नन्हे कान्हा और माखन की मटकी
वृंदावन में सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ बज रही थीं और गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। लेकिन नंद भवन में आज यशोदा मैया कुछ ज्यादा ही परेशान थीं।
उन्होंने सुबह-सुबह माखन की मटकी खोली तो उसमें माखन बहुत कम था।
यशोदा ने हैरानी से मटकी देखी।
“कल तो मैंने पूरी मटकी भरी थी। इतनी जल्दी माखन खत्म कैसे हो गया?”
उन्होंने घर में काम करने वाली गोपी से पूछा—
“तुमने माखन निकाला था?”
गोपी ने सिर हिलाया।
“नहीं मैया। मैंने तो मटकी को हाथ तक नहीं लगाया।”
यशोदा कुछ समझ नहीं पाईं।
तभी उन्हें बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।
उन्होंने धीरे से दरवाजे के पास जाकर देखा।
आँगन में कान्हा अपने दोस्तों के साथ बैठे थे। सभी बच्चे कुछ खाने में व्यस्त थे।
यशोदा ने ध्यान से देखा।
कान्हा के हाथ में माखन था।
उन्होंने आवाज लगाई—
“कान्हा!”
कान्हा ने तुरंत माखन पीछे कर लिया।
“जी मैया?”
“इधर आओ।”
कान्हा धीरे-धीरे उनके पास आए।
यशोदा ने पूछा—
“तुम्हारे हाथ में क्या है?”
कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।
“कुछ नहीं।”
“अच्छा? हाथ आगे करो।”
कान्हा ने धीरे से हाथ आगे किया।
उसमें सफेद माखन लगा हुआ था।
यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।
“ये क्या है?”
कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—
“माखन।”
“और ये तुम्हारे हाथ में कैसे आया?”
कान्हा कुछ पल सोचते रहे।
फिर बोले—
“मैया, मैं तो बस देख रहा था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”
यशोदा हँसते-हँसते बोलीं—
“माखन देखकर हाथ में कैसे आ गया?”
कान्हा बोले—
“वो… हाथ खुद चला गया।”
पास खड़े ग्वाल-बाल हँसने लगे।
यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कान्हा तुरंत भाग गए।
“कान्हा! रुको!”
कान्हा आँगन के एक कोने से दूसरे कोने तक भागने लगे।
यशोदा उनके पीछे दौड़ती रहीं।
आखिर कान्हा एक बड़े घड़े के पीछे छिप गए।
यशोदा ने जानबूझकर कहा—
“लगता है मेरा कान्हा कहीं चला गया।”
कान्हा चुप रहे।
यशोदा दूसरी तरफ जाने लगीं।
कान्हा धीरे से बाहर निकले।
जैसे ही उन्होंने भागने के लिए कदम बढ़ाया, यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया।
“मिल गए!”
कान्हा हँसने लगे।
यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।
“अब बताओ, माखन किसने खाया?”
कान्हा बोले—
“मैंने नहीं खाया।”
“तो?”
“मेरे दोस्तों ने खाया।”
ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
एक बच्चा बोला—
“मैया, कान्हा ने ही हमें बुलाया था।”
कान्हा ने उसकी तरफ देखा।
“तुमने मेरी शिकायत कर दी?”
बच्चा हँसने लगा।
यशोदा ने कहा—
“कान्हा, अगर तुम्हें माखन चाहिए तो मुझसे माँग लिया करो। चोरी क्यों करते हो?”
कान्हा ने मासूमियत से कहा—
“माँगने पर तो आप थोड़ा देती हो। मटकी में बहुत सारा होता है।”
यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।
उन्होंने कहा—
“अच्छा, तो अब मटकी खाली कर दोगे?”
कान्हा बोले—
“नहीं मैया।”
“पक्का?”
“पक्का।”
अगले दिन यशोदा ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर रख दी।
उन्होंने सोचा कि अब कान्हा वहाँ तक नहीं पहुँच पाएँगे।
लेकिन कान्हा ने मटकी देखी तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाया।
“आज मटकी बहुत ऊपर है।”
एक दोस्त बोला—
“तो आज माखन नहीं मिलेगा।”
कान्हा ने कहा—
“क्यों नहीं मिलेगा? बस तरीका बदलना पड़ेगा।”
उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर खड़ा किया।
सबसे ऊपर कान्हा चढ़ गए।
कान्हा ने मटकी पकड़ ली।
“देखा! मैंने कहा था ना, माखन मिलेगा।”
एक बच्चा बोला—
“लेकिन मैया पकड़ लेंगी।”
कान्हा हँसे।
“पहले माखन तो निकालो।”
मटकी नीचे उतारी गई।
कान्हा ने उसे खोला।
माखन की खुशबू फैल गई।
सभी बच्चे खुशी से झूम उठे।
कान्हा ने माखन बाँटा।
किसी को थोड़ा मिला, किसी को ज्यादा।
तभी एक बंदर भी वहाँ आ गया।
कान्हा ने उसे भी माखन दे दिया।
एक दोस्त ने पूछा—
“तुम बंदर को क्यों दे रहे हो?”
कान्हा बोले—
“उसे भी भूख लगी है।”
बंदर माखन लेकर पेड़ पर चढ़ गया।
लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।
उन्होंने सब देख लिया था।
“कान्हा!”
बच्चे भाग गए।
कान्हा वहीं खड़े रह गए।
यशोदा ने पूछा—
“फिर माखन चोरी?”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“मैया…”
“आज तो तुम्हें सजा मिलेगी।”
कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।
“कैसी सजा?”
“आज तुम्हें मेरे साथ बैठकर पूरा माखन खाना होगा।”
कान्हा की आँखें चमक उठीं।
“सच?”
यशोदा हँस पड़ीं।
“तुम्हें लगा मैं तुम्हें सच में सजा दूँगी?”
कान्हा दौड़कर उनकी गोद में बैठ गए।
यशोदा ने माखन की कटोरी सामने रख दी।
कान्हा ने पहला निवाला लिया और फिर अपनी माँ को खिलाया।
“पहले आप।”
यशोदा ने कहा—
“मुझे क्यों?”
“क्योंकि माखन आपने बनाया है।”
यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।
उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।
उस दिन शाम को कई गोपियाँ फिर शिकायत लेकर आईं।
एक बोली—
“यशोदा, तुम्हारा कान्हा हमारे घर की मटकी भी खाली कर गया।”
दूसरी बोली—
“और मेरे घर तो बंदरों को भी बुला लाया।”
यशोदा ने कान्हा की ओर देखा।
कान्हा धीरे से मुस्कुराए।
एक गोपी बोली—
“लेकिन सच कहूँ तो जब से कान्हा हमारे घर आने लगा है, घर में रौनक हो गई है।”
दूसरी बोली—
“पहले हम माखन बनाकर रखती थीं, अब बनाते ही सोचती हैं कि कान्हा कब आएगा।”
यशोदा मुस्कुराईं।
कान्हा गोपियों की तरफ देखकर बोले—
“तो कल से मैं सबके घर आऊँगा।”
सभी गोपियाँ एक साथ बोलीं—
“नहीं!”
पूरा आँगन हँसी से भर गया।
कान्हा भी खिलखिलाकर हँसने लगे।
यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।
“मेरे नटखट कान्हा, तुम्हारी शरारतों से पूरा वृंदावन परेशान भी है और खुश भी।”
कान्हा ने माँ के गले में हाथ डालकर कहा—
“मैया, मैं शरारत नहीं करता। मैं तो सबको खुश करता हूँ।”
यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।
और सच ही तो था।
कान्हा की माखन चोरी सिर्फ माखन की चोरी नहीं थी। उनके बहाने हर घर में हँसी पहुँचती थी, हर आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी और हर गोपी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।
इसीलिए वृंदावन में जब भी कोई माखन की खाली मटकी देखता, तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहता—
“लगता है कान्हा यहाँ होकर गए हैं।”
. नन्हे कान्हा और खोया हुआ बछड़ा
एक सुबह नंद बाबा ने कान्हा से कहा—
“कान्हा, आज तुम अपने दोस्तों के साथ बछड़ों को चराने ले जाना।”
कान्हा खुशी से उछल पड़े।
“सच बाबा?”
“हाँ, लेकिन ध्यान रखना। कोई बछड़ा झुंड से अलग नहीं होना चाहिए।”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“मैं सबका ध्यान रखूँगा।”
कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ बछड़ों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।
रास्ते में बच्चे खेलते रहे।
कोई पेड़ से फल तोड़ता, कोई फूल इकट्ठा करता और कान्हा कभी बांसुरी बजाते तो कभी बछड़ों के साथ दौड़ते।
जंगल के पास पहुँचकर उन्होंने बछड़ों को हरी घास वाले मैदान में छोड़ दिया।
कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाने लगे।
सभी बछड़े उनकी आवाज सुनकर शांत हो गए।
कुछ देर बाद एक दोस्त ने कहा—
“कान्हा, चलो नदी के पास चलते हैं।”
कान्हा ने कहा—
“ठीक है, लेकिन पहले बछड़ों को देख लो।”
सभी बच्चों ने बछड़ों को गिना।
एक कम था।
कान्हा ने तुरंत पूछा—
“एक बछड़ा कहाँ गया?”
सब बच्चे परेशान हो गए।
उन्होंने चारों तरफ देखा।
लेकिन बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।
एक बच्चा बोला—
“शायद जंगल की तरफ चला गया।”
कान्हा ने कहा—
“चलो, उसे ढूँढ़ते हैं।”
सब बच्चे अलग-अलग दिशा में फैल गए।
कान्हा ने बछड़े को आवाज दी—
“आ जा… आ जा…”
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
तभी उन्हें झाड़ियों के पीछे से हल्की आवाज सुनाई दी।
“कान्हा, इधर!”
कान्हा दौड़कर वहाँ पहुँचे।
एक छोटा बछड़ा झाड़ियों में फँसा हुआ था।
उसका पैर एक बेल में उलझ गया था।
कान्हा धीरे से उसके पास बैठ गए।
“डर मत। मैं तुम्हें निकालता हूँ।”
उन्होंने बेल को सावधानी से हटाया।
बछड़ा आजाद हो गया।
लेकिन वह बहुत डरा हुआ था।
कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“अब ठीक है।”
बछड़ा कान्हा के पास आकर खड़ा हो गया।
एक दोस्त बोला—
“चलो, इसे वापस झुंड में ले चलते हैं।”
कान्हा ने कहा—
“हाँ।”
लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, बछड़ा एक दिशा में देखने लगा।
कान्हा समझ गए कि शायद उसकी माँ उसी तरफ होगी।
उन्होंने कहा—
“शायद इसकी माँ को ढूँढ़ना होगा।”
एक दोस्त ने कहा—
“लेकिन अगर हम ज्यादा दूर गए तो बाबा चिंता करेंगे।”
कान्हा बोले—
“हम जल्दी वापस आ जाएँगे।”
वे बछड़े के पीछे चल पड़े।
काफी देर तक जंगल में घूमने के बाद उन्हें घंटियों की आवाज सुनाई दी।
कान्हा ने कहा—
“सुनो!”
सबने ध्यान लगाया।
घंटियों की आवाज लगातार आ रही थी।
वे उसी दिशा में दौड़े।
वहाँ गायों का एक बड़ा झुंड था।
बछड़े ने अपनी माँ को देखते ही आवाज लगाई और दौड़कर उसके पास चला गया।
गाय ने अपने बछड़े को प्यार से चाटा।
कान्हा यह देखकर मुस्कुराने लगे।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, अब इसे यहीं छोड़ दें?”
कान्हा ने कहा—
“नहीं। इसे अपनी माँ के साथ वापस ले चलेंगे।”
वे दोनों को लेकर वापस लौटने लगे।
जब वे मैदान में पहुँचे तो बाकी बछड़े भी उनके पास आ गए।
लेकिन शाम होने तक कान्हा घर नहीं लौटे थे।
यशोदा मैया चिंतित हो गईं।
उन्होंने नंद बाबा से पूछा—
“कान्हा अभी तक क्यों नहीं आया?”
नंद बाबा ने कहा—
“शायद बच्चों के साथ खेल रहा होगा।”
लेकिन थोड़ी देर बाद बच्चे वापस आए।
यशोदा ने पूछा—
“कान्हा कहाँ है?”
एक बच्चा बोला—
“मैया, कान्हा एक बछड़े को उसकी माँ तक पहुँचाने गए थे।”
यशोदा की चिंता और बढ़ गई।
“कहाँ गए हैं?”
“बस आते होंगे।”
कुछ देर बाद दूर से कान्हा दिखाई दिए।
उनके कपड़े मिट्टी से भरे थे।
बालों में पत्ते लगे थे और कंधे पर बांसुरी लटकी हुई थी।
यशोदा दौड़कर उनके पास पहुँचीं।
“कहाँ चले गए थे?”
कान्हा ने कहा—
“मैया, एक बछड़ा खो गया था।”
“तो तुम अकेले इतनी दूर चले गए?”
“मैं अकेला नहीं था। मेरे दोस्त भी थे।”
यशोदा ने उन्हें ध्यान से देखा।
“तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान थी?”
कान्हा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माफ कर दो मैया। अगली बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”
यशोदा का गुस्सा तुरंत गायब हो गया।
उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।
“बस अपना ध्यान रखा करो।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे