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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 8

पढ़ने का समय : 10 मिनट

तेरी मेरी दास्तान

 

एपिसोड 8 — पापा की डायरी का राज

 

आरोही और आरव तेज कदमों से कार की तरफ बढ़े।

 

आरोही के हाथ में अभी भी फोन था।

 

उसकी मां की घबराई हुई आवाज उसके कानों में गूंज रही थी “मुझे तुम्हारे पापा की डायरी मिली है।”

 

आरोही का दिल बेचैनी से धड़क रहा था।

 

आरव ने कार स्टार्ट की और उसकी तरफ देखा।

 

“घबराओ मत।”

 

आरोही ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,

 

“कैसे ना घबराऊं, आरव? इतने सालों से जिस सच की तलाश थी… शायद आज वो हमारे सामने आने वाला है।”

 

आरव ने उसका हाथ थाम लिया।

 

“जो भी सच होगा, हम दोनों मिलकर सामना करेंगे।”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम हर बार ऐसा क्यों कहते हो?”

 

“क्या?”

 

“हम दोनों।”

 

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर मुस्कुराकर बोला,

 

“क्योंकि अब मेरी जिंदगी में ‘मैं’ से ज्यादा ‘हम’ जरूरी लगने लगा है।”

 

आरोही कुछ नहीं बोली।

 

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

 

लेकिन दिल में एक डर अब भी था।

 

अगर डायरी में ऐसा सच लिखा हुआ हुआ जिसने दोनों को अलग कर दिया तो?

 

करीब आधे घंटे बाद दोनों घर पहुंचे।

 

आरोही ने जैसे ही दरवाजा खोला, उसकी मां सामने खड़ी थीं।

 

उनके हाथ में एक पुरानी काली डायरी थी।

 

आरोही की नजर डायरी पर टिक गई।

 

“मां… यही है?”

 

मां ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरोही ने डायरी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन मां ने उसे रोक दिया।

 

“पहले बैठो।”

 

“मां, प्लीज।”

 

“नहीं आरोही। इसे पढ़ने से पहले तुम्हें एक बात समझनी होगी।”

 

“क्या?”

 

मां ने आरव की तरफ देखा।

 

“ये डायरी सिर्फ तुम्हारे पिता की यादें नहीं हैं।”

 

आरव भी गंभीर हो गया।

 

“फिर?”

 

“इसमें ऐसे नाम हैं, जिन्हें जानने के बाद तुम्हारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती है।”

 

आरोही ने धीरे से पूछा,

 

“क्या इसमें आरव के परिवार का नाम है?”

 

मां ने उसकी तरफ देखा।

 

“हां।”

 

आरव ने गहरी सांस ली।

 

“तो पढ़ते हैं।”

 

मां ने डायरी आरोही के हाथ में दे दी।

 

आरोही ने पहला पन्ना खोला।

 

ऊपर उसके पिता की लिखावट थी।

 

“12 मार्च”

 

नीचे लिखा था—

 

“आज राजवीर से फिर मुलाकात हुई। हमारे बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि वो मेरी बेटी के खिलाफ कभी कुछ नहीं करेगा।”

 

आरोही ने आरव की तरफ देखा।

 

आरव की आंखों में हैरानी थी।

 

“मेरे पिता… तुम्हारे पापा के बारे में ऐसा सोचते थे?”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

अगला पन्ना।

 

“18 मार्च”

 

“विक्रम फिर मेरे पास आया। उसने मुझे राजवीर के खिलाफ जाने के लिए कहा। मैंने मना कर दिया।”

 

आरव तुरंत आगे झुका।

 

“विक्रम सूद।”

 

आरोही ने पन्ना पलटा।

 

“मैंने उससे साफ कह दिया है कि मैं किसी भी कीमत पर राजवीर को धोखा नहीं दूंगा।”

 

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

 

आरोही की मां ने धीमी आवाज में कहा,

 

“तुम्हारे पिता और राजवीर एक समय दुश्मन नहीं थे।”

 

आरोही चौंक गई।

 

“क्या?”

 

“वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।”

 

आरव ने भी हैरानी से मां को देखा।

 

“मेरे पिता ने कभी इसका जिक्र नहीं किया।”

 

मां ने कहा,

 

“क्योंकि बाद में सब कुछ बदल गया।”

 

आरोही ने डायरी आगे पढ़ी।

 

“25 मार्च”

 

“मुझे शक है कि विक्रम दोनों परिवारों के बीच गलतफहमी पैदा कर रहा है। अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो मेरी बेटी को सच्चाई बताना।”

 

आरोही के हाथ कांपने लगे।

 

“मां…”

 

मां की आंखें भर आईं।

 

“पढ़ती जाओ।”

 

अगला पन्ना।

 

“28 मार्च”

 

“आज मुझे एक ऐसा दस्तावेज मिला है जो साबित करता है कि कंपनी में करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई है। लेकिन ये काम न मेरा है और न राजवीर का।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तो किसका?”

 

आरोही ने नीचे पढ़ा।

 

उसकी आंखें फैल गईं।

 

“विक्रम सूद।”

 

आरव की मुट्ठी कस गई।

 

“तो उसने पैसे चुराए और इल्जाम दोनों परिवारों पर लगाया।”

 

“शायद,” आरोही ने कहा।

 

अगला पन्ना आधा फटा हुआ था।

 

उस पर सिर्फ कुछ शब्द दिखाई दे रहे थे “अगर मैं मर जाऊं… तो M-17 में…”

 

आरोही रुक गई।

 

“आगे का पन्ना फटा हुआ है।”

 

आरव ने डायरी हाथ में ली।

 

“कोई जानबूझकर इसे फाड़कर ले गया है।”

 

आरोही की मां ने तुरंत कहा,

 

“तुम्हारे पापा की मौत के बाद मैंने ये डायरी बहुत ढूंढी थी। लेकिन मुझे कभी नहीं मिली।”

 

“तो फिर ये अब कहां से आई?”

 

मां चुप हो गईं।

 

आरोही ने पूछा,

 

“मां?”

 

मां ने धीमे से कहा,

 

“आज सुबह हमारे पुराने स्टोर रूम की सफाई करते समय ये एक लकड़ी के बक्से के पीछे मिली।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या बक्सा पहले से वहां था?”

 

“हां।”

 

“किसने रखा था?”

 

मां ने सिर हिलाया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरव और आरोही ने एक-दूसरे को देखा।

 

रात काफी हो चुकी थी।

 

आरव जाने के लिए उठा।

 

आरोही उसे दरवाजे तक छोड़ने आई।

 

दोनों कुछ पल चुप खड़े रहे।

 

आरोही ने धीमे से कहा,

 

“आरव।”

 

“हम्म?”

 

“आज जो कुछ पढ़ा… उससे एक बात तो साफ है।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारे पिता और मेरे पिता दुश्मन नहीं थे।”

 

“हां।”

 

“तो फिर उन्हें दुश्मन किसने बनाया?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

 

“विक्रम।”

 

“और अगर वही तुम्हारे पापा की मौत के पीछे है?”

 

“तो उसे कानून के सामने लाएंगे।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

फिर अचानक बोली,

 

“एक बात पूछूं?”

 

“पूछो।”

 

“अगर मेरे पापा और तुम्हारे पापा दोस्त थे… तो क्या तुम्हारे पापा को मेरी मां के बारे में पता था?”

 

आरव कुछ पल चुप रहा।

 

“शायद।”

 

“और मेरे बारे में?”

 

“शायद।”

 

आरोही मुस्कुराई।

 

“तुम्हारा ‘शायद’ भी बहुत है।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“तुमने ही सिखाया है।”

 

दोनों हंसने लगे।

 

कुछ पल बाद खामोशी छा गई।

 

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

 

“आरोही।”

 

“हां?”

 

“तुम खुश हो?”

 

“अभी?”

 

“हां।”

 

आरोही ने कुछ पल सोचा।

 

फिर बोली,

 

“जब तुम मेरे पास होते हो… तब।”

 

आरव की आंखों में चमक आ गई।

 

“तो मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें ज्यादा से ज्यादा खुश रखूं।”

 

आरोही ने नजरें झुका लीं।

 

“और अगर मैं तुम्हारी आदत बन गई तो?”

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा,

 

“तो फिर जिंदगी भर की आदत बना लूंगा।”

 

आरोही ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

 

“जाओ।”

 

“क्यों?”

 

“बहुत बातें करते हो।”

 

“ठीक है।”

 

आरव मुड़ा।

 

दो कदम आगे बढ़ा।

 

फिर वापस उसकी तरफ देखा।

 

“गुड नाइट।”

 

आरोही मुस्कुराई।

 

“गुड नाइट।”

 

आरव चला गया।

 

आरोही दरवाजे पर खड़ी उसे तब तक देखती रही जब तक उसकी कार नजरों से ओझल नहीं हो गई।

 

लेकिन उसी रात…

 

आरव के पिता की पुरानी स्टडी में कुछ हलचल हुई।

 

आरव ने घर लौटकर अपने पिता की पुरानी अलमारी खोली।

 

उसे याद था कि उसके पिता के पास भी कई पुराने दस्तावेज थे।

 

उसने एक-एक करके फाइलें निकालनी शुरू कीं।

 

अचानक एक पुराना लकड़ी का डिब्बा नीचे गिरा।

 

डिब्बा खुल गया।

 

उसमें एक पुरानी तस्वीर थी।

 

आरव ने तस्वीर उठाई।

 

उसमें उसके पिता राजवीर और विनय मेहरा साथ खड़े थे।

 

दोनों हंस रहे थे।

 

पीछे एक और आदमी था।

 

विक्रम सूद।

 

आरव ने तस्वीर पलटी।

 

पीछे लिखा था “हम तीनों ने जो शुरू किया है, उसे कोई खत्म नहीं कर सकता।”

 

आरव की भौंहें सिकुड़ गईं।

 

“हम तीनों?”

 

उसे कुछ समझ नहीं आया।

 

तभी डिब्बे के अंदर एक छोटी-सी चाबी दिखाई दी।

 

आरव ने उसे उठाया।

 

उस पर भी वही अक्षर खुदे थे M-17

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

“तो मेरे पिता के पास भी इसकी चाबी थी।”

 

उसने तुरंत कबीर को फोन किया।

 

“कबीर, अभी मेरे घर आ।”

 

“क्या हुआ?”

 

“मुझे M-17 की दूसरी चाबी मिली है।”

 

कुछ पल खामोशी रही।

 

फिर कबीर ने कहा,

 

“तो इसका मतलब…”

 

“हां।”

 

आरव ने कहा,

 

“हमारे पास अब दोनों चाबियां हैं।”

 

अगली सुबह आरव और कबीर पुराने रिकॉर्ड रूम पहुंचे।

 

आरोही भी उनके साथ थी।

 

आरव ने दोनों चाबियां सामने रखीं।

 

“एक तुम्हारे पापा की।”

 

“और एक मेरे पापा की।”

 

आरोही ने कहा,

 

“शायद दोनों एक ही ताले के लिए हैं।”

 

कमरे में एक पुरानी लोहे की अलमारी थी।

 

लेकिन उस पर कोई ताला दिखाई नहीं दे रहा था।

 

कबीर ने ध्यान से देखा।

 

“रुको।”

 

उसने अलमारी के नीचे हाथ लगाया।

 

एक छोटा-सा छेद दिखाई दिया।

 

आरव ने पहली चाबी लगाई।

 

फिर दूसरी।

 

दोनों चाबियां एक साथ घूमीं।

 

क्लिक!

 

अलमारी खुल गई।

 

अंदर सिर्फ एक काला बॉक्स था।

 

आरोही ने उसे बाहर निकाला।

 

बॉक्स पर लिखा था “सच केवल उसी के लिए जो दोनों परिवारों पर भरोसा कर सके।”

 

आरोही ने आरव की तरफ देखा।

 

“इसे खोलें?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

बॉक्स खुला।

 

अंदर एक पेन ड्राइव, कुछ कागज और एक पुराना फोटो था।

 

आरोही ने फोटो उठाया।

 

उसकी आंखें अचानक फैल गईं।

 

फोटो में उसके पिता और आरव के पिता के साथ…

 

आरोही की मां भी थीं।

 

लेकिन वो तस्वीर उस समय की थी जब आरोही की मां ने हमेशा कहा था कि वह इन लोगों को जानती तक नहीं थीं।

 

आरोही की सांस अटक गई।

 

“मां ने हमसे झूठ बोला?”

 

आरव ने फोटो हाथ में लिया।

 

पीछे तारीख लिखी थी “घटना से तीन दिन पहले।”

 

कबीर ने पेन ड्राइव उठाई।

 

“इसमें क्या है?”

 

आरव ने कहा,

 

“पता लगाते हैं।”

 

उन्होंने लैपटॉप में पेन ड्राइव लगाई।

 

एक वीडियो फाइल सामने आई।

 

वीडियो चलाया गया।

 

स्क्रीन पर विनय मेहरा दिखाई दिए।

 

उनका चेहरा गंभीर था।

 

वह कैमरे की तरफ देखकर बोल रहे थे “अगर ये वीडियो किसी के हाथ लगा है, तो समझ लेना कि मैं शायद जिंदा नहीं हूं।”

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

वीडियो में उसके पिता आगे बोले “मेरी मौत का जिम्मेदार राजवीर नहीं है।”

 

आरव ने हैरानी से स्क्रीन देखी।

 

फिर विनय ने कहा “लेकिन राजवीर का बेटा… आरव… उसे बचाना बहुत जरूरी है।”

 

वीडियो अचानक रुक गया।

 

स्क्रीन काली हो गई।

 

आरोही ने घबराकर पूछा,

 

“वीडियो क्यों रुक गया?”

 

कबीर ने कहा,

 

“शायद फाइल अधूरी है।”

 

आरव की नजर स्क्रीन पर जमी थी।

 

“मेरे पिता ने ऐसा क्या किया था कि मेरे पापा ने मुझे बचाने की बात कही?”

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“हमें पता करना होगा।”

 

तभी कमरे की लाइट अचानक बंद हो गई।

 

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

 

आरोही घबरा गई।

 

“आरव?”

 

“मैं यहीं हूं।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

कुछ सेकंड बाद बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

कबीर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

 

“दरवाजा बाहर से लॉक है!”

 

आरोही ने घबराकर पूछा,

 

“कोई हमें यहां बंद कर गया?”

 

आरव ने तुरंत फोन निकाला।

 

नेटवर्क नहीं था।

 

उसने आरोही को अपने पीछे कर लिया।

 

“डरो मत।”

 

अंधेरे में अचानक एक आवाज गूंजी “तुम्हें सच जानने की बहुत जल्दी थी ना?”

 

आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

 

आरव ने आवाज की दिशा में देखा।

 

“सामने आ!”

 

आवाज फिर आई “सच जानोगे… तो शायद एक-दूसरे से नफरत करने लगोगे।”

 

आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

 

“हमारा रिश्ता इतना कमजोर नहीं है।”

 

कुछ सेकंड खामोशी रही।

 

फिर आओयप्यारज आई “देखते हैं।”

 

अचानक लाइट वापस जल गई।

 

कमरा खाली था।

 

लेकिन टेबल पर एक नया कागज रखा था।

 

आरव ने उसे उठाया।

 

उस पर लिखा था “जिसे तुम बचाना चाहते हो, उसी के पिता ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

आरोही ने कागज पढ़ा।

 

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

 

उनके बीच पहली बार डर ने जगह बना ली।

 

क्योंकि अगर ये सच था…

 

तो उनके पिता सिर्फ दोस्त नहीं थे।

 

उनके बीच कोई ऐसा विश्वासघात हुआ था…

 

जिसकी कीमत शायद उनकी अगली पीढ़ी को चुकानी थी।

 

और उन्हें अभी नहीं पता था कि इस पूरे खेल में…

 

आरव और आरोही का प्यार ही सबसे बड़ा हथियार बनने वाला था।

 

जारी रहेगा…

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