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घर का बंटवारा

पढ़ने का समय : 5 मिनट

घर का बंटवारा

 

शहर से थोड़ा दूर एक छोटे से गाँव में रामदीन का बड़ा सा पुश्तैनी घर था। घर पुराना जरूर था, लेकिन उसमें परिवार की बहुत सारी यादें बसी थीं। रामदीन के दो बेटे थे—बड़ा बेटा मोहन और छोटा बेटा सोहन।

 

दोनों भाई बचपन में एक-दूसरे के बिना नहीं रहते थे। एक ही थाली में खाना, साथ स्कूल जाना और खेतों में पिता का हाथ बँटाना—उनका बचपन ऐसे ही बीता था।

 

लेकिन समय के साथ दोनों की सोच बदलने लगी।

 

मोहन की शादी हो चुकी थी और उसके दो बच्चे थे। वह खेती संभालता था। सोहन शहर में नौकरी करता था और महीने में एक-दो बार ही गाँव आता था।

 

रामदीन बूढ़े हो चुके थे। एक दिन उन्होंने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा, “बेटा, अब मेरी उम्र हो गई है। मैं चाहता हूँ कि मेरे रहते घर और खेत का बंटवारा कर दूँ, ताकि मेरे जाने के बाद तुम दोनों के बीच कोई झगड़ा न हो।”

 

मोहन तुरंत बोला, “बाबा, मुझे बंटवारा नहीं चाहिए। हम दोनों भाई मिलकर रहेंगे।”

 

सोहन भी मुस्कुराकर बोला, “बड़े भैया सही कह रहे हैं।”

 

रामदीन ने दोनों की तरफ देखा और कहा, “आज तुम ऐसा कह रहे हो, लेकिन जिंदगी कब बदल जाए, कोई नहीं जानता।”

 

कुछ महीने बाद रामदीन की तबीयत बहुत बिगड़ गई। जाते-जाते उन्होंने दोनों बेटों से सिर्फ इतना कहा, “घर चाहे बाँट लेना, लेकिन अपना रिश्ता मत बाँटना।”

 

उनकी मृत्यु के बाद घर में शोक का माहौल था। तेरहवीं के बाद एक दिन मोहन की पत्नी ने कहा, “अब पिताजी नहीं रहे। घर और खेत का हिसाब साफ कर लेना चाहिए।”

 

सोहन की पत्नी ने भी यही बात कही।

 

दोनों भाइयों ने जमीन के कागज निकाले। खेत बराबर बाँट दिए गए। दुकान भी आधी-आधी हो गई।

 

सब ठीक चल रहा था, लेकिन असली परेशानी पुश्तैनी घर को लेकर शुरू हुई।

 

मोहन बोला, “मुझे घर का आगे वाला हिस्सा चाहिए। बच्चों के लिए जगह ज्यादा है।”

 

सोहन ने कहा, “लेकिन आगे वाला हिस्सा सड़क से लगा है। उसकी कीमत भी ज्यादा है।”

 

“तो तुम पीछे वाला हिस्सा ले लो और खेत में तुम्हारा हिस्सा थोड़ा बढ़ा देंगे।”

 

“नहीं भैया, मुझे बराबर का हिस्सा चाहिए।”

 

बात धीरे-धीरे बहस में बदल गई।

 

मोहन गुस्से में बोला, “तुम शहर में रहते हो, तुम्हें इस घर से क्या लेना-देना?”

 

सोहन को यह बात चुभ गई।

 

“और आप गाँव में रहते हैं तो क्या पूरा घर आपका हो गया? पिताजी ने दोनों को बराबर दिया है।”

 

उस दिन पहली बार दोनों भाइयों के बीच आवाज ऊँची हुई।

 

अगले दिन राजमिस्त्री बुलाया गया और घर के बीच दीवार खड़ी करने की बात तय हुई।

 

जब मजदूर दीवार बनाने लगे तो दोनों भाई दूर खड़े होकर एक-दूसरे को देखते रहे। जिस आँगन में दोनों बचपन में खेलते थे, उसी आँगन के बीच अब ईंटें रखी जा रही थीं।

 

मोहन की बेटी रोते हुए बोली, “पापा, दादाजी के घर में दीवार क्यों बन रही है?”

 

मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

कुछ दिनों में दीवार खड़ी हो गई।

 

अब दोनों भाइयों के हिस्से अलग थे। रसोई अलग, आँगन अलग और दरवाजे भी अलग।

 

एक शाम मोहन की पत्नी का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से गिरते-गिरते बची। सोहन ने आवाज सुनते ही दौड़कर उसे संभाल लिया।

 

मोहन कुछ पल चुप रहा।

 

“धन्यवाद,” उसने धीरे से कहा।

 

सोहन ने बस इतना कहा, “भाभी हैं आप मेरी।”

 

लेकिन दोनों फिर अपने-अपने हिस्से में चले गए।

 

दिन बीतते गए। घर का बंटवारा तो हो गया था, मगर रिश्ते में आई दूरी बढ़ती गई।

 

एक रात तेज बारिश शुरू हुई। बारिश इतनी ज्यादा थी कि पुराने घर की छत से पानी टपकने लगा। अचानक मोहन के हिस्से की पिछली दीवार कमजोर होकर गिर गई।

 

अंदर बच्चे सो रहे थे।

 

सोहन ने आवाज सुनी तो तुरंत दीवार के पास पहुँचा। उसने बिना कुछ सोचे बच्चों को बाहर निकाला।

 

मोहन भी दौड़कर आया।

 

कुछ देर दोनों भाई अपने बच्चों को सीने से लगाए खड़े रहे।

 

मोहन की आँखों में आँसू थे।

 

वह बोला, “सोहन… अगर तुम समय पर नहीं आते तो पता नहीं क्या होता।”

 

सोहन ने कहा, “भैया, बच्चों की जान के सामने ये दीवार क्या मायने रखती है?”

 

मोहन चुप हो गया।

 

फिर उसकी नजर उसी दीवार पर गई, जिसे कुछ महीने पहले दोनों ने मिलकर खड़ा करवाया था।

 

उसने कहा, “हमने घर बाँट लिया, लेकिन शायद हम ये भूल गए कि घर ईंटों से नहीं, रिश्तों से बनता है।”

 

सोहन की आँखें भी भर आईं।

 

“भैया, मुझे भी उस दिन की बात का अफसोस है। मुझे बराबर हिस्सा चाहिए था, लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि बराबर हिस्सा जमीन का होता है, भाई का नहीं।”

 

मोहन ने आगे बढ़कर सोहन को गले लगा लिया।

 

दोनों काफी देर तक चुपचाप खड़े रहे।

 

अगली सुबह मजदूर बुलाए गए।

 

मोहन ने कहा, “यह दीवार तोड़ दो।”

 

सोहन ने उसकी तरफ देखा।

 

“पक्का?”

 

मोहन मुस्कुराया, “हाँ। पिताजी की आखिरी बात याद है ना? उन्होंने कहा था—घर चाहे बाँट लेना, रिश्ता मत बाँटना।”

 

दीवार टूटने लगी।

 

हर ईंट के गिरने के साथ जैसे दोनों भाइयों के बीच की नाराजगी भी गिरती जा रही थी।

 

कुछ दिनों बाद घर फिर पहले जैसा हो गया। अब रसोई अलग नहीं थी। शाम को दोनों परिवार एक साथ बैठकर खाना खाते थे। बच्चे फिर उसी आँगन में खेलने लगे।

 

एक दिन मोहन ने पुराने संदूक से पिता की तस्वीर निकाली और आँगन में रख दी।

 

सोहन ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, देर से सही, लेकिन आपकी बात समझ आ गई।”

 

मोहन ने कहा, “आपने हमें जमीन नहीं, एक परिवार दिया था। हम ही उसे बाँटने चले थे।”

 

दोनों भाइयों ने तय किया कि खेत और संपत्ति का हिसाब कागजों में चाहे अलग रहे, लेकिन घर में कभी दीवार नहीं होगी।

 

क्योंकि उस दिन उन्हें समझ आया था कि संपत्ति का बंटवारा आसान होता है, लेकिन रिश्तों का बंटवारा इंसान को अंदर से तोड़ देता है।

 

और पिता की सबसे बड़ी विरासत जमीन नहीं थी।

 

वह था—दो भाइयों का साथ।

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