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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 52

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 52 : नाना जिंदा थे, लेकिन कैद में क्यों?

    स्क्रीन पर दिखाई दे रहे उस चेहरे को देखकर आरव की आंखें जम गईं।

    वो चेहरा…

    जिसे उसने सिर्फ पुरानी तस्वीरों में देखा था।

    जिसके बारे में बचपन से सुनता आया था कि उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।

    उसके नाना।

    लेकिन आज वो सामने थे।

    जिंदा।

    और किसी अनजान जगह पर कैद।

    नैना की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

    “पापा…”

    स्क्रीन पर बैठे बूढ़े आदमी ने अपनी बेटी की आवाज सुनकर आंखें बंद कर लीं।

    फिर धीरे से कहा—

    “नैना… मेरी बच्ची।”

    नैना अपने आंसू रोक नहीं पाईं।

    “आपने हमें इतने साल क्यों नहीं बताया कि आप जिंदा हैं?”

    वो कुछ पल चुप रहे।

    फिर बोले—

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चल जाता… तो तुम सबको बचाना मुश्किल हो जाता।”

    आरव आगे बढ़ा।

    “नाना… आपको किसने कैद किया है?”

    स्क्रीन के पीछे खड़ा विक्रम मुस्कुराया।

    “अभी इतनी जल्दी क्यों?”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “विक्रम!”

    “उन्हें छोड़ दो।”

    विक्रम ने कहा—

    “तुम मुझे आदेश देने की स्थिति में नहीं हो।”

    “तुम्हारे नाना के पास वो आखिरी राज है, जिसकी तलाश में तुम लोग पिछले पच्चीस साल से भटक रहे हो।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन-सा राज?”

    विक्रम ने मुस्कुराकर कहा—

    “तुम्हारे जन्म का।”


    नाना ने बताई सच्चाई

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “नाना, क्या ये सच कह रहा है?”

    नाना ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

    “हां।”

    तीनों भाइयों के चेहरे पर सवाल थे।

    नाना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म एक सामान्य परिवार में हुआ था।”

    “लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ ही समय बाद मुझे पता चला कि हमारे परिवार के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है।”

    विहान ने पूछा—

    “किसका?”

    “विक्रम का।”

    विक्रम हंसा।

    “अधूरी कहानी मत सुनाओ।”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “आज मैं पूरी कहानी बताऊंगा।”

    विक्रम का चेहरा गंभीर हो गया।


    पच्चीस साल पुराना राज

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता अभय और समर एक ही काम पर थे।”

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के गैरकानूनी कारोबार के सबूत जुटाए थे।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    “विक्रम को इसका पता चल गया।”

    “उसने पहले समर को निशाना बनाया।”

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

    “मेरे पापा…”

    नाना ने कहा—

    “समर ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबूत तुम्हारे पास रखे।”

    “लेकिन विक्रम ने उसे ढूंढ लिया।”

    आरोही ने पूछा—

    “तो पापा ने मेरे लॉकेट में चाबी क्यों छुपाई?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि वो जानता था कि अगर उसे कुछ हो गया… तो एक दिन तुम बड़ी होकर उस सच तक पहुंचोगी।”

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।


    अभय की बारी

    नाना आगे बोले—

    “जब विक्रम ने अभय को खत्म करने की कोशिश की, तब अभय ने अपनी मौत का नाटक किया।”

    अभय ने सिर झुका लिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा…”

    अभय ने कहा—

    “मुझे तुम्हें सच बताना चाहिए था।”

    आरव की आवाज भर्रा गई।

    “आपने इतने साल हमसे दूरी क्यों रखी?”

    अभय ने कहा—

    “क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

    “मुझे डर था कि अगर विक्रम को पता चला कि तुम मेरे बच्चे हो… तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन मैं आपका बेटा हूं।”

    “मुझे आपकी जरूरत थी।”

    अभय की आंखें भर आईं।

    “मुझे भी तुम्हारी जरूरत थी, बेटा।”

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

    फिर आरव ने आगे बढ़कर अपने पिता को गले लगा लिया।

    अभय ने उसे कसकर पकड़ लिया।


    नाना की असली योजना

    अमन ने पूछा—

    “अगर आप सब जानते थे तो हमें तीन अलग-अलग चाबियां क्यों दी गईं?”

    नाना मुस्कुराए।

    “क्योंकि मैंने जानबूझकर ऐसा किया।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि मैं जानता था कि अगर एक व्यक्ति के पास पूरा राज होगा, तो विक्रम उसे खत्म कर देगा।”

    “इसलिए मैंने राज को तीन हिस्सों में बांट दिया।”

    विहान ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

    “और ये तीसरी चाबी?”

    नाना ने कहा—

    “हां।”

    “तीनों चाबियां मिलकर एक दरवाजा खोलती हैं।”

    आरव ने पूछा—

    “कहां का?”

    नाना ने कहा—

    “पुराने महल के नीचे बने गुप्त तहखाने का।”

    देवेंद्र अचानक बोल पड़ा—

    “वही तहखाना?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “हां, देवेंद्र।”

    देवेंद्र का चेहरा गंभीर हो गया।

    आरव ने पूछा—

    “आप उस जगह के बारे में जानते हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “हां।”

    “लेकिन मैंने सोचा था वो जगह हमेशा के लिए बंद हो चुकी है।”

    नाना ने कहा—

    “वो कभी बंद नहीं हुई।”

    “वो सिर्फ सही लोगों का इंतजार कर रही थी।”


    विक्रम क्यों डरा हुआ था?

    आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “अगर उस तहखाने में इतना बड़ा राज है, तो विक्रम हमें वहां जाने क्यों नहीं दे रहा?”

    विक्रम ने तुरंत कहा—

    “क्योंकि वहां कुछ ऐसा है जिसे बाहर आना नहीं चाहिए।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मतलब वहां हमारे खिलाफ कुछ नहीं… तुम्हारे खिलाफ है।”

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

    नाना ने कहा—

    “बिल्कुल।”

    “वहां विक्रम के पूरे साम्राज्य के सबूत हैं।”

    “नाम।”

    “हिसाब।”

    “कागजात।”

    “और उन सभी लोगों के वीडियो, जिन्हें उसने रास्ते से हटाया।”

    अमन ने कहा—

    “तो फिर पुलिस को दे देते हैं।”

    नाना ने कहा—

    “अगर हम उस तहखाने तक पहुंच गए तो।”


    विक्रम का आखिरी दांव

    विक्रम ने कैमरे के सामने कदम बढ़ाया।

    “तुम लोग बहुत खुश हो रहे हो।”

    “लेकिन तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे नाना अभी मेरे कब्जे में हैं।”

    नैना ने गुस्से में कहा—

    “उन्हें छोड़ दो।”

    “तुम्हें जो चाहिए, मैं दूंगी।”

    विक्रम हंसा।

    “मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।”

    “मुझे सिर्फ आरव चाहिए।”

    नैना चौंक गईं।

    “आरव?”

    विक्रम ने कहा—

    “हां।”

    “क्योंकि उस तहखाने का आखिरी ताला वही खोल सकता है।”

    आरव ने पूछा—

    “मैं?”

    नाना ने आंखें बंद कर लीं।

    “मुझे डर था कि ये दिन आएगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैंने उस ताले में तुम्हारा खून इस्तेमाल किया था।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।


    आरव की विरासत

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “मेरे खून का?”

    “हां।”

    “क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हारे पिता की संपत्ति का असली वारिस तुम हो।”

    अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

    आरव ने कहा—

    “लेकिन हम तीनों भाई हैं।”

    “हां।”

    “तो सिर्फ मैं क्यों?”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि तुम सबसे बड़े हो।”

    “तुम्हारे पिता ने कानूनी वारिस के रूप में तुम्हारा नाम रखा था।”

    “लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारे भाइयों का कोई हक नहीं।”

    “तुम तीनों मिलकर ही उस विरासत को पूरा कर सकते हो।”

    अमन ने कहा—

    “तो हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।”

    नाना मुस्कुराए।

    “यही बात तुम्हें सबसे ताकतवर बनाती है।”


    आरोही का सच

    अचानक नाना की नजर आरोही पर गई।

    “और तुम।”

    आरोही चौंक गई।

    “जी?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता ने अपनी बेटी को सिर्फ एक चाबी नहीं दी थी।”

    “उन्होंने तुम्हें इस परिवार से जोड़ने वाला एक सबूत भी दिया था।”

    आरोही ने पूछा—

    “क्या?”

    नाना ने कहा—

    “तुम्हारे पिता समर और अभय सिर्फ दोस्त नहीं थे।”

    आरव ने चौंककर पूछा—

    “तो?”

    “वे दोनों एक ही मिशन पर काम कर रहे थे।”

    “और उन्होंने फैसला किया था कि अगर उन्हें कुछ हो गया…”

    “तो उनके बच्चे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।”

    आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

    नाना ने मुस्कुराकर कहा—

    “शायद इसी वजह से तुम दोनों इतने करीब आए।”

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “चाहे अतीत कुछ भी हो… मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूं।”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “मैं भी नहीं।”


    तहखाने का रास्ता

    नाना ने कहा—

    “अब मेरी बात ध्यान से सुनो।”

    “पुराने महल के पीछे एक सूखा कुआं है।”

    “उसके नीचे एक लोहे का दरवाजा है।”

    “वहीं से तहखाने का रास्ता शुरू होता है।”

    आरव ने पूछा—

    “और तीन चाबियां?”

    “पहली चाबी तुम्हारे पास।”

    “दूसरी अमन के पास।”

    “तीसरी आरोही के लॉकेट में।”

    विहान चौंका।

    “लेकिन मेरी चाबी?”

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारी चाबी चाबी नहीं है।”

    “वो उस दरवाजे का कोड है।”

    विहान ने अपने लॉकेट को देखा।

    उसमें कुछ अंक खुदे हुए थे।

    1-7-2-5

    देवेंद्र ने कहा—

    “ये वही नंबर है!”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “अभय की पुरानी फाइल में यही नंबर था।”


    नाना की आखिरी चेतावनी

    नाना ने गंभीर होकर कहा—

    “लेकिन ध्यान रखना।”

    “तहखाने में सिर्फ सबूत नहीं हैं।”

    “वहां एक इंसान भी है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने कहा—

    “वो व्यक्ति जिसने पच्चीस साल पहले मुझे धोखा दिया था।”

    नैना चौंक गईं।

    “पापा!”

    “आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

    नाना ने कहा—

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम उस सच से दूर रहो।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन है वो?”

    नाना ने स्क्रीन की तरफ देखा।

    “तुम उसे जानते हो।”

    “बहुत करीब से।”

    अमन ने पूछा—

    “कौन?”

    नाना ने सिर्फ इतना कहा—

    “देवेंद्र।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सभी की नजर देवेंद्र पर टिक गई।

    देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।

    नैना ने अविश्वास से कहा—

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

    आरव ने बंदूक निकाल ली।

    “पापा के दोस्त…”

    “क्या आप गद्दार हैं?”

    देवेंद्र की आंखों में आंसू आ गए।

    “आरव… बात वैसी नहीं है जैसी दिख रही है।”

    अभय भी चौंक गया।

    “देवेंद्र?”

    नाना ने कहा—

    “उसने मुझे धोखा दिया था।”

    देवेंद्र ने कांपती आवाज में कहा—

    “मैंने धोखा नहीं दिया था।”

    “मैंने किसी को बचाने के लिए झूठ बोला था।”

    आरव ने पूछा—

    “किसे?”

    देवेंद्र ने धीरे से नैना की तरफ देखा।

    नैना की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र ने कहा—

    “नैना को।”

    नैना स्तब्ध रह गईं।

    और तभी स्क्रीन अचानक बंद हो गई।

    विक्रम की आखिरी आवाज गूंजी—

    “अब समझे, आरव? इस परिवार में कोई भी वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

    स्क्रीन काली हो गई।

    आरव की नजर देवेंद्र और नैना के बीच घूम रही थी।

    उसे पहली बार लगा—

    शायद उसके परिवार का सबसे बड़ा राज अभी खुलना बाकी है।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 51

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 51 : पुरानी हवेली का बंद कमरा

     

    पुरानी हवेली के सामने खड़ी काली गाड़ी का इंजन बंद हो चुका था।

     

    चारों तरफ अंधेरा था।

     

    हवा इतनी तेज चल रही थी कि हवेली की टूटी खिड़कियां बार-बार आपस में टकरा रही थीं।

     

    आरव ने हवेली के खुले दरवाजे को देखा।

     

    अंदर से विक्रम की आवाज अब भी गूंज रही थी—

     

    “आओ आरव… तुम्हारा इंतजार था।”

     

    आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    शेखर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “इस हवेली में कदम रखने के बाद वापस निकलना आसान नहीं होगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अंदर आरोही है।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तो मैं उसे छोड़कर नहीं जा सकता।”

     

    शेखर ने उसकी आंखों में देखा।

     

    “इसीलिए विक्रम ने उसे चुना है।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    उसने अपनी मुट्ठी बांधी और हवेली के अंदर चला गया।

     

     

     

    हवेली के अंदर

     

    हवेली के अंदर कदम रखते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    “शेखर?”

     

    शेखर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन दरवाजा नहीं खुला।

     

    “ये लॉक हो गया है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम फंस गए।”

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    तभी सामने की दीवार पर लगी सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    सामने एक बड़ा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी पर आरोही बैठी थी।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “आरोही!”

     

    आरोही ने सिर उठाया।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ना चाहता था, लेकिन शेखर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    “क्यों?”

     

    “कुछ गड़बड़ है।”

     

    आरोही ने जोर से कहा—

     

    “आरव, पास मत आना!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    “आरोही?”

     

    उसने कांपती आवाज में कहा—

     

    “फर्श के नीचे कुछ है।”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फर्श पर छोटे-छोटे लाल निशान बने थे।

     

    शेखर ने तुरंत कहा—

     

    “पीछे हटो!”

     

    अगले ही पल फर्श के कुछ हिस्से से बिजली की चिंगारी निकली।

     

    अगर आरव एक कदम और आगे बढ़ता…

     

    तो शायद वह बच नहीं पाता।

     

     

     

    विक्रम सामने आया

     

    ऊपर की बालकनी से तालियों की आवाज आई।

     

    ताली… ताली… ताली…

     

    विक्रम धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    “शाबाश, शेखर।”

     

    शेखर ने बंदूक निकाल ली।

     

    “खेल खत्म हो चुका है, विक्रम।”

     

    विक्रम हंस पड़ा।

     

    “तुम अब भी खुद को हीरो समझते हो?”

     

    “बीस साल तक मेरे साथ रहकर मेरे खिलाफ सबूत जमा करते रहे।”

     

    “लेकिन आखिर में यहां आए किसके साथ?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “आरव के साथ।”

     

    विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

     

    “मुझे पता था।”

     

    आरव ने गुस्से में पूछा—

     

    “आरोही को क्यों उठाया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हें यहां लाने का यही एक तरीका था।”

     

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    विक्रम धीरे-धीरे आरव के पास आया।

     

    “तुम्हारे पास जो चाबी है।”

     

    आरव ने अपनी जेब पर हाथ रखा।

     

    “ये?”

     

    “हां।”

     

    “और अगर मैं नहीं दूं?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “तो आरोही मरेगी।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “उसे हाथ भी मत लगाना।”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हें अपनी कमजोरी का पता भी नहीं है, आरव।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    आरोही ने आंखों से इशारा किया—

     

    “चाबी मत देना।”

     

    आरव समझ गया।

     

     

     

    आरोही का इशारा

     

    विक्रम ने आरोही की तरफ देखा।

     

    “क्या कहा उसने?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    विक्रम आरोही के पास गया।

     

    “तुम्हें लगता है तुम्हारा हीरो तुम्हें बचा लेगा?”

     

    आरोही ने बिना डरे कहा—

     

    “मुझे अपने आरव पर पूरा भरोसा है।”

     

    विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।

     

    “प्यार।”

     

    “यही सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “प्यार इंसान को कमजोर नहीं… मजबूत बनाता है।”

     

    विक्रम ने उसे घूरा।

     

    आरव की आंखों में गर्व था।

     

     

     

    छुपा हुआ संदेश

     

    अचानक शेखर ने आरव के कान में धीरे से कहा—

     

    “तुम्हारी मां ने जो लॉकेट दिया था, उसमें सिर्फ चिप नहीं थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और क्या?”

     

    “एक ट्रैकिंग डिवाइस।”

     

    आरव की आंखें फैल गईं।

     

    “तो?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “नैना को पता है कि हम यहां हैं।”

     

    आरव ने तुरंत अपना फोन निकाला।

     

    सिग्नल नहीं था।

     

    शेखर मुस्कुराया।

     

    “फोन से नहीं।”

     

    उसने आरव की घड़ी की तरफ इशारा किया।

     

    “उसमें।”

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    उसकी स्क्रीन पर एक छोटा लाल निशान चमक रहा था।

     

    LOCATION SHARED.

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “मां हमें ढूंढ रही हैं।”

     

     

     

    विक्रम की असली मांग

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “चाबी दो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “पहले आरोही को छोड़ो।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है मैं इतना मूर्ख हूं?”

     

    “चाबी पहले।”

     

    आरव ने चाबी निकाल ली।

     

    विक्रम की नजर चाबी पर टिक गई।

     

    लेकिन तभी शेखर ने गोली चला दी।

     

    धांय!

     

    विक्रम पीछे हट गया।

     

    आरव दौड़कर आरोही के पास पहुंचा।

     

    उसने उसके हाथ खोले।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत डर गई थी?”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “तुम आ गए थे ना।”

     

    आरव ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन तभी…

     

    धांय!

     

    एक गोली दीवार से टकराई।

     

    विक्रम वहां नहीं था।

     

    शेखर ने चारों तरफ देखा।

     

    “वो भाग गया।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उसे जाने दो।”

     

    शेखर ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि अब हमें पता है वो क्या चाहता है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने चाबी अपनी जेब से निकाली।

     

    “ये।”

     

     

     

    लेकिन चाबी नकली थी

     

    विक्रम की आवाज अचानक पूरे कमरे में गूंजी—

     

    “आरव…”

     

    “तुमने मुझे जो चाबी दी थी…”

     

    “वो नकली थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    विक्रम सामने नहीं था।

     

    लेकिन उसकी आवाज चारों तरफ से आ रही थी।

     

    “तुम बहुत चालाक हो गए हो।”

     

    “लेकिन तुम्हें अभी ये नहीं पता कि असली चाबी किसके पास है।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास।”

     

    आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मेरे पास?”

     

    “तुम्हारे लॉकेट में।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना लॉकेट पकड़ लिया।

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लॉकेट में सिर्फ सबूत नहीं छुपाया था।”

     

    “उन्होंने असली चाबी छुपाई थी।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तो इसी वजह से उसने आरोही को अगवा किया था।”

     

    विक्रम की आवाज आई—

     

    “बिल्कुल।”

     

     

     

    लॉकेट का दूसरा राज

     

    आरव ने आरोही का लॉकेट देखा।

     

    “इसे खोलो।”

     

    आरोही ने लॉकेट खोला।

     

    अंदर लगी छोटी सी धातु की प्लेट हटाने पर एक बेहद छोटी चाबी दिखाई दी।

     

    अमन की कही बात आरव को याद आई—

     

    “तीनों के पास अलग-अलग चाबी है।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “तो हमारे पास तीन चाबियां थीं।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “और अब ये तीनों मिलकर कुछ खोलेंगी।”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “एक ऐसी जगह… जहां तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।”

     

    सबने पीछे देखा।

     

    दरवाजे पर नैना खड़ी थीं।

     

    उनके साथ देवेंद्र, माधवी, अमन और विहान भी थे।

     

    आरोही की आंखों में खुशी आ गई।

     

    “मां…”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हम तुम्हें लेने आए हैं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपको पता था हम यहां हैं?”

     

    नैना मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारी घड़ी ने सब बता दिया।”

     

     

     

    विक्रम फिर सामने आया

     

    अचानक हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरा छा गया।

     

    फिर विक्रम की आवाज आई—

     

    “तुम सब यहां आ गए।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “अब तुम्हारा खेल खत्म।”

     

    विक्रम हंसा।

     

    “नैना… तुम्हें लगता है कि पच्चीस साल पहले मैं हार गया था?”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम सिर्फ भागी थीं।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “लेकिन इस बार मैं नहीं भागूंगी।”

     

    अचानक सामने स्क्रीन जल उठी।

     

    उस पर एक लाइव वीडियो चल रहा था।

     

    वीडियो में राजवीर जेल के कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    “ये कौन है?”

     

    नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    देवेंद्र भी स्तब्ध रह गया।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “मां?”

     

    नैना की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “नहीं…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “ये आदमी… तुम्हारे नाना हैं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने स्क्रीन को देखा।

     

    “लेकिन आपने कहा था नाना की मौत हो चुकी है।”

     

    नैना ने कहा—

     

    “हमें भी यही लगता था।”

     

    स्क्रीन पर वो आदमी धीरे-धीरे कैमरे की तरफ मुड़ा।

     

    उसके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी।

     

    और उसने कहा—

     

    “मेरे बच्चों… बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे ढूंढने में।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    विहान पीछे हट गया।

     

    अमन ने अविश्वास से कहा—

     

    “तो इतने सालों से हमारे नाना जिंदा थे?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    फिर स्क्रीन पर विक्रम दिखाई दिया।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “अब तुम्हें चुनना होगा—तुम अपने नाना को बचाओगे या इस हवेली के अंदर छिपा वो सच खोजोगे, जिसके लिए तुम तीनों पैदा हुए थे।”

     

    आरव ने मुट्ठी भींच ली।

     

    उसकी नजर पहले अपनी मां पर गई…

     

    फिर आरोही पर…

     

    और आखिर में स्क्रीन पर मौजूद अपने नाना पर।

     

    उसे पहली बार समझ आया—

     

    ये लड़ाई सिर्फ उसके परिवार की नहीं थी।

     

    इसके पीछे एक ऐसा राज था…

     

    जो उसकी और आरोही की पूरी जिंदगी बदल सकता था।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 48

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 48 : अभय का नाम सुनकर क्यों कांप गया देवेंद्र?

    देवेंद्र के हाथ से फोन लगभग छूट ही गया।

    स्क्रीन पर सिर्फ एक नाम था—

    “अभय।”

    आरव ने फोन को दोबारा देखा।

    “अभय…?”

    उसकी आवाज में हैरानी थी।

    विहान भी तुरंत आरव के पास आ गया।

    “अभय कौन?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “पापा… अभय तो मेरे पिता थे।”

    देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।

    “हां।”

    “तो फिर इस मैसेज का मतलब क्या है?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    नैना भी अचानक गंभीर हो गईं।

    माधवी ने उनकी तरफ देखा।

    “नैना… अब हमें सच बताना होगा।”

    नैना ने धीरे से सिर हिलाया।

    “हां दीदी।”

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    नैना ने तीनों भाइयों को अपने पास बुलाया।

    “तुम्हारे पिता अभय की मौत वैसी नहीं हुई थी, जैसी तुम्हें बताई गई।”

    तीनों भाई एक साथ चौंक गए।


    अभय की मौत का सच

    अमन ने पूछा—

    “तो हमारे पिता की मौत कैसे हुई थी?”

    नैना ने गहरी सांस ली।

    “अभय मरा नहीं था।”

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “क्या?”

    “जिस आदमी की लाश तुम्हें दिखाई गई थी… वो अभय नहीं था।”

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

    “तो मेरे पिता जिंदा हैं?”

    नैना ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

    देवेंद्र ने कहा—

    “हमें नहीं पता।”

    आरव ने गुस्से में पूछा—

    “आपको नहीं पता?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “पच्चीस साल पहले अभय गायब हो गया था।”

    “और तब से किसी ने उसे नहीं देखा।”

    अमन ने पूछा—

    “तो उसकी मौत की खबर किसने फैलाई?”

    नैना ने राजवीर की तरफ इशारा किया।

    “राजवीर ने।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन अभी जो मैसेज आया है, उसमें लिखा है कि राजवीर को आदेश देने वाला अभय था।”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही सबसे बड़ा सवाल है।”


    क्या अभय लौट आया है?

    आरव ने फोन फिर देखा।

    “अगर अभय जिंदा है… तो उसने राजवीर को आदेश क्यों दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “शायद वो वही अभय नहीं है जिसे हम जानते थे।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “ऐसा मत कहिए।”

    “मेरे पिता बुरे इंसान नहीं थे।”

    नैना ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “मैं जानती हूं।”

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाल दी थी।”

    विहान ने पूछा—

    “फिर वो गायब क्यों हुए?”

    नैना की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उन्होंने एक ऐसा राज जान लिया था, जिसे जानने वाला कोई भी जिंदा नहीं बचता।”

    अमन ने पूछा—

    “क्या राज?”

    नैना ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों के जन्म का।”

    तीनों भाई चौंक गए।

    आरव ने पूछा—

    “लेकिन हमने तो अभी सब जान लिया।”

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “जो तुम जानते हो… वो पूरी सच्चाई नहीं है।”


    तीन बच्चों का असली रहस्य

    आरव ने बेचैनी से पूछा—

    “तो फिर क्या छुपाया गया है?”

    नैना ने कहा—

    “तुम तीनों का जन्म सिर्फ एक संयोग नहीं था।”

    अमन ने पूछा—

    “मतलब?”

    “तुम तीनों को एक साथ पैदा होने की वजह थी।”

    विहान ने पूछा—

    “किसने तय किया था?”

    नैना ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने।”

    आरव चौंका।

    “नाना?”

    “हां।”

    “उन्होंने तुम्हें एक खास वजह से दुनिया में लाया था।”

    आरव ने गुस्से में कहा—

    “हम कोई योजना नहीं हैं।”

    नैना की आंखों में आंसू आ गए।

    “तुम मेरे बच्चे हो।”

    “लेकिन उस समय हमारे परिवार पर बहुत बड़ा खतरा था।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “तुम्हारे नाना ने एक ऐसी संपत्ति बनाई थी, जो सिर्फ तीन वारिसों को मिल सकती थी।”

    अमन ने पूछा—

    “तीन वारिस?”

    “तुम तीनों।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन क्यों?”

    देवेंद्र ने जवाब दिया—

    “क्योंकि तीनों के पास उस संपत्ति की अलग-अलग चाबी थी।”

    आरव ने अपनी जेब में रखी चाबी को देखा।

    “तो ये सिर्फ एक चाबी नहीं है?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “ये पहली चाबी है।”

    अमन ने पूछा—

    “दूसरी?”

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हारे पास है।”

    अमन ने चौंककर अपनी जेब टटोली।

    उसे एक छोटा सा पुराना सिक्का मिला।

    “ये?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    विहान ने पूछा—

    “और तीसरी?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारे पास है।”

    विहान ने अपने गले में पहना लॉकेट छुआ।

    “ये?”

    नैना ने सिर हिलाया।

    “यही।”


    तीनों निशान

    तीनों चीजों को एक साथ मेज पर रखा गया।

    चाबी।

    सिक्का।

    और लॉकेट।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर अचानक तीनों चीजों पर बने निशान चमकने लगे।

    आरोही ने हैरानी से कहा—

    “ये कैसे?”

    माधवी ने कहा—

    “नैना ने ये सब इतने साल छुपाकर रखा था।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने नहीं।”

    सबने उनकी तरफ देखा।

    “तो?”

    नैना ने कहा—

    “ये सब अभय ने छुपाया था।”

    आरव के चेहरे पर हैरानी छा गई।

    “अभय?”

    “हां।”

    “तो वो जिंदा थे?”

    नैना ने कहा—

    “मुझे पूरा विश्वास है कि वो जिंदा थे।”

    तभी कमरे में रखी पुरानी मशीन अचानक चालू हो गई।

    उसमें से एक आवाज आई—

    “अगर तुम तीनों एक साथ ये संदेश सुन रहे हो, तो समझो मैं शायद तुम्हारे पास नहीं हूं।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “पापा…”

    वो आवाज अभय की थी।


    अभय की रिकॉर्डिंग

    रिकॉर्डिंग आगे चली—

    “आरव… अमन… विहान…”

    तीनों भाइयों की आंखों में आंसू आ गए।

    “अगर तुम मेरी आवाज सुन रहे हो तो इसका मतलब है कि नैना तुम्हारे पास वापस आ चुकी है।”

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

    अभय की आवाज आगे आई—

    “मैंने तुम तीनों को बचाने के लिए अपनी मौत का नाटक किया।”

    आरव ने आंखें पोंछीं।

    “लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं कितने समय तक छिपा रहूंगा।”

    “राजवीर को लगता है कि मैंने सब कुछ खत्म कर दिया।”

    “लेकिन असली खेल अभी बाकी है।”

    देवेंद्र ने बेचैनी से कहा—

    “अभय…”

    रिकॉर्डिंग में अभय ने कहा—

    “राजवीर सिर्फ एक मोहरा है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    “तो फिर असली खिलाड़ी कौन है?”

    जैसे ही अभय ये कहने वाला था—

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

    अमन ने मशीन पर हाथ मारा।

    “नहीं!”

    विहान ने कहा—

    “आगे क्यों नहीं चल रहा?”

    देवेंद्र ने मशीन खोली।

    “किसी ने रिकॉर्डिंग का आखिरी हिस्सा निकाल दिया है।”

    आरव ने कहा—

    “किसने?”

    देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।


    कमरे में कौन था?

    आरोही अचानक बोली—

    “एक मिनट।”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    “जब ये रिकॉर्डिंग चली… तब कमरे में हम सब थे।”

    “हां।”

    “लेकिन रिकॉर्डिंग शुरू होने से पहले कमरे में कोई और भी था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    आरोही ने धीरे से कहा—

    “रुद्र।”

    सबकी नजर रुद्र पर गई।

    रुद्र चुप खड़ा था।

    अमन ने तुरंत उसकी तरफ बंदूक तान दी।

    “रिकॉर्डिंग का हिस्सा कहां है?”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास नहीं है।”

    “झूठ!”

    विहान ने कहा—

    “तुम पहले भी हमें धोखा दे चुके हो।”

    रुद्र ने हाथ ऊपर कर दिए।

    “इस बार मैं सच बोल रहा हूं।”

    आरव ने पूछा—

    “तो फिर तुम्हें क्या पता है?”

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

    फिर बोला—

    “अभय जिंदा है।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    आरव ने धीरे से पूछा—

    “कहां?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैं नहीं जानता।”

    “लेकिन?”

    रुद्र ने कहा—

    “वो मुझे हर महीने एक संदेश भेजता था।”


    आखिरी संदेश

    “क्या लिखा था?”

    रुद्र ने अपने फोन से एक पुराना संदेश दिखाया।

    उसमें लिखा था—

    “जब मेरे तीनों बेटे एक साथ होंगे, उन्हें पुराने शिव मंदिर तक ले जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा मंदिर?”

    रुद्र ने कहा—

    “शहर से बाहर वाला।”

    नैना अचानक घबरा गईं।

    “नहीं!”

    सब उनकी तरफ देखने लगे।

    “क्या हुआ?”

    नैना ने कहा—

    “वहां मत जाना।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

    “क्योंकि उसी मंदिर में…”

    वह रुक गईं।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    नैना की आंखों से आंसू बह निकले।

    “उसी मंदिर में तुम्हारे पिता अभय को आखिरी बार देखा गया था।”

    आरव ने तुरंत कहा—

    “तो हमें वहीं जाना होगा।”

    नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “नहीं बेटा।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि अगर अभय वहां है…”

    वह कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “तो वो अकेला नहीं होगा।”


    मंदिर की ओर

    रात गहरी हो चुकी थी।

    फिर भी आरव, अमन, विहान और आरोही मंदिर जाने के लिए तैयार थे।

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं भी चलूंगा।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी।”

    माधवी ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम्हें नहीं जाना चाहिए।”

    नैना ने कहा—

    “पच्चीस साल भाग चुकी हूं।”

    “अब नहीं।”

    आरव ने मां का हाथ पकड़ लिया।

    “इस बार हम सब साथ चलेंगे।”

    कुछ देर बाद गाड़ियां मंदिर की ओर बढ़ने लगीं।

    रास्ते में आरव चुप था।

    आरोही ने पूछा—

    “क्या सोच रहे हो?”

    “अगर पापा सच में जिंदा हैं…”

    “तो?”

    “मैं उनसे बहुत सारे सवाल पूछूंगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “और अगर वो तुम्हें गले लगा लें?”

    आरव की आंखें नम हो गईं।

    “तो शायद मेरी जिंदगी पूरी हो जाएगी।”


    मंदिर में इंतजार

    रात के करीब बारह बजे सभी मंदिर पहुंच गए।

    चारों तरफ सन्नाटा था।

    हवा तेज चल रही थी।

    मंदिर के अंदर एक दीपक जल रहा था।

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

    उस तस्वीर में अभय था।

    आरव की आंखें भर आईं।

    “पापा…”

    अचानक मंदिर के पीछे से किसी के कदमों की आवाज आई।

    ठक… ठक… ठक…

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

    विहान ने भी हथियार संभाल लिया।

    आरोही आरव के पास खड़ी हो गई।

    देवेंद्र ने सबको पीछे रहने का इशारा किया।

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

    चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।

    आरव ने कहा—

    “कौन हो?”

    आदमी ने धीरे-धीरे चेहरा खोला।

    तीनों भाइयों की आंखें फैल गईं।

    देवेंद्र के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला—

    “अभय…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    “पापा…”

    अभय ने तीनों बेटों को देखा।

    लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

    बल्कि…

    डर था।

    उसने धीरे से कहा—

    “तुम तीनों को यहां नहीं आना चाहिए था।”

    आरव ने पूछा—

    “क्यों?”

    अभय ने पीछे अंधेरे की तरफ देखा।

    फिर बोला—

    “क्योंकि जिसने मुझे इतने साल कैद करके रखा… वो जान चुका है कि तुम तीनों यहां हो।”

    और मंदिर के बाहर अचानक दर्जनों गाड़ियों की हेडलाइट्स दिखाई देने लगीं।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 47

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 47 : मां सामने थी, फिर भी एक रहस्य बाकी था

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    बाहर से आई उस आवाज ने जैसे पूरे कमरे की सांसें रोक दीं।

    राजवीर के हाथ से बंदूक नीचे गिर गई।

    विहान की आंखें फैल गईं।

    “मां…?”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    लेकिन आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    विहान ने बेचैनी से कहा—

    “भाई, वो मां हैं!”

    आरव ने कहा—

    “हमें पक्का यकीन नहीं है।”

    तभी बाहर से वही आवाज आई—

    “विहान… इतने सालों बाद भी तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मुझे अपनी मां की आवाज कैसे भूल सकती है?”

    वह आरव का हाथ छुड़ाकर दरवाजे तक पहुंच गया।

    देवेंद्र ने भी उसे रोकना चाहा, लेकिन विहान ने कहा—

    “अगर ये मेरी मां हैं और मैं फिर उनसे दूर हो गया… तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।”

    उसने दरवाजा खोल दिया।


    नैना सामने थी

    दरवाजा खुलते ही सामने एक महिला खड़ी थी।

    सफेद साड़ी।

    चेहरे पर उम्र के निशान।

    आंखों में आंसू।

    लेकिन वही चेहरा…

    वही आंखें…

    वही आवाज।

    विहान उसे देखते ही कुछ पल के लिए जम गया।

    महिला ने धीरे से कहा—

    “विहान…”

    विहान के होंठ कांपे।

    “मां…”

    और अगले ही पल वह दौड़कर उनसे लिपट गया।

    “मां!”

    महिला ने उसे कसकर गले लगा लिया।

    उसकी आंखों से भी आंसू बहने लगे।

    “मेरा बच्चा…”

    विहान फूट-फूटकर रोने लगा।

    “आप कहां चली गई थीं मां?”

    “मैंने आपको कितना ढूंढा।”

    “मुझे लगा आप मर गईं।”

    नैना ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

    “मैं मरना चाहती तो भी नहीं मर सकती थी।”

    “क्यों?”

    नैना ने धीरे से कहा—

    “क्योंकि मुझे अपने बच्चों के पास वापस आना था।”

    विहान ने पीछे मुड़कर आरव और अमन को देखा।

    “मां… ये आरव है।”

    नैना की नजर आरव पर गई।

    उनकी आंखें भर आईं।

    “मेरा गुड्डू…”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    उसे बचपन की वही आवाज याद आई—

    “गुड्डू, इतना मत रो… मां यहीं है।”

    आरव धीरे-धीरे उनके पास गया।

    “आप… सच में मेरी मां हैं?”

    नैना ने अपने हाथ आगे बढ़ाए।

    “आओ।”

    आरव उनके गले लग गया।

    नैना ने उसे कसकर पकड़ लिया।

    “मेरा बच्चा… मैंने तुम्हें बहुत याद किया।”

    आरव की आंखें बंद थीं।

    उसके अंदर बरसों से खाली पड़ा एक कोना जैसे पहली बार भर गया था।


    अमन की बारी

    अमन कुछ दूर खड़ा सब देख रहा था।

    नैना ने उसे देखा।

    उनकी आंखों में फिर आंसू आ गए।

    “अमन…”

    अमन की आंखें भर आईं।

    “आपको मेरा नाम भी याद है?”

    नैना ने कहा—

    “मां अपने बच्चे का नाम कैसे भूल सकती है?”

    अमन उनके पास गया।

    नैना ने उसे भी गले लगा लिया।

    तीनों भाई पहली बार अपनी जन्मदात्री मां के साथ खड़े थे।

    माधवी यह दृश्य देखकर रो रही थीं।

    आरव ने उन्हें देखा।

    “मां…”

    नैना ने भी माधवी की तरफ देखा।

    दोनों बहनों की आंखें मिलीं।

    कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर नैना ने आगे बढ़कर माधवी को गले लगा लिया।

    “दीदी…”

    माधवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।

    “मुझे लगा था तुम मर गई।”

    नैना ने कहा—

    “मैं भी यही चाहती थी कि तुम मुझे मरा हुआ समझो।”

    माधवी ने हैरानी से पूछा—

    “क्यों?”

    नैना ने पीछे खड़े राजवीर की तरफ देखा।

    “क्योंकि अगर तुम्हें पता चलता कि मैं जिंदा हूं… तो राजवीर तुम्हें भी नहीं छोड़ता।”


    राजवीर का डर

    राजवीर अब भी वहीं खड़ा था।

    नैना ने उसकी तरफ देखा।

    “इतने सालों बाद भी तुम वही हो।”

    राजवीर ने धीरे से कहा—

    “तुम्हें मर जाना चाहिए था।”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हारी यही सबसे बड़ी गलती थी।”

    “तुमने मुझे कमजोर समझा।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “मैंने तुम्हें खत्म कर दिया था!”

    नैना ने कहा—

    “नहीं।”

    “तुमने सिर्फ मुझे दुनिया की नजरों में खत्म किया था।”

    “लेकिन मैं जिंदा थी।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    “तुम्हें किसने बचाया?”

    नैना ने जवाब नहीं दिया।

    राजवीर ने चारों तरफ देखा।

    “किसने?”

    नैना ने कहा—

    “उस आदमी ने, जिसे तुमने सबसे पहले अपना दुश्मन समझा था।”

    राजवीर का चेहरा बदल गया।

    “देवेंद्र?”

    देवेंद्र आगे आया।

    “हां।”

    राजवीर हंस पड़ा।

    “तुम दोनों ने मुझे इतने साल धोखा दिया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “नहीं। हमने तुम्हारी चाल को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किया।”


    उस रात क्या हुआ था?

    आरव ने पूछा—

    “मां, उस रात आखिर हुआ क्या था?”

    नैना कुछ पल चुप रहीं।

    फिर बोलीं—

    “मुझे राजवीर के लोग उठा ले गए थे।”

    “मुझे गोली लगी थी।”

    “लेकिन मैं मरी नहीं।”

    “देवेंद्र मुझे वहां से निकालकर ले गया।”

    देवेंद्र ने कहा—

    “मैं तुम्हें अस्पताल ले जाना चाहता था।”

    नैना ने कहा—

    “लेकिन तब तक राजवीर को पता चल चुका था कि मैं जिंदा हूं।”

    “इसलिए मुझे एक गुप्त जगह पर रखा गया।”

    आरव ने पूछा—

    “इतने साल?”

    “हां।”

    “आप हमसे मिलने क्यों नहीं आईं?”

    नैना की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम तीनों की जान खतरे में पड़े।”

    अमन ने पूछा—

    “लेकिन आपने हमें अकेला छोड़ दिया।”

    नैना ने कहा—

    “मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।”

    “मैं हर साल तुम्हारी खबर लेती थी।”

    विहान ने कहा—

    “तो आपने मुझे देखा था?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “तुम्हें शायद याद भी नहीं होगा।”

    “जब तुम छोटे थे, मैं दूर खड़ी होकर तुम्हें स्कूल जाते देखती थी।”

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

    “मां…”


    एक और बड़ा सच

    आरव ने पूछा—

    “मां, फिर आपने हमें एक-दूसरे से दूर क्यों रखा?”

    नैना ने कहा—

    “क्योंकि राजवीर तुम्हें ढूंढ रहा था।”

    “उसे पता था कि तुम तीनों के पास मेरी संपत्ति और मेरे सबूतों की चाबी है।”

    आरव ने अपनी जेब से वही चाबी निकाली।

    “ये?”

    नैना ने चाबी देखते ही कहा—

    “हां।”

    “इसे मैंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

    अमन ने पूछा—

    “इससे क्या खुलेगा?”

    नैना ने कहा—

    “एक ऐसी जगह जहां तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए सब कुछ छुपाकर रखा है।”

    आरव चौंका।

    “पिता?”

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    “तुम्हारे पिता की असली वसीयत।”

    विहान ने पूछा—

    “और उसमें क्या है?”

    नैना ने कहा—

    “सिर्फ संपत्ति नहीं।”

    “राजवीर के खिलाफ सबूत भी।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “नैना, तुम नहीं जानती कि तुम क्या कर रही हो।”

    नैना उसकी तरफ मुड़ीं।

    “इस बार मैं सब जानती हूं।”


    राजवीर की आखिरी चाल

    राजवीर ने अचानक अपनी जेब से एक छोटा रिमोट निकाला।

    देवेंद्र की नजर उस पर पड़ गई।

    “राजवीर!”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “अगर मैं ये बटन दबा दूं…”

    आरव ने पूछा—

    “क्या होगा?”

    राजवीर ने कहा—

    “पूरी हवेली उड़ जाएगी।”

    सबके चेहरे पर डर छा गया।

    आरोही आरव के पास आ गई।

    “आरव…”

    देवेंद्र ने कहा—

    “राजवीर, ऐसा मत करना।”

    राजवीर हंसा।

    “मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है।”

    नैना आगे बढ़ीं।

    “राजवीर, तुम्हें लगता है मैं इस बार भी डर जाऊंगी?”

    “मैं मरने से नहीं डरती।”

    राजवीर ने रिमोट का बटन दबाने के लिए उंगली बढ़ाई।

    तभी पीछे से एक गोली चली।

    धांय!

    रिमोट उसके हाथ से गिर गया।

    सबने पीछे देखा।

    रुद्र खड़ा था।

    उसके कंधे पर अभी भी चोट थी।

    अमन ने हैरानी से कहा—

    “रुद्र!”

    रुद्र ने कहा—

    “इस बार सही पक्ष में हूं।”

    राजवीर ने गुस्से में उसे देखा।

    “तू!”

    रुद्र ने कहा—

    “तुमने मुझे बहुत साल इस्तेमाल किया।”

    “अब हिसाब बराबर होगा।”


    राजवीर गिरफ्तार?

    बाहर से पुलिस की गाड़ियों की आवाज आने लगी।

    राजवीर चौंक गया।

    “पुलिस?”

    नैना ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर ने उनकी तरफ देखा।

    “तुमने पुलिस को बुलाया?”

    नैना मुस्कुराईं।

    “नहीं।”

    फिर उन्होंने रुद्र की तरफ देखा।

    “उसने।”

    रुद्र ने कहा—

    “मेरे पास तुम्हारे खिलाफ सारे सबूत हैं।”

    राजवीर पीछे हटने लगा।

    “तुम लोग मुझे नहीं पकड़ सकते।”

    तभी शेखर ने अपने बंधे हाथों के बावजूद राजवीर को धक्का दिया।

    राजवीर जमीन पर गिर पड़ा।

    शेखर ने कहा—

    “बहुत कर लिया।”

    पुलिस अंदर घुस आई।

    राजवीर को गिरफ्तार कर लिया गया।

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा।

    “तुम सोचते हो खेल खत्म हो गया?”

    आरव ने कहा—

    “हां।”

    राजवीर मुस्कुराया।

    “नहीं… असली खेल तो अब शुरू होगा।”


    मां के साथ पहली रात

    राजवीर के जाने के बाद हवेली में पहली बार शांति थी।

    तीनों भाई अपनी मां के आसपास बैठे थे।

    विहान ने नैना का हाथ पकड़ा हुआ था।

    अमन उनके पास बैठा था।

    आरव थोड़ा दूर खड़ा था।

    नैना ने उसे देखा।

    “गुड्डू।”

    आरव उनकी तरफ आया।

    “जी?”

    नैना ने कहा—

    “तुम मुझसे नाराज हो?”

    आरव की आंखें भर आईं।

    “नहीं।”

    “तुमने मुझे छोड़ दिया था।”

    “लेकिन मुझे पता है क्यों।”

    नैना ने उसका चेहरा छूते हुए कहा—

    “मुझे माफ कर दो।”

    आरव ने सिर उनकी गोद में रख दिया।

    “मां को माफी नहीं मांगनी चाहिए।”

    नैना रो पड़ीं।

    अमन और विहान भी उनके पास आ गए।

    चारों एक-दूसरे से लिपट गए।

    आरोही दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी।

    लेकिन तभी माधवी उसके पास आईं।

    उन्होंने धीरे से कहा—

    “तुम आरव से बहुत प्यार करती हो।”

    आरोही ने शर्म से सिर झुका लिया।

    “जी।”

    माधवी मुस्कुराईं।

    “तो एक बात याद रखना।”

    “क्या?”

    माधवी ने कहा—

    “आरव की जिंदगी अब सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है… उसके अतीत का एक ऐसा राज बाकी है, जो उसे तुमसे भी दूर कर सकता है।”

    आरोही चौंक गई।

    “क्या मतलब?”

    माधवी कुछ कहतीं, उससे पहले नैना ने उन्हें रोक दिया।

    “माधवी… अभी नहीं।”

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

    “क्या हुआ?”

    नैना और माधवी एक-दूसरे को देखने लगीं।

    नैना ने धीमे से कहा—

    “आरव को अभी ये सच नहीं पता चलना चाहिए।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन-सा सच?”

    दोनों चुप रहीं।

    तभी देवेंद्र के फोन पर एक मैसेज आया।

    उसने मैसेज पढ़ा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

    आरव ने पूछा—

    “क्या हुआ?”

    देवेंद्र ने फोन छुपाने की कोशिश की।

    लेकिन आरव ने फोन ले लिया।

    मैसेज में सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

    “राजवीर गिरफ्तार हो गया है, लेकिन जिसने उसे आदेश दिए थे… वह अभी आजाद है।”

    आरव की आंखें फैल गईं।

    और नीचे एक नाम लिखा था—

    “अभय।”

    आरव के हाथ कांपने लगे।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 46

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    एपिसोड – 46 : असली दुश्मन कौन है?

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”

    आवाज सुनते ही आरव, अमन और विहान ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।

    अंधेरे में एक परछाई खड़ी थी।

    हाथ में बंदूक थी।

    चेहरा अभी भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

    राजवीर भी उस आवाज को सुनकर कुछ पल के लिए जम गया।

    आरव ने तुरंत पूछा—

    “कौन हो तुम?”

    परछाई धीरे-धीरे रोशनी में आई।

    और जैसे ही चेहरा सामने आया, तीनों भाइयों के होश उड़ गए।

    वो कोई अनजान इंसान नहीं था।

    वो था…

    रुद्र।

    अमन की आंखें फैल गईं।

    “रुद्र?”

    विहान पीछे हट गया।

    “तुम…?”

    आरोही ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

    “ये क्या हो रहा है?”

    रुद्र के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

    वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।

    “हां… मैं।”

    आरव ने अविश्वास से पूछा—

    “तुमने हमें धोखा दिया?”

    रुद्र ने कहा—

    “मैंने कभी तुम्हारा दोस्त होने का दावा नहीं किया था।”

    आरव का चेहरा कठोर हो गया।

    “लेकिन तुमने इतने साल मेरे साथ काम किया।”

    “क्योंकि मुझे तुम्हारे पास रहना था।”

    अमन ने गुस्से में बंदूक उठा ली।

    “किसके कहने पर?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “राजवीर के।”

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

    “रुद्र!”

    रुद्र ने उसकी तरफ मुड़कर कहा—

    “अब चुप रहो।”

    राजवीर पहली बार असहाय नजर आया।


    राजवीर भी हैरान था

    आरव ने तुरंत समझ लिया कि मामला सिर्फ रुद्र और राजवीर के बीच का नहीं है।

    “तुमने अभी राजवीर को भी चुप करा दिया।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “क्योंकि अब खेल मेरे हाथ में है।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “तुम भूल रहे हो कि तुम्हें मैंने बनाया है।”

    रुद्र ने कहा—

    “और तुम भूल रहे हो कि तुम्हारे सारे राज मेरे पास हैं।”

    राजवीर कुछ नहीं बोला।

    आरव ने पूछा—

    “तुम दोनों के बीच आखिर रिश्ता क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “राजवीर मेरा मालिक था।”

    “था?”

    “अब नहीं।”

    विहान ने कहा—

    “तो फिर तुम चाहते क्या हो?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम तीनों।”

    आरव आगे आया।

    “क्यों?”

    रुद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम तीनों के बिना नैना की आखिरी वसीयत पूरी नहीं हो सकती।”

    अमन ने पूछा—

    “वसीयत?”

    रुद्र ने सिर हिलाया।

    “तुम्हारी मां ने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम की थी।”

    “लेकिन उसके साथ एक शर्त थी।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या?”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “तीनों भाइयों को एक साथ होना होगा।”


    नैना की डायरी

    आरव ने हाथ में पकड़ी डायरी को देखा।

    “इसमें क्या है?”

    रुद्र ने कहा—

    “तुम्हारी मां की आखिरी सच्चाई।”

    आरव ने डायरी खोलने की कोशिश की।

    लेकिन पन्ने आपस में चिपके हुए थे।

    विहान ने कहा—

    “शायद कोई गुप्त तरीका है।”

    अमन ने डायरी को ध्यान से देखा।

    “यहां कुछ लिखा है।”

    एक पन्ने पर तीन छोटे निशान बने थे।

    एक पर आरव का नाम।

    दूसरे पर अमन।

    तीसरे पर विहान।

    तीनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।

    रुद्र ने कहा—

    “अपने हाथ उन निशानों पर रखो।”

    आरव ने हाथ रखा।

    अमन ने भी।

    विहान ने तीसरे निशान पर हाथ रखा।

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

    फिर…

    टक!

    डायरी के बीच से एक छोटा हिस्सा बाहर निकला।

    उसमें एक फोटो थी।

    फोटो देखते ही आरव के हाथ कांपने लगे।

    फोटो में नैना थी।

    उसकी गोद में तीन छोटे बच्चे थे।

    और उनके पीछे खड़ी थी…

    माधवी।

    लेकिन तस्वीर में एक और आदमी था।

    आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

    “ये कौन है?”

    राजवीर ने फोटो देखते ही नजरें फेर लीं।

    देवेंद्र ने भी कुछ नहीं कहा।

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    आरव ने पूछा—

    “मां… आप इस आदमी को जानती हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “हां।”

    “कौन है?”

    माधवी ने जवाब देने से पहले बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी।

    फिर बोलीं—

    “ये तुम्हारा नाना है।”

    तीनों भाई स्तब्ध रह गए।


    नाना की कहानी

    अमन ने पूछा—

    “हमारे नाना?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान ने कहा—

    “लेकिन हमें कभी उनके बारे में क्यों नहीं बताया गया?”

    माधवी की आंखों में दर्द था।

    “क्योंकि उनकी मौत के पीछे भी राजवीर का हाथ था।”

    राजवीर ने गुस्से में कहा—

    “माधवी!”

    “चुप रहो!”

    माधवी ने पहली बार राजवीर पर जोर से आवाज उठाई।

    “पच्चीस साल तक तुमने हम सबको डराया।”

    “अब नहीं।”

    राजवीर कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

    धांय!

    सबने नीचे झुककर अपनी जान बचाई।

    रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

    “कोई और भी आया है।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    अमन ने कहा—

    “क्या तुम्हें हर बात पता नहीं होती?”

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

    “कुछ चीजें ऐसी हैं जो मुझे भी नहीं पता।”

    आरव ने पूछा—

    “जैसे?”

    रुद्र ने जवाब दिया—

    “नैना अभी जिंदा हैं या नहीं।”


    क्या नैना सच में जिंदा हैं?

    विहान की आंखों में उम्मीद की चमक आ गई।

    “अगर मेरी मां जिंदा हैं… तो मैं उन्हें ढूंढूंगा।”

    राजवीर ने तुरंत कहा—

    “वो जिंदा नहीं है।”

    विहान ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें कैसे पता?”

    राजवीर चुप रहा।

    विहान आगे बढ़ा।

    “तुमने उसकी लाश देखी थी?”

    राजवीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

    “तुमने खुद उसे मारा था?”

    राजवीर की आंखें बदल गईं।

    विहान ने कहा—

    “जवाब दो!”

    राजवीर ने आखिरकार कहा—

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    राजवीर ने सिर झुका लिया।

    “मैंने उसे मरते हुए देखा था।”

    विहान ने कहा—

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

    “नहीं।”

    राजवीर की आवाज पहली बार कमजोर थी।

    “नैना को गोली लगी थी।”

    “लेकिन उसके बाद…”

    “उसके बाद क्या?”

    राजवीर चुप हो गया।

    रुद्र ने कहा—

    “उसे कोई वहां से ले गया था।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन?”

    रुद्र ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”


    एक और चौंकाने वाला सच

    अचानक माधवी ने कहा—

    “मुझे पता है।”

    सबकी नजर उनकी तरफ गई।

    आरव ने पूछा—

    “कौन ले गया था?”

    माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

    “मैं।”

    विहान स्तब्ध रह गया।

    “आप?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “नैना को गोली लगने के बाद मैं उसे वहां से लेकर गई थी।”

    “लेकिन फिर?”

    “वो बेहोश थी।”

    “मैं उसे अस्पताल ले गई।”

    आरव ने पूछा—

    “फिर?”

    माधवी ने कहा—

    “अस्पताल पहुंचने से पहले ही हमें रोक लिया गया।”

    अमन ने पूछा—

    “किसने?”

    माधवी ने कहा—

    “शेखर के आदमियों ने।”

    राजवीर ने कहा—

    “झूठ।”

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम्हें सब पता था।”

    “लेकिन तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि नैना को बचाया जा चुका था।”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    “तो नैना बच गई थीं?”

    माधवी ने सिर हिलाया।

    “हां।”

    विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

    “मेरी मां जिंदा हैं?”

    माधवी ने धीरे से कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि उसके बाद मुझे कभी नैना नहीं मिली।”


    देवेंद्र की चुप्पी

    आरव ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपको पता था?”

    देवेंद्र चुप रहा।

    आरव ने फिर पूछा—

    “आपको पता था कि नैना बच गई थीं?”

    देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।

    “हां।”

    आरव का गुस्सा बढ़ गया।

    “फिर आपने हमें क्यों बताया कि वो मर चुकी हैं?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि हमें लगा राजवीर उसे ढूंढ लेगा।”

    “और अगर वो जिंदा थीं तो?”

    “मैं उन्हें ढूंढ नहीं पाया।”

    विहान ने देवेंद्र की तरफ देखा।

    “आपने मेरी मां को ढूंढने की कोशिश की?”

    “हर दिन।”

    विहान की आंखों में आंसू थे।

    “फिर मुझे क्यों नहीं बताया?”

    देवेंद्र ने कहा—

    “क्योंकि तुम्हें बचाना जरूरी था।”


    आरव और आरोही

    इस पूरे रहस्य के बीच आरोही चुप थी।

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा।

    “तुम कुछ सोच रही हो।”

    आरोही ने कहा—

    “हां।”

    “क्या?”

    “अगर नैना जिंदा थीं और किसी ने उन्हें छुपाया… तो वो अभी भी कहीं हो सकती हैं।”

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

    “और हमें उन्हें ढूंढना होगा।”

    आरोही मुस्कुराई।

    “मैंने यही सोचा।”

    आरव ने धीरे से कहा—

    “तुम मेरे साथ चलोगी?”

    आरोही ने बिना किसी झिझक के कहा—

    “जहां तुम जाओगे, मैं वहां रहूंगी।”

    आरव ने उसके माथे को हल्के से चूम लिया।

    अमन ने पीछे से कहा—

    “भाई, इस वक्त भी रोमांस?”

    आरव हंस पड़ा।

    “तू चुप कर।”

    विहान ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

    इतने दर्द के बीच भी तीनों भाइयों के बीच का रिश्ता और मजबूत हो रहा था।


    बाहर कौन आया था?

    अचानक बाहर फिर गोली चली।

    रुद्र ने कहा—

    “सब नीचे रहो!”

    वह दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    अचानक एक गोली आकर उसके कंधे में लगी।

    “आह!”

    आरव दौड़कर उसके पास गया।

    “रुद्र!”

    रुद्र जमीन पर गिर पड़ा।

    अमन ने कहा—

    “बाहर कोई स्नाइपर है।”

    राजवीर ने तुरंत अपने आदमियों को पीछे हटने का इशारा किया।

    “सब हथियार नीचे रखो।”

    आरव ने आश्चर्य से पूछा—

    “क्यों?”

    राजवीर ने कहा—

    “क्योंकि जो बाहर है… वो मेरे आदमी नहीं हैं।”

    अमन ने पूछा—

    “तो किसके हैं?”

    राजवीर ने पहली बार डरते हुए कहा—

    “नैना के।”

    सबकी सांस रुक गई।

    विहान ने पूछा—

    “क्या?”

    राजवीर ने कहा—

    “अगर नैना सच में जिंदा है…”

    वह खिड़की की तरफ देखने लगा।

    “तो आज रात वो यहां जरूर आएगी।”

    तभी बाहर से एक महिला की आवाज गूंजी—

    “विहान!”

    विहान का शरीर जैसे जम गया।

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

    “ये आवाज…”

    माधवी ने भी सांस रोक ली।

    आरव ने कहा—

    “विहान?”

    विहान कांपते हुए दरवाजे की तरफ बढ़ा।

    “ये मेरी मां की आवाज है।”

    राजवीर पीछे हट गया।

    और बाहर से वही आवाज फिर आई—

    “मेरे बच्चे… दरवाजा खोलो।”

    विहान की आंखों से आंसू बह रहे थे।

    उसने दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा।

    लेकिन तभी आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “रुको।”

    “क्यों?”

    आरव ने गंभीर आवाज में कहा—

    “क्योंकि हमें नहीं पता… बाहर सच में नैना हैं या कोई हमें जाल में फंसा रहा है।”

    और तभी बाहर से महिला ने कहा—

    “आरव… अगर तुम सच में मेरे बेटे हो, तो तुम्हें याद होगा कि बचपन में मैं तुम्हें किस नाम से बुलाती थी।”

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

    उसकी आंखों के सामने बचपन की एक धुंधली तस्वीर उभरी।

    और उसके होंठों से खुद-ब-खुद एक नाम निकला—

    “गुड्डू…”

    बाहर कुछ पल सन्नाटा रहा।

    फिर महिला की आवाज आई—

    “हां बेटा… गुड्डू।”

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

    विहान ने दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

    लेकिन उसी क्षण राजवीर चिल्लाया—

    “दरवाजा मत खोलना! वो नैना नहीं है!”

    सब उसकी तरफ देखने लगे।

    राजवीर के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

    और तभी बाहर खड़ी महिला ने धीमी आवाज में कहा—

    “राजवीर… क्या तुम अब भी मुझसे डरते हो?”

    राजवीर के हाथ से बंदूक गिर गई।

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 45 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 45 :

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    एपिसोड – 45 : नैना की आखिरी निशानी

     

    “मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”

     

    माधवी की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उन्हें देखता रह गया।

     

    उसके मन में जैसे हजारों सवाल एक साथ उठ खड़े हुए थे।

     

    आरोही ने भी देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    बाहर राजवीर की आवाज फिर गूंजी—

     

    “माधवी! अब सच बोल दो… वरना मैं वो राज सबके सामने खोल दूंगा, जिसे तुमने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

     

    माधवी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “वो राज… सिर्फ मेरा नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो किसका है?”

     

    माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “हम दोनों का।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

     

    “माधवी, अब समय आ गया है।”

     

    “हां।”

     

    माधवी ने गहरी सांस ली।

     

    “आरव, तुम्हें जो बताने जा रही हूं, उसे सुनने के बाद शायद तुम मुझसे नाराज हो जाओ।”

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आपने मुझे पाला है मां। चाहे जो सच हो, मेरा रिश्ता आपसे नहीं बदलेगा।”

     

    माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “काश, सब इतना आसान होता।”

     

     

     

    माधवी और देवेंद्र का रिश्ता

     

    माधवी ने कहना शुरू किया—

     

    “पच्चीस साल पहले देवेंद्र और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    आरव शांत खड़ा सुनता रहा।

     

    “हम शादी करना चाहते थे। लेकिन उसी समय मेरी बहन नैना की जिंदगी में बहुत बड़ा तूफान आ गया।”

     

    देवेंद्र ने आगे कहा—

     

    “नैना को पता चल चुका था कि राजवीर और शेखर गैरकानूनी कारोबार में शामिल थे।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और अभय?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “अभय उस समय शेखर के साथ था। लेकिन जब उसे नैना की सच्चाई पता चली, तो उसने शेखर का साथ छोड़ दिया।”

     

    विहान ने धीरे से पूछा—

     

    “और मेरी मां?”

     

    “नैना ने अभय पर भरोसा किया।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “लेकिन आपने कहा कि आप मेरे पिता हैं।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे जन्मदाता मैं हूं।”

     

    विहान के चेहरे पर हैरानी थी।

     

    “लेकिन फिर अभय?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “अभय ने तुम्हें अपना बेटा माना। उसने कभी तुम्हें सच्चाई नहीं बताई, क्योंकि नैना ने उससे ऐसा करने को कहा था।”

     

    विहान ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उलझन अब धीरे-धीरे सुलझ रही थी।

     

     

     

    तीन बच्चों का जन्म

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और हम तीनों?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम तीनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन क्या हम तीनों सच में भाई हैं?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “एक ही पिता के?”

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और मां?”

     

    माधवी कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं—

     

    “तुम तीनों की जन्मदात्री नैना थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तो मेरी मां…”

     

    “नैना।”

     

    “और आरव?”

     

    माधवी ने आरव का चेहरा अपने हाथों में लिया।

     

    “तुम भी उसी मां के बेटे हो।”

     

    आरव की आंखें भर आईं।

     

    “फिर आपने मुझे क्यों पाला?”

     

    माधवी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं—

     

    “क्योंकि नैना ने तुम तीनों को मेरे भरोसे छोड़ा था।”

     

     

     

    नैना का आखिरी फैसला

     

    माधवी ने बताया—

     

    “उस रात नैना को पता चल गया था कि राजवीर उसके पीछे है।”

     

    “उसने मुझे बुलाया।”

     

    “जब मैं वहां पहुंची, तो नैना के पास तुम तीनों थे।”

     

    “तुम बहुत छोटे थे।”

     

    “उसने मुझे देखकर कहा था—”

     

    माधवी की आवाज भर्रा गई।

     

    “दीदी, अगर मैं बची नहीं तो मेरे बच्चों को बचा लेना।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसे अचानक किसी महिला की आवाज याद आने लगी।

     

    “मेरे बच्चों को कभी अलग मत होने देना।”

     

    आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “मुझे उसकी आवाज याद आ रही है।”

     

    “किसकी?”

     

    “नैना की।”

     

    विहान उसकी तरफ देखने लगा।

     

    “तुम्हें मां याद आ रही हैं?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “थोड़ा-सा।”

     

     

     

    वो रात

     

    माधवी ने आगे कहा—

     

    “उस रात हमने तीनों बच्चों को अलग-अलग जगह छिपाने का फैसला किया।”

     

    “विहान को अभय के पास भेजा गया।”

     

    “अमन को सिया के साथ।”

     

    “और आरव को मैंने अपने पास रखा।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इसीलिए हम एक-दूसरे को याद नहीं करते थे।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हारी यादें जानबूझकर दबाई गई थीं।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने डॉक्टर से कहा था।”

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “आपने?”

     

    “हां।”

     

    “आपने मेरी यादें मुझसे छीन लीं।”

     

    देवेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने तुम्हारी जिंदगी बचाने के लिए ऐसा किया था।”

     

    आरव की आंखों में गुस्सा था।

     

    “लेकिन मेरी मां की याद?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “वो भी वापस आनी थी।”

     

    “कब?”

     

    “जब तुम तीनों फिर एक साथ खड़े होते।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

     

     

    राजवीर का प्रवेश

     

    तभी दरवाजा जोर से खुला।

     

    राजवीर अंदर आ गया।

     

    उसके साथ कई आदमी थे।

     

    “बहुत अच्छी कहानी चल रही है।”

     

    शेखर भी उसके पीछे खड़ा था।

     

    लेकिन शेखर के हाथ बंधे हुए थे।

     

    आरव ने चौंककर पूछा—

     

    “शेखर?”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा तथाकथित पिता अब मेरी कैद में है।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “आरव, उसकी बात मत मानना।”

     

    राजवीर ने उसके पेट में बंदूक का कुंदा मारा।

     

    “चुप!”

     

    विहान गुस्से में आगे बढ़ा।

     

    “उसे हाथ मत लगाना!”

     

    राजवीर ने विहान को देखा।

     

    “तुम्हें अपनी मां की बहुत चिंता है ना?”

     

    विहान रुक गया।

     

    “मेरी मां मर चुकी हैं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “क्या सच में?”

     

    विहान की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    राजवीर ने जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट देखकर माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये…”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ मां?”

     

    माधवी ने कांपते हुए कहा—

     

    “ये नैना का लॉकेट है।”

     

    राजवीर ने लॉकेट हवा में उछालकर पकड़ा।

     

    “हां।”

     

    विहान ने कहा—

     

    “ये तुम्हारे पास कैसे आया?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि नैना की आखिरी रात मैं उसके बहुत करीब था।”

     

     

     

    नैना जिंदा थी?

     

    विहान का चेहरा बदल गया।

     

    “तुमने उसे मारा?”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “मैंने उसे मरते हुए देखा।”

     

    “मतलब?”

     

    “लेकिन मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो क्या नैना जिंदा थी?”

     

    राजवीर ने सीधे जवाब नहीं दिया।

     

    उसने लॉकेट खोल दिया।

     

    अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।

     

    नैना की।

     

    और उसके पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    “जहां तीनों भाई पहली बार मिले थे, वहीं सच दफन है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हम पहली बार कहां मिले थे?”

     

    आरव अचानक बोला—

     

    “पुराना अनाथालय।”

     

    विहान ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें याद है?”

     

    “हां।”

     

    आरव की आंखों के सामने एक दृश्य आया।

     

    तीन छोटे बच्चे एक ही कमरे में थे।

     

    एक लड़की उन्हें देख रही थी।

     

    उसने तीनों के हाथ एक साथ रखे थे।

     

    और कह रही थी—

     

    “एक दिन तुम तीनों भाई फिर मिलोगे।”

     

    आरव ने आंखें खोलीं।

     

    “वह लड़की…”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मुझे उसका चेहरा याद नहीं… लेकिन उसने हमारे हाथों में ये लॉकेट रखा था।”

     

    राजवीर अचानक गंभीर हो गया।

     

    “तुम्हें वो याद आ गई?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम उसे जानते हो?”

     

    राजवीर चुप रहा।

     

    आरव ने जोर से कहा—

     

    “कौन थी वो?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “नैना की सबसे बड़ी गलती।”

     

     

     

    अनाथालय की ओर

     

    राजवीर ने अपने आदमियों को आदेश दिया—

     

    “इन सबको गाड़ी में बैठाओ।”

     

    अमन ने विरोध किया।

     

    “हम कहीं नहीं जाएंगे।”

     

    राजवीर ने बंदूक शेखर की कनपटी पर रख दी।

     

    “तो फिर ये मरेगा।”

     

    आरव ने शेखर को देखा।

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “मेरी चिंता मत करो।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “आपको मरने नहीं दूंगा।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुम्हें अपने परिवार को बचाना है तो मेरे साथ चलो।”

     

    कुछ देर बाद सभी को गाड़ियों में बैठा दिया गया।

     

    आरोही आरव के साथ बैठी थी।

     

    उसने धीरे से पूछा—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “लेकिन?”

     

    “अब मुझे अपनी मां की सच्चाई जाननी है।”

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अगर इस लड़ाई में मुझे सब कुछ खोना पड़ा तो?”

     

    आरोही ने बिना झिझके कहा—

     

    “तो मैं तुम्हारे साथ सब कुछ खो दूंगी।”

     

    आरव ने उसका हाथ चूम लिया।

     

    “मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।”

     

    आरोही की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मुझे पता है।”

     

     

     

    पुराना अनाथालय

     

    कुछ घंटों बाद गाड़ियां एक सुनसान जगह पर रुकीं।

     

    सामने वही पुराना अनाथालय था।

     

    जिसे सालों पहले बंद कर दिया गया था।

     

    राजवीर सबसे पहले अंदर गया।

     

    दीवारों पर धूल थी।

     

    पुराने खिलौने टूटे पड़े थे।

     

    आरव ने एक कोना देखा।

     

    उसकी सांस रुक गई।

     

    “यहीं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    आरव ने फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    “यहीं हम तीनों बैठे थे।”

     

    विहान भी आगे आया।

     

    “मुझे भी याद आ रहा है।”

     

    अमन ने आंखें बंद कीं।

     

    “एक औरत थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हां।”

     

    तीनों भाइयों को एक साथ कुछ याद आने लगा।

     

    एक महिला उनके सामने खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर घूंघट था।

     

    उसने तीनों के माथे पर किस किया था।

     

    और कहा था—

     

    “जब तक तुम एक-दूसरे को पहचान नहीं लेते, किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    आरव ने अचानक जमीन पर पैर मारा।

     

    “यहां कुछ है।”

     

    रुद्र ने जमीन हटानी शुरू की।

     

    कुछ देर बाद लोहे का एक छोटा संदूक दिखाई दिया।

     

    राजवीर आगे बढ़ा।

     

    “इसे मैं खोलूंगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसने अपनी जेब से नैना का लॉकेट निकाला।

     

    लॉकेट को संदूक के ऊपर रखा।

     

    टक!

     

    संदूक अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक पुरानी डायरी थी।

     

    एक फोटो थी।

     

    और एक पत्र।

     

    आरव ने पत्र उठाया।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “मेरे तीनों बेटों के लिए।”

     

    विहान की सांस थम गई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “नैना!”

     

    आरव ने कांपते हाथों से पत्र खोला।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “नैना जिंदा थीं…”

     

    राजवीर का चेहरा भी बदल गया।

     

    “ये असंभव है।”

     

    आरव ने अगली लाइन पढ़ी।

     

    और उसकी आंखें फैल गईं।

     

    पत्र में लिखा था—

     

    “अगर ये पत्र मेरे बेटों तक पहुंचा है, तो समझो मैं अभी जिंदा हूं… और मेरे बच्चों, तुम जिस आदमी को अपना दुश्मन समझ रहे हो, असली दुश्मन वो नहीं है।”

     

    आरव ने राजवीर की तरफ देखा।

     

    राजवीर के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी थी।

     

    पत्र की आखिरी लाइन पढ़ते ही सबके पैरों तले जमीन खिसक गई—

     

    “तुम्हारा असली दुश्मन तुम्हारे बीच ही मौजूद है।”

     

    तीनों भाइयों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

     

    और तभी पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    कोई अंधेरे में खड़ा था।

     

    फिर वही आवाज सुनाई दी—

     

    “बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 44

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 44

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 44 : वो कौन था?

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारा असली पिता हूं।”

     

    उस आवाज ने जैसे पूरे रास्ते की हवा रोक दी।

     

    आरव, अमन और विहान तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आरोही भी हैरान खड़ी थी।

     

    सामने अंधेरे में एक आदमी खड़ा था। उसके चेहरे का आधा हिस्सा अंधेरे में छिपा हुआ था, लेकिन उसकी आवाज में ऐसा अपनापन था, जैसे वह उन तीनों को बरसों से जानता हो।

     

    आरव ने आगे बढ़ते हुए पूछा—

     

    “सामने आओ।”

     

    वह आदमी धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    उसके बालों में सफेदी थी। चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में अजीब-सी गहराई थी।

     

    विहान उसे देखते ही पीछे हट गया।

     

    “आप…”

     

    आदमी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हां, विहान।”

     

    “आप वही हैं जो मुझे सपनों में दिखाई देते थे।”

     

    उस आदमी की आंखें नम हो गईं।

     

    “क्योंकि वो सपने नहीं थे।”

     

    विहान की सांस अटक गई।

     

    “तो क्या था?”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “तुम्हारी बचपन की यादें।”

     

    अमन ने गुस्से से पूछा—

     

    “आपने अभी कहा कि आप हमारे असली पिता हैं। इसका मतलब क्या है?”

     

    आदमी ने आरव और अमन की तरफ देखा।

     

    “मैं तुम तीनों का पिता हूं।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “झूठ।”

     

    “नहीं।”

     

    “मेरे पिता अभय थे।”

     

    “अभय तुम्हारा पिता था।”

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    आदमी कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “मेरा नाम देवेंद्र है।”

     

     

     

    देवेंद्र का सच

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “अगर आप इनके पिता हैं, तो इतने साल कहां थे?”

     

    देवेंद्र की आंखें झुक गईं।

     

    “छिपा हुआ था।”

     

    आरव ने तीखी आवाज में पूछा—

     

    “किससे?”

     

    “शेखर से।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और राजवीर से?”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सबसे।”

     

    विहान आगे आया।

     

    “मेरी मां नैना आपको जानती थीं?”

     

    देवेंद्र की आंखों में दर्द उतर आया।

     

    “नैना मेरी जिंदगी थी।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “तो फिर उन्होंने आपसे शादी क्यों नहीं की?”

     

    देवेंद्र ने कुछ नहीं कहा।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या आप और नैना…?”

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से कहा—

     

    “हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

     

    विहान ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “तो मैं…”

     

    देवेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम मेरे बेटे हो।”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    “फिर मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “क्योंकि मुझे मजबूर किया गया था।”

     

     

     

    पच्चीस साल पुराना समझौता

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “जब नैना को पता चला कि वह मां बनने वाली है, तब राजवीर को भी इसकी खबर मिल गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “राजवीर को क्यों फर्क पड़ता था?”

     

    “क्योंकि उसे पता था कि नैना के पास शेखर के खिलाफ सारे सबूत हैं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और हम?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम दोनों का जन्म उसी समय हुआ था।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तो क्या हम सच में तीनों एक ही मां के बच्चे हैं?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन हमें अलग-अलग परिवारों में क्यों रखा गया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि नैना जानती थी कि अगर राजवीर को पता चल गया कि उसके तीन बच्चे हैं, तो वह तीनों को खत्म कर देगा।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “फिर मेरी परवरिश किसने की?”

     

    “शेखर ने।”

     

    विहान का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “वो मुझे अपना बेटा कहता था, लेकिन कैद करके रखता था।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि वह तुम्हें बचा रहा था।”

     

    विहान ने गुस्से में कहा—

     

    “कैद करके?”

     

    “हां।”

     

    “ये कैसी सुरक्षा थी?”

     

    देवेंद्र चुप हो गया।

     

     

     

    आरव की उलझन

     

    आरव अब तक कुछ नहीं बोला था।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ रखा था।

     

    “आरव?”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “अगर नैना मेरी मां थीं… तो माधवी मां कौन हैं?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “माधवी तुम्हारी मां की बहन थीं।”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन उन्होंने मुझे पाला।”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने मुझे कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनका बेटा नहीं हूं।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उनके लिए तुम सिर्फ भांजे नहीं थे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “तुम उनका बेटा थे।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    उसके मन में माधवी की सारी बातें घूमने लगीं।

     

    बचपन में उसका माथा सहलाना…

     

    बीमार होने पर पूरी रात उसके पास बैठना…

     

    उसके स्कूल के पहले दिन रोना…

     

    हर मुश्किल में उसका साथ देना।

     

    आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “मां ने मुझे कभी झूठे प्यार से नहीं पाला।”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि मां वही होती है जो आपको जन्म देने के साथ-साथ आपको प्यार भी दे।”

     

    आरव ने आरोही की तरफ देखा।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “तुम हर मुश्किल वक्त में मेरे साथ क्यों खड़ी रहती हो?”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने तुमसे प्यार किया है।”

     

    आरव ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

     

     

    अचानक गोली की आवाज

     

    धांय!

     

    गोली दीवार से टकराई।

     

    देवेंद्र तुरंत सबको नीचे झुकने का इशारा करता है।

     

    “राजवीर ने रास्ता ढूंढ लिया!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “वो यहां तक कैसे पहुंचा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “उसके पास इस हवेली का नक्शा है।”

     

    अमन ने बंदूक निकाल ली।

     

    “तो फिर उसे यहां आने से रोकते हैं।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि राजवीर अकेला नहीं है।”

     

    दूर से कदमों की आवाज सुनाई दी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    फिर दर्जनों कदम।

     

    विहान घबरा गया।

     

    “वो आ गए।”

     

    देवेंद्र ने सामने की दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “उस दरवाजे के पीछे एक और रास्ता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कहां जाता है?”

     

    “नैना के आखिरी कमरे में।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें वहां क्या मिलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की आखिरी रिकॉर्डिंग।”

     

     

     

    नैना की आखिरी रिकॉर्डिंग

     

    दरवाजा खोलते ही एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे में पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    उसके पास एक चिट्ठी थी।

     

    देवेंद्र ने उसे उठाया।

     

    चिट्ठी पर लिखा था—

     

    “मेरे बच्चों के लिए।”

     

    विहान ने कांपते हाथों से रिकॉर्डर चालू किया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर एक महिला की आवाज आई—

     

    “अगर मेरे बच्चे ये आवाज सुन रहे हैं, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं हूं।”

     

    विहान की आंखों से आंसू निकलने लगे।

     

    “मां…”

     

    आवाज आगे बोली—

     

    “मैं चाहती हूं कि मेरे तीनों बच्चे एक दिन एक साथ खड़े हों।”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “मैंने तुम तीनों को अलग इसलिए किया क्योंकि मुझे डर था कि मेरे दुश्मन तुम्हें नुकसान पहुंचाएंगे।”

     

    अमन की आंखों से भी आंसू बहने लगे।

     

    नैना की आवाज कांप रही थी।

     

    “तुम तीनों के पिता अलग नहीं हैं…”

     

    तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

     

    “तुम्हारे पिता देवेंद्र हैं।”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “लेकिन तुम्हारी परवरिश अलग-अलग लोगों ने की, ताकि कोई तुम्हें पहचान न सके।”

     

    रिकॉर्डिंग में कुछ सेकंड का सन्नाटा आया।

     

    फिर नैना ने कहा—

     

    “और एक बात…”

     

    आवाज अचानक गंभीर हो गई।

     

    “अगर राजवीर तुम्हें ढूंढ ले, तो उस पर कभी भरोसा मत करना।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्यों?”

     

    रिकॉर्डिंग में नैना ने कहा—

     

    “क्योंकि राजवीर सिर्फ तुम्हारे परिवार का दुश्मन नहीं है…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    विहान ने मशीन को झकझोर दिया।

     

    “आगे बोलो मां!”

     

    लेकिन रिकॉर्डिंग बंद थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद यही पूरी रिकॉर्डिंग थी।”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “ये रिकॉर्डिंग अधूरी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “बाकी हिस्सा कहां है?”

     

    देवेंद्र ने कमरे की दीवार की तरफ देखा।

     

    “यहीं।”

     

     

     

    दीवार के पीछे छुपा रहस्य

     

    देवेंद्र ने दीवार पर तीन बार दस्तक दी।

     

    टक… टक… टक…

     

    फिर उसने एक पत्थर हटाया।

     

    अंदर से छोटी सी मेमोरी चिप निकली।

     

    आरोही ने कहा—

     

    “ये क्या है?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना की पूरी रिकॉर्डिंग।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “इसे अभी क्यों नहीं सुनते?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर ये रिकॉर्डिंग राजवीर के हाथ लग गई, तो वो हम सबको खत्म कर देगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो सुनते हैं।”

     

    देवेंद्र ने चिप रिकॉर्डर में लगा दी।

     

    कुछ सेकंड बाद नैना की आवाज फिर सुनाई दी—

     

    “अगर तुम ये हिस्सा सुन रहे हो तो समझो राजवीर तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    नैना की आवाज आगे आई—

     

    “और सबसे बड़ा सच ये है कि राजवीर अकेला काम नहीं करता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “उसके साथ कौन था?”

     

    रिकॉर्डिंग में नैना बोली—

     

    “उसका साथी… तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।

     

    सब स्तब्ध रह गए।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “हमारे बहुत करीब?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    देवेंद्र ने तुरंत रिकॉर्डर बंद किया।

     

    सबने हथियार संभाल लिए।

     

    दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

     

    सामने…

     

    माधवी खड़ी थीं।

     

    आरव दौड़कर उनके पास गया।

     

    “मां!”

     

    माधवी ने उसे गले लगा लिया।

     

    लेकिन उनकी नजर देवेंद्र पर पड़ी।

     

    उनका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    देवेंद्र भी उन्हें देखकर चुप हो गया।

     

    आरोही ने गौर किया कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे उनके बीच कोई बहुत पुराना रिश्ता हो।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मां, आप देवेंद्र को जानती हैं?”

     

    माधवी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    देवेंद्र ने भी नजरें झुका लीं।

     

    आरव ने फिर पूछा—

     

    “मां?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा—

     

    “हां… मैं देवेंद्र को सिर्फ जानती नहीं हूं।”

     

    वह कुछ पल रुकीं।

     

    फिर बोलीं—

     

    “मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”

     

    आरव स्तब्ध रह गया।

     

    आरोही ने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    और उसी वक्त बाहर से राजवीर की आवाज आई—

     

    “माधवी! अब झूठ बोलना बंद करो… क्योंकि तुम्हारा सबसे बड़ा राज मेरे पास है।”

     

    माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 43

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 43

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 43 : राजवीर की वापसी

     

    हवेली की सारी लाइटें बंद थीं।

     

    चारों तरफ घना अंधेरा था।

     

    सिर्फ बाहर खड़ी गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी खिड़कियों से अंदर आ रही थी।

     

    और उसी अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “शेखर… अपने बेटों को मेरे हवाले कर दो।”

     

    आरव ने तुरंत अपने दोनों भाइयों की तरफ देखा।

     

    अमन ने बंदूक कसकर पकड़ रखी थी।

     

    विहान के चेहरे पर डर था, लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था।

     

    आरोही आरव के बिल्कुल पास खड़ी थी।

     

    रुद्र ने धीरे से कहा—

     

    “राजवीर ने पूरी हवेली को घेर लिया है।”

     

    शेखर खिड़की के पास गया और बाहर देखा।

     

    उसकी आंखों में पहली बार सचमुच डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    शेखर ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “ये आदमी जितना मैं सोच रहा था, उससे कहीं ज्यादा ताकतवर हो चुका है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “आपने ही तो कहा था कि राजवीर आपका सबसे पुराना दोस्त था।”

     

    शेखर ने कड़वी हंसी हंसी।

     

    “था।”

     

    “अब?”

     

    शेखर ने बाहर देखते हुए कहा—

     

    “अब वो मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है।”

     

     

     

    राजवीर की पहली चाल

     

    अचानक हवेली के मुख्य दरवाजे पर जोरदार धमाका हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

     

    कई हथियारबंद लोग अंदर घुस आए।

     

    रुद्र ने तुरंत गोली चलाई।

     

    अमन भी उनके सामने आ गया।

     

    आरव ने आरोही को पीछे किया।

     

    “तुम यहां से नहीं हटोगी।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “मैंने कहा ना, जहां तुम हो वहीं मैं रहूंगी।”

     

    आरव हल्का सा मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी यही जिद मुझे डराती है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

     

    “और तुम्हारा प्यार मुझे हिम्मत देता है।”

     

    दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    तभी अमन ने पीछे से आवाज लगाई—

     

    “भाई! रोमांस बाद में करना, पहले इन लोगों को संभालो!”

     

    आरोही ने तुरंत नजरें हटा लीं।

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “तू कभी नहीं सुधरेगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और तुम दोनों कभी सुधरोगे नहीं।”

     

    अचानक एक गोली उनकी तरफ आई।

     

    रुद्र ने तुरंत आरव को नीचे खींच लिया।

     

    गोली दीवार में जा लगी।

     

    “सावधान!”

     

     

     

    तीनों भाइयों की पहली लड़ाई

     

    अमन आगे बढ़ा और दो आदमियों को रोक लिया।

     

    विहान ने भी एक हमलावर को पीछे धकेला।

     

    आरव ने पहली बार अपने दोनों भाइयों को एक साथ लड़ते देखा।

     

    उसे अजीब-सा एहसास हुआ।

     

    जैसे यह दृश्य उसने पहले भी देखा हो।

     

    तीन छोटे बच्चे…

     

    एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए…

     

    और सामने खड़ा कोई दुश्मन।

     

    आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    “आह!”

     

    आरोही तुरंत उसके पास आई।

     

    “आरव!”

     

    “मैं ठीक हूं।”

     

    “फिर सिर क्यों पकड़ रखा है?”

     

    “मुझे कुछ याद आ रहा है।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

     

    एक आवाज उसके कानों में गूंजी—

     

    “जब तीनों भाई एक साथ खड़े होंगे, तभी तिजोरी खुलेगी।”

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “तिजोरी!”

     

    आरोही ने पूछा—

     

    “कौन-सी तिजोरी?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “वही जिसका जिक्र मां की डायरी में था।”

     

     

     

    राजवीर सामने आया

     

    अचानक गोलीबारी रुक गई।

     

    हथियारबंद लोग पीछे हट गए।

     

    और दरवाजे से एक आदमी अंदर आया।

     

    काले सूट में।

     

    सफेद बाल।

     

    हाथ में चांदी की छड़ी।

     

    उसकी उंगली में वही काली अंगूठी थी, जिस पर सांप का निशान बना था।

     

    आरव की नजर उसकी अंगूठी पर टिक गई।

     

    “राजवीर।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार तुमने मुझे पहचान लिया।”

     

    शेखर उसके सामने आ गया।

     

    “तुम यहां से चले जाओ।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “इतने सालों बाद भी तुम मुझे आदेश दोगे?”

     

    “मैं तुम्हारा मालिक था।”

     

    “था।”

     

    राजवीर ने वही शब्द दोहराया।

     

    “अब नहीं।”

     

    शेखर ने बंदूक तान दी।

     

    “तुमने मेरे परिवार को बर्बाद किया।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारा परिवार पहले ही टूट चुका था।”

     

    “तुमने मेरी पत्नी को मारा।”

     

    “कौन-सी पत्नी?”

     

    शेखर की आंखों में गुस्सा भर गया।

     

    “नैना।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “नैना की मौत के लिए मुझे दोष मत दो।”

     

    विहान आगे आया।

     

    “झूठ!”

     

    राजवीर ने पहली बार उसे गौर से देखा।

     

    उसकी आंखों में अजीब-सा भाव आया।

     

    “तुम…”

     

    विहान ने कहा—

     

    “मैं नैना का बेटा हूं।”

     

    राजवीर कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “तो तुम जिंदा हो।”

     

    विहान के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    आरव तुरंत उसकी तरफ आ गया।

     

    “तुम्हें पहले से पता था कि विहान जिंदा है?”

     

    राजवीर चुप रहा।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुमने उसे क्यों ढूंढा?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि विहान के पास वो चीज है, जिसकी मुझे सबसे ज्यादा जरूरत है।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारी मां की आखिरी याद।”

     

     

     

    विहान की याद

     

    विहान का चेहरा बदल गया।

     

    “मेरी मां की आखिरी याद?”

     

    “हां।”

     

    “मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें याद नहीं… लेकिन तुम्हारे दिमाग में वो सब मौजूद है।”

     

    डॉक्टर अचानक बेचैन हो गया।

     

    “राजवीर, उसे छोड़ दो।”

     

    राजवीर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “तुम अब भी इनके लिए मरने को तैयार हो?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुमने पच्चीस साल पहले भी यही कहा था।”

     

    आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आपने हमसे क्या छुपाया?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम्हारे जन्म की पूरी कहानी।”

     

     

     

    असली जन्म का रहस्य

     

    राजवीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम तीनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये हम जानते हैं।”

     

    “नहीं।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “तुम सिर्फ इतना जानते हो कि तुम तीनों एक ही रात पैदा हुए।”

     

    “लेकिन तुम्हें ये नहीं पता कि तुम तीनों को एक ही अस्पताल में क्यों रखा गया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “क्योंकि तीनों बच्चों को एक ही मां ने जन्म दिया था।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    माधवी ने तुरंत कहा—

     

    “झूठ!”

     

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें लगता है सच छुपाने से वो बदल जाएगा?”

     

    आरव ने माधवी की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी की आंखों में डर था।

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “आरव, अमन और विहान… तीनों की जन्मदात्री एक ही औरत थी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “कौन?”

     

    राजवीर ने धीरे से कहा—

     

    “नैना।”

     

    विहान स्तब्ध रह गया।

     

    “तो आरव और अमन भी…”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन मेरी मां माधवी है।”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “माधवी ने तुम्हें पाला।”

     

    “लेकिन जन्म?”

     

    “नैना।”

     

    आरव की आंखें माधवी पर टिक गईं।

     

    “मां… क्या ये सच है?”

     

    माधवी रोने लगीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आपने मुझसे झूठ बोला?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मेरी असली मां नैना थी?”

     

    माधवी ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    “हां।”

     

     

     

    सबसे बड़ा झटका

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “आरव…”

     

    लेकिन आरव कुछ सुन नहीं रहा था।

     

    उसके दिमाग में बचपन की तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक महिला उसे गोद में उठाए हुए थी।

     

    एक औरत उसके माथे पर चूम रही थी।

     

    उसकी आवाज—

     

    “मेरे बच्चे…”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “वो… नैना थीं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    आरव ने डॉक्टर को देखा।

     

    “फिर आपने मेरी यादें क्यों मिटाईं?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर तुम्हें नैना याद रहतीं, तो तुम राजवीर तक पहुंच जाते।”

     

    राजवीर हंस पड़ा।

     

    “और यही मैं नहीं चाहता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुम्हें हमसे क्या चाहिए?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “तुम तीनों की जरूरत है।”

     

    “किसलिए?”

     

    राजवीर ने अपनी छड़ी जमीन पर मारी।

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मरने से पहले अपनी सारी संपत्ति और सबूत तुम्हारे नाम कर दिए थे।”

     

    शेखर चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    “लेकिन नैना की सारी संपत्ति तो खत्म हो गई थी।”

     

    “तुम्हें ऐसा लगा।”

     

    राजवीर मुस्कुराया।

     

    “उसने सब कुछ एक गुप्त ट्रस्ट में रखा था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और उसकी चाबी?”

     

    राजवीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पास है।”

     

    आरव ने अपनी जेब टटोली।

     

    वही छोटी चाबी।

     

    उसकी आंखें फैल गईं।

     

     

     

    चाबी किसकी थी?

     

    राजवीर ने कहा—

     

    “वही चाबी मुझे दे दो।”

     

    आरव ने चाबी कसकर पकड़ ली।

     

    “नहीं।”

     

    “तो तुम्हारे भाइयों में से एक मर जाएगा।”

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    “पहले मुझे मार।”

     

    विहान भी उसके पास खड़ा हो गया।

     

    “और मुझे भी।”

     

    आरव ने दोनों को देखा।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हम तीनों साथ हैं।”

     

    आरोही ने कहा—

     

    “और मैं भी।”

     

    राजवीर हंसा।

     

    “तुम्हें लगता है प्यार और भाईचारा तुम्हें बचा लेगा?”

     

    आरव ने दृढ़ता से कहा—

     

    “हां।”

     

    राजवीर ने इशारा किया।

     

    उसके आदमी बंदूकें उठाने लगे।

     

    तभी अचानक हवेली की सारी खिड़कियां बंद हो गईं।

     

    रुद्र ने चौंककर कहा—

     

    “ये किसने किया?”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मैंने।”

     

    राजवीर उसकी तरफ मुड़ा।

     

    “तुम?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तुम भूल गए कि इस हवेली का गुप्त सिस्टम किसने बनाया था।”

     

    अचानक फर्श के नीचे से लोहे की आवाज आई।

     

    दीवारें खिसकने लगीं।

     

    एक गुप्त रास्ता खुल गया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “तीनों भाई अंदर जाओ!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और आप?”

     

    डॉक्टर मुस्कुराया।

     

    “मुझे अपना पुराना हिसाब चुकाना है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं!”

     

    लेकिन डॉक्टर ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    आरव, अमन, विहान और आरोही उस गुप्त रास्ते में चले गए।

     

    दरवाजा बंद होते ही बाहर से गोलियों की आवाज सुनाई देने लगी।

     

    धांय! धांय! धांय!

     

    विहान डर गया।

     

    “डॉक्टर!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हम उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकते।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “लेकिन रास्ता बंद है।”

     

    तभी सामने एक लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उस पर तीन शब्द लिखे थे—

     

    “नैना के बच्चे।”

     

    आरव ने चाबी निकाली।

     

    लेकिन ताले में चाबी लगाने से पहले ही उसके पीछे से आरोही की आवाज आई—

     

    “आरव…”

     

    वह मुड़ी हुई दीवार की तरफ देख रही थी।

     

    वहां एक तस्वीर लगी थी।

     

    तस्वीर में नैना थी।

     

    उसकी गोद में तीन छोटे बच्चे थे।

     

    और उनके पीछे खड़ा था…

     

    अभय।

     

    लेकिन तस्वीर के कोने में एक और आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखते ही कहा—

     

    “ये कौन है?”

     

    विहान ने तस्वीर को गौर से देखा।

     

    फिर उसके चेहरे पर डर छा गया।

     

    “मैं इसे जानता हूं।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    विहान ने कांपते हुए कहा—

     

    “ये आदमी… मुझे बचपन से सपनों में दिखाई देता था।”

     

    और उसी पल दरवाजे के पीछे से एक आवाज आई—

     

    “क्योंकि मैं तुम्हारा असली पिता हूं।”

     

    तीनों भाई जम गए।

     

    जारी रहेगा…

  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 42 :

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 42 :

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 42 : तीनों की असली मां कौन है?

     

    “अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

     

    डॉक्टर की बात सुनते ही कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे वक्त कुछ पल के लिए रुक गया हो।

     

    आरव की नजर अपनी मां माधवी पर थी।

     

    अमन और विहान भी उन्हें ही देख रहे थे।

     

    आरव ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “मां… आपने अभी क्या कहा?”

     

    माधवी की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैंने कहा… आरव मेरा बेटा है।”

     

    आरव का दिल टूटने लगा।

     

    “तो अमन और विहान?”

     

    माधवी ने दोनों की तरफ देखा।

     

    “तुम दोनों भी मेरे बच्चे हो… लेकिन मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तो इतने साल आपने हमें अपना बेटा क्यों कहा?”

     

    माधवी ने रोते हुए कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी मां ने मरते वक्त मुझे तुम दोनों की जिम्मेदारी सौंपी थी।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मेरी मां कौन थी?”

     

    माधवी ने जवाब देने के लिए होंठ खोले, लेकिन आवाज नहीं निकली।

     

    आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, अब सच बता दीजिए।”

     

    माधवी ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “तुम्हारी मां का नाम…”

     

    वह रुक गईं।

     

    तभी शेखर ने कहा—

     

    “नैना।”

     

    विहान जैसे पत्थर का हो गया।

     

    “नैना… मेरी मां?”

     

    शेखर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    विहान की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “तो आपने मेरी मां को क्यों मारा?”

     

    शेखर ने नजरें झुका लीं।

     

    “मैंने नहीं मारा।”

     

    विहान चौंक गया।

     

    “फिर कौन?”

     

    शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    “इस सवाल का जवाब वही देगा।”

     

    सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

     

     

     

    डॉक्टर का सबसे बड़ा सच

     

    डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

     

    “नैना की मौत उस रात हुई थी जब उसने शेखर का सच जान लिया था।”

     

    विहान ने पूछा—

     

    “क्या सच?”

     

    “शेखर अकेला सम्राट नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो उसके साथ कौन था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “एक ऐसा व्यक्ति, जिस पर शेखर आंख बंद करके भरोसा करता था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—

     

    “अभय।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन अभय तो शेखर के खिलाफ था।”

     

    “बाद में।”

     

    “मतलब?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “शुरुआत में अभय और शेखर साथ काम करते थे।”

     

    आरव को जैसे झटका लगा।

     

    “तो मेरे पिता भी…?”

     

    “हां।”

     

    “उन्होंने भी गलत काम किया था?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “कुछ समय तक।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर उन्होंने सब छोड़ क्यों दिया?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “क्योंकि उन्हें प्यार हो गया था।”

     

    “किससे?”

     

    डॉक्टर ने माधवी की तरफ देखा।

     

    माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    “मां?”

     

    माधवी ने सिर झुका लिया।

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “अभय को माधवी से प्यार हो गया था।”

     

    शेखर ने पहली बार बीच में कहा—

     

    “और यही हमारी दुश्मनी की शुरुआत थी।”

     

     

     

    दो भाइयों के बीच का प्यार

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन इसका हमारी मां से क्या संबंध है?”

     

    माधवी ने धीरे से कहा—

     

    “सिया और नैना मेरी बहनें थीं।”

     

    तीनों की आंखें फैल गईं।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “हम तीन बहनें थीं।”

     

    “माधवी… सिया… और नैना।”

     

    विहान ने कांपते हुए पूछा—

     

    “तो मेरी मां आपकी बहन थीं?”

     

    “हां।”

     

    अमन की आवाज भी कांप गई।

     

    “और मेरी मां?”

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “सिया।”

     

    अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तो हम दोनों…”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम दोनों मेरे भांजे हो।”

     

    आरव ने दोनों भाइयों को देखा।

     

    कुछ पल कोई कुछ नहीं बोला।

     

    फिर आरव आगे बढ़ा और दोनों को गले लगा लिया।

     

    “रिश्ता चाहे जैसा हो… तुम दोनों मेरे भाई हो।”

     

    अमन ने उसे कसकर पकड़ लिया।

     

    “भाई से बढ़कर।”

     

    विहान ने भी दोनों को पकड़ लिया।

     

    “मैंने जिंदगी भर भाई को ढूंढा था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब कभी अकेले नहीं रहोगे।”

     

     

     

    लेकिन असली सवाल अभी बाकी था

     

    आरव ने माधवी से पूछा—

     

    “मां, अगर सिया और नैना आपकी बहनें थीं, तो आप तीनों अलग कैसे हुईं?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “शेखर की वजह से।”

     

    शेखर चुपचाप सुन रहा था।

     

    माधवी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शेखर ने हमारे परिवार को बर्बाद कर दिया।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम सच नहीं जानती।”

     

    माधवी ने गुस्से से कहा—

     

    “मैंने सब अपनी आंखों से देखा है।”

     

    “नहीं।”

     

    “तो बताओ।”

     

    शेखर चुप हो गया।

     

    माधवी ने कहा—

     

    “सिया को तुम्हारे कारोबार का पता चला।”

     

    “नैना ने तुम्हारा विरोध किया।”

     

    “और अभय तुम्हें छोड़कर हमारे साथ खड़ा हो गया।”

     

    “तुमने एक-एक करके सबको खत्म करना शुरू कर दिया।”

     

    शेखर ने धीमे से कहा—

     

    “मैंने किसी को खत्म नहीं किया।”

     

    माधवी चौंकी।

     

    “क्या?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मैंने सिर्फ उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

     

     

    शेखर की सफाई

     

    शेखर ने कहा—

     

    “तुम लोग मुझे जितना बुरा समझते हो, मैं उतना बुरा नहीं हूं।”

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “मेरी मां मर गई।”

     

    विहान बोला—

     

    “मेरी मां भी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मेरे पिता भी।”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मैंने किसी को नहीं मारा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो फिर कौन मारता रहा?”

     

    शेखर ने डॉक्टर की तरफ देखा।

     

    डॉक्टर का चेहरा बदल गया।

     

    आरव समझ गया।

     

    “डॉक्टर?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “आपने हमारी मांओं को मारा?”

     

    डॉक्टर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं!”

     

    “तो फिर?”

     

    डॉक्टर की आंखों में डर आ गया।

     

    “मैंने उन्हें मारने की कोशिश नहीं की।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “साफ-साफ बोलिए।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “मैंने उन्हें बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “लेकिन वे मरी कैसे?”

     

    डॉक्टर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि हमारे बीच एक और व्यक्ति था।”

     

     

     

    चौथा नाम

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “वही व्यक्ति जिसने पच्चीस साल से सबको एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    डॉक्टर ने धीरे से कहा—

     

    “राजवीर।”

     

    शेखर का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “राजवीर!”

     

    डॉक्टर ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “राजवीर कौन है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “मेरा सबसे पुराना दोस्त।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “दोस्त नहीं।”

     

    फिर उनकी आंखों में नफरत भर गई।

     

    “वही आदमी जिसने मेरी दोनों बहनों को मारा।”

     

    विहान की सांस रुक गई।

     

    “मेरी मां को?”

     

    “हां।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “और सिया को?”

     

    माधवी ने सिर हिलाया।

     

    “उसे भी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन उसने ऐसा क्यों किया?”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “क्योंकि वह शेखर का साम्राज्य चाहता था।”

     

    शेखर ने पहली बार सिर झुका लिया।

     

    “और मैंने उसे कभी नहीं पहचाना।”

     

     

     

    पुरानी डायरी का दूसरा पन्ना

     

    अमन ने सिया की डायरी फिर खोली।

     

    अचानक एक मुड़ा हुआ पन्ना नीचे गिरा।

     

    उस पर सिर्फ कुछ शब्द लिखे थे—

     

    “अगर मैं मर जाऊं तो राजवीर पर भरोसा मत करना।”

     

    अमन की आंखें फैल गईं।

     

    “मां को पता था!”

     

    आरव ने पन्ना लिया।

     

    नीचे एक तारीख लिखी थी।

     

    14 अगस्त।

     

    वही तारीख।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही रात।”

     

    डॉक्टर ने कहा—

     

    “हां।”

     

    अचानक आरव को फिर अपनी बचपन की याद आने लगी।

     

    वह अस्पताल के कमरे में था।

     

    माधवी उसके पास थीं।

     

    सिया रो रही थीं।

     

    नैना किसी बच्चे को गोद में लिए हुए थी।

     

    और दरवाजे के बाहर एक आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसकी उंगली में एक बड़ी काली अंगूठी थी।

     

    आरव ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    “अंगूठी!”

     

    रुद्र ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “राजवीर की अंगूठी कैसी है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “काली।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उस पर सांप का निशान है?”

     

    शेखर चौंक गया।

     

    “हां।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “वही आदमी उस रात अस्पताल में था।”

     

     

     

    सबसे बड़ा खतरा

     

    अचानक शेखर का फोन बजा।

     

    उसने फोन उठाया।

     

    दूसरी तरफ से किसी ने सिर्फ एक बात कही—

     

    “तीनों बच्चे एक साथ हैं।”

     

    शेखर का चेहरा बदल गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    फोन कट गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन था?”

     

    शेखर ने फोन नीचे कर लिया।

     

    “राजवीर।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    विहान ने पूछा—

     

    “वो हमें क्यों ढूंढ रहा है?”

     

    शेखर ने कहा—

     

    “क्योंकि उसे पता चल गया है कि तुम तीनों एक साथ हो।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तो?”

     

    शेखर ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “तो अब वो तुम्हें मारने आएगा।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “उसे आने दो।”

     

    शेखर ने उसे देखा।

     

    “तुम नहीं जानते राजवीर कितना खतरनाक है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

     

    आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “हम तीनों भाई एक साथ हैं।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “और हम पीछे नहीं हटेंगे।”

     

    विहान ने भी सिर हिलाया।

     

    “इस बार कोई हमें अलग नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने तीनों भाइयों की तरफ देखा।

     

    फिर माधवी के पास जाकर उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मां, अब हम भागेंगे नहीं।”

     

    माधवी ने कहा—

     

    “तुम्हें लड़ना पड़ेगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    माधवी ने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “उस आदमी से, जिसने पच्चीस साल पहले तुम्हारे परिवार को तोड़ा था।”

     

    उसी वक्त बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।

     

    रुद्र ने खिड़की से देखा।

     

    उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    रुद्र ने कांपते हुए कहा—

     

    “राजवीर अकेला नहीं आया है।”

     

    “कितने लोग हैं?”

     

    “पूरी से कहती” 

     

    और उसी पल हवेली की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

     

    “शेखर… अपने बेटों को मेरे हवाले कर दो।”

     

    शेखर ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

     

    आरव ने आरोही का हाथ थाम लिया।

     

    और तीनों भाई एक साथ खड़े हो गए।

     

    क्योंकि अब उनकी लड़ाई सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं… अपने प्यार और अपने भविष्य के लिए भी थी।

     

    जारी रहेगा…