चार सब्जियों की अनोखी लड़ाई
एक छोटे से शहर में मार्था नाम की एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसका एक छोटा-सा बगीचा था, जिसमें वह तरह-तरह की सब्जियां उगाती थी। टमाटर, आलू, बैंगन, भिंडी, गाजर, मटर और कई तरह की हरी सब्जियां उसके बगीचे की शोभा बढ़ाती थीं।
लेकिन उस बगीचे में चार सब्जियां ऐसी थीं, जो खुद को सबसे ज्यादा खास समझती थीं।
टमाटर, आलू, बैंगन और भिंडी।
चारों में हमेशा किसी न किसी बात पर बहस होती रहती थी।
एक सुबह टमाटर ने अपनी लाल चमक दिखाते हुए कहा—
“देखो मुझे! मैं कितनी सुंदर हूं। मेरे बिना सलाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती।”
आलू तुरंत बोला—
“सुंदर होने से क्या होता है? सबसे ज्यादा काम तो मेरा आता है। सब्जी बनानी हो, पराठे हों, चाट हो या पकौड़े… हर जगह मैं काम आता हूं।”
भिंडी ने गर्दन हिलाई।
“तुम दोनों अपनी-अपनी तारीफ कर लो। लेकिन मेरे जैसा स्वाद किसके पास है?”
बैंगन हंसते हुए बोला—
“तुम तीनों भूल रहे हो कि असली सब्जियों का राजा कौन है।”
टमाटर ने पूछा—
“कौन?”
बैंगन ने गर्व से कहा—
“मैं! मुझसे भरता बनता है, सब्जी बनती है और मसालेदार पकवान भी।”
आलू ने हंसकर कहा—
“तुम्हें कौन पसंद करता है? बच्चे तो तुम्हारा नाम सुनकर ही मुंह बना लेते हैं।”
बैंगन गुस्से में लाल पड़ गया।
“कम से कम मैं तुम्हारी तरह हर सब्जी में घुसकर अपनी पहचान नहीं खोता!”
आलू ने कहा—
“क्या कहा?”
भिंडी बीच में बोली—
“बस करो तुम दोनों!”
टमाटर ने कहा—
“आज फैसला हो ही जाना चाहिए कि हम चारों में सबसे जरूरी कौन है।”
चारों सब्जियां मान गईं।
उन्होंने तय किया कि अगले दिन बगीचे में एक प्रतियोगिता होगी।
जिस सब्जी को मार्था सबसे ज्यादा पसंद करेगी, वही सबसे खास मानी जाएगी।
अगली सुबह मार्था बगीचे में आई।
उसने टोकरी उठाई और चारों सब्जियों को देखा।
सबसे पहले उसने टमाटर तोड़े।
टमाटर खुशी से फूल गया।
“देखा! सबसे पहले मुझे चुना।”
आलू बोला—
“अभी फैसला मत करो।”
कुछ देर बाद मार्था ने आलू भी खोद लिए।
आलू मुस्कुराया।
“अब बताओ, कौन ज्यादा जरूरी है?”
भिंडी और बैंगन भी टोकरी में रख दिए गए।
चारों एक-दूसरे को देखने लगे।
टमाटर बोला—
“अब तो हम सब बराबर हो गए।”
आलू ने कहा—
“नहीं। असली फैसला रसोई में होगा।”
मार्था सब्जियां लेकर रसोई में पहुंची।
उसने टमाटर से चटनी बनाई।
टमाटर खुशी से बोला—
“देखा! मेरा इस्तेमाल सबसे पहले हुआ।”
फिर आलू की सब्जी बनी।
आलू ने गर्व से कहा—
“अब मेरी बारी।”
इसके बाद भिंडी मसाले के साथ पकाई गई।
भिंडी बोली—
“अब समझ आया कि स्वाद किसमें है?”
अंत में बैंगन का भरता बना।
बैंगन मुस्कुराया।
“अब तो सबको मानना पड़ेगा कि मैं सबसे खास हूं।”
लेकिन तभी रसोई में मार्था की छोटी पोती एलीना आई।
उसने पूछा—
“दादी, आज इतनी सारी सब्जियां?”
मार्था मुस्कुराई।
“हां बेटा। आज सबकी पसंद की चीज बनेगी।”
एलीना ने चारों पकवान चखे।
“दादी, सब बहुत अच्छे हैं!”
चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।
लेकिन उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी।
टमाटर बोला—
“एलीना ने पहले मेरी चटनी की तारीफ की थी।”
आलू बोला—
“लेकिन उसने मेरी सब्जी ज्यादा खाई।”
भिंडी ने कहा—
“उसने मेरी प्लेट पूरी खत्म की।”
बैंगन बोला—
“और भरता दोबारा मांगा।”
अब चारों फिर झगड़ने लगे।
मार्था रसोई साफ करने के बाद आराम करने बैठी थी। उसने उनकी बातें सुन लीं।
वह मुस्कुराई और बोली—
“तुम चारों लड़ क्यों रहे हो?”
सब्जियां चुप हो गईं।
टमाटर बोला—
“हममें से सबसे अच्छी कौन है, इसी का फैसला कर रहे हैं।”
मार्था हंस पड़ी।
“सबसे अच्छी?”
“हां।”
मार्था ने कहा—
“तुम चारों अलग हो। कोई सलाद में अच्छा लगता है, कोई सब्जी में, कोई भरते में और कोई अलग-अलग पकवानों में।”
आलू बोला—
“लेकिन सबसे जरूरी कौन है?”
मार्था ने कहा—
“अगर तुममें से एक भी न हो तो खाना थोड़ा कम स्वादिष्ट हो सकता है। लेकिन अगर तुम सब मिलकर रहो तो रसोई और भी अच्छी बनती है।”
चारों सब्जियां एक-दूसरे को देखने लगीं।
फिर भी बैंगन बोला—
“लेकिन क्या हम अपनी-अपनी खासियत नहीं बता सकते?”
मार्था ने कहा—
“बिल्कुल बता सकते हो। अपनी अच्छाई पर गर्व करना गलत नहीं है। लेकिन अपनी अच्छाई को दूसरों को छोटा दिखाने के लिए इस्तेमाल करना गलत है।”
यह बात चारों के दिल में उतर गई।
लेकिन उसी समय बगीचे से एक आवाज आई।
“अरे! मेरी बात कोई नहीं कर रहा!”
चारों ने पीछे देखा।
वह गाजर थी।
गाजर ने कहा—
“मैं भी तो हूं!”
भिंडी हंस पड़ी।
“तुम्हें तो हम भूल ही गए।”
गाजर नाराज होकर बोली—
“यही तो समस्या है। तुम चारों खुद को सबसे बड़ा समझते हो।”
चारों चुप हो गए।
गाजर ने कहा—
“इस बगीचे में हर सब्जी की अपनी जगह है। किसी की जरूरत कम नहीं।”
आलू ने सिर झुका लिया।
“तुम सही कह रही हो।”
टमाटर बोला—
“हम बिना वजह लड़ रहे थे।”
भिंडी ने कहा—
“हमें अपनी खूबियां पता हैं, लेकिन दूसरों की खूबियां देखना भूल गए।”
बैंगन मुस्कुराया।
“तो क्या आज से कोई नहीं लड़ेगा?”
आलू ने मजाक में कहा—
“अगर तुमने खुद को राजा कहना बंद कर दिया तो।”
बैंगन हंस पड़ा।
“ठीक है।”
चारों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली।
अब जब भी बगीचे में कोई सब्जी खुद को सबसे खास बताती, चारों उसे समझाते—
“सबसे खास बनने की जरूरत नहीं है। अपनी जगह अच्छी तरह निभाना ही काफी है।”
कुछ दिनों बाद मार्था ने बगीचे में एक बड़ा बोर्ड लगाया।
उस पर लिखा था—
“इस बगीचे में कोई सब्जी छोटी-बड़ी नहीं। हर किसी की अपनी खासियत है।”
चारों सब्जियां उस बोर्ड को देखकर मुस्कुराने लगीं।
टमाटर ने कहा—
“अब समझ आया, लाल होने का मतलब सिर्फ गुस्सा करना नहीं है।”
आलू बोला—
“और हर जगह काम आने का मतलब सबसे बड़ा होना नहीं।”
भिंडी हंसी—
“मेरी लंबाई ज्यादा है, इसका मतलब मैं दूसरों से बड़ी नहीं।”
बैंगन ने कहा—
“और मेरा भरता मशहूर है, इसका मतलब मैं सब्जियों का राजा नहीं।”
सभी हंस पड़े।
उस दिन के बाद बगीचे में चारों की दोस्ती पूरे शहर में मशहूर हो गई।
जब भी मार्था चारों को एक साथ रसोई में लाती, वह मुस्कुराकर कहती—
“लड़ाई में कोई जीतता नहीं। लेकिन जब सब मिलकर रहें, तो हर किसी की खूबसूरती और स्वाद और बढ़ जाता है।”
और चारों सब्जियों ने हमेशा के लिए यह सीख याद रखी—
दूसरों से बेहतर साबित होने से ज्यादा जरूरी है, अपनी खासियत को पहचानना और दूसरों की खासियत की कद्र करना।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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