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टैग: #बच्चों कि कहानी

  • कान्हा की छोटी कटोरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

    कान्हा की छोटी कटोरी और रहस्यमयी निशान

     

    सुबह की सुनहरी धूप नंद भवन के आँगन में फैल रही थी। कान्हा जल्दी-जल्दी उठकर बाहर आए। उनके मन में सबसे पहले वही छोटी मिट्टी की कटोरी थी, जिसे उन्होंने कुम्हार चाचा के यहाँ अपने हाथों से बनाया था।

     

    कल शाम तक वह कटोरी आँगन के एक कोने में सुरक्षित रखी थी। कान्हा ने सोचा था कि आज उसमें पानी भरकर छोटू और चंदू को पिलाएँगे।

     

    लेकिन आँगन में पहुँचते ही वे रुक गए।

     

    कटोरी वहाँ नहीं थी।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “अरे! मेरी कटोरी कहाँ गई?”

     

    गौरी भी उनके पीछे आ गई थी।

     

    उसने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल मैंने इसे यहीं रखा था।”

     

    उन्होंने जमीन पर ध्यान से देखा। थोड़ी दूर मिट्टी में छोटे-छोटे निशान बने थे।

     

    गौरी नीचे बैठ गई।

     

    “देखो!”

     

    कान्हा ने निशानों को देखा।

     

    “ये तो किसी चीज को घसीटकर ले जाने के निशान हैं।”

     

    एक दोस्त भी वहाँ पहुँच गया।

     

    उसने कहा—

     

    “क्या कोई कटोरी चुराकर ले गया?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “पहले ये पता लगाएँगे कि कटोरी यहाँ से कैसे गई। बिना जाने किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे निशानों के पीछे चल पड़े।

     

    निशान आँगन से निकलकर कच्ची गली में जा रहे थे।

     

    कुछ दूर जाकर निशान एक बड़े बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    वहाँ जमीन पर कटोरी का एक छोटा सा मिट्टी का टुकड़ा पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे उठाया।

     

    “ये मेरी कटोरी का हिस्सा है।”

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तो कटोरी टूट गई?”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “शायद नहीं। ये सिर्फ किनारे का छोटा टुकड़ा है।”

     

    तभी बरगद के ऊपर से कुछ पत्ते नीचे गिरे।

     

    सभी बच्चों ने ऊपर देखा।

     

    एक बंदर डाल पर बैठा था।

     

    उसके हाथ में कान्हा की कटोरी थी!

     

    वह कटोरी को कभी देखता, कभी अपनी नाक के पास ले जाता।

     

    एक दोस्त चिल्लाया—

     

    “अरे! यही ले गया!”

     

    बंदर घबराकर दूसरी डाल पर चला गया।

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “शायद इसे भी कटोरी पसंद आ गई।”

     

    बंदर ने कटोरी को ऊपर उठाया।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “भाई, वो मेरी है।”

     

    बंदर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने सोचा कि अगर वे शोर करेंगे तो बंदर कटोरी गिरा सकता है।

     

    उन्होंने सबको शांत रहने का इशारा किया।

     

    फिर पास में पड़े कुछ फल उठाए।

     

    उन्होंने एक फल जमीन पर रखा।

     

    बंदर ने नीचे देखा।

     

    कान्हा ने दूसरा फल थोड़ी दूर रखा।

     

    बंदर की नजर फल पर टिक गई।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हें फल चाहिए?”

     

    बंदर धीरे-धीरे नीचे की डाल पर आया।

     

    कान्हा ने फल थोड़ा आगे किया।

     

    बंदर ने कटोरी को पकड़े-पकड़े नीचे झाँका।

     

    कान्हा ने दूसरा फल रख दिया।

     

    बंदर ने आखिरकार कटोरी नीचे रख दी और फल उठा लिया।

     

    कान्हा ने तुरंत कटोरी उठा ली।

     

    उन्होंने देखा कि कटोरी थोड़ी खरोंच गई थी, लेकिन सही सलामत थी।

     

    “मिल गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    गौरी ने पूछा—

     

    “तुमने उससे कटोरी छीनी क्यों नहीं?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर मैं उसे डराता तो वह कटोरी गिरा सकता था। समझदारी से काम लेने पर दोनों को अपना सामान मिल गया।”

     

    तभी बंदर पेड़ से नीचे आया और कान्हा की ओर देखने लगा।

     

    कान्हा ने उसे एक और फल दे दिया।

     

    “ये तुम्हारे लिए। लेकिन मेरी कटोरी दोबारा मत ले जाना।”

     

    बंदर ने फल लिया और पेड़ पर वापस चला गया।

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    वापस लौटते समय कान्हा अपनी कटोरी को बहुत सावधानी से पकड़े हुए थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब इसे कहाँ रखोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जहाँ बंदर न पहुँच सके।”

     

    गौरी हँसकर बोली—

     

    “और चंदू?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    चंदू उनकी तरफ आ रहा था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “इसे भी दूर रखना पड़ेगा।”

     

    चंदू ने जैसे उनकी बात सुन ली और मुँह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    सभी हँस पड़े।

     

    घर पहुँचकर कान्हा ने कटोरी यशोदा मैया को दिखाई।

     

    “मैया, मिल गई!”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कहाँ थी?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “तुम्हारी कटोरी तो आज खूब घूम आई।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ। पहले मेरे पास, फिर बंदर के पास और अब फिर मेरे पास।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अब इसे ठीक जगह रखना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    उन्होंने कटोरी को एक ऊँची शेल्फ पर रख दिया।

     

    फिर छोटू और चंदू को पानी पिलाने के लिए दूसरी कटोरी ले आए।

     

    दोपहर में कान्हा अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।

     

    तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! बरगद के पेड़ के पास फिर वही बंदर आया है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वह किसी चीज से खेल रहा है।”

     

    सभी बच्चे फिर बरगद की ओर गए।

     

    बंदर इस बार अकेला नहीं था। उसके पास दो छोटे बंदर और थे।

     

    कान्हा ने देखा कि उनमें से एक छोटा बंदर कमजोर लग रहा था।

     

    वह बाकी दोनों से अलग बैठा था।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    उन्होंने पास जाने की कोशिश नहीं की।

     

    नंद बाबा को बुलाया गया।

     

    नंद बाबा ने दूर से देखा और कहा—

     

    “शायद इसका पैर थोड़ा परेशान है। हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “क्या हम कुछ कर सकते हैं?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “पास में फल रख सकते हैं और जगह शांत छोड़ सकते हैं।”

     

    कान्हा और दोस्तों ने कुछ फल पेड़ के नीचे रख दिए।

     

    फिर सभी पीछे हट गए।

     

    थोड़ी देर बाद छोटे बंदर ने धीरे-धीरे नीचे आकर फल उठाया।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अब ये ठीक हो जाएगा।”

     

    शाम होने तक बच्चे वहीं नहीं रुके। वे घर लौट आए।

     

    रात में कान्हा आँगन में बैठे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज फिर बंदर से दोस्ती कर ली?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “उसने मेरी कटोरी चुराई थी।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर हमने फल देकर कटोरी वापस ले ली।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “और बदले में उसे फल भी दे दिया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “तुम्हारा मन भी तुम्हारी कटोरी जैसा है।”

     

    कान्हा ने हैरानी से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “जितना बाँटो, उतना ही सुंदर लगता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो कल से मैं अपना मन भी सबके साथ बाँटूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

     

    रात गहरी हो गई।

     

    दूर कहीं गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं।

     

    टन… टन…

     

    कान्हा सोने ही वाले थे कि बाहर से किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “कान्हा! जल्दी बाहर आओ!”

     

    कान्हा उठ बैठे।

     

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “आसमान में बहुत सारे रंग दिखाई दे रहे हैं!”

     

    कान्हा तुरंत बाहर आए।

     

    सब बच्चे आँगन से आसमान की ओर देखने लगे।

     

    बादलों के पीछे चाँदनी और तारों की रोशनी मिलकर आसमान को अद्भुत बना रही थी।

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “कल हम सब सुबह-सुबह पहाड़ी पर चलेंगे। वहाँ से सूर्योदय देखेंगे।”

     

    दोस्तों ने खुशी से हामी भरी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उस पहाड़ी की राह में एक पुराना रास्ता था, जहाँ एक छोटी सी रहस्यमयी घंटी की आवाज सुनाई देती थी।

     

    कान्हा को अगले दिन उसी आवाज का पीछा करना था।

  • कान्हा और मिस्री की चोरी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  — कान्हा और मिश्री की मीठी चोरी

     

    वृंदावन में उस सुबह हवा में कुछ अलग ही मिठास थी। नंद भवन की रसोई से मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। यशोदा मैया सुबह से ही एक बड़े बर्तन में दूध उबाल रही थीं। पास में मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े रखे थे।

     

    कान्हा बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, लेकिन जैसे ही मीठी खुशबू उनके पास पहुँची, उन्होंने खेलना बंद कर दिया।

     

    कान्हा ने हवा में साँस लेते हुए कहा—

     

    “कुछ मीठा बन रहा है।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मेरी नाक बता रही है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “चलो पता लगाते हैं।”

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे नंद भवन की रसोई के पास पहुँच गए।

     

    खिड़की से झाँककर कान्हा ने देखा कि यशोदा मैया एक बड़ी थाली में मिश्री के टुकड़े रख रही थीं।

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “मिश्री!”

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “बहुत सारी है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम्हारा कुछ नहीं मतलब हमेशा कुछ होता है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उसी समय यशोदा मैया ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    खिड़की के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन उन्हें पता था कि कोई न कोई जरूर वहाँ था।

     

    उन्होंने मिश्री की थाली उठाई और उसे ऊँची जगह पर रख दिया।

     

    फिर मन ही मन बोलीं—

     

    “आज देखते हैं कान्हा इसे कैसे लेते हैं।”

     

    यशोदा बाहर चली गईं।

     

    कुछ पल बाद कान्हा धीरे-धीरे अंदर आए।

     

    उन्होंने ऊपर देखा।

     

    मिश्री बहुत ऊँचाई पर रखी थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब कैसे लोगे?”

     

    कान्हा ने पास पड़ी लकड़ी उठाई।

     

    “इससे।”

     

    उन्होंने लकड़ी ऊपर की तरफ बढ़ाई।

     

    लेकिन थाली दूर थी।

     

    उन्होंने फिर कोशिश की।

     

    थाली हिली जरूर, लेकिन मिश्री नीचे नहीं आई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ये काम नहीं करेगा।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो छोड़ देते हैं।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    उन्होंने आसपास देखा।

     

    वहाँ एक छोटी चौकी पड़ी थी।

     

    कान्हा ने उसे खींचकर दीवार के पास रखा।

     

    फिर उसके ऊपर एक और लकड़ी का पटरा रख दिया।

     

    दोस्त घबरा गया।

     

    “कान्हा, गिर जाओगे!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “तुम पकड़कर रखना।”

     

    एक बच्चा चौकी पकड़कर खड़ा हो गया।

     

    कान्हा धीरे-धीरे ऊपर चढ़े।

     

    अब उनका हाथ थाली तक पहुँचने वाला था।

     

    उन्होंने मिश्री का एक टुकड़ा उठाया।

     

    “मिल गई!”

     

    नीचे खड़े बच्चों ने खुशी से हाथ उठाए।

     

    लेकिन तभी बाहर से यशोदा की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    उनके हाथ में मिश्री थी।

     

    दोस्तों ने चौकी छोड़ दी और भागने लगे।

     

    कान्हा जल्दी से नीचे उतरने लगे।

     

    लेकिन उनका पैर चौकी से फिसल गया।

     

    सौभाग्य से वह नीचे रखी नरम चटाई पर गिर गए।

     

    यशोदा अंदर आईं।

     

    उन्होंने देखा कि कान्हा जमीन पर बैठे हैं और उनके हाथ में मिश्री है।

     

    यशोदा ने कमर पर हाथ रखा।

     

    “तो यही हो रहा था?”

     

    कान्हा ने मिश्री पीछे छिपा ली।

     

    “क्या?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाथ पीछे क्यों कर रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “दिखाओ।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    मिश्री का टुकड़ा देखकर यशोदा मुस्कुरा दीं।

     

    “तुम्हें इतनी मिश्री चाहिए थी?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे नहीं।”

     

    “तो किसे?”

     

    कान्हा ने पीछे खड़े दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “सबको।”

     

    दोस्तों ने सिर हिलाया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “अगर तुम्हें चाहिए थी तो मुझसे माँग लेते।”

     

    कान्हा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “आप मना कर देतीं।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आप कहतीं कि ज्यादा मीठा मत खाओ।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तो तुमने चोरी करना ठीक समझा?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “गलती हो गई।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया।

     

    “देखो कान्हा, बिना पूछे किसी की चीज लेना अच्छी बात नहीं है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “अगर मैं माँगता तो देतीं?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ, लेकिन सबको बराबर देती।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो अब दे दो।”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “पहले वादा करो कि आगे से बिना पूछे नहीं लोगे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वादा।”

     

    यशोदा ने मिश्री की थाली नीचे रख दी।

     

    सभी बच्चों की आँखें चमक उठीं।

     

    उन्होंने एक-एक करके सबको मिश्री दी।

     

    कान्हा को थोड़ा ज्यादा देने लगीं तो कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। सबको जितनी दी है, मुझे भी उतनी ही दो।”

     

    यशोदा ने प्यार से उनकी तरफ देखा।

     

    “आज तो तुमने बहुत बड़ी बात कह दी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    सब बच्चे मिश्री खाने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, चोरी करने से अच्छा माँग लेना था।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब समझ आ गया।”

     

    दूसरा बच्चा बोला—

     

    “लेकिन चोरी में मजा आता है।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मिश्री मिलने की खुशी ज्यादा अच्छी है, चोरी की नहीं।”

     

    यशोदा यह सुनकर मुस्कुराईं।

     

    दोपहर को नंद बाबा घर लौटे।

     

    उन्होंने देखा कि आँगन में बच्चे बैठे मिश्री खा रहे हैं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज किस खुशी में मिश्री बाँटी जा रही है?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज फिर एक नया कारनामा किया।”

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “क्या किया?”

     

    कान्हा ने खुद ही सारी बात बता दी।

     

    “मैंने मिश्री लेने की कोशिश की।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “और पकड़े गए?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया ने सबको बराबर मिश्री दी।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो आज तुम्हारी चोरी भी काम की रही।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आप भी उसे बढ़ावा मत दीजिए।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तो बहुत मजा आया।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हाँ।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “कल क्या मिलेगा?”

     

    कान्हा ने सोचा।

     

    “पता नहीं।”

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे यशोदा! तुम्हारे कान्हा ने मेरी मटकी में फूल डाल दिए!”

     

    कान्हा ने आवाज सुनी।

     

    उन्होंने तुरंत दोस्तों की तरफ देखा।

     

    दोस्तों ने भी उन्हें देखा।

     

    सब चुप हो गए।

     

    कान्हा धीरे से बोले—

     

    “मैंने तो कुछ नहीं किया।”

     

    दोस्त हँसने लगे।

     

    “अब तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ कौन मानेगा?”

     

    कान्हा भी हँस पड़े और भागने लगे।

     

    गोपी पीछे से आवाज लगाती रही—

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

     

    कान्हा दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ के पीछे छिप गए।

     

    उनके दोस्त भी वहीं आ गए।

     

    एक ने पूछा—

     

    “तुमने सच में मटकी में फूल डाले थे?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि वो गोपी हमेशा अपनी मटकी को बहुत सुंदर बनाती हैं। मैंने सोचा मटकी के अंदर भी फूल होने चाहिए।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

     

    उन्होंने कान्हा को पकड़ लिया।

     

    “तो ये थी आज की दूसरी शरारत!”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “मैया, मैंने फूल ही तो डाले थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे!”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    फिर बोले—

     

    “अब नहीं करूँगा।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा, अब उस गोपी से माफी माँगो।”

     

    कान्हा उनके साथ गए।

     

    गोपी अभी भी नाराज थी।

     

    कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    गोपी ने उन्हें देखा।

     

    “अच्छा, अब नहीं करोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं।”

     

    गोपी मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या मैं बाहर से फूल लगाऊँ?”

     

    गोपी हँस पड़ी।

     

    “हाँ, वो कर सकते हो।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “ठीक है!”

     

    उस दिन कान्हा ने पहली बार समझा कि अपनी खुशी के लिए किसी की चीज से छेड़छाड़ करने से अच्छा है कि उसकी खुशी में शामिल हुआ जाए।

     

    रात को यशोदा ने कान्हा को सुलाते हुए पूछा—

     

    “आज क्या सीखा?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

     

    “और?”

     

    “अगर किसी को खुश करना हो तो उसकी अनुमति लेकर करना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर उनके माथे को चूमा।

     

    “मेरा कान्हा सच में समझदार हो रहा है।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कीं।

     

    कुछ पल बाद धीरे से बोले—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल फिर मिश्री मिलेगी?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “हाँ, लेकिन चोरी नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पक्का।”

     

    बाहर वृंदावन में चाँदनी फैल चुकी थी।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा के सामने मिश्री से भी बड़ी चुनौती आने वाली थी।

     

    नंद बाबा ने अपनी गायों के लिए एक नया घंटी वाला पट्टा बनवाया था।

     

    और कान्हा को देखते ही उसमें कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर उनके मन में फिर एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

     

    •  
  • कान्हा और नन्हीं चिड़िया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    अध्याय  कान्हा और नन्ही चिड़िया

     

    सुबह होते ही कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँच गए। कल उन्होंने तय किया था कि आज वहाँ खूब खेलेंगे, लेकिन जैसे ही वे नदी के पास पहुँचे, कान्हा की नजर घास के बीच किसी छोटी सी चीज पर पड़ी।

     

    उन्होंने कदम रोक दिए।

     

    “रुको!”

     

    सभी बच्चे रुक गए।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस जगह पहुँचे। वहाँ एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी। वह उड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार अपने पंख समेटकर नीचे बैठ जाती।

     

    कान्हा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “क्या हुआ तुम्हें?”

     

    चिड़िया ने गर्दन हिलाई।

     

    कान्हा ने उसे हाथ लगाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस ध्यान से देखा।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “शायद इसे चोट लगी है।”

     

    कान्हा ने धीरे से कहा—

     

    “हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

     

    दूसरे दोस्त ने पूछा—

     

    “अब क्या करें?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    “इसे पानी चाहिए होगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी कटोरी में थोड़ा पानी भरा और चिड़िया के पास रख दिया।

     

    चिड़िया पहले तो पीछे हट गई, लेकिन कुछ देर बाद धीरे-धीरे पानी पीने लगी।

     

    कान्हा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    “देखा? इसे प्यास लगी थी।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे घर ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “अगर इसकी माँ इसे ढूँढ़ रही होगी तो?”

     

    सभी बच्चे चुप हो गए।

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    “पहले इसकी माँ को ढूँढ़ेंगे।”

     

    वे पेड़ों की तरफ देखने लगे।

     

    कान्हा ने चिड़िया की आवाज की नकल की।

     

    “चीं… चीं…”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तुम चिड़िया की आवाज निकाल रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अगर इससे इसकी माँ आ गई तो?”

     

    उन्होंने फिर आवाज निकाली।

     

    कुछ देर बाद ऊपर पेड़ से एक चिड़िया की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “शायद इसकी माँ है।”

     

    उन्होंने नीचे बैठी चिड़िया को देखा।

     

    वह भी ऊपर की ओर देखने लगी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, यही है।”

     

    लेकिन समस्या यह थी कि छोटी चिड़िया उड़ नहीं पा रही थी।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे पेड़ के नीचे ले चलते हैं।”

     

    सब बच्चे सावधानी से उसके पास बैठ गए।

     

    कान्हा ने पत्तों की मदद से उसके लिए छोटी सी जगह बनाई।

     

    फिर बोले—

     

    “अब इसकी माँ नीचे आएगी।”

     

    कुछ देर बाद ऊपर वाली चिड़िया नीचे की डाल पर आकर बैठ गई।

     

    वह लगातार आवाज कर रही थी।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “देखो, इसकी माँ इसे बुला रही है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन ये ऊपर कैसे जाएगी?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जब इसके पंख ठीक होंगे, तब उड़ जाएगी। अभी इसे आराम चाहिए।”

     

    कान्हा ने पास की झाड़ियों से कुछ नरम पत्ते लाकर उसके आसपास रख दिए।

     

    फिर वह वहीं बैठ गए।

     

    दोस्तों ने पूछा—

     

    “तुम यहीं बैठे रहोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इसे डर लग रहा है।”

     

    कुछ देर बाद चिड़िया शांत हो गई।

     

    कान्हा ने धीरे से बांसुरी निकाली।

     

    उन्होंने बहुत धीमी धुन बजानी शुरू की।

     

    आसपास का वातावरण शांत हो गया।

     

    ऊपर बैठी चिड़िया भी कुछ देर चुप रही।

     

    एक दोस्त ने धीरे से कहा—

     

    “लगता है इसे तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “शायद।”

     

    कुछ समय बाद छोटी चिड़िया ने अपने पंख हिलाए।

     

    कान्हा तुरंत खुश हो गए।

     

    “देखो! ये कोशिश कर रही है।”

     

    उसने फिर पंख फैलाए, लेकिन इस बार भी उड़ नहीं पाई।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कोई बात नहीं। जल्दी नहीं करनी चाहिए।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हर किसी को ठीक होने में अपना समय लगता है।”

     

    बच्चे चुप हो गए।

     

    दोपहर होने लगी।

     

    यशोदा मैया को चिंता होने लगी कि कान्हा अभी तक घर क्यों नहीं आया।

     

    उन्होंने नंद बाबा से कहा—

     

    “आज फिर बहुत देर हो गई।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम्हारा कान्हा कहीं न कहीं कोई नई कहानी बना रहा होगा।”

     

    उधर कान्हा अभी भी चिड़िया के पास बैठे थे।

     

    तभी एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, अब घर चलें?”

     

    कान्हा ने चिड़िया की तरफ देखा।

     

    “थोड़ी देर और।”

     

    अचानक छोटी चिड़िया ने अपने पंख फैलाए।

     

    वह पहले एक छोटी सी छलांग लगाकर पास की डाल तक पहुँची।

     

    कान्हा खुशी से खड़े हो गए।

     

    “उड़ गई!”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    चिड़िया थोड़ी देर डाल पर बैठी रही।

     

    फिर उसने अपने पंख फैलाए और ऊपर अपनी माँ की तरफ उड़ गई।

     

    ऊपर बैठी बड़ी चिड़िया भी उसके साथ उड़ गई।

     

    कान्हा उन्हें देखते रहे।

     

    उनके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुमने इसे बचा लिया।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। इसकी माँ ने इसे बचाया। हमने बस थोड़ा इंतजार किया।”

     

    सभी बच्चे वापस घर की तरफ चल पड़े।

     

    रास्ते में कान्हा अचानक रुक गए।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम इसके लिए कुछ लेकर नहीं गए।”

     

    “क्या?”

     

    “इसके लिए दाना।”

     

    एक दोस्त हँस पड़ा।

     

    “अब तो वो उड़ गई।”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    घर पहुँचते ही यशोदा मैया ने कान्हा को देखते ही पूछा—

     

    “इतनी देर कहाँ थे?”

     

    कान्हा उनके पास बैठ गए।

     

    “मैया, आज हमें एक छोटी चिड़िया मिली थी।”

     

    यशोदा का चेहरा नरम हो गया।

     

    “क्या हुआ था उसे?”

     

    कान्हा ने पूरी बात बताई।

     

    यशोदा ध्यान से सुनती रहीं।

     

    जब कान्हा ने बताया कि वह चिड़िया अपनी माँ के पास उड़ गई, तो यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरे कान्हा ने आज अच्छा काम किया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, वो बहुत छोटी थी। उसे अकेला देखकर अच्छा नहीं लगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें हर छोटे जीव की चिंता होती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वो बोल नहीं सकते।”

     

    यशोदा कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर उन्होंने कहा—

     

    “जो बोल नहीं सकता, उसके दर्द को समझना बहुत बड़ी बात है।”

     

    कान्हा माँ की तरफ देखने लगे।

     

    “मैया, अगर किसी को हमारी जरूरत हो और हम मदद न करें तो?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जहाँ तक हो सके, मदद करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं हमेशा करूँगा।”

     

    शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ फिर बाहर बैठे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “आज तुमने कोई शरारत नहीं की।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम पूरा दिन चिड़िया के साथ बैठे रहे।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “हर दिन शरारत करना जरूरी है क्या?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम्हारे लिए तो है।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा ने अचानक मिट्टी से एक छोटी सी चिड़िया बनाई।

     

    उन्होंने उसे अपने सामने रखा।

     

    “देखो, ये हमारी दोस्त है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “ये तो मिट्टी की है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “लेकिन याद तो असली वाली की दिलाएगी।”

     

    शाम की हवा चल रही थी।

     

    दूर आसमान में कई पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।

     

    कान्हा उन्हें देखते हुए मुस्कुराते रहे।

     

    तभी ऊपर से एक छोटी चिड़िया उनके पास से उड़ती हुई गुजरी।

     

    कान्हा ने उसे पहचान लिया।

     

    “देखो!”

     

    दोस्तों ने ऊपर देखा।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    चिड़िया एक पल के लिए पास की डाल पर बैठी और फिर उड़ गई।

     

    कान्हा ने हाथ हिलाकर कहा—

     

    “फिर मिलना!”

     

    उस दिन कान्हा ने अपने दोस्तों को एक छोटी सी बात समझाई—

     

    “किसी की मदद करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं। कभी-कभी थोड़ा पानी, थोड़ा इंतजार और थोड़ा प्यार भी किसी के लिए बहुत होता है।”

     

    सभी बच्चे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे।

     

    लेकिन अगले ही पल कान्हा ने मिट्टी की चिड़िया उठाई और दोस्त के सिर पर रख दी।

     

    “अब तुम चिड़िया बनो!”

     

    दोस्त चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    कान्हा हँसते हुए भागने लगे।

     

    “पकड़ो मुझे!”

     

    सारे बच्चे उनके पीछे दौड़ पड़े।

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा और मुस्कुराईं।

     

    “मेरा कान्हा फिर अपनी शरारत पर लौट आया।”

     

    लेकिन उस दिन की शरारत में भी एक मिठास थी।

     

    क्योंकि कान्हा ने अपने दोस्तों को सिखाया था कि खेल और हँसी के साथ-साथ किसी छोटे और कमजोर जीव के लिए दया रखना भी जरूरी है।

     

    और वृंदावन की उस शाम को कान्हा की बांसुरी की आवाज के साथ पेड़ों पर बैठे पक्षी भी जैसे खुशी से चहक रहे थे।

     

    लेकिन अगले दिन कान्हा को एक नई परेशानी मिलने वाली थी—यशोदा मैया ने घर में बहुत सारी मिश्री बनाई थी, और कान्हा के दोस्तों को इसकी खबर लग चुकी थी।

     

    अब शुरू होने वाली थी मिश्री की सबसे मीठी चोरी!

     

  • कान्हा और जामुन के पेड़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और जामुन के पेड़ की शरारत

     

    वृंदावन की सुबह आज कुछ अलग ही थी। रात में हल्की बारिश हुई थी, इसलिए पेड़ों की पत्तियों पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं। गलियों में मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी और गायें अपने बछड़ों के साथ धीरे-धीरे चरने निकल रही थीं।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ नंद भवन के बाहर बैठे थे। उनके हाथ में छोटी सी लकड़ी थी, जिससे वह मिट्टी पर तरह-तरह की आकृतियाँ बना रहे थे।

     

    तभी एक दोस्त दौड़ता हुआ आया।

     

    “कान्हा! मैंने कुछ देखा है!”

     

    कान्हा ने लकड़ी छोड़ दी।

     

    “क्या?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “गाँव के बाहर वाले बड़े जामुन के पेड़ पर बहुत सारे जामुन लगे हैं।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। इतने सारे कि पूरा पेड़ काला दिखाई दे रहा है।”

     

    दूसरा दोस्त बोला—

     

    “लेकिन पेड़ बहुत ऊँचा है। हम जामुन तोड़ नहीं पाएँगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “पेड़ कितना भी ऊँचा हो, जामुन नीचे तो आने ही पड़ेंगे।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    कान्हा ने आसपास देखा।

     

    फिर बोले—

     

    “चलो, पेड़ के पास।”

     

    सभी बच्चे उनके पीछे चल पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे उस बड़े जामुन के पेड़ के पास पहुँच गए।

     

    सचमुच पेड़ पर इतने जामुन लगे थे कि उसकी डालियाँ झुकी हुई थीं।

     

    कान्हा ने ऊपर देखा।

     

    “वाह!”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “अब बताओ, इन्हें तोड़ेंगे कैसे?”

     

    कान्हा ने पेड़ के तने को देखा।

     

    “पहले मैं चढ़ूँगा।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “तुम गिर गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं गिरूँगा नहीं।”

     

    वह पेड़ पर चढ़ने लगे।

     

    पहली डाल तक पहुँचे।

     

    फिर दूसरी।

     

    फिर तीसरी।

     

    दोस्त नीचे खड़े होकर उन्हें देखते रहे।

     

    कान्हा एक मजबूत डाल पर बैठ गए।

     

    उन्होंने जामुन तोड़े और नीचे फेंकने लगे।

     

    “पकड़ो!”

     

    नीचे खड़े बच्चे खुशी से जामुन पकड़ने लगे।

     

    किसी ने अपनी धोती में जामुन बाँध लिए।

     

    किसी ने पत्तों से छोटी टोकरी बना ली।

     

    कान्हा ऊपर से जामुन तोड़ते रहे।

     

    लेकिन तभी एक शरारती दोस्त ने नीचे से कहा—

     

    “कान्हा! सबसे बड़े जामुन तो अपने लिए रख लेना।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं! सब बराबर मिलेंगे।”

     

    उन्होंने एक बड़ा जामुन तोड़ा और नीचे फेंक दिया।

     

    एक बच्चा उसे पकड़ने के लिए दौड़ा।

     

    लेकिन जामुन उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया।

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    वह बच्चा बोला—

     

    “मेरा जामुन!”

     

    कान्हा ऊपर से बोले—

     

    “कोई बात नहीं। दूसरा दूँगा।”

     

    उन्होंने उसके लिए एक और जामुन तोड़कर नीचे फेंका।

     

    इस बार बच्चे ने दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “मिल गया!”

     

    सब हँसने लगे।

     

    तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

     

    “अरे! तुम लोग वहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    बच्चे अचानक शांत हो गए।

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    एक गोपी हाथ में टोकरी लिए उनकी तरफ आ रही थी।

     

    वह बोली—

     

    “ये जामुन का पेड़ किसने तोड़ना शुरू कर दिया?”

     

    कान्हा नीचे उतरते हुए बोले—

     

    “हम तो बस कुछ जामुन ले रहे थे।”

     

    गोपी ने कहा—

     

    “कुछ? तुम्हारे पास तो पूरी टोकरी है!”

     

    कान्हा ने अपनी टोकरी देखी।

     

    वह सच में भर चुकी थी।

     

    उन्होंने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “हम अकेले नहीं खाएँगे।”

     

    गोपी ने पूछा—

     

    “तो किसके लिए?”

     

    कान्हा ने आसपास के बच्चों की तरफ इशारा किया।

     

    “सबके लिए।”

     

    गोपी का गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उसने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पेड़ की डालियाँ मत तोड़ना।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं तोड़ेंगे।”

     

    तभी ऊपर बैठे एक बच्चे का पैर फिसला।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    बच्चा डर गया था।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “डरो मत। धीरे-धीरे नीचे आओ।”

     

    उन्होंने उसे सुरक्षित नीचे उतारा।

     

    गोपी ने यह देखा तो बोली—

     

    “कान्हा, शरारत करते हो लेकिन अपने दोस्तों का ध्यान भी रखते हो।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “दोस्त हैं तो ध्यान रखना पड़ेगा।”

     

    सभी बच्चे जामुन लेकर बैठ गए।

     

    कान्हा ने एक जामुन उठाया और खाने लगे।

     

    उनके होंठ और जीभ बैंगनी हो गए।

     

    एक दोस्त उन्हें देखकर हँस पड़ा।

     

    “कान्हा! तुम्हारी जीभ देखो!”

     

    कान्हा ने अपनी जीभ बाहर निकाली।

     

    “तुम्हारी भी तो ऐसी ही है।”

     

    सभी बच्चे अपनी-अपनी जीभ देखने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।

     

    कुछ देर बाद वे जामुन लेकर घर की ओर लौटे।

     

    कान्हा ने सोचा कि आज यशोदा मैया को भी जामुन खिलाएँगे।

     

    घर पहुँचते ही उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “मैया!”

     

    यशोदा रसोई से बाहर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा का चेहरा देखा और हैरान रह गईं।

     

    “ये क्या हाल बना रखा है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “जामुन खाए हैं।”

     

    यशोदा ने उनके गाल देखे।

     

    “तुम्हारा पूरा मुँह बैंगनी हो गया।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “मैया, आपको भी दूँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “पहले ये बताओ कि जामुन कहाँ से लाए?”

     

    कान्हा ने टोकरी आगे कर दी।

     

    “पेड़ से।”

     

    “किसकी अनुमति से?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा ने समझ लिया।

     

    “फिर से बिना पूछे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, हम बहुत सारे नहीं तोड़े।”

     

    यशोदा ने टोकरी देखी।

     

    “ये तुम्हारे हिसाब से थोड़े हैं?”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    “हमने सबमें बाँट दिए।”

     

    तभी पीछे से नंद बाबा आ गए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या बाँटा?”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “आपका बेटा आज जामुन का पूरा पेड़ बाँट आया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा से पूछा—

     

    “किसी को नुकसान तो नहीं हुआ?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बाबा। हमने डालियाँ नहीं तोड़ीं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “तो ठीक है। लेकिन अगली बार पेड़ से फल लेने से पहले उसके मालिक से पूछ लेना।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “ठीक है बाबा।”

     

    फिर उन्होंने टोकरी से सबसे बड़ा जामुन उठाया और नंद बाबा को दे दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    नंद बाबा ने जामुन लिया।

     

    “मेरे लिए?”

     

    “हाँ।”

     

    फिर कान्हा ने दूसरा जामुन यशोदा को दिया।

     

    “ये आपके लिए।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “मेरे लिए इतना बड़ा?”

     

    “आपको सबसे बड़ा मिलना चाहिए।”

     

    यशोदा ने जामुन खाया और बोलीं—

     

    “बहुत मीठा है।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना!”

     

    उस शाम कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में बैठे थे।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कान्हा, कल क्या करेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कल?”

     

    “हाँ।”

     

    कान्हा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    कुछ देर सोचकर बोले—

     

    “कल हम नदी किनारे खेलेंगे।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “वहाँ क्या करेंगे?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “अभी नहीं बताऊँगा।”

     

    सभी बच्चे बोले—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर तुम सब आज ही सोचना शुरू कर दोगे।”

     

    सब हँस पड़े।

     

    यशोदा दूर से बच्चों की बातें सुन रही थीं।

     

    उन्होंने कान्हा को आवाज लगाई—

     

    “अब घर आ जाओ।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आ रहा हूँ मैया।”

     

    वह दोस्तों के साथ अंदर जाने लगे।

     

    लेकिन जाते-जाते उन्होंने पीछे मुड़कर उस जामुन के पेड़ की तरफ देखा।

     

    हवा से उसकी डालियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    उन्हें लगा जैसे पेड़ भी उनसे कह रहा हो—

     

    “कल फिर आना।”

     

    अगले दिन कान्हा सचमुच यमुना किनारे गए।

     

    लेकिन वहाँ उन्हें एक ऐसी चीज दिखाई देने वाली थी, जिसे देखकर उनकी सारी शरारतें कुछ देर के लिए भूल जानी थीं।

     

    यमुना किनारे एक छोटा घायल पक्षी पड़ा था।

     

    कान्हा ने उसे देखा तो तुरंत अपने दोस्तों से कहा—

     

    “इसे घर ले चलो।”

     

    और यहीं से शुरू हुई कान्हा की एक ऐसी बाल लीला, जिसमें पहली बार उनके दोस्तों ने देखा कि उनका नटखट कान्हा किसी छोटे से जीव का दर्द देखकर कितना परेशान हो जाता है।

     

  • कान्हा नंद बाबा की पगड़ी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     कान्हा और नंद बाबा की पगड़ी

     

    सुबह का समय था। नंद भवन के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी। गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और यशोदा मैया रसोई में नाश्ता बना रही थीं।

     

    नंद बाबा आज गाँव के कुछ लोगों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने अपनी सबसे सुंदर पीली पगड़ी निकाली और उसे बड़े ध्यान से सिर पर बाँधा।

     

    कान्हा दूर खड़े उन्हें देख रहे थे।

     

    उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा—

     

    “मेरे बाबा आज इतने सुंदर क्यों लग रहे हैं?”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “आज उन्हें गाँव की सभा में जाना है।”

     

    कान्हा कुछ देर पगड़ी को देखते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “पगड़ी बहुत सुंदर है।”

     

    दोस्त ने तुरंत कहा—

     

    “कान्हा, इसे हाथ मत लगाना।”

     

    कान्हा ने मासूमियत से पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुमने कुछ किया तो बाबा नाराज होंगे।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं कुछ नहीं करूँगा।”

     

    दोस्त ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन वह कान्हा को नहीं जानता था।

     

    कान्हा ने मन ही मन एक योजना बना ली थी।

     

    नंद बाबा तैयार होकर बाहर जाने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें देखा और कहा—

     

    “आज तो आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा लगना जरूरी है। आज गाँव के बड़े लोग भी आएँगे।”

     

    कान्हा तुरंत उनके पास पहुँचे।

     

    “बाबा!”

     

    “क्या हुआ बेटा?”

     

    “आपकी पगड़ी मुझे भी पहननी है।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “अभी नहीं। ये तुम्हारे लिए बहुत बड़ी है।”

     

    कान्हा ने पगड़ी को देखा।

     

    “मैं छोटी कर लूँगा।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “जब तुम बड़े हो जाओगे, तब अपनी पगड़ी पहनना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा बाहर चले गए।

     

    कान्हा कुछ देर उन्हें जाते देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

     

    “चलो।”

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “पगड़ी पहनने।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    कान्हा दौड़ते हुए बाहर गए।

     

    नंद बाबा कुछ दूर ही गए थे।

     

    कान्हा उनके पीछे भागे।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा हाँफते हुए उनके पास पहुँचे।

     

    “आपकी पगड़ी ठीक नहीं है।”

     

    नंद बाबा ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “क्या खराब है?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “इसमें मोरपंख नहीं है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    “पगड़ी में मोरपंख क्यों लगाऊँ?”

     

    कान्हा ने अपने सिर की तरफ इशारा किया।

     

    “मेरे सिर पर तो है।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “वो तुम्हारे लिए है।”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो एक मेरे बाबा के लिए भी होना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम्हारा मन बहुत बड़ा है।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपना मोरपंख निकाल लिया।

     

    “ये आप लगा लो।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “नहीं बेटा, ये तुम्हें ही अच्छा लगता है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे अच्छा लगता है कि मेरे बाबा भी सुंदर लगें।”

     

    नंद बाबा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने मोरपंख लिया और अपनी पगड़ी में लगा लिया।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “अब आप बिल्कुल मेरे जैसे लग रहे हो!”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    लेकिन तभी गाँव के दो आदमी वहाँ आ गए।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी में मोरपंख देखा।

     

    एक ने मजाक में कहा—

     

    “अरे नंद जी, आज तो आप कान्हा जैसे बन गए।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लगता है कान्हा ने आपको भी अपनी टोली में शामिल कर लिया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    कान्हा गर्व से बोले—

     

    “ये मेरे बाबा हैं।”

     

    सब मुस्कुराने लगे।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गाँव की सभा में चले गए।

     

    कान्हा अपने दोस्तों के साथ वापस घर आ गए।

     

    लेकिन उनकी नजर अब भी पगड़ी पर थी।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तुमने बाबा की पगड़ी में मोरपंख तो लगा दिया, लेकिन अब आगे क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “फिर वही कुछ नहीं!”

     

    कान्हा भी हँसने लगे।

     

    उधर यशोदा मैया ने कान्हा को देखा।

     

    “तुम अपने बाबा के पीछे क्यों गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    “सच बताओ।”

     

    “मैंने बाबा की पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “अच्छा किया।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “आप नाराज नहीं हुईं?”

     

    “नहीं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा बहुत सुंदर लग रहे थे।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हें अपने बाबा बहुत प्यारे हैं ना?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “बहुत।”

     

    दोपहर तक नंद बाबा वापस लौट आए।

     

    कान्हा दौड़कर उनके पास गए।

     

    “बाबा!”

     

    नंद बाबा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “आपकी पगड़ी में मोरपंख अच्छा लगा?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बहुत अच्छा।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “सबने देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्या सबने कहा कि आप सुंदर लग रहे हो?”

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “सबने कहा कि मैं आज कान्हा जैसा लग रहा हूँ।”

     

    कान्हा खुशी से हँसने लगे।

     

    “तो फिर रोज लगाना।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “रोज नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि फिर लोग कहेंगे कि नंद बाबा ने कान्हा की नकल करनी शुरू कर दी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तो कहने दो।”

     

    दोनों हँसने लगे।

     

    शाम को नंद बाबा गायों को देखने जा रहे थे।

     

    कान्हा उनके साथ चल दिए।

     

    रास्ते में नंद बाबा ने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम मुझे मोरपंख क्यों देना चाहते थे?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि मुझे अच्छा लगता है जब मेरे बाबा खुश होते हैं।”

     

    नंद बाबा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और मुझे खुशी तब होती है जब तुम मेरे साथ होते हो।”

     

    कान्हा ने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

     

    दोनों धीरे-धीरे गायों की तरफ बढ़ने लगे।

     

    तभी एक गाय कान्हा के पास आ गई।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “बाबा, ये आज उदास लग रही है।”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसका बछड़ा दूसरी तरफ चला गया है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “तो उसे बुला लेते हैं।”

     

    उन्होंने आवाज लगाई।

     

    कुछ ही देर में बछड़ा दौड़ता हुआ आया।

     

    गाय उसे देखते ही शांत हो गई।

     

    नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुम्हें सच में सबकी चिंता रहती है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “सब हमारे अपने हैं।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “ये बात हमेशा याद रखना।”

     

    सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

     

    कान्हा और नंद बाबा वापस घर लौट रहे थे।

     

    दरवाजे पर यशोदा उनका इंतजार कर रही थीं।

     

    उन्होंने नंद बाबा की पगड़ी देखी और मुस्कुराईं।

     

    “मोरपंख अभी तक लगा हुआ है?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “इसे निकालने का मन ही नहीं हुआ।”

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, अच्छा लगता है।”

     

    यशोदा ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “मेरे दोनों नंदलाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

     

    नंद बाबा हँसे।

     

    “एक ही काफी है।”

     

    कान्हा बोला—

     

    “नहीं बाबा, दो होने चाहिए।”

     

    यशोदा ने दोनों को प्यार से देखा।

     

    रात को कान्हा सोने के लिए अपनी माँ के पास गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज मैंने बाबा को सुंदर बनाया।”

     

    “कैसे?”

     

    “उनकी पगड़ी में मोरपंख लगाया।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और कल?”

     

    कान्हा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “कल?”

     

    “हाँ, कल क्या शरारत करोगे?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारा ये ‘कुछ नहीं’ सुनकर ही मुझे डर लगता है।”

     

    कान्हा माँ की गोद में सिर रखकर मुस्कुराने लगे।

     

    लेकिन अगले दिन उनके मन में एक नया विचार जन्म ले चुका था।

     

    नंद बाबा की पगड़ी के बाद अब उनकी नजर वृंदावन की सबसे ऊँची पेड़ की डाल पर लगे मीठे जामुनों पर थी।

     

    और कान्हा ने तय कर लिया था कि वह अकेले जामुन नहीं खाएँगे…

     

    पूरे ग्वाल-बालों को खिलाएँगे।

     

    लेकिन जामुन तोड़ते समय जो होने वाला था, उसका अंदाजा किसी को नहीं था।

  • कान्हा और दूध मटकी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

     कान्हा और नंद बाबा की दूध वाली मटकी

     

    अगली सुबह नंद भवन में बहुत हलचल थी। नंद बाबा ने गाँव की गायों से खूब सारा ताजा दूध इकट्ठा करवाया था। आज उन्होंने खुद दूध से दही और माखन बनाने का फैसला किया था।

     

    यशोदा मैया रसोई में थीं और नंद बाबा आँगन में बड़ी-बड़ी मटकियों को एक जगह रखवा रहे थे।

     

    उन्होंने एक बहुत बड़ी मटकी उठाई और यशोदा से कहा—

     

    “यशोदा, इसे संभालकर रखना। इसमें आज का सबसे अच्छा दूध है।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “आप चिंता मत कीजिए।”

     

    दरवाजे के पीछे खड़ा कान्हा सब सुन रहा था।

     

    उसकी नजर तुरंत उस बड़ी मटकी पर गई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “देख रहे हो?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो बड़ी वाली मटकी।”

     

    “हाँ।”

     

    “बाबा ने कहा है इसमें सबसे अच्छा दूध है।”

     

    दोस्त ने तुरंत समझ लिया।

     

    “तुम फिर कुछ करने वाले हो?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैंने अभी कुछ कहा थोड़ी है।”

     

    दोस्त बोला—

     

    “लेकिन तुम्हारे चेहरे से सब पता चल रहा है।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद नंद बाबा गायों को देखने बाहर चले गए।

     

    यशोदा भी रसोई के दूसरे काम में लग गईं।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उस मटकी के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने मटकी को देखा।

     

    फिर अपने दोस्तों को देखा।

     

    “बहुत बड़ी है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे उठाना मुश्किल होगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “उठानी ही क्यों है? बस थोड़ा दूध निकालेंगे।”

     

    उन्होंने एक छोटी कटोरी उठाई।

     

    मटकी का ढक्कन हटाया।

     

    दूध देखकर कान्हा के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने कटोरी में दूध भरा।

     

    पहला घूँट लिया।

     

    “वाह!”

     

    दोस्तों ने भी दूध माँगा।

     

    कान्हा ने सबको थोड़ा-थोड़ा दूध दिया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, बहुत स्वादिष्ट है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने कहा था ना, बाबा ने सबसे अच्छा दूध रखा है।”

     

    तभी बाहर से गाय की आवाज आई।

     

    कान्हा तुरंत रुक गए।

     

    “बाबा आ गए?”

     

    सभी बच्चे डर गए।

     

    लेकिन आवाज बाहर की गायों की थी।

     

    कान्हा ने राहत की साँस ली।

     

    “अभी समय है।”

     

    उन्होंने फिर कटोरी भरनी शुरू कर दी।

     

    लेकिन तभी मटकी थोड़ी हिल गई।

     

    “अरे!”

     

    एक दोस्त ने मटकी पकड़ ली।

     

    “संभालो!”

     

    कान्हा ने जल्दी से उसे सीधा किया।

     

    “अगर ये गिर गई तो मैया हमें छोड़ेंगी नहीं।”

     

    सब बच्चे चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद कान्हा ने कहा—

     

    “बस, अब बहुत हुआ।”

     

    उन्होंने ढक्कन वापस रख दिया।

     

    बच्चे वहाँ से निकलने लगे।

     

    लेकिन कान्हा ने जाते-जाते मटकी की तरफ देखा।

     

    “कल फिर आएँगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “कल क्यों?”

     

    सभी बच्चे जम गए।

     

    नंद बाबा दरवाजे पर खड़े थे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे पीछे मुड़े।

     

    “बाबा…”

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या कर रहे थे?”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    एक दोस्त पीछे हटने लगा।

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “सब यहीं खड़े रहो।”

     

    कान्हा ने अपनी कटोरी छिपा ली।

     

    नंद बाबा ने देखा और मुस्कुराने लगे।

     

    “कान्हा, हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने हाथ आगे किया।

     

    कटोरी में दूध था।

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तो तुमने दूध चुराया?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं बाबा।”

     

    “तो ये क्या है?”

     

    “मैं चख रहा था।”

     

    “किससे पूछकर?”

     

    कान्हा ने कुछ सोचकर कहा—

     

    “गाय से।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    “गाय ने अनुमति दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।

     

    “अच्छा, तो अब गाय से ही पूछना पड़ेगा।”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “तुम्हारा कान्हा मेरी दूध वाली मटकी तक पहुँच गया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, हमने बहुत थोड़ा सा लिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “थोड़ा?”

     

    उन्होंने मटकी देखी।

     

    “अरे, आधी कटोरी भी कम नहीं है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “इतने सारे बच्चे थे ना।”

     

    यशोदा ने बाकी बच्चों को देखा।

     

    सबने सिर झुका लिया।

     

    नंद बाबा हँसते हुए बोले—

     

    “यशोदा, इन्हें डाँटो मत। बच्चों ने दूध ही तो पिया है।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “लेकिन बिना पूछे?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “अगर दूध अच्छा है तो बच्चों को मिलना भी चाहिए।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “सुना मैया?”

     

    यशोदा ने उन्हें घूरकर देखा।

     

    “तुम्हारे बाबा ने तुम्हें बचा लिया, लेकिन अगली बार पहले पूछना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    नंद बाबा ने बच्चों को पास बुलाया।

     

    “चलो, अब सबको मैं खुद दूध पिलाता हूँ।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “बाबा, सच?”

     

    “हाँ।”

     

    नंद बाबा ने दूध के गिलास भर दिए।

     

    सभी बच्चों ने दूध पिया।

     

    कान्हा ने अपना गिलास खत्म करके कहा—

     

    “बाबा, आज वाला दूध बहुत अच्छा था।”

     

    नंद बाबा बोले—

     

    “क्योंकि गायों को आज सुबह बहुत अच्छी घास मिली थी।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “तो क्या गायें भी खुश थीं?”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “हाँ। जानवर खुश रहें तो उनका दूध भी अच्छा होता है।”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तो हमें गायों को भी अच्छा खाना देना चाहिए।”

     

    नंद बाबा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बिल्कुल।”

     

    उस दिन से कान्हा ने गायों को चारा देने की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    सुबह होते ही वह गायों के पास जाते।

     

    “आओ, तुम्हारे लिए घास लाया हूँ।”

     

    गायें उनके आसपास इकट्ठी हो जातीं।

     

    एक दिन कान्हा ने एक गाय को चारा देते हुए देखा कि वह कुछ खा नहीं रही।

     

    उन्होंने नंद बाबा को बुलाया।

     

    “बाबा, इसे क्या हुआ?”

     

    नंद बाबा ने गाय को देखा।

     

    “शायद इसे भूख नहीं है।”

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

     

    “इसे आराम करने दो।”

     

    नंद बाबा मुस्कुराए।

     

    “तुम अब गायों की भाषा भी समझने लगे हो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “ये मेरी दोस्त हैं।”

     

    दोपहर को यशोदा ने देखा कि कान्हा बाहर गायों के बीच बैठे हैं।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा, खाना खा लो!”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैया, पहले इन्हें खिला दूँ।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें खुद भी तो खाना है।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “सबके बाद मैं।”

     

    यशोदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    शाम को नंद बाबा ने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “आज से तुम्हें एक काम दूँगा।”

     

    कान्हा ने उत्सुक होकर पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “हर दिन गायों को चारा खिलाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “मैं जरूर करूँगा।”

     

    यशोदा ने दूर से यह देखा तो उन्हें अपने बेटे पर गर्व हुआ।

     

    रात को कान्हा माँ की गोद में लेटे थे।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “आज तुम्हें सबसे ज्यादा खुशी किस बात की हुई?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “बाबा ने मुझे गायों की देखभाल का काम दिया।”

     

    “और दूध?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “वो भी अच्छा था।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “तुम्हें हर चीज में खुशी मिल जाती है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “क्योंकि मेरे पास आप हो, बाबा हैं, मेरे दोस्त हैं और मेरी गायें भी।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “भगवान तुम्हें हमेशा ऐसा ही रखे।”

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन अगले ही पल उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ?”

     

    “कल माखन मिलेगा?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम सुधरोगे नहीं।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “माखन से दोस्ती थोड़ी छोड़ी जाती है।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    उन्हें पता था कि उनका नन्हा कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करे, उसके मन में प्रेम और अपनापन हमेशा सबसे ऊपर रहेगा।

     

    और अगले दिन कान्हा की नजर इस बार दूध की मटकी पर नहीं, बल्कि नंद बाबा की पगड़ी पर पड़ने वाली थी।

     

     

  • कान्हा और यमुना किनारे शरारत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यमुना किनारे की शरारत

     

    अगली सुबह वृंदावन में सूरज निकलने से पहले ही कान्हा की आँख खुल गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। आकाश हल्का-हल्का नीला हो रहा था। दूर से गायों की घंटियों की आवाज आ रही थी।

     

    कान्हा धीरे से बिस्तर से उठे और बाहर जाने लगे।

     

    तभी पीछे से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा वहीं रुक गए।

     

    “जी मैया?”

     

    यशोदा ने आँखें खोलकर पूछा—

     

    “इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “मैं तो बस बाहर देखने जा रहा था।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बाहर देखने के लिए इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत है?”

     

    कान्हा चुप हो गए।

     

    यशोदा समझ गईं।

     

    “फिर से कोई शरारत करने का मन है?”

     

    कान्हा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “बिल्कुल पक्का।”

     

    यशोदा ने उन्हें पास बुलाया और उनके बाल ठीक करते हुए कहा—

     

    “यमुना के बहुत पास मत जाना। और अपने दोस्तों से अलग मत होना।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ घर से निकल पड़े।

     

    आज उनका मन यमुना किनारे जाने का था।

     

    रास्ते में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, आज क्या खेलेंगे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “आज हम यमुना किनारे दौड़ लगाएंगे।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “और अगर तुम हार गए तो?”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “मैं कभी नहीं हारता।”

     

    तीसरा बच्चा बोला—

     

    “कल तो तुम पेड़ पर चढ़ते समय गिर गए थे।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “वो गिरना नहीं था। मैं नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था।”

     

    सभी बच्चे जोर से हँस पड़े।

     

    कुछ ही देर में वे यमुना किनारे पहुँच गए।

     

    यमुना का पानी शांत था। किनारे पर हरी घास थी और पास के पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे।

     

    कान्हा ने अपनी बांसुरी निकाली और एक पत्थर पर बैठ गए।

     

    उन्होंने धीरे-धीरे बांसुरी बजानी शुरू की।

     

    सभी बच्चे शांत होकर सुनने लगे।

     

    कुछ देर बाद एक मोर भी पास आ गया।

     

    कान्हा ने बांसुरी बजाना बंद किया तो मोर भी रुक गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, इसे भी तुम्हारी बांसुरी पसंद है।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “ये मेरा दोस्त है।”

     

    तभी एक बच्चे ने यमुना में तैरती हुई कमल की पत्तियाँ देखीं।

     

    वह बोला—

     

    “कान्हा, देखो कितनी सुंदर पत्तियाँ हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो उन्हें देखते हैं।”

     

    सब बच्चे पानी के किनारे पहुँच गए।

     

    कान्हा ने एक छोटी लकड़ी उठाई और पानी में पड़ी पत्ती को अपनी ओर खींचने लगे।

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “बहुत अंदर मत जाना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं किनारे पर ही हूँ।”

     

    तभी उन्हें पानी में एक छोटी सी नाव दिखाई दी।

     

    नाव किनारे से थोड़ी दूर थी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो नाव में बैठते हैं।”

     

    एक दोस्त घबरा गया।

     

    “नहीं, हमें बाबा ने पानी में जाने से मना किया है।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “ठीक है, नाव में नहीं जाएँगे।”

     

    उन्होंने पास पड़ी एक लंबी लकड़ी उठाई और नाव को किनारे की ओर खींचने लगे।

     

    बच्चे उनकी मदद करने लगे।

     

    कुछ कोशिश के बाद नाव किनारे आ गई।

     

    कान्हा खुशी से बोले—

     

    “देखा! बिना पानी में उतरे भी नाव आ गई।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    तभी अचानक एक तेज हवा चली।

     

    कान्हा की बांसुरी उनके हाथ से छूटकर घास में गिर गई।

     

    “मेरी बांसुरी!”

     

    कान्हा उसे ढूँढ़ने लगे।

     

    सभी बच्चे अलग-अलग तरफ खोजने लगे।

     

    लेकिन बांसुरी कहीं दिखाई नहीं दी।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद हवा से आगे चली गई।”

     

    कान्हा चिंतित हो गए।

     

    “मेरी बांसुरी मुझे बहुत प्यारी है।”

     

    वे घास में झुककर खोजने लगे।

     

    तभी उन्हें दूर एक छोटी सी लड़की दिखाई दी।

     

    वह किनारे पर बैठी थी और हाथ में वही बांसुरी थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “ये मेरी बांसुरी है।”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मुझे ये घास में मिली थी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ, ये मेरी है।”

     

    लड़की ने बांसुरी वापस कर दी।

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “तुम यहाँ अकेली क्यों बैठी हो?”

     

    लड़की बोली—

     

    “मैं अपनी माँ के साथ आई थी। वो थोड़ी दूर गई हैं।”

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी माँ कहाँ हैं?”

     

    लड़की ने नदी की दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    कान्हा समझ गए कि वह अपनी माँ से अलग हो गई थी।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “हमें इसे इसकी माँ के पास पहुँचाना चाहिए।”

     

    सभी बच्चे लड़की के साथ चल पड़े।

     

    थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक महिला परेशान होकर इधर-उधर देखते हुए दिखाई दी।

     

    लड़की अपनी माँ को देखते ही दौड़ पड़ी।

     

    “माँ!”

     

    महिला ने उसे गले लगा लिया।

     

    उसने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी बेटी को यहाँ तक पहुँचाया?”

     

    कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    महिला ने हाथ जोड़ते हुए कहा—

     

    “बेटा, भगवान तुम्हें खुश रखे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “आप बस इसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    महिला मुस्कुराई।

     

    “अब नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा वापस अपने दोस्तों के पास लौट आए।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें याद आया कि उन्हें घर भी लौटना था।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब मैया डाँटेंगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हमने कोई गलत काम तो किया नहीं।”

     

    दूसरा बोला—

     

    “लेकिन हम काफी देर से यहाँ हैं।”

     

    कान्हा ने आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज काफी ऊपर आ चुका था।

     

    “अरे! सच में बहुत देर हो गई।”

     

    सभी बच्चे तेजी से घर की तरफ भागने लगे।

     

    उधर नंद भवन में यशोदा मैया बार-बार बाहर देख रही थीं।

     

    नंद बाबा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “कान्हा अभी तक नहीं आया।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “बच्चों के साथ गया है। आता होगा।”

     

    लेकिन कुछ देर बाद कान्हा अपने दोस्तों के साथ दौड़ते हुए आ गए।

     

    यशोदा ने उन्हें देखते ही पकड़ लिया।

     

    “कहाँ थे इतनी देर?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “यमुना किनारे।”

     

    “मैंने कहा था ज्यादा दूर मत जाना।”

     

    “हम दूर नहीं गए थे।”

     

    “फिर इतनी देर क्यों?”

     

    कान्हा ने सारी बात बता दी।

     

    यशोदा ने ध्यान से सुना।

     

    जब उन्हें पता चला कि कान्हा ने एक बच्ची को उसकी माँ तक पहुँचाया, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हो गया।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “तुमने अच्छा काम किया, लेकिन बिना बताए इतनी देर तक बाहर रहना ठीक नहीं।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “माफ कर दो मैया।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस अगली बार मुझे बता देना।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पक्का।”

     

    तभी उनके एक दोस्त ने पीछे से कहा—

     

    “मैया, कान्हा ने आज नाव भी किनारे खींची थी!”

     

    यशोदा ने कान्हा की तरफ देखा।

     

    “नाव?”

     

    कान्हा चुप।

     

    “तुमने नाव में जाने की कोशिश तो नहीं की?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया। हमने नाव को खुद ही किनारे बुला लिया।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हारी बातें भी ना!”

     

    उन्होंने कान्हा को अपने पास बैठाया और उन्हें खाना खिलाने लगीं।

     

    कान्हा खाते-खाते बोले—

     

    “मैया, आज मैंने एक बात सीखी।”

     

    “क्या?”

     

    “जिसे रास्ता न मिले, उसका रास्ता दिखाना चाहिए।”

     

    यशोदा ने मुस्कुराकर पूछा—

     

    “ये किसने सिखाया?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मुझे खुद समझ आया।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    “मेरे नन्हे कान्हा की शरारतों के बीच इतनी समझदारी भी छिपी है, ये तो मुझे आज पता चला।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    शाम को वह आँगन में बैठे अपनी बांसुरी बजाने लगे।

     

    वही मोर दूर पेड़ के पास आकर बैठ गया।

     

    गायें भी शांत होकर उन्हें देखने लगीं।

     

    यशोदा दरवाजे पर खड़ी अपने बेटे को देख रही थीं।

     

    उन्हें लगा कि कान्हा चाहे कितनी भी शरारतें करें, उनके मन में दूसरों के लिए हमेशा प्यार रहता है।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा ने बांसुरी बजाते-बजाते अपने दोस्तों की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया।

     

    दोस्त समझ गए।

     

    कान्हा की अगली शरारत की योजना फिर शुरू हो चुकी थी।

     

    और इस बार निशाना था—

     

    नंद बाबा की नई बनाई हुई दूध की बड़ी मटकी।

  • नन्हे कान्हा की बाल लीलाएं

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ कान्हा और यशोदा मैया की रंगोली

     

    वृंदावन में सुबह होते ही हर तरफ चहल-पहल शुरू हो गई थी। गोपियाँ अपने घरों के बाहर आँगन साफ कर रही थीं। कोई फूलों की माला बना रही थी तो कोई घर के दरवाजे पर सुंदर रंगोली सजा रही थी।

     

    उस दिन नंद भवन के पास रहने वाली गोपी राधिका ने अपने आँगन में बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी। उसने कई रंगों से फूल, पत्तियाँ और बीच में एक बड़ा सा मोर बनाया था।

     

    राधिका रंगोली पूरी करके पीछे हटी और खुशी से बोली—

     

    “आज तो मेरी रंगोली सबसे सुंदर लग रही है।”

     

    पास खड़ी दूसरी गोपी ने कहा—

     

    “सच में बहुत सुंदर है। बस इसे कान्हा से बचाकर रखना।”

     

    राधिका का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “अरे हाँ! कान्हा ने देख लिया तो मेरी सारी मेहनत खराब कर देगा।”

     

    उधर थोड़ी दूरी पर खड़े कान्हा अपने दोस्तों के साथ यह बात सुन रहे थे।

     

    कान्हा ने अपने दोस्त से धीरे से कहा—

     

    “तुमने सुना?”

     

    दोस्त बोला—

     

    “क्या?”

     

    “वो कह रही है कि मैं उसकी रंगोली खराब कर दूँगा।”

     

    दोस्त हँस पड़ा।

     

    “तो क्या करोगे?”

     

    कान्हा ने आँखों में शरारत भरकर कहा—

     

    “कुछ नहीं।”

     

    दोस्त ने कहा—

     

    “तुम्हारे चेहरे से तो लग रहा है कि जरूर कुछ करोगे।”

     

    कान्हा मुस्कुराए और चुप हो गए।

     

    कुछ देर बाद राधिका घर के अंदर चली गई।

     

    कान्हा धीरे-धीरे उसके आँगन के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने रंगोली को देखा।

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    उनके दोस्त भी पास आ गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “इसे मत छूना। बहुत मेहनत से बनाई है।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं खराब थोड़ी करूँगा।”

     

    उन्होंने अपनी छोटी सी उंगली रंग के पास ले जाकर रोक ली।

     

    फिर अचानक उन्होंने रंगोली के बीच एक छोटा सा बांसुरी का निशान बना दिया।

     

    दोस्तों ने मुँह पर हाथ रखकर हँसी रोक ली।

     

    कान्हा बोले—

     

    “अब ये मेरी भी हो गई।”

     

    तभी राधिका बाहर आ गई।

     

    उसने रंगोली देखी।

     

    पहले तो वह चौंकी।

     

    फिर कान्हा को देखकर बोली—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा भागने लगे।

     

    राधिका उनके पीछे दौड़ी।

     

    “रुको! आज तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”

     

    कान्हा हँसते हुए बोले—

     

    “मैंने रंगोली खराब नहीं की। मैंने तो उसमें बांसुरी बनाई है।”

     

    “तुमने मेरी पूरी रंगोली में अपनी बांसुरी क्यों बना दी?”

     

    “क्योंकि तुमने मोर बनाया था। मोर को भी तो बांसुरी सुननी चाहिए।”

     

    राधिका कुछ बोल नहीं पाई।

     

    पास खड़े बच्चे हँसने लगे।

     

    राधिका ने कहा—

     

    “तुम्हारी बातें सुनकर गुस्सा भी नहीं आता।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर गुस्सा मत करो।”

     

    राधिका ने हाथ में थोड़ा रंग लिया और कान्हा के गाल पर लगा दिया।

     

    “अब बराबर!”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने भी रंग उठाया और राधिका के गाल पर लगा दिया।

     

    अब बाकी बच्चे भी रंग लगाने लगे।

     

    कुछ ही पल में पूरा आँगन रंगों से भर गया।

     

    राधिका की सुंदर रंगोली जरूर खराब हो गई थी, लेकिन आँगन में बच्चों की हँसी गूँज रही थी।

     

    तभी वहाँ यशोदा मैया आ गईं।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    सब बच्चे एकदम शांत हो गए।

     

    यशोदा ने रंगोली की तरफ देखा।

     

    फिर कान्हा की तरफ।

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “मैया, मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तो ये रंग तुम्हारे गाल पर कैसे आया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “राधिका ने लगाया।”

     

    राधिका तुरंत बोली—

     

    “पहले कान्हा ने लगाया था!”

     

    यशोदा मुस्कुराने लगीं।

     

    उन्होंने कान्हा का हाथ पकड़ा।

     

    “चलो मेरे साथ।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कहाँ?”

     

    “घर।”

     

    “क्यों?”

     

    “तुम्हारे कपड़े देखे हैं?”

     

    कान्हा ने नीचे देखा।

     

    उनका पूरा कुर्ता रंगों से भर गया था।

     

    वह हँसने लगे।

     

    “मैया, आज तो मैं बहुत सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “हाँ, बिल्कुल रंगों की पोटली जैसे।”

     

    कान्हा हँसते हुए उनके साथ चल दिए।

     

    घर पहुँचकर यशोदा ने उन्हें पानी से साफ किया।

     

    कान्हा बार-बार पानी से बचने की कोशिश करते।

     

    “मैया, ठंडा पानी है!”

     

    “चुपचाप बैठो।”

     

    “मैया, आँख में चला गया।”

     

    “आँखें बंद कर लो।”

     

    “मैया, कान में चला गया।”

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    यशोदा भी आखिर मुस्कुरा दीं।

     

    उन्होंने कान्हा के बाल साफ किए और कपड़े बदलाए।

     

    फिर उन्हें पास बैठाकर बोलीं—

     

    “कान्हा, किसी की मेहनत खराब नहीं करनी चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मुझसे गलती हो गई।”

     

    “अगर तुम्हें रंगोली पसंद आई थी तो तुम राधिका से पूछ सकते थे।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैं उससे माफी माँगूँगा।”

     

    यशोदा ने उनके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस यही बात अच्छी है।”

     

    कुछ देर बाद कान्हा वापस राधिका के घर पहुँचे।

     

    राधिका नई रंगोली बना रही थी।

     

    कान्हा उसके पास गए।

     

    “राधिका।”

     

    राधिका ने उनकी तरफ देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    राधिका मुस्कुरा दी।

     

    “ठीक है।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

     

    राधिका ने सोचा।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन इस बार रंगोली खराब मत करना।”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “नहीं करूँगा।”

     

    दोनों मिलकर रंगोली बनाने लगे।

     

    कान्हा ने फूलों के लिए पीला रंग दिया।

     

    राधिका ने नीला रंग लगाया।

     

    कुछ देर बाद रंगोली पहले से भी सुंदर बन गई।

     

    कान्हा ने उसे देखकर कहा—

     

    “अब ये सच में सुंदर है।”

     

    राधिका बोली—

     

    “क्योंकि इस बार तुमने इसे बिगाड़ा नहीं।”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    तभी उनके दोस्त आ गए।

     

    एक बोला—

     

    “कान्हा, चलो! नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “तुम लोग जाओ, मैं अभी आता हूँ।”

     

    दोस्तों के जाते ही राधिका ने पूछा—

     

    “तुम्हें इतनी शरारत करने की जरूरत क्यों पड़ती है?”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि जब सब हँसते हैं ना, तो मुझे अच्छा लगता है।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “लेकिन कभी-कभी तुम्हारी शरारत से किसी को दुख भी हो सकता है।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “अब ध्यान रखूँगा।”

     

    शाम को यशोदा ने कान्हा को बुलाया।

     

    “आज क्या किया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “आज मैंने रंगोली बनाई।”

     

    “खराब तो नहीं की?”

     

    “नहीं मैया। इस बार मैंने बनवाई है।”

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “सच?”

     

    कान्हा ने गर्व से सिर हिलाया।

     

    “हाँ। और राधिका ने मुझे माफ भी कर दिया।”

     

    यशोदा ने उन्हें गले लगा लिया।

     

    “मेरा कान्हा बड़ा हो रहा है।”

     

    कान्हा तुरंत बोले—

     

    “नहीं मैया, मैं बड़ा नहीं होना चाहता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि बड़ा हो गया तो आप मुझे गोद में नहीं उठाओगी।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया।

     

    “तुम चाहे कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए हमेशा मेरे नन्हे कान्हा ही रहोगे।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डाल दिया।

     

    बाहर शाम की हवा चल रही थी और वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    लेकिन उसी समय कान्हा के दोस्तों ने बाहर से आवाज लगाई—

     

    “कान्हा! जल्दी आओ!”

     

    कान्हा ने यशोदा से पूछा—

     

    “मैया, जाऊँ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “जाओ, लेकिन आज कोई नई शरारत मत करना।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैं कोशिश करूँगा।”

     

    और यह कहते ही वह दौड़ते हुए बाहर निकल गए।

     

    यशोदा उन्हें जाते हुए देखती रहीं और मुस्कुराकर बोलीं—

     

    “ये ‘कोशिश’ कह रहा है… मतलब आज फिर कोई शरारत होने वाली है।”

     

    और सच में, अगले दिन कान्हा की शरारत वृंदावन की रंगोली से निकलकर यमुना किनारे तक पहुँचने वाली थी।

     

  • नन्हा कान्हा और यशोदा मैया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

     

    कान्हा और यशोदा मैया की छुपी हुई मटकी

     

    वृंदावन में उस दिन सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। कहीं मटकी में दही जम रहा था तो कहीं मक्खन निकाला जा रहा था। नंद भवन में भी यशोदा मैया सुबह से काम में लगी हुई थीं।

     

    यशोदा मैया को अब अपने कान्हा की माखन चोरी की आदत अच्छी तरह पता चल चुकी थी।

     

    इसलिए उन्होंने आज एक नई योजना बनाई।

     

    उन्होंने खूब सारा ताजा माखन निकाला और उसे एक बड़ी मटकी में भर दिया। फिर उस मटकी को घर के ऐसे कमरे में रख दिया जहाँ कान्हा की नजर आसानी से न पहुँच सके।

     

    यशोदा ने मन ही मन कहा—

     

    “आज देखती हूँ मेरा नटखट कान्हा माखन कैसे ढूँढ़ता है।”

     

    उन्हें क्या पता था कि कान्हा को रोकना इतना आसान नहीं था।

     

    उसी समय कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में खेल रहे थे।

     

    एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला—

     

    “कान्हा! आज मैया ने माखन कहीं छिपा दिया है।”

     

    कान्हा ने खेलना छोड़ दिया।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। मैंने देखा है। मैया मटकी लेकर अंदर गई थीं।”

     

    कान्हा ने आँखें सिकोड़कर कहा—

     

    “तो आज माखन ढूँढ़ने का खेल खेलेंगे।”

     

    सभी बच्चे खुश हो गए।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “लेकिन अगर यशोदा मैया ने पकड़ लिया तो?”

     

    कान्हा हँस पड़े।

     

    “पकड़ लिया तो कह देंगे हम तो छुपन-छुपाई खेल रहे थे।”

     

    सब बच्चे धीरे-धीरे घर के अंदर जाने लगे।

     

    कान्हा सबसे आगे थे।

     

    उन्होंने पहले रसोई में देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    फिर उन्होंने अनाज वाले कमरे में देखा।

     

    वहाँ भी कुछ नहीं मिला।

     

    फिर एक छोटे कमरे में गए।

     

    कान्हा ने चारों तरफ देखा।

     

    “यहाँ भी नहीं।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कहीं मैया ने मटकी बाहर तो नहीं रख दी?”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। माखन घर के अंदर ही है। मुझे इसकी खुशबू आ रही है।”

     

    बच्चे हँसने लगे।

     

    कान्हा धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    तभी उन्हें एक बंद दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उन्होंने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    कान्हा बोले—

     

    “यही है!”

     

    एक दोस्त डरते हुए बोला—

     

    “कान्हा, इसे मत खोलो।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “माखन यहीं है।”

     

    उन्होंने दरवाजा खटखटाया।

     

    अंदर से कोई आवाज नहीं आई।

     

    कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—

     

    “तुम सब पीछे हटो।”

     

    फिर उन्होंने धीरे से दरवाजे की कुंडी उठाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    कान्हा धीरे-धीरे अंदर गए।

     

    एक कोने में बड़ी सी मटकी रखी थी।

     

    कान्हा के चेहरे पर चमक आ गई।

     

    “मिल गया!”

     

    सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।

     

    कान्हा मटकी के पास गए।

     

    उन्होंने ढक्कन हटाया।

     

    ताजा सफेद माखन देखकर उनकी आँखें चमकने लगीं।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, जल्दी करो। मैया आ जाएँगी।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “पहले सबको मिलेगा।”

     

    उन्होंने हाथ से माखन निकाला और दोस्तों को देने लगे।

     

    तभी बाहर से यशोदा मैया की आवाज आई—

     

    “कान्हा!”

     

    सभी बच्चों के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    कान्हा ने जल्दी से कहा—

     

    “सब छिप जाओ!”

     

    कोई परदे के पीछे छिप गया।

     

    कोई संदूक के पीछे।

     

    कान्हा खुद मटकी के पीछे बैठ गए।

     

    यशोदा कमरे के पास पहुँचीं।

     

    उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।

     

    वह समझ गईं कि उनकी योजना पकड़ ली गई है।

     

    उन्होंने अंदर जाकर कहा—

     

    “कान्हा, बाहर आ जाओ।”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    “मुझे पता है तुम यहीं हो।”

     

    फिर भी चुप्पी।

     

    यशोदा ने मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “अच्छा, अगर कान्हा नहीं निकले तो मैं ये माखन किसी और को दे दूँगी।”

     

    मटकी के पीछे से तुरंत आवाज आई—

     

    “नहीं!”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा धीरे-धीरे बाहर निकले।

     

    उनके हाथ और गाल माखन से भरे थे।

     

    यशोदा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।

     

    “तो तुम यहाँ माखन ढूँढ़ रहे थे?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “जी मैया।”

     

    “मैंने माखन छिपाया था।”

     

    “मुझे पता है।”

     

    “फिर भी तुमने ढूँढ़ लिया?”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “मैया, आप माखन छिपा सकती हो, लेकिन उसकी खुशबू नहीं।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “और ये सारे बच्चे?”

     

    कान्हा ने पीछे देखा।

     

    सभी बच्चे धीरे-धीरे बाहर आ गए।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, गलती हमारी नहीं थी। कान्हा हमें लेकर आए थे।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “अरे! दोस्ती में सबकी गलती बराबर होती है।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “अच्छा! अब दोस्ती भी याद आ रही है?”

     

    कान्हा मुस्कुरा दिए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी उठाई।

     

    “ठीक है। आज मैं तुम्हें माखन दूँगी।”

     

    कान्हा खुश हो गए।

     

    “सच?”

     

    “हाँ। लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “पहले तुम मेरे लिए एक काम करोगे।”

     

    कान्हा ने पूछा—

     

    “कौन सा?”

     

    “आँगन में जो मटके पड़े हैं, उन्हें सही जगह रखना होगा।”

     

    कान्हा कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “माखन कितना मिलेगा?”

     

    यशोदा हँसते हुए बोलीं—

     

    “काम के हिसाब से।”

     

    कान्हा ने तुरंत अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “चलो, काम करते हैं।”

     

    बच्चे मटके उठाने लगे।

     

    कुछ ही देर में आँगन साफ हो गया।

     

    यशोदा ने देखा तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

     

    उन्होंने सब बच्चों को माखन और मिश्री दी।

     

    कान्हा ने अपना हिस्सा लिया और आधा अपने दोस्तों को दे दिया।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम अपना माखन भी बाँट देते हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “अकेले खाने में क्या मजा है?”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, तुम बहुत अच्छे हो।”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “लेकिन ये बात मैया को मत बताना।”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “मैंने सुन लिया है।”

     

    सभी बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    शाम को जब नंद बाबा घर लौटे तो उन्होंने देखा कि आँगन बहुत साफ था।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “आज क्या हुआ?”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “आपके बेटे ने आज माखन चुराया भी और घर का काम भी किया।”

     

    नंद बाबा हँस पड़े।

     

    उन्होंने कान्हा को पास बुलाया।

     

    “क्यों बेटा, आज क्या कारनामा किया?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “कुछ नहीं बाबा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “मटकी ढूँढ़ निकाली।”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “वाह! तुम्हारी नाक तो बहुत तेज है।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “बाबा, माखन की खुशबू मुझे दूर से बुलाती है।”

     

    नंद बाबा हँसने लगे।

     

    रात को कान्हा यशोदा की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

     

    यशोदा उनके बाल सहला रही थीं।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “कान्हा, तुम इतना माखन क्यों खाते हो?”

     

    कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “क्योंकि माखन मीठा होता है।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    “और माँ का प्यार?”

     

    कान्हा ने तुरंत कहा—

     

    “वो माखन से भी ज्यादा मीठा है।”

     

    यशोदा की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कान्हा को सीने से लगा लिया।

     

    कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।

     

    लेकिन सोने से पहले उन्होंने धीरे से पूछा—

     

    “मैया?”

     

    “हाँ बेटा?”

     

    “कल माखन कहाँ छिपाओगी?”

     

    यशोदा ने हँसते हुए कहा—

     

    “अब तो मैं तुम्हारे सामने ही रखूँगी।”

     

    कान्हा मुस्कुराए।

     

    “तो फिर कल चोरी करने में मजा नहीं आएगा।”

     

    यशोदा बोलीं—

     

    “तुम्हारी शरारतें भी ना!”

     

    कान्हा हँसते हुए माँ से लिपट गए।

     

    उस रात नंद भवन में शांति थी।

     

    लेकिन यशोदा जानती थीं कि अगले दिन उनका नन्हा कान्हा फिर कोई नई शरारत करने वाला है।

     

    और इस बार उसकी शरारत सिर्फ माखन की मटकी तक सीमित नहीं रहने वाली थी।

  • नन्हे कान्हा ओर माखन की मटकी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    नन्हे कान्हा और माखन की मटकी

     

    वृंदावन में सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतर रही थीं। गायों के गले में बंधी घंटियाँ बज रही थीं और गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। लेकिन नंद भवन में आज यशोदा मैया कुछ ज्यादा ही परेशान थीं।

     

    उन्होंने सुबह-सुबह माखन की मटकी खोली तो उसमें माखन बहुत कम था।

     

    यशोदा ने हैरानी से मटकी देखी।

     

    “कल तो मैंने पूरी मटकी भरी थी। इतनी जल्दी माखन खत्म कैसे हो गया?”

     

    उन्होंने घर में काम करने वाली गोपी से पूछा—

     

    “तुमने माखन निकाला था?”

     

    गोपी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं मैया। मैंने तो मटकी को हाथ तक नहीं लगाया।”

     

    यशोदा कुछ समझ नहीं पाईं।

     

    तभी उन्हें बाहर से बच्चों की हँसी सुनाई दी।

     

    उन्होंने धीरे से दरवाजे के पास जाकर देखा।

     

    आँगन में कान्हा अपने दोस्तों के साथ बैठे थे। सभी बच्चे कुछ खाने में व्यस्त थे।

     

    यशोदा ने ध्यान से देखा।

     

    कान्हा के हाथ में माखन था।

     

    उन्होंने आवाज लगाई—

     

    “कान्हा!”

     

    कान्हा ने तुरंत माखन पीछे कर लिया।

     

    “जी मैया?”

     

    “इधर आओ।”

     

    कान्हा धीरे-धीरे उनके पास आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “तुम्हारे हाथ में क्या है?”

     

    कान्हा ने अपना हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “अच्छा? हाथ आगे करो।”

     

    कान्हा ने धीरे से हाथ आगे किया।

     

    उसमें सफेद माखन लगा हुआ था।

     

    यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

     

    “ये क्या है?”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाकर कहा—

     

    “माखन।”

     

    “और ये तुम्हारे हाथ में कैसे आया?”

     

    कान्हा कुछ पल सोचते रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “मैया, मैं तो बस देख रहा था कि माखन अच्छा बना है या नहीं।”

     

    यशोदा हँसते-हँसते बोलीं—

     

    “माखन देखकर हाथ में कैसे आ गया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “वो… हाथ खुद चला गया।”

     

    पास खड़े ग्वाल-बाल हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कान्हा तुरंत भाग गए।

     

    “कान्हा! रुको!”

     

    कान्हा आँगन के एक कोने से दूसरे कोने तक भागने लगे।

     

    यशोदा उनके पीछे दौड़ती रहीं।

     

    आखिर कान्हा एक बड़े घड़े के पीछे छिप गए।

     

    यशोदा ने जानबूझकर कहा—

     

    “लगता है मेरा कान्हा कहीं चला गया।”

     

    कान्हा चुप रहे।

     

    यशोदा दूसरी तरफ जाने लगीं।

     

    कान्हा धीरे से बाहर निकले।

     

    जैसे ही उन्होंने भागने के लिए कदम बढ़ाया, यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया।

     

    “मिल गए!”

     

    कान्हा हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “अब बताओ, माखन किसने खाया?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “मैंने नहीं खाया।”

     

    “तो?”

     

    “मेरे दोस्तों ने खाया।”

     

    ग्वाल-बाल एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा ने ही हमें बुलाया था।”

     

    कान्हा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी शिकायत कर दी?”

     

    बच्चा हँसने लगा।

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “कान्हा, अगर तुम्हें माखन चाहिए तो मुझसे माँग लिया करो। चोरी क्यों करते हो?”

     

    कान्हा ने मासूमियत से कहा—

     

    “माँगने पर तो आप थोड़ा देती हो। मटकी में बहुत सारा होता है।”

     

    यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “अच्छा, तो अब मटकी खाली कर दोगे?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “नहीं मैया।”

     

    “पक्का?”

     

    “पक्का।”

     

    अगले दिन यशोदा ने माखन की मटकी बहुत ऊँचाई पर रख दी।

     

    उन्होंने सोचा कि अब कान्हा वहाँ तक नहीं पहुँच पाएँगे।

     

    लेकिन कान्हा ने मटकी देखी तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “आज मटकी बहुत ऊपर है।”

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “तो आज माखन नहीं मिलेगा।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “क्यों नहीं मिलेगा? बस तरीका बदलना पड़ेगा।”

     

    उन्होंने बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर खड़ा किया।

     

    सबसे ऊपर कान्हा चढ़ गए।

     

    कान्हा ने मटकी पकड़ ली।

     

    “देखा! मैंने कहा था ना, माखन मिलेगा।”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “लेकिन मैया पकड़ लेंगी।”

     

    कान्हा हँसे।

     

    “पहले माखन तो निकालो।”

     

    मटकी नीचे उतारी गई।

     

    कान्हा ने उसे खोला।

     

    माखन की खुशबू फैल गई।

     

    सभी बच्चे खुशी से झूम उठे।

     

    कान्हा ने माखन बाँटा।

     

    किसी को थोड़ा मिला, किसी को ज्यादा।

     

    तभी एक बंदर भी वहाँ आ गया।

     

    कान्हा ने उसे भी माखन दे दिया।

     

    एक दोस्त ने पूछा—

     

    “तुम बंदर को क्यों दे रहे हो?”

     

    कान्हा बोले—

     

    “उसे भी भूख लगी है।”

     

    बंदर माखन लेकर पेड़ पर चढ़ गया।

     

    लेकिन तभी यशोदा वहाँ आ गईं।

     

    उन्होंने सब देख लिया था।

     

    “कान्हा!”

     

    बच्चे भाग गए।

     

    कान्हा वहीं खड़े रह गए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “फिर माखन चोरी?”

     

    कान्हा ने सिर झुका लिया।

     

    “मैया…”

     

    “आज तो तुम्हें सजा मिलेगी।”

     

    कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

     

    “कैसी सजा?”

     

    “आज तुम्हें मेरे साथ बैठकर पूरा माखन खाना होगा।”

     

    कान्हा की आँखें चमक उठीं।

     

    “सच?”

     

    यशोदा हँस पड़ीं।

     

    “तुम्हें लगा मैं तुम्हें सच में सजा दूँगी?”

     

    कान्हा दौड़कर उनकी गोद में बैठ गए।

     

    यशोदा ने माखन की कटोरी सामने रख दी।

     

    कान्हा ने पहला निवाला लिया और फिर अपनी माँ को खिलाया।

     

    “पहले आप।”

     

    यशोदा ने कहा—

     

    “मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि माखन आपने बनाया है।”

     

    यशोदा की आँखों में प्यार भर आया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    उस दिन शाम को कई गोपियाँ फिर शिकायत लेकर आईं।

     

    एक बोली—

     

    “यशोदा, तुम्हारा कान्हा हमारे घर की मटकी भी खाली कर गया।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “और मेरे घर तो बंदरों को भी बुला लाया।”

     

    यशोदा ने कान्हा की ओर देखा।

     

    कान्हा धीरे से मुस्कुराए।

     

    एक गोपी बोली—

     

    “लेकिन सच कहूँ तो जब से कान्हा हमारे घर आने लगा है, घर में रौनक हो गई है।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “पहले हम माखन बनाकर रखती थीं, अब बनाते ही सोचती हैं कि कान्हा कब आएगा।”

     

    यशोदा मुस्कुराईं।

     

    कान्हा गोपियों की तरफ देखकर बोले—

     

    “तो कल से मैं सबके घर आऊँगा।”

     

    सभी गोपियाँ एक साथ बोलीं—

     

    “नहीं!”

     

    पूरा आँगन हँसी से भर गया।

     

    कान्हा भी खिलखिलाकर हँसने लगे।

     

    यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया।

     

    “मेरे नटखट कान्हा, तुम्हारी शरारतों से पूरा वृंदावन परेशान भी है और खुश भी।”

     

    कान्हा ने माँ के गले में हाथ डालकर कहा—

     

    “मैया, मैं शरारत नहीं करता। मैं तो सबको खुश करता हूँ।”

     

    यशोदा ने उनके माथे पर प्यार किया।

     

    और सच ही तो था।

     

    कान्हा की माखन चोरी सिर्फ माखन की चोरी नहीं थी। उनके बहाने हर घर में हँसी पहुँचती थी, हर आँगन में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी और हर गोपी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।

     

    इसीलिए वृंदावन में जब भी कोई माखन की खाली मटकी देखता, तो गुस्सा करने के बजाय मुस्कुराकर कहता—

     

    “लगता है कान्हा यहाँ होकर गए हैं।”

     

     

    . नन्हे कान्हा और खोया हुआ बछड़ा

     

    एक सुबह नंद बाबा ने कान्हा से कहा—

     

    “कान्हा, आज तुम अपने दोस्तों के साथ बछड़ों को चराने ले जाना।”

     

    कान्हा खुशी से उछल पड़े।

     

    “सच बाबा?”

     

    “हाँ, लेकिन ध्यान रखना। कोई बछड़ा झुंड से अलग नहीं होना चाहिए।”

     

    कान्हा ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सबका ध्यान रखूँगा।”

     

    कुछ ही देर बाद कान्हा अपने ग्वाल-बाल दोस्तों के साथ बछड़ों को लेकर जंगल की ओर निकल पड़े।

     

    रास्ते में बच्चे खेलते रहे।

     

    कोई पेड़ से फल तोड़ता, कोई फूल इकट्ठा करता और कान्हा कभी बांसुरी बजाते तो कभी बछड़ों के साथ दौड़ते।

     

    जंगल के पास पहुँचकर उन्होंने बछड़ों को हरी घास वाले मैदान में छोड़ दिया।

     

    कान्हा एक पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाने लगे।

     

    सभी बछड़े उनकी आवाज सुनकर शांत हो गए।

     

    कुछ देर बाद एक दोस्त ने कहा—

     

    “कान्हा, चलो नदी के पास चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “ठीक है, लेकिन पहले बछड़ों को देख लो।”

     

    सभी बच्चों ने बछड़ों को गिना।

     

    एक कम था।

     

    कान्हा ने तुरंत पूछा—

     

    “एक बछड़ा कहाँ गया?”

     

    सब बच्चे परेशान हो गए।

     

    उन्होंने चारों तरफ देखा।

     

    लेकिन बछड़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “शायद जंगल की तरफ चला गया।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “चलो, उसे ढूँढ़ते हैं।”

     

    सब बच्चे अलग-अलग दिशा में फैल गए।

     

    कान्हा ने बछड़े को आवाज दी—

     

    “आ जा… आ जा…”

     

    लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    तभी उन्हें झाड़ियों के पीछे से हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “कान्हा, इधर!”

     

    कान्हा दौड़कर वहाँ पहुँचे।

     

    एक छोटा बछड़ा झाड़ियों में फँसा हुआ था।

     

    उसका पैर एक बेल में उलझ गया था।

     

    कान्हा धीरे से उसके पास बैठ गए।

     

    “डर मत। मैं तुम्हें निकालता हूँ।”

     

    उन्होंने बेल को सावधानी से हटाया।

     

    बछड़ा आजाद हो गया।

     

    लेकिन वह बहुत डरा हुआ था।

     

    कान्हा ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

     

    “अब ठीक है।”

     

    बछड़ा कान्हा के पास आकर खड़ा हो गया।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “चलो, इसे वापस झुंड में ले चलते हैं।”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन जैसे ही वे आगे बढ़े, बछड़ा एक दिशा में देखने लगा।

     

    कान्हा समझ गए कि शायद उसकी माँ उसी तरफ होगी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “शायद इसकी माँ को ढूँढ़ना होगा।”

     

    एक दोस्त ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम ज्यादा दूर गए तो बाबा चिंता करेंगे।”

     

    कान्हा बोले—

     

    “हम जल्दी वापस आ जाएँगे।”

     

    वे बछड़े के पीछे चल पड़े।

     

    काफी देर तक जंगल में घूमने के बाद उन्हें घंटियों की आवाज सुनाई दी।

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “सुनो!”

     

    सबने ध्यान लगाया।

     

    घंटियों की आवाज लगातार आ रही थी।

     

    वे उसी दिशा में दौड़े।

     

    वहाँ गायों का एक बड़ा झुंड था।

     

    बछड़े ने अपनी माँ को देखते ही आवाज लगाई और दौड़कर उसके पास चला गया।

     

    गाय ने अपने बछड़े को प्यार से चाटा।

     

    कान्हा यह देखकर मुस्कुराने लगे।

     

    एक दोस्त बोला—

     

    “कान्हा, अब इसे यहीं छोड़ दें?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “नहीं। इसे अपनी माँ के साथ वापस ले चलेंगे।”

     

    वे दोनों को लेकर वापस लौटने लगे।

     

    जब वे मैदान में पहुँचे तो बाकी बछड़े भी उनके पास आ गए।

     

    लेकिन शाम होने तक कान्हा घर नहीं लौटे थे।

     

    यशोदा मैया चिंतित हो गईं।

     

    उन्होंने नंद बाबा से पूछा—

     

    “कान्हा अभी तक क्यों नहीं आया?”

     

    नंद बाबा ने कहा—

     

    “शायद बच्चों के साथ खेल रहा होगा।”

     

    लेकिन थोड़ी देर बाद बच्चे वापस आए।

     

    यशोदा ने पूछा—

     

    “कान्हा कहाँ है?”

     

    एक बच्चा बोला—

     

    “मैया, कान्हा एक बछड़े को उसकी माँ तक पहुँचाने गए थे।”

     

    यशोदा की चिंता और बढ़ गई।

     

    “कहाँ गए हैं?”

     

    “बस आते होंगे।”

     

    कुछ देर बाद दूर से कान्हा दिखाई दिए।

     

    उनके कपड़े मिट्टी से भरे थे।

     

    बालों में पत्ते लगे थे और कंधे पर बांसुरी लटकी हुई थी।

     

    यशोदा दौड़कर उनके पास पहुँचीं।

     

    “कहाँ चले गए थे?”

     

    कान्हा ने कहा—

     

    “मैया, एक बछड़ा खो गया था।”

     

    “तो तुम अकेले इतनी दूर चले गए?”

     

    “मैं अकेला नहीं था। मेरे दोस्त भी थे।”

     

    यशोदा ने उन्हें ध्यान से देखा।

     

    “तुम्हें पता है मैं कितनी परेशान थी?”

     

    कान्हा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

     

    “माफ कर दो मैया। अगली बार बिना बताए नहीं जाऊँगा।”

     

    यशोदा का गुस्सा तुरंत गायब हो गया।

     

    उन्होंने कान्हा को गले लगा लिया।

     

    “बस अपना ध्यान रखा करो।”