नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और यमुना किनारे की शरारत
अगली सुबह वृंदावन में सूरज निकलने से पहले ही कान्हा की आँख खुल गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश हल्का-हल्का नीला हो रहा था। दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।
कान्हा धीरे से बिस्तर से उठे और बाहर जाने लगे।
तभी पीछे से यशोदा मैया की आवाज आई—
“कान्हा!”
कान्हा वहीं रुक गए।
“जी मैया?”
यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—
“इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो?”
कान्हा ने मासूमियत से कहा—
“मैं तो बस बाहर देखने जा रहा था।”
यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—
“बाहर देखने के लिए इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है?”
कान्हा चुप हो गए।
यशोदा समझ गईं।
“फिर से कोई शरारत करने का मन है?”
कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।
“नहीं मैया।”
“पक्का?”
“बिल्कुल पक्का।”
यशोदा ने उन्हें पास बुलाया और उनके बाल ठीक करते हुए कहा—
“यमुना के बहुत पास मत जाना। और अपने दोस्तों से अलग मत होना।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ घर से निकल पड़े।
आज उनका मन यमुना किनारे जाने का था।
रास्ते में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, आज क्या खेलेंगे?”
कान्हा ने कहा—
“आज हम यमुना किनारे दौड़ लगाएंगे।”
दूसरा बोला—
“और अगर तुम हार गए तो?”
कान्हा हँसे।
“मैं कभी नहीं हारता।”
तीसरा बच्चा बोला—
“कल तो तुम पेड़ पर चढ़ते समय गिर गए थे।”
कान्हा ने उसकी तरफ देखा।
“वो गिरना नहीं था। मैं नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”
सभी बच्चे जोर से हँस पड़े।
कुछ ही देर में वे यमुना किनारे पहुँच गए।
यमुना का पानी शांत था। किनारे पर हरी घास थी और पास के पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।
कान्हा ने अपनी बांसुरी निकाली और एक पत्थर पर बैठ गए।
उन्होंने धीरे-धीरे बांसुरी बजानी शुरू की।
सभी बच्चे शांत होकर सुनने लगे।
कुछ देर बाद एक मोर भी पास आ गया।
कान्हा ने बांसुरी बजाना बंद किया तो मोर भी रुक गया।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, इसे भी तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”
कान्हा मुस्कुराए।
“ये मेरा दोस्त है।”
तभी एक बच्चे ने यमुना में तैरती हुई कमल की पत्तियाँ देखीं।
वह बोला—
“कान्हा, देखो कितनी सुंदर पत्तियाँ हैं।”
कान्हा ने कहा—
“चलो उन्हें देखते हैं।”
सब बच्चे पानी के किनारे पहुँच गए।
कान्हा ने एक छोटी लकड़ी उठाई और पानी में पड़ी पत्ती को अपनी ओर खींचने लगे।
एक दोस्त ने कहा—
“बहुत अंदर मत जाना।”
कान्हा ने कहा—
“मैं किनारे पर ही हूँ।”
तभी उन्हें पानी में एक छोटी सी नाव दिखाई दी।
नाव किनारे से थोड़ी दूर थी।
कान्हा ने कहा—
“चलो नाव में बैठते हैं।”
एक दोस्त घबरा गया।
“नहीं, हमें बाबा ने पानी में जाने से मना किया है।”
कान्हा कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“ठीक है, नाव में नहीं जाएँगे।”
उन्होंने पास पड़ी एक लंबी लकड़ी उठाई और नाव को किनारे की ओर खींचने लगे।
बच्चे उनकी मदद करने लगे।
कुछ कोशिश के बाद नाव किनारे आ गई।
कान्हा खुशी से बोले—
“देखा! बिना पानी में उतरे भी नाव आ गई।”
सभी बच्चे हँसने लगे।
तभी अचानक एक तेज हवा चली।
कान्हा की बांसुरी उनके हाथ से छूटकर घास में गिर गई।
“मेरी बांसुरी!”
कान्हा उसे ढूँढ़ने लगे।
सभी बच्चे अलग-अलग तरफ खोजने लगे।
लेकिन बांसुरी कहीं दिखाई नहीं दी।
एक बच्चा बोला—
“शायद हवा से आगे चली गई।”
कान्हा चिंतित हो गए।
“मेरी बांसुरी मुझे बहुत प्यारी है।”
वे घास में झुककर खोजने लगे।
तभी उन्हें दूर एक छोटी सी लड़की दिखाई दी।
वह किनारे पर बैठी थी और हाथ में वही बांसुरी थी।
कान्हा उसके पास गए।
“ये मेरी बांसुरी है।”
लड़की ने कहा—
“मुझे ये घास में मिली थी।”
कान्हा ने कहा—
“हाँ, ये मेरी है।”
लड़की ने बांसुरी वापस कर दी।
कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—
“तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?”
लड़की बोली—
“मैं अपनी माँ के साथ आई थी। वो थोड़ी दूर गई हैं।”
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
“तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”
लड़की ने नदी की दूसरी तरफ इशारा किया।
कान्हा समझ गए कि वह अपनी माँ से अलग हो गई थी।
उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—
“हमें इसे इसकी माँ के पास पहुँचाना चाहिए।”
सभी बच्चे लड़की के साथ चल पड़े।
थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक महिला परेशान होकर इधर-उधर देखते हुए दिखाई दी।
लड़की अपनी माँ को देखते ही दौड़ पड़ी।
“माँ!”
महिला ने उसे गले लगा लिया।
उसने कान्हा की तरफ देखा।
“तुमने मेरी बेटी को यहाँ तक पहुँचाया?”
कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ।”
महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा—
“बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“आप बस इसे अकेला मत छोड़ना।”
महिला मुस्कुराई।
“अब नहीं छोड़ूँगी।”
कान्हा वापस अपने दोस्तों के पास लौट आए।
लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें याद आया कि उन्हें घर भी लौटना था।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, अब मैया डाँटेंगी।”
कान्हा ने कहा—
“हमने कोई गलत काम तो किया नहीं।”
दूसरा बोला—
“लेकिन हम काफी देर से यहाँ हैं।”
कान्हा ने आसमान की तरफ देखा।
सूरज काफी ऊपर आ चुका था।
“अरे! सच में बहुत देर हो गई।”
सभी बच्चे तेजी से घर की तरफ भागने लगे।
उधर नंद भवन में यशोदा मैया बार-बार बाहर देख रही थीं।
नंद बाबा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
यशोदा बोलीं—
“कान्हा अभी तक नहीं आया।”
नंद बाबा ने कहा—
“बच्चों के साथ गया है। आता होगा।”
लेकिन कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ दौड़ते हुए आ गए।
यशोदा ने उन्हें देखते ही पकड़ लिया।
“कहाँ थे इतनी देर?”
कान्हा बोले—
“यमुना किनारे।”
“मैंने कहा था ज्यादा दूर मत जाना।”
“हम दूर नहीं गए थे।”
“फिर इतनी देर क्यों?”
कान्हा ने सारी बात बता दी।
यशोदा ने ध्यान से सुना।
जब उन्हें पता चला कि कान्हा ने एक बच्ची को उसकी माँ तक पहुँचाया, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हो गया।
उन्होंने कहा—
“तुमने अच्छा काम किया, लेकिन बिना बताए इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं।”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“माफ कर दो मैया।”
यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।
“बस अगली बार मुझे बता देना।”
कान्हा ने कहा—
“पक्का।”
तभी उनके एक दोस्त ने पीछे से कहा—
“मैया, कान्हा ने आज नाव भी किनारे खींची थी!”
यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।
“नाव?”
कान्हा चुप।
“तुमने नाव में जाने की कोशिश तो नहीं की?”
कान्हा बोले—
“नहीं मैया। हमने नाव को खुद ही किनारे बुला लिया।”
यशोदा हँस पड़ीं।
“तुम्हारी बातें भी ना!”
उन्होंने कान्हा को अपने पास बैठाया और उन्हें खाना खिलाने लगीं।
कान्हा खाते-खाते बोले—
“मैया, आज मैंने एक बात सीखी।”
“क्या?”
“जिसे रास्ता न मिले, उसका रास्ता दिखाना चाहिए।”
यशोदा ने मुस्कुराकर पूछा—
“ये किसने सिखाया?”
कान्हा ने कहा—
“मुझे खुद समझ आया।”
यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।
“मेरे नन्हे कान्हा की शरारतों के बीच इतनी समझदारी भी छिपी है, ये तो मुझे आज पता चला।”
कान्हा हँस पड़े।
शाम को वह आँगन में बैठे अपनी बांसुरी बजाने लगे।
वही मोर दूर पेड़ के पास आकर बैठ गया।
गायें भी शांत होकर उन्हें देखने लगीं।
यशोदा दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे को देख रही थीं।
उन्हें लगा कि कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करें, उनके मन में दूसरों के लिए हमेशा प्यार रहता है।
लेकिन उसी समय कान्हा ने बांसुरी बजाते-बजाते अपने दोस्तों की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया।
दोस्त समझ गए।
कान्हा की अगली शरारत की योजना फिर शुरू हो चुकी थी।
और इस बार निशाना था—
नंद बाबा की नई बनाई हुई दूध की बड़ी मटकी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे