलब क्या है?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    नैना भी अचानक गंभीर हो गईं।

    माधवी ने उनकी तरफ देखा।

    “नैना… अब हमें सच बताना होगा।”

    नैना ने धीरे से सिर हिलाया।

    “हां दीदी।”

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    नैना ने तीनों भाइयों को अपने पास बुलाया।

    “तुम्हारे पिता अभय की मौत वैसी नहीं हुई थी, जैसी तुम्हें बताई गई।”

    तीनों भाई एक साथ चौंक गए।


    अभय की मौत का सच

    अमन ने पूछा—

    “तो हमारे पिता की मौत कैसे हुई थी?”

    नैना ने गहरी सांस ली।

    “अभय मरा नहीं था।”

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “क्या?”

    “जिस आदमी की लाश तुम्हें दिखाई गई थी… वो अभय नहीं था।”

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

    “तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

    नैना ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

    देवेंद्र ने कहा—

    “हमें नहीं पता।”

    आरव ने गुस्से में पूछा—

    “आपको नहीं पता?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “पच्चीस साल पहले अभय गायब हो गया था।”

    “और तब से किसी ने उसे नहीं देखा।”

    अमन ने पूछा—

    “तो उसकी मौत की खबर किसने फैलाई?”

    नैना ने राजवीर की तरफ इशारा किया।

    “राजवीर ने।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन अभी जो मैसेज आया है, उसमें लिखा है कि राजवीर को आदेश देने वाला अभय था।”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही सबसे बड़ा सवाल है।”


    क्या अभय लौट आया है?

    आरव ने फोन फिर देखा।

    “अगर अभय जिंदा है… तो उसने राजवीर को आदेश क्यों दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “शायद वो वही अभय नहीं है जिसे हम जानते थे।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “ऐसा मत कहिए।”

    “मेरे पिता बुरे इंसान नहीं थे।”

    नैना ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “मैं जानती हूं।”

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाल दी थी।”

    विहान ने पूछा—

    “फिर वो गायब क्यों हुए?”

    नैना की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उन्होंने एक ऐसा राज जान लिया था, जिसे जानने वाला कोई भी जिंदा नहीं बचता।”

    अमन ने पूछा—

    “क्या राज?”

    नैना ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों के जन्म का।”

    तीनों भाई चौंक गए।

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन हमने तो अभी सब जान लिया।”

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “जो तुम जानते हो… वो पूरी सच्चाई नहीं है।”


    तीन बच्चों का असली रहस्य

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “तो फिर क्या छुपाया गया है?”

    नैना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म सिर्फ एक संयोग नहीं था।”

    अमन ने पूछा—

    “मतलब?”

    “तुम तीनों को एक साथ पैदा होने की वजह थी।”

    विहान ने पूछा—

    “किसने तय किया था?”

    नैना ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने।”

    आरव चौंका।

    “नाना?”

    “हां।”

    “उन्होंने तुम्हें एक खास वजह से दुनिया में लाया था।”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “हम कोई योजना नहीं हैं।”

    नैना की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम मेरे बच्चे हो।”

    “लेकिन उस समय हमारे परिवार पर बहुत बड़ा खतरा था।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने एक ऐसी संपत्ति बनाई थी, जो सिर्फ तीन वारिसों को मिल सकती थी।”

    अमन ने पूछा—

    “तीन वारिस?”

    “तुम तीनों।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन क्यों?”

    देवेंद्र ने जवाब दिया—

    “क्योंकि तीनों के पास उस संपत्ति की अलग-अलग चाबी थी।”

    आरव ने अपनी जेब में रखी चाबी को देखा।

    “तो ये सिर्फ एक चाबी नहीं है?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “ये पहली चाबी है।”

    अमन ने पूछा—

    “दूसरी?”

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारे पास है।”

    अमन ने चौंककर अपनी जेब टटोली।

    उसे एक छोटा सा पुराना सिक्का मिला।

    “ये?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    विहान ने पूछा—

    “और तीसरी?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारे पास है।”

    विहान ने अपने गले में पहना लॉकेट छुआ।

    “ये?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही।”


    तीनों निशान

    तीनों चीजों को एक साथ मेज पर रखा गया।

    चाबी।

    सिक्का।

    और लॉकेट।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर अचानक तीनों चीजों पर बने निशान चमकने लगे।

    आरोही ने हैरानी से कहा—

    “ये कैसे?”

    माधवी ने कहा—

    “नैना ने ये सब इतने साल छुपाकर रखा था।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने नहीं।”

    सबने उनकी तरफ देखा।

    “तो?”

    नैना ने कहा—

    “ये सब अभय ने छुपाया था।”

    आरव के चेहरे पर हैरानी छा गई।

    “अभय?”

    “हां।”

    “तो वो जिंदा थे?”

    नैना ने कहा—

    “मुझे पूरा विश्वास है कि वो जिंदा थे।”

    तभी कमरे में रखी पुरानी मशीन अचानक चालू हो गई।

    उसमें से एक आवाज आई—

    “अगर तुम तीनों एक साथ ये संदेश सुन रहे हो, तो समझो मैं शायद तुम्हारे पास नहीं हूं।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “पापा…”

    वो आवाज अभय की थी।


    अभय की रिकॉर्डिंग

    रिकॉर्डिंग आगे चली—

    “आरव… अमन… विहान…”

    तीनों भाइयों की आंखों में आंसू आ गए।

    “अगर तुम मेरी आवाज सुन रहे हो तो इसका मतलब है कि नैना तुम्हारे पास वापस आ चुकी है।”

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

    अभय की आवाज आगे आई—

    “मैंने तुम तीनों को बचाने के लिए अपनी मौत का नाटक किया।”

    आरव ने आंखें पोंछीं।

    “लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं कितने समय तक छिपा रहूंगा।”

    “राजवीर को लगता है कि मैंने सब कुछ खत्म कर दिया।”

    “लेकिन असली खेल अभी बाकी है।”

    देवेंद्र ने बेचैनी से कहा—

    “अभय…”

    रिकॉर्डिंग में अभय ने कहा—

    “राजवीर सिर्फ एक मोहरा है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    “तो फिर असली खिलाड़ी कौन है?”

    जैसे ही अभय ये कहने वाला था—

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

    अमन ने मशीन पर हाथ मारा।

    “नहीं!”

    विहान ने कहा—

    “आगे क्यों नहीं चल रहा?”

    देवेंद्र ने मशीन खोली।

    “किसी ने रिकॉर्डिंग का आखिरी हिस्सा निकाल दिया है।”

    आरव ने कहा—

    “किसने?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।


    कमरे में कौन था?

    आरोही अचानक बोली—

    “एक मिनट।”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    “जब ये रिकॉर्डिंग चली… तब कमरे में हम सब थे।”

    “हां।”

    “लेकिन रिकॉर्डिंग शुरू होने से पहले कमरे में कोई और भी था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “रुद्र।”

    सबकी नजर रुद्र पर गई।

    रुद्र चुप खड़ा था।

    अमन ने तुरंत उसकी तरफ बंदूक तान दी।

    “रिकॉर्डिंग का हिस्सा कहां है?”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास नहीं है।”

    “झूठ!”

    विहान ने कहा—

    “तुम पहले भी हमें धोखा दे चुके हो।”

    रुद्र ने हाथ ऊपर कर दिए।

    “इस बार मैं सच बोल रहा हूं।”

    आरव ने पूछा—

    “तो फिर तुम्हें क्या पता है?”

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

    फिर बोला—

    “अभय जिंदा है।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    आरव ने धीरे से पूछा—

    “कहां?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैं नहीं जानता।”

    “लेकिन?”

    रुद्र ने कहा—

    “वो मुझे हर महीने एक संदेश भेजता था।”


    आखिरी संदेश

    “क्या लिखा था?”

    रुद्र ने अपने फोन से एक पुराना संदेश दिखाया।

    उसमें लिखा था—

    “जब मेरे तीनों बेटे एक साथ होंगे, उन्हें पुराने शिव मंदिर तक ले जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा मंदिर?”

    रुद्र ने कहा—

    “शहर से बाहर वाला।”

    नैना अचानक घबरा गईं।

    “नहीं!”

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

    “क्या हुआ?”

    नैना ने कहा—

    “वहां मत जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

    “क्योंकि उसी मंदिर में…”

    वह रुक गईं।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    नैना की आंखों से आंसू बह निकले।

    “उसी मंदिर में तुम्हारे पिता अभय को आखिरी बार देखा गया था।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “तो हमें वहीं जाना होगा।”

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “नहीं बेटा।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि अगर अभय वहां है…”

    वह कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “तो वो अकेला नहीं होगा।”


    मंदिर की ओर

    रात गहरी हो चुकी थी।

    फिर भी आरव, अमन, विहान और आरोही मंदिर जाने के लिए तैयार थे।

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं भी चलूंगा।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी।”

    माधवी ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम्हें नहीं जाना चाहिए।”

    नैना ने कहा—

    “पच्चीस साल भाग चुकी हूं।”

    “अब नहीं।”

    आरव ने मां का हाथ पकड़ लिया।

    “इस बार हम सब साथ चलेंगे।”

    कुछ देर बाद गाड़ियां मंदिर की ओर बढ़ने लगीं।

    रास्ते में आरव चुप था।

    आरोही ने पूछा—

    “क्या सोच रहे हो?”

    “अगर पापा सच में जिंदा हैं…”

    “तो?”

    “मैं उनसे बहुत सारे सवाल पूछूंगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “और अगर वो तुम्हें गले लगा लें?”

    आरव की आंखें नम हो गईं।

    “तो शायद मेरी जिंदगी पूरी हो जाएगी।”


    मंदिर में इंतजार

    रात के करीब बारह बजे सभी मंदिर पहुंच गए।

    चारों तरफ सन्नाटा था।

    हवा तेज चल रही थी।

    मंदिर के अंदर एक दीपक जल रहा था।

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

    उस तस्वीर में अभय था।

    आरव की आंखें भर आईं।

    “पापा…”

    अचानक मंदिर के पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

    विहान ने भी हथियार संभाल लिया।

    आरोही आरव के पास खड़ी हो गई।

    देवेंद्र ने सबको पीछे रहने का इशारा किया।

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

    चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।

    आरव ने कहा—

    “कौन हो?”

    आदमी ने धीरे-धीरे चेहरा खोला।

    तीनों भाइयों की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला—

    “अभय…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    “पापा…”

    अभय ने तीनों बेटों को देखा।

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

    बल्कि…

    डर था।

    उसने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    अभय ने पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

    फिर बोला—

    “क्योंकि जिसने मुझे इतने साल कैद करके रखा… वो जान चुका है कि तुम तीनों यहां हो।”

    और मंदिर के बाहर अचानक दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई देने लगीं।

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 47 : मां सामने थी, फिर भी एक रहस्य बाकी था

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    बाहर से आई उस आवाज ने जैसे पूरे कमरे की सांसें रोक दीं।

    राजवीर के हाथ से बंदूक नीचे गिर गई।

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “मां…?”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    लेकिन आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    विहान ने बेचैनी से कहा—

    “भाई, वो मां हैं!”

    आरव ने कहा—

    “हमें पक्का यकीन नहीं है।”

    तभी बाहर से वही आवाज आई—

    “विहान… इतने सालों बाद भी तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मुझे अपनी मां की आवाज कैसे भूल सकती है?”

    वह आरव का हाथ छुड़ाकर दरवाजे तक पहुंच गया।

    देवेंद्र ने भी उसे रोकना चाहा, लेकिन विहान ने कहा—

    “अगर ये मेरी मां हैं और मैं फिर उनसे दूर हो गया… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।”

    उसने दरवाजा खोल दिया।


    नैना सामने थी

    दरवाजा खुलते ही सामने एक महिला खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरे पर उम्र के निशान।

    आंखों में आंसू।

    लेकिन वही चेहरा…

    वही आंखें…

    वही आवाज।

    विहान उसे देखते ही कुछ पल के लिए जम गया।

    महिला ने धीरे से कहा—

    “विहान…”

    विहान के होंठ कांपे।

    “मां…”

    और अगले ही पल वह दौड़कर उनसे लिपट गया।

    “मां!”

    महिला ने उसे कसकर गले लगा लिया।

    उसकी आंखों से भी आंसू बहने लगे।

    “मेरा बच्चा…”

    विहान फूट-फूटकर रोने लगा।

    “आप कहां चली गई थीं मां?”

    “मैंने आपको कितना ढूंढा।”

    “मुझे लगा आप मर गईं।”

    नैना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

    “मैं मरना चाहती तो भी नहीं मर सकती थी।”

    “क्यों?”

    नैना ने धीरे से कहा—

    “क्योंकि मुझे अपने बच्चों के पास वापस आना था।”

    विहान ने पीछे मुड़कर आरव और अमन को देखा।

    “मां… ये आरव है।”

    नैना की नजर आरव पर गई।

    उनकी आंखें भर आईं।

    “मेरा गुड्डू…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    उसे बचपन की वही आवाज याद आई—

    “गुड्डू, इतना मत रो… मां यहीं है।”

    आरव धीरे-धीरे उनके पास गया।

    “आप… सच में मेरी मां हैं?”

    नैना ने अपने हाथ आगे बढ़ाए।

    “आओ।”

    आरव उनके गले लग गया।

    नैना ने उसे कसकर पकड़ लिया।

    “मेरा बच्चा… मैंने तुम्हें बहुत याद किया।”

    आरव की आंखें बंद थीं।

    उसके अंदर बरसों से खाली पड़ा एक कोना जैसे पहली बार भर गया था।


    अमन की बारी

    अमन कुछ दूर खड़ा सब देख रहा था।

    नैना ने उसे देखा।

    उनकी आंखों में फिर आंसू आ गए।

    “अमन…”

    अमन की आंखें भर आईं।

    “आपको मेरा नाम भी याद है?”

    नैना ने कहा—

    “मां अपने बच्चे का नाम कैसे भूल सकती है?”

    अमन उनके पास गया।

    नैना ने उसे भी गले लगा लिया।

    तीनों भाई पहली बार अपनी जन्मदात्री मां के साथ खड़े थे।

    माधवी यह दृश्य देखकर रो रही थीं।

    आरव ने उन्हें देखा।

    “मां…”

    नैना ने भी माधवी की तरफ देखा।

    दोनों बहनों की आंखें मिलीं।

    कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर नैना ने आगे बढ़कर माधवी को गले लगा लिया।

    “दीदी…”

    माधवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।

    “मुझे लगा था तुम मर गई।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी यही चाहती थी कि तुम मुझे मरा हुआ समझो।”

    माधवी ने हैरानी से पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने पीछे खड़े राजवीर की तरफ देखा।

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चलता कि मैं जिंदा हूं… तो राजवीर तुम्हें भी नहीं छोड़ता।”


    राजवीर का डर

    राजवीर अब भी वहीं खड़ा था।

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “इतने सालों बाद भी तुम वही हो।”

    राजवीर ने धीरे से कहा—

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारी यही सबसे बड़ी गलती थी।”

    “तुमने मुझे कमजोर समझा।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “मैंने तुम्हें खत्म कर दिया था!”

    नैना ने कहा—

    “नहीं।”

    “तुमने सिर्फ मुझे दुनिया की नजरों में खत्म किया था।”

    “लेकिन मैं जिंदा थी।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    “तुम्हें किसने बचाया?”

    नैना ने जवाब नहीं दिया।

    राजवीर ने चारों तरफ देखा।

    “किसने?”

    नैना ने कहा—

    “उस आदमी ने, जिसे तुमने सबसे पहले अपना दुश्मन समझा था।”

    राजवीर का चेहरा बदल गया।

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र आगे आया।

    “हां।”

    राजवीर हंस पड़ा।

    “तुम दोनों ने मुझे इतने साल धोखा दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “नहीं। हमने तुम्हारी चाल को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किया।”


    उस रात क्या हुआ था?

    आरव ने पूछा—

    “मां, उस रात आखिर हुआ क्या था?”

    नैना कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “मुझे राजवीर के लोग उठा ले गए थे।”

    “मुझे गोली लगी थी।”

    “लेकिन मैं मरी नहीं।”

    “देवेंद्र मुझे वहां से निकालकर ले गया।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं तुम्हें अस्पताल ले जाना चाहता था।”

    नैना ने कहा—

    “लेकिन तब तक राजवीर को पता चल चुका था कि मैं जिंदा हूं।”

    “इसलिए मुझे एक गुप्त जगह पर रखा गया।”

    आरव ने पूछा—

    “इतने साल?”

    “हां।”

    “आप हमसे मिलने क्यों नहीं आईं?”

    नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम तीनों की जान खतरे में पड़े।”

    अमन ने पूछा—

    “लेकिन आपने हमें अकेला छोड़ दिया।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।”

    “मैं हर साल तुम्हारी खबर लेती थी।”

    विहान ने कहा—

    “तो आपने मुझे देखा था?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हें शायद याद भी नहीं होगा।”

    “जब तुम छोटे थे, मैं दूर खड़ी होकर तुम्हें स्कूल जाते देखती थी।”

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

    “मां…”


    एक और बड़ा सच

    आरव ने पूछा—

    “मां, फिर आपने हमें एक-दूसरे से दूर क्यों रखा?”

    नैना ने कहा—

    “क्योंकि राजवीर तुम्हें ढूंढ रहा था।”

    “उसे पता था कि तुम तीनों के पास मेरी संपत्ति और मेरे सबूतों की चाबी है।”

    आरव ने अपनी जेब से वही चाबी निकाली।

    “ये?”

    नैना ने चाबी देखते ही कहा—

    “हां।”

    “इसे मैंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

    अमन ने पूछा—

    “इससे क्या खुलेगा?”

    नैना ने कहा—

    “एक ऐसी जगह जहां तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सब कुछ छुपाकर रखा है।”

    आरव चौंका।

    “पिता?”

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    “तुम्हारे पिता की असली वसीयत।”

    विहान ने पूछा—

    “और उसमें क्या है?”

    नैना ने कहा—

    “सिर्फ संपत्ति नहीं।”

    “राजवीर के खिलाफ सबूत भी।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम नहीं जानती कि तुम क्या कर रही हो।”

    नैना उसकी तरफ मुड़ीं।

    “इस बार मैं सब जानती हूं।”


    राजवीर की आखिरी चाल

    राजवीर ने अचानक अपनी जेब से एक छोटा रिमोट निकाला।

    देवेंद्र की नजर उस पर पड़ गई।

    “राजवीर!”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “अगर मैं ये बटन दबा दूं…”

    आरव ने पूछा—

    “क्या होगा?”

    राजवीर ने कहा—

    “पूरी हवेली उड़ जाएगी।”

    सबके चेहरे पर डर छा गया।

    आरोही आरव के पास आ गई।

    “आरव…”

    देवेंद्र ने कहा—

    “राजवीर, ऐसा मत करना।”

    राजवीर हंसा।

    “मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।”

    नैना आगे बढ़ीं।

    “राजवीर, तुम्हें लगता है मैं इस बार भी डर जाऊंगी?”

    “मैं मरने से नहीं डरती।”

    राजवीर ने रिमोट का बटन दबाने के लिए उंगली बढ़ाई।

    तभी पीछे से एक गोली चली।

    धांय!

    रिमोट उसके हाथ से गिर गया।

    सबने पीछे देखा।

    रुद्र खड़ा था।

    उसके कंधे पर अभी भी चोट थी।

    अमन ने हैरानी से कहा—

    “रुद्र!”

    रुद्र ने कहा—

    “इस बार सही पक्ष में हूं।”

    राजवीर ने गुस्से में उसे देखा।

    “तू!”

    रुद्र ने कहा—

    “तुमने मुझे बहुत साल इस्तेमाल किया।”

    “अब हिसाब बराबर होगा।”


    राजवीर गिरफ्तार?

    बाहर से पुलिस की गाड़ियों की आवाज आने लगी।

    राजवीर चौंक गया।

    “पुलिस?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर ने उनकी तरफ देखा।

    “तुमने पुलिस को बुलाया?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “नहीं।”

    फिर उन्होंने रुद्र की तरफ देखा।

    “उसने।”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास तुम्हारे खिलाफ सारे सबूत हैं।”

    राजवीर पीछे हटने लगा।

    “तुम लोग मुझे नहीं पकड़ सकते।”

    तभी शेखर ने अपने बंधे हाथों के बावजूद राजवीर को धक्का दिया।

    राजवीर जमीन पर गिर पड़ा।

    शेखर ने कहा—

    “बहुत कर लिया।”

    पुलिस अंदर घुस आई।

    राजवीर को गिरफ्तार कर लिया गया।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा।

    “तुम सोचते हो खेल खत्म हो गया?”

    आरव ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “नहीं… असली खेल तो अब शुरू होगा।”


    मां के साथ पहली रात

    राजवीर के जाने के बाद हवेली में पहली बार शांति थी।

    तीनों भाई अपनी मां के आसपास बैठे थे।

    विहान ने नैना का हाथ पकड़ा हुआ था।

    अमन उनके पास बैठा था।

    आरव थोड़ा दूर खड़ा था।

    नैना ने उसे देखा।

    “गुड्डू।”

    आरव उनकी तरफ आया।

    “जी?”

    नैना ने कहा—

    “तुम मुझसे नाराज हो?”

    आरव की आंखें भर आईं।

    “नहीं।”

    “तुमने मुझे छोड़ दिया था।”

    “लेकिन मुझे पता है क्यों।”

    नैना ने उसका चेहरा छूते हुए कहा—

    “मुझे माफ कर दो।”

    आरव ने सिर उनकी गोद में रख दिया।

    “मां को माफी नहीं मांगनी चाहिए।”

    नैना रो पड़ीं।

    अमन और विहान भी उनके पास आ गए।

    चारों एक-दूसरे से लिपट गए।

    आरोही दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

    लेकिन तभी माधवी उसके पास आईं।

    उन्होंने धीरे से कहा—

    “तुम आरव से बहुत प्यार करती हो।”

    आरोही ने शर्म से सिर झुका लिया।

    “जी।”

    माधवी मुस्कुराईं।

    “तो एक बात याद रखना।”

    “क्या?”

    माधवी ने कहा—

    “आरव की जिंदगी अब सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है… उसके अतीत का एक ऐसा राज बाकी है, जो उसे तुमसे भी दूर कर सकता है।”

    आरोही चौंक गई।

    “क्या मतलब?”

    माधवी कुछ कहतीं, उससे पहले नैना ने उन्हें रोक दिया।

    “माधवी… अभी नहीं।”

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

    “क्या हुआ?”

    नैना और माधवी एक-दूसरे को देखने लगीं।

    नैना ने धीमे से कहा—

    “आरव को अभी ये सच नहीं पता चलना चाहिए।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    दोनों चुप रहीं।

    तभी देवेंद्र के फोन पर एक मैसेज आया।

    उसने मैसेज पढ़ा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “क्या हुआ?”

    देवेंद्र ने फोन छुपाने की कोशिश की।

    लेकिन आरव ने फोन ले लिया।

    मैसेज में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

    “राजवीर गिरफ्तार हो गया है, लेकिन जिसने उसे आदेश दिए थे… वह अभी आजाद है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    और नीचे एक नाम लिखा था—

    “अभय।”

    आरव के हाथ कांपने लगे।

    जारी रहेगा…

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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 46 : असली दुश्मन कौन है?

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”

    आवाज सुनते ही आरव, अमन और विहान ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे में एक परछाई खड़ी थी।

    हाथ में बंदूक थी।

    चेहरा अभी भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

    राजवीर भी उस आवाज को सुनकर कुछ पल के लिए जम गया।

    आरव ने तुरंत पूछा—

    “कौन हो तुम?”

    परछाई धीरे-धीरे रोशनी में आई।

    और जैसे ही चेहरा सामने आया, तीनों भाइयों के होश उड़ गए।

    वो कोई अनजान इंसान नहीं था।

    वो था…

    रुद्र।

    अमन की आंखें फैल गईं।

    “रुद्र?”

    विहान पीछे हट गया।

    “तुम…?”

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “ये क्या हो रहा है?”

    रुद्र के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

    वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।

    “हां… मैं।”

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “तुमने हमें धोखा दिया?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैंने कभी तुम्हारा दोस्त होने का दावा नहीं किया था।”

    आरव का चेहरा कठोर हो गया।

    “लेकिन तुमने इतने साल मेरे साथ काम किया।”

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पास रहना था।”

    अमन ने गुस्से में बंदूक उठा ली।

    “किसके कहने पर?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “राजवीर के।”

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

    “रुद्र!”

    रुद्र ने उसकी तरफ मुड़कर कहा—

    “अब चुप रहो।”

    राजवीर पहली बार असहाय नजर आया।


    राजवीर भी हैरान था

    आरव ने तुरंत समझ लिया कि मामला सिर्फ रुद्र और राजवीर के बीच का नहीं है।

    “तुमने अभी राजवीर को भी चुप करा दिया।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “क्योंकि अब खेल मेरे हाथ में है।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “तुम भूल रहे हो कि तुम्हें मैंने बनाया है।”

    रुद्र ने कहा—

    “और तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे सारे राज मेरे पास हैं।”

    राजवीर कुछ नहीं बोला।

    आरव ने पूछा—

    “तुम दोनों के बीच आखिर रिश्ता क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “राजवीर मेरा मालिक था।”

    “था?”

    “अब नहीं।”

    विहान ने कहा—

    “तो फिर तुम चाहते क्या हो?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम तीनों।”

    आरव आगे आया।

    “क्यों?”

    रुद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम तीनों के बिना नैना की आखिरी वसीयत पूरी नहीं हो सकती।”

    अमन ने पूछा—

    “वसीयत?”

    रुद्र ने सिर हिलाया।

    “तुम्हारी मां ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम की थी।”

    “लेकिन उसके साथ एक शर्त थी।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “तीनों भाइयों को एक साथ होना होगा।”


    नैना की डायरी

    आरव ने हाथ में पकड़ी डायरी को देखा।

    “इसमें क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “तुम्हारी मां की आखिरी सच्चाई।”

    आरव ने डायरी खोलने की कोशिश की।

    लेकिन पन्ने आपस में चिपके हुए थे।

    विहान ने कहा—

    “शायद कोई गुप्त तरीका है।”

    अमन ने डायरी को ध्यान से देखा।

    “यहां कुछ लिखा है।”

    एक पन्ने पर तीन छोटे निशान बने थे।

    एक पर आरव का नाम।

    दूसरे पर अमन।

    तीसरे पर विहान।

    तीनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।

    रुद्र ने कहा—

    “अपने हाथ उन निशानों पर रखो।”

    आरव ने हाथ रखा।

    अमन ने भी।

    विहान ने तीसरे निशान पर हाथ रखा।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर…

    टक!

    डायरी के बीच से एक छोटा हिस्सा बाहर निकला।

    उसमें एक फोटो थी।

    फोटो देखते ही आरव के हाथ कांपने लगे।

    फोटो में नैना थी।

    उसकी गोद में तीन छोटे बच्चे थे।

    और उनके पीछे खड़ी थी…

    माधवी।

    लेकिन तस्वीर में एक और आदमी था।

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

    “ये कौन है?”

    राजवीर ने फोटो देखते ही नजरें फेर लीं।

    देवेंद्र ने भी कुछ नहीं कहा।

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    आरव ने पूछा—

    “मां… आप इस आदमी को जानती हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “हां।”

    “कौन है?”

    माधवी ने जवाब देने से पहले बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी।

    फिर बोलीं—

    “ये तुम्हारा नाना है।”

    तीनों भाई स्तब्ध रह गए।


    नाना की कहानी

    अमन ने पूछा—

    “हमारे नाना?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन हमें कभी उनके बारे में क्यों नहीं बताया गया?”

    माधवी की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उनकी मौत के पीछे भी राजवीर का हाथ था।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “माधवी!”

    “चुप रहो!”

    माधवी ने पहली बार राजवीर पर जोर से आवाज उठाई।

    “पच्चीस साल तक तुमने हम सबको डराया।”

    “अब नहीं।”

    राजवीर कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

    धांय!

    सबने नीचे झुककर अपनी जान बचाई।

    रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

    “कोई और भी आया है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    अमन ने कहा—

    “क्या तुम्हें हर बात पता नहीं होती?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “कुछ चीजें ऐसी हैं जो मुझे भी नहीं पता।”

    आरव ने पूछा—

    “जैसे?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “नैना अभी जिंदा हैं या नहीं।”


    क्या नैना सच में जिंदा हैं?

    विहान की आंखों में उम्मीद की चमक आ गई।

    “अगर मेरी मां जिंदा हैं… तो मैं उन्हें ढूंढूंगा।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “वो जिंदा नहीं है।”

    विहान ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें कैसे पता?”

    राजवीर चुप रहा।

    विहान आगे बढ़ा।

    “तुमने उसकी लाश देखी थी?”

    राजवीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

    “तुमने खुद उसे मारा था?”

    राजवीर की आंखें बदल गईं।

    विहान ने कहा—

    “जवाब दो!”

    राजवीर ने आखिरकार कहा—

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    राजवीर ने सिर झुका लिया।

    “मैंने उसे मरते हुए देखा था।”

    विहान ने कहा—

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

    “नहीं।”

    राजवीर की आवाज पहली बार कमजोर थी।

    “नैना को गोली लगी थी।”

    “लेकिन उसके बाद…”

    “उसके बाद क्या?”

    राजवीर चुप हो गया।

    रुद्र ने कहा—

    “उसे कोई वहां से ले गया था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”


    एक और चौंकाने वाला सच

    अचानक माधवी ने कहा—

    “मुझे पता है।”

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

    आरव ने पूछा—

    “कौन ले गया था?”

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

    “मैं।”

    विहान स्तब्ध रह गया।

    “आप?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “नैना को गोली लगने के बाद मैं उसे वहां से लेकर गई थी।”

    “लेकिन फिर?”

    “वो बेहोश थी।”

    “मैं उसे अस्पताल ले गई।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    माधवी ने कहा—

    “अस्पताल पहुंचने से पहले ही हमें रोक लिया गया।”

    अमन ने पूछा—

    “किसने?”

    माधवी ने कहा—

    “शेखर के आदमियों ने।”

    राजवीर ने कहा—

    “झूठ।”

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें सब पता था।”

    “लेकिन तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि नैना को बचाया जा चुका था।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “तो नैना बच गई थीं?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मेरी मां जिंदा हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि उसके बाद मुझे कभी नैना नहीं मिली।”


    देवेंद्र की चुप्पी

    आरव ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपको पता था?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    आरव ने फिर पूछा—

    “आपको पता था कि नैना बच गई थीं?”

    देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

    “हां।”

    आरव का गुस्सा बढ़ गया।

    “फिर आपने हमें क्यों बताया कि वो मर चुकी हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि हमें लगा राजवीर उसे ढूंढ लेगा।”

    “और अगर वो जिंदा थीं तो?”

    “मैं उन्हें ढूंढ नहीं पाया।”

    विहान ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपने मेरी मां को ढूंढने की कोशिश की?”

    “हर दिन।”

    विहान की आंखों में आंसू थे।

    “फिर मुझे क्यों नहीं बताया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हें बचाना जरूरी था।”


    आरव और आरोही

    इस पूरे रहस्य के बीच आरोही चुप थी।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा।

    “तुम कुछ सोच रही हो।”

    आरोही ने कहा—

    “हां।”

    “क्या?”

    “अगर नैना जिंदा थीं और किसी ने उन्हें छुपाया… तो वो अभी भी कहीं हो सकती हैं।”

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “और हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “मैंने यही सोचा।”

    आरव ने धीरे से कहा—

    “तुम मेरे साथ चलोगी?”

    आरोही ने बिना किसी झिझक के कहा—

    “जहां तुम जाओगे, मैं वहां रहूंगी।”

    आरव ने उसके माथे को हल्के से चूम लिया।

    अमन ने पीछे से कहा—

    “भाई, इस वक्त भी रोमांस?”

    आरव हंस पड़ा।

    “तू चुप कर।”

    विहान ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

    इतने दर्द के बीच भी तीनों भाइयों के बीच का रिश्ता और मजबूत हो रहा था।


    बाहर कौन आया था?

    अचानक बाहर फिर गोली चली।

    रुद्र ने कहा—

    “सब नीचे रहो!”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    अचानक एक गोली आकर उसके कंधे में लगी।

    “आह!”

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “रुद्र!”

    रुद्र जमीन पर गिर पड़ा।

    अमन ने कहा—

    “बाहर कोई स्नाइपर है।”

    राजवीर ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

    “सब हथियार नीचे रखो।”

    आरव ने आश्चर्य से पूछा—

    “क्यों?”

    राजवीर ने कहा—

    “क्योंकि जो बाहर है… वो मेरे आदमी नहीं हैं।”

    अमन ने पूछा—

    “तो किसके हैं?”

    राजवीर ने पहली बार डरते हुए कहा—

    “नैना के।”

    सबकी सांस रुक गई।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    राजवीर ने कहा—

    “अगर नैना सच में जिंदा है…”

    वह खिड़की की तरफ देखने लगा।

    “तो आज रात वो यहां जरूर आएगी।”

    तभी बाहर से एक महिला की आवाज गूंजी—

    “विहान!”

    विहान का शरीर जैसे जम गया।

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

    “ये आवाज…”

    माधवी ने भी सांस रोक ली।

    आरव ने कहा—

    “विहान?”

    विहान कांपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    और बाहर से वही आवाज फिर आई—

    “मेरे बच्चे… दरवाजा खोलो।”

    विहान की आंखों से आंसू बह रहे थे।

    उसने दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा।

    लेकिन तभी आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    “क्यों?”

    आरव ने गंभीर आवाज में कहा—

    “क्योंकि हमें नहीं पता… बाहर सच में नैना हैं या कोई हमें जाल में फंसा रहा है।”

    और तभी बाहर से महिला ने कहा—

    “आरव… अगर तुम सच में मेरे बेटे हो, तो तुम्हें याद होगा कि बचपन में मैं तुम्हें किस नाम से बुलाती थी।”

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

    उसकी आंखों के सामने बचपन की एक धुंधली तस्वीर उभरी।

    और उसके होंठों से खुद-ब-खुद एक नाम निकला—

    “गुड्डू…”

    बाहर कुछ पल सन्नाटा रहा।

    फिर महिला की आवाज आई—

    “हां बेटा… गुड्डू।”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    विहान ने दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

    लेकिन उसी क्षण राजवीर चिल्लाया—

    “दरवाजा मत खोलना! वो नैना नहीं है!”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    राजवीर के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

    और तभी बाहर खड़ी महिला ने धीमी आवाज में कहा—

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    राजवीर के हाथ से बंदूक गिर गई।

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇